
इस्लामी क़ानून की मौलिक धारणाएँ (फ़िक़्हे इस्लामी: लेक्चर 6)
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फ़िक़्ह
- at 27 February 2025
डॉ. महमूद अहमद ग़ाज़ी
आज की चर्चा का शीर्षक है ‘इस्लामी क़ानून की मौलिक धारणाएँ’।
इस्लामी क़ानून की मौलिक धारणाओं से मुराद वे मौलिक सिद्धान्त हैं जो फ़िक़्हे-इस्लामी के तमाम विभागों में कार्यरत हैं और उन विभागों के बहुत-से आदेशों को संगठित करते हैं। फ़िक़्हे-इस्लामी के लगभग तमाम विभागों में इन सिद्धान्तों और धारणाओं के आधार पर बहुत-से आदेश दिए गए हैं। इन धारणाओं की हैसियत ऐसे मौलिक स्तंभों की है जिनपर फ़िक़्हे-इस्लामी की भव्य इमारत खड़ी है। उनकी हैसियत कई दृष्टि से ऐसे मार्गदर्शक सिद्धान्तों की है जिनका इस्लामी शरीअत ने हर जगह ध्यान रखा है। फ़िक़्हे-इस्लामी में जितने फ़तवे, इज्तिहादात और आदेश बयान किए गए हैं, उन्हें निकालने और क्रमबद्ध करने में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने इन सिद्धान्तों और धारणाओं को सामने रखा है।
इन सब मौलिक धारणाओं का उल्लेख करना और इन सबपर विस्तार से चर्चा तो बहुत मुश्किल है और एक लम्बा समय चाहती है। इसलिए इनमें से तुलनात्मक रूप से ज़्यादा महत्वपूर्ण धारणाओं का चयन करके उनका एक आरम्भिक परिचय मैं आपकी सेवा में पेश करना चाहता हूँ। इस संक्षिप्त परिचय से यह अनुमान कराना अभीष्ट है कि इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने पवित्र क़ुरआन और हदीसों पर किस-किस अंदाज़ से ग़ौर किया और उन्होंने पवित्र क़ुरआन से क्या-क्या विचारधाराएँ और धारणाएँ निकालीं। उनके आधार पर किस तरह फ़िक़ही इज्तिहादात की इमारत क़ायम हुई। और फिर किन विवरणों को सामने रखते हुए इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने वह क़ानूनी व्यवस्था संकलित की जो इस समय मानवता के इतिहास की सबसे परिपूर्ण और सफलतम क़ानूनी व्यवस्था है।
‘हक़’ की धारणा
सबसे पहले ‘हक़’ की शब्दावली को देखते हैं। आपने ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ और ‘हुक़ूक़ुल-इबाद’ की शब्दावलियाँ सुनी होंगी। ‘हक़’ की शब्दावली हमारी नित्य चर्चा में भी बहुत अधिक प्रयुक्त होती है। लोग कहते हैं यह मेरा ‘हक़’ है, यह अमुक का ‘हक़’ है और वह अमुक का ‘हक़’ है। सवाल यह पैदा होता है कि क्या चीज़ ‘हक़’ है और क्या चीज़ ‘हक़’ नहीं है। ‘हक़’ इस्लामी फ़िक़्ह की एक मौलिक धारणा है। ‘हक़’ के शाब्दिक अर्थ तो उस चीज़ के हैं जो वास्तविकता के क़रीब हो, जो सच्चाई के समान हो। जो सचमुच दुनिया में मौजूद हो और वास्तविक रूप से पाई जाती हो। यानी झूठ न हो। अन्धविश्वास और कल्पना न हो। जिसके आधार पर किसी को कोई सांसारिक या पारलौकिक लाभ प्राप्त होता हो। जिसके आधार पर इंसानों के दरमियान लेन-देन हो सकता हो, उसको ‘हक़’ कहते हैं।
दीवानी क़ानून के सन्दर्भ में ‘हक़’ से मुराद वह पात्रता या entitlement है जिसकी माँग अदालत के द्वारा या किसी क़ानूनी संस्था और या हुकूमत के द्वारा की जा सके। ‘हक़’ के दो प्रकारों से सब परिचित हैं। ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ (अल्लाह के प्रति हमारी ज़िम्मेदारियाँ) और ‘हुक़ूक़ुल-इबाद’ (बन्दों के अधिकार)। ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ से मुराद अधिकतर वे सामूहिक ज़िम्मेदारियाँ होती हैं जिनको अंजाम देना हर मुसलमान का फ़र्ज़ है। ये वे फ़राइज़ (कर्तव्य) हैं जो या तो ख़ालिस इबादात के दायरे से सम्बन्ध रखते हैं, या मुसलमानों के सामूहिक नैतिक आचरण को बनाने में सहायता देते हैं, या पूरे मुस्लिम समाज के सामूहिक गुणों एवं अधिकारों की देखभाल करते हैं। ये सब फ़राइज़ वस्तुतः इंसानों ही के लाभ और निहितार्थ की पूर्ति के लिए हैं। लेकिन इन ज़िम्मेदारियों का महत्व और उनके असाधारण प्रभाव की वजह से उनको ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ कहा जाता है ताकि मुसलमान इस बात को याद रखें कि अगर इस ख़ास आदेश का उल्लंघन हुआ तो गोया इस उल्लंघन से मात्र इंसानों के नहीं, बल्कि अल्लाह के प्रत्यक्ष ‘हक़’ का उल्लंघन हो रहा है। इस तरह से उनके, बल्कि अल्लाह के हुक़ूक़ (अधिकारों) को एक तक़द्दुस (श्रद्धा) प्राप्त हो जाता है। और अधिक सम्मान की एक भावना उनके लिए पैदा हो जाती है। वरना सर्वोच्च अल्लाह को किसी ‘हक़’ की आवश्यकता नहीं। वह किसी ‘हक़’ का मुहताज नहीं। सर्वोच्च अल्लाह हमारी तरफ़ से किसी पात्रता के पूरे किए जाने का मुहताज नहीं।
जिन चीज़ों को ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ क़रार दिया गया है, वे भी वास्तव में बंदों ही के हुक़ूक़ हैं। बन्दे ही उससे फ़ायदा उठाते हैं। बंदों ही के कल्याण के लिए वे हुक़ूक़ नियुक्त किए गए हैं। ख़ास तौर पर वे हुक़ूक़, जिनमें पूरे समाज या पूरी उम्मत के हित जुड़े हों, उनको ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ के नाम से याद किया गया। उदाहरण के रूप में इस्लाम यह चाहता है कि मुस्लिम समाज का आधार नैतिक सिद्धान्तों पर हो। मुस्लिम समाज का आन्तरिक गठन नैतिक क़ानूनों और नियमों के आधार पर हो। मुस्लिम समाज में लाज-शर्म, उदारता, त्याग, एहसान (उपकार) जैसे भाईचारे की नैतिक भावनाएँ बढ़ावा पा रही हों और इन ही भावनाओं के आधार पर मुस्लिम समाज में सम्बन्ध जन्म ले रहे हों। अगर मुस्लिम समाज में ये नैतिक मूल्य और ये गुण मौजूद होंगे तो उनका फ़ायदा मुझे और आपको होगा। सर्वोच्च अल्लाह को किसी फ़ायदे की आवश्यकता ही नहीं। अगर ये चीज़ें न हों तो उनके न होने से सर्वोच्च अल्लाह को कोई नुक़्सान नहीं पहुँच सकता। लेकिन चूँकि ये गुण पूरे समाज से सम्बन्धित हैं इसलिए इन मामलों को ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ की सम्माननीय शब्दावली से याद किया गया और कहा गया कि ये अल्लाह के अधिकार हैं। ताकि इंसान को यह याद रहे कि जो चीज़ सामूहिकता से सम्बन्ध रखती है या किसी व्यक्ति या गिरोह के विशुद्ध आध्यात्मिक प्रशिक्षण के मामले से सम्बन्ध रखती है, वह ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ कहलाती है।
इसके मुक़ाबले में कुछ अधिकार हैं जो हुक़ूक़ुल-इबाद कहलाते हैं। यह विशुद्ध रूप से बन्दों यानी इनसानों की जान-माल और उनके सांसारिक मामलों से सम्बन्धित हैं। अगर किसी व्यक्ति की कोई चीज़ चोरी हो जाए तो निश्चय ही यह बहुत बुरी बात है और ऐसा नहीं होना चाहिए, लेकिन इस अपराध के नकारात्मक प्रभाव उस व्यक्ति तक सीमित हैं जिसके यहाँ चोरी हुई है, इसके विपरीत अगर खुले बाज़ार में कोई व्यक्ति कोई बेशर्मी का काम करेगा तो पूरा समाज उससे प्रभावित होगा। इसलिए खुले बाज़ार में बेशर्मी करने को ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ का उल्लंघन क़रार दिया गया। और किसी व्यक्ति को निजी रूप से नुक़्सान पहुँचाने को हुक़ूक़ुल-इबाद का उल्लंघन क़रार दिया गया।
अल्लाह की शरीअत का एक आम अंदाज़ और स्वभाव यह है कि वह आदेश देते समय और फ़राइज़ एवं वाजिबात (कर्तव्यों एवं अनिवार्यताओं) का निर्धारण करते समय इंसानों की कमज़ोरियों का एहसास करती है। इंसानों की कमज़ोरियों का ध्यान रखते हुए आदेश देती है। सर्वोच्च अल्लाह से बेहतर कोई नहीं जानता कि इंसान कमज़ोर पैदा हुआ है। (क़ुरआन, 4:28)। इंसान के दिल में धन-दौलत के प्रति गहरा लगाव भी पाया जाता है। माल के प्रेम में इंसान सख़्त है। (क़ुरआन, 100:8) कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ और ‘हुक़ूक़ुल-इबाद’ में कोई टकराव पैदा हो जाए। अब महत्व और श्रद्धा की दृष्टि से तो ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ सबसे बढ़कर हैं। लेकिन कितने इंसान हैं जो दिल से इसपर राज़ी हों कि अपने निजी ‘हक़’ को क़ुर्बान करके ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ को निभाएँ। ज़ाहिर है कि बहुत थोड़े लोग ऐसे होंगे। और जो बहुत थोड़े लोग होंगे उनके दिल में भी खलबली पैदा होती रहेगी कि हाय मेरे पैसे का क्या होगा, हाय मेरे घर का क्या होगा, कारोबार का क्या होगा, मेरी सम्पत्ति का क्या होगा। इसलिए अल्लाह ने इंसान के इस स्वभाव और कमज़ोरी का ध्यान करते हुए यह अनुमति दे दी कि जहाँ ‘हुक़ूक़ुल्लाह’ और ‘हुक़ूक़ुल-इबाद’ में कोई टकराव हो, तो वहाँ ‘हुक़ूक़ुल-इबाद’ को प्राथमिकता दी जाएगी। ‘हिदाया’ फ़िक़्हे-हनफ़ी की एक बहुत प्रमाणित, लोकप्रिय और प्रसिद्ध किताब है। इसमें लिखा है कि “बन्दे का ‘हक़’ शरीअत यानी अल्लाह के ‘हक़’ पर प्राथमिकता रखता है।” अल्लाह के आदेश से ही यह हुआ है। अल्लाह ने ही यह आदेश दिया है कि अपने ‘हक़’ को मेरे हक़ के ऊपर प्राथमिकता दो। तुम कमज़ोर और मुहताज हो, मैं कमज़ोर और मुहताज नहीं हूँ।
‘हक़’ का मामला इस्लाम के दीवानी और फ़ौजदारी क़ानून का बड़ा महत्वपूर्ण मसला बन जाता है। इसलिए कि सारे मामलात, लेन-देन के सारे रूप, मुक़द्दमे, अदालतों में सुनवाइयाँ, इन सबका सम्बन्ध किसी एक या एक से अधिक इंसानों के अधिकारों से होता है। इसलिए जब तक अधिकारों का मामला स्पष्ट और साफ़ न हो, उस समय तक बहुत-से मामलों का फ़ैसला करना बहुत मुश्किल होता है। शुरू-शुरू में इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने पवित्र क़ुरआन और हदीसों के स्पष्ट आदेशों को देखकर यह तय किया कि ‘हक़’ से मुराद वह पात्रता है जिसका आधार किसी महसूस सम्पत्ति पर हो। किसी tangible asset पर हो। यानी ऐसी सम्पत्ति पर हो जो tangible asset और physical क़रार दी जा सके। ऐसी पात्रता या title को ‘हक़’ कहा जाएगा। किसी non-tangible asset को ‘हक़’ का आधार क़रार नहीं दिया जाएगा। वह ‘हक़’ जो लेन-देन के आधार बन सकता है इसका सम्बन्ध केवल महसूस और मौजूद सम्पत्ति से ही होगा। अब इसपर सवाल पैदा हुआ कि फिर abstract rights यानी अमूर्त अधिकारों की क्या हैसियत होगी? क्या वे क्रय-विक्रय का विषय बन सकते हैं? इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के एक बड़े हिस्से की राय शुरू से यही रही कि अमूर्त अधिकार माल नहीं क़रार दिए जा सकते और इसलिए वे क्रय-विक्रय का विषय नहीं बन सकते। इसके विपरीत प्रतिष्ठित फ़ुक़हा के एक गिरोह की शुरू से यह राय रही है कि अमूर्त अधिकारों को माल क़रार दिया जा सकता है और वे क्रय-विक्रय और दूसरे दीवानी समझौतों और लेन-देन का विषय और आधार बन सकते हैं। उदाहरण के रूप में यह डेस्क, यह लाउडस्पीकर और यह गिलास, यह और इस तरह की अनगिनत चीज़ें यह सब tangible चीज़ें हैं। उनका क्रय-विक्रय, लेन-देन, किराया, इजारा वग़ैरा सब निस्संकोच हो सकते हैं। लेकिन अगर हक़्क़े-शुफ़अः आपको प्राप्त है। [‘शुफ़अः’ फ़िक़्ह में उस पड़ोस या साझेदारी को कहते हैं जिसकी वजह से किसी पड़ोसी, या किसी साझेदार को उसके दूसरे पड़ोसी या दूसरे साझेदार के बिकनेवाली ज़मीन या बिकनेवाले मकान को ख़रीदने का एक विशेष अधिकार प्राप्त होता है और यह अधिकार केवल ज़मीन या मकान के साथ ख़ास होता है] आपका कोई बाग़ है, इसके पड़ोस में एक और बाग़ है। आप अपना बाग़ या सम्पत्ति बेचना चाहते हैं। आपके पड़ोसी को हक़्क़े-शुफ़अः है। वह चाहे तो पहला ‘हक़’ उसका बन सकता है। क्या वह अपने इस ‘हक़’ को बेच सकता है। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) की बड़ी संख्या ने कहा कि नहीं बेच सकता। कुछ लोगों ने कहा कि बेच सकता है। आपकी कुछ खेती की ज़मीन है। आप उसके मालिक हैं। इस कृषि भूमि से लगी हुई एक और आदमी की ज़मीन है, फिर एक और आदमी की ज़मीन है। साथ में एक नहर गुज़र रही है। इस नहर से पानी लेने का ‘हक़’ आपको भी है और बादवाली दो ज़मीनों के मालिकों को भी है। यह ‘हक़’ शर्ब कहलाता है यानी ज़मीन को पानी देने या पानी लेने का हक़। आप अपनी ज़मीन की व्यापकता और अपनी पात्रता के अनुसार पानी ले सकते हैं और इस पानी को इन दोनों पड़ोसी मालिकों की ज़मीनों से गुज़ारना पड़ेगा। वे यह नहीं कह सकते कि हम आपको पानी नहीं ले जाने देंगे। जिस ज़माने में पाइप वग़ैरा नहीं थे, उस ज़माने में नहर गुज़र सकती थी और कोई नाला गुज़र सकता था। इसलिए शरीअत ने यह ‘हक़’ स्वीकार किया कि आप उनकी ज़मीन से अपना नाला गुज़ार सकते हैं। यह ‘हक़्क़े-शर्ब’ कहलाता है। क्या इस ‘हक़्क़े-शर्ब’ को बेचा जा सकता है। कुछ फ़ुक़हा के ख़याल में बेचा जा सकता है और कुछ के ख़याल में बेचा नहीं जा सकता। जो लोग कहते थे कि ‘हक़्के-शर्ब’ को बेचा नहीं जा सकता उनके पास बड़े मज़बूत बौद्धिक तर्क थे। इसके विपरीत जो कहते थे कि ऐसा किया जा सकता है उनके पास भी बड़े मज़बूत तर्क थे। समय गुज़रने के साथ-साथ ख़ास तौर से बीसवीं शताब्दी में अमूर्त अधिकारों, यानी abstract rights, जिनकी पीछे कोई physical asset नहीं होता था, बहुत-से मामलों का विषय बनने लगे। अब यह सवाल ज़्यादा शिद्दत और संजीदगी से पैदा होने लगा कि क्या अमूर्त अधिकार माल हैं। इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) की बड़ी संख्या क्रमशः यह राय बनाती गई कि अमूर्त माल हैं और उनको माल मानना चाहिए। उदाहरण के रूप में लेखन के अधिकार को लीजिए। आपने मेहनत करके एक किताब लिखी तो क्या शरई तौर पर उसके कॉपीराइट को सुरक्षित कर लेने का ‘हक़’ आपको प्राप्त है या नहीं। बीसवीं सदी के शुरू तक इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के अधिकांश बहुसंख्यकों का ख़याल था कि आपको यह लेखनाधिकार या कॉपीराइट सुरक्षित कराने और इसके आधार पर कोई मुआवज़ा वुसूल करने का ‘हक़’ प्राप्त नहीं है। आपके पास अगर कोई ज्ञान है तो आपका दीनी कर्तव्य है कि उसको आम करें। उसको फैलाएँ। उसका कोई पारिश्रमिक लेने का आपको ‘हक़’ नहीं। ज़्यादा-से-ज़्यादा आप उस समय का पारिश्रमिक ले लें जो आप प्रयुक्त कर रहे हैं। आपने दो घंटे का लेक्चर दिया तो आप इन दो घंटों का पारिश्रमिक ले लें। लेकिन अगर आपके शिष्यों और सुननेवालों में से कुछ लोगों ने इस लेक्चर को नोट कर लिया और इसको छपवाकर या कैसेट बनाकर आगे बाँट रहे हैं तो आपको मना करने का कोई अधिकार नहीं। यह एक ज्ञान है जो सब इंसानों का ‘हक़’ और सबकी मिल्कियत है और साझा सम्पत्ति है। इस उसूल पर बहुत-से विद्वान और संयमी व्यक्ति कार्यरत रहे और दूसरों को भी इसपर कार्यरत रहने का सख़्ती से आदेश दिया। बीसवीं सदी में ऐसे-ऐसे परहेज़गार लोग सैंकड़ों की संख्या में मौजूद रहे हैं, स्वयं हमारे भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद हैं, जिन्होंने सैंकड़ों, हज़ारों किताबें लिखीं और लेखनाधिकार का एक पैसा भी नहीं लिया। अगर वह लेखनाधिकार वुसूल करते तो उनकी सन्तान आज करोड़ों में खेलती। लेकिन चूँकि वे सैद्धान्तिक रूप से लेखन अधिकार को माल नहीं समझते थे, इसलिए उसके क्रय-विक्रय को भी नाजायज़ क़रार देते थे। अत: उन ही की रचना की छपाई पर प्रिंटर से कोई रॉयलटी वसूल करने को जायज़ नहीं समझते थे। यह तो ख़ैर इन लोगों की निजी क़ुर्बानी थी जो उन्होंने दे दी। लेकिन आजकल विज्ञान के मैदान में, मेडिकल साइंस या अन्य कलात्मक खोजों के मैदान में अनगिनत नई-नई खोजें हो रही हैं तो अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या इन खोजों और आविष्कारों की भी वही हैसियत है जो दीन के ज्ञान की है? उन्होंने हदीस की किताब लिखी, मुवत्ता इमाम मालिक (रह॰) की व्याख्या करके एक विस्तृत व्याख्या पंद्रह-बीस भागों में लिखी और कहा कि मुझे रॉयलटी का ‘हक़’ नहीं। चलिए बात समझ में आती है कि दीन के इल्म को अल्लाह ने अपनी नेमत क़रार दिया है और इसको फैलाने का आदेश दिया है, लेकिन अगर कोई व्यक्ति मेडिकल साइंस में शोध करता है और कैंसर की दवा ईजाद करता है। अब वह कहता है कि मैं तो मुफ़्त में लोगों को हिस्सेदार नहीं बनाऊँगा, तो क्या उसको भी मजबूर किया जाएगा कि वह इस ईजाद को कॉपीराइट के तहत रजिस्टर न कराए और इसका कोई मुआवज़ा या रॉयलटी वुसूल न करे। इस तरह से होते-होते यह सवाल महत्वपूर्ण होता गया। विद्वानों के बीच चर्चा जारी रही और अब अन्ततः ये लगभग तय हो गया है कि अमूर्त अधिकार माल हैं और उनका क्रय-विक्रय हो सकता है। जब इस्लामी विद्वानों की एक बहुत बड़ी संख्या ने यह दृष्टिकोण अपना लिया तो इससे बहुत-सी नई समस्याएँ पैदा हो गईं। इन नई समस्याओं के लिए नए आदेश संकलित करने की आवश्यकता पड़ी। यह काम आजकल जारी है। यह फ़िक़्हे-इस्लामी का एक महत्वपूर्ण मैदान है जिसमें अब नई-नई समस्याएँ सामने आ रही हैं और फ़िक़्ह में एक नए अध्याय, बल्कि नए अध्यायों की बढ़ोतरी हो रही है।
‘माल’ की अवधारणा
लेकिन यह तो माल की अवधारणा का एक पहलू था जिसका सम्बन्ध ‘हक़’ से है। अब हम इस्लामी क़ानून की एक और महत्वपूर्ण धारणा, माल की अवधारणा का ज़िक्र करते हैं जिसपर बहुत-से आदेशों का दारोमदार है। एक बार माल की वास्तविकता और उसके प्रकारों को समझ लिया जाए तो फ़िक़्ह के बहुत-से आदेशों को समझना आसान हो जाता है। माल वह चीज़ है जिसको इंसान जमा करने की इच्छा करे, जिससे उसकी नित्य आर्थिक ज़रूरतें पूरी हो सकें। अब तक फ़ुक़हा की बड़ी संख्या का कहना यह था कि माल वह चीज़ है जिसको सुरक्षित रखा जा सके और प्रयुक्त किया जा सके और जिसको भौतिक ढंग से जज (judge) किया जा सके कि खोटा है या खरा है, अस्ली है कि नक़ली है, छोटा है कि बड़ा है। abstract चीज़ को तो आप न define कर सकते हैं, न नाप-तौल कर सकते हैं। कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि आज उनको माल क़रार दिया जाता है, लेकिन व्यावहारिक रूप से उनका कोई अस्तित्व नहीं, उदाहरणार्थ अच्छी साख यानी Good Will आजकल कारोबार में बड़ा महत्व रखती है। लेकिन अच्छी साख को न तो नापा जा सकता है और न तौला जा सकता है। किसी की अच्छी साख कितनी है, थोड़ी है या कम है, इसको नापने और तौलने का कोई आला अभी तक ईजाद नहीं हुआ। इसलिए अगर प्राचीन प्रतिष्ठित फ़ुक़हा यह कहते थे कि इसके आधार पर लेन-देन नहीं हो सकता तो वे सही कहते थे। उनकी इस राय का आधार बहुत मज़बूत था कि लेन-देन उस चीज़ का हो सकता है जिसके बारे में बताया जा सके कि वह क्या है, कितनी है, ख़ूबसूरत है कि बदसूरत है। बड़ी है कि छोटी है। स्वीकार्य है कि अस्वीकार्य है। किसी की अच्छी या बुरी साख के बारे में प्राचीन प्रतिष्ठित फ़ुक़हा का कहना था कि वह बहुत अस्पष्ट और vague चीज़ है। अगर किसी व्यापारी के बारे में आपकी राय अच्छी है तो आप कहेंगे कि उसकी साख अच्छी है और अगर आपकी राय इस बारे में अच्छी नहीं तो आपके ख़याल में उस व्यापारी की साख भी ख़राब है। यह बहुत subjective चीज़ है। कम-से-कम अतीत निकट तक यह एक अनिर्धारित और अस्पष्ट चीज़ ही थी। इसलिए ऐसी अस्पष्ट चीज़ को कारोबार और लेन-देन का आधार नहीं बनाया जा सकता था।
दूसरी तरफ़ यह भी सच है कि आजकल साख और गुडविल का असाधारण व्यापारिक महत्व हो गया है। आजकल कारोबार और कला व्यापार के विशेषज्ञों का कहना है कि अमूर्त अधिकारों उदाहरणार्थ साख के माल होने का इनकार करने से बड़ी समस्याएँ पैदा हो जाएँगी। इस चीज़ का इनकार करके कारोबार नहीं हो सकता, ऐसा कहने से बहुत समस्याएँ आजकल पैदा हो रही हैं। दुनिया में बड़ी-बड़ी multinational कंपनियाँ हैं। आपने देखा होगा कि जो इस्लामाबाद का हॉलीडे-इन होटल है यह पहले इस्लामाबाद होटल कहलाता था। जिन बुज़ुर्ग की मिल्कियत पहले था आज भी उन ही की मिल्कियत है। अब उसका नाम उन्होंने हॉलीडे-इन इस्लामाबाद होटल कर दिया है। व्यावहारिक रूप से होटल के काम और प्रबन्धन में कुछ परिवर्तन नहीं आया। लेकिन इस नए नाम के व्यापारिक लाभ बेशुमार हैं। इसकी वजह यह है कि हॉलीडे-इन के नाम से पश्चिमी दुनिया में होटलों की एक चेन है। जिसके बारे में यह समझा जाता है कि इन सब होटलों का एक ख़ास स्तर है। इस्लामाबाद होटल के मालिकों को भी इस नाम के बदलने से बहुत-से व्यापारिक लाभ हुए हैं या होने की आशा है। इसलिए उन्होंने इस नाम के इस्तेमाल करने की फ़ीस अदा की है और गोया इस हॉलीडे-इन नाम को ख़रीदने के पैसे दिए हैं और विधिवत रूप से दे रहे हैं। इस नाम साख या (Good Will) की वजह से अब उनके पास ज़्यादा ग्राहक आते हैं। जो लोग हॉलीडे-इन से परिचित हैं वे समझ जाते हैं कि इसी तरह का होटल यह भी है। इसलिए वह वहाँ आकर ठहरते हैं और होटल की आमदनी और कारोबार में बढ़ोतरी होती है। अब ऐसी चीज़ जिससे व्यापार में बढ़ोतरी होती हो, इससे एकतरफ़ा तौर पर एक आदमी फ़ायदा उठाए, और जो अस्ल मालिक है जिसकी मेहनत और योग्यता से यह साख बनी, वह फ़ायदा न उठाए तो यह भी बज़ाहिर इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है। अगर हॉलीडे-इन का नाम इस्तेमाल करने से उनका व्यापार बढ़ गया और कारोबार ने तरक़्क़ी की, तो वे तो एकतरफ़ा फ़ायदा उठा रहे हों, और जिसका नाम प्रयुक्त कर रहे हैं इसको कुछ न मिल रहा हो, तो यह न्यायसंगत मालूम नहीं होता। स्वयं शरीअत में भी एकतरफ़ा लाभ इंसाफ़ के ख़िलाफ़ है।
इन कारणों के आधार पर आजकल के उलमा का कहना है कि अमूर्त अधिकार यानी abstract rights भी माल हैं और यह कारोबार और व्यापार का साधन बन सकते हैं। यह वह चीज़ है जिसको ‘हक़’ कहते हैं। ‘हक़’ माल है कि नहीं है, यह सवाल भी मैंने आपके सामने उठाया। आधुनिक काल के अधिकांश उलमा का ख़याल है कि अमूर्त अधिकार माल हैं। लेकिन माल क्या है और इससे क्या मुराद है?
माल का ज़िक्र पवित्र क़ुरआन और हदीसों में दर्जनों बार आया है। माल का ज़िक्र शरीअत के आदेशों और फ़िक़्ह में भी बार-बार आया है। यहाँ तक कि नमाज़, रोज़ा और इबादात में माल का ज़िक्र आया है। माल होगा तो ज़कात होगी। माल होगा तो हज हो सकेगा। किसी आदमी ने जीवन में नमाज़ नहीं पढ़ी तो अक्सर फ़ुक़हा के नज़दीक उसका कफ़्फ़ारा (प्रायश्चित) माल के रूप में दिया जाएगा। बहुत-सी चीज़ों के कफ़्फ़ारे माल के रूप में दिए जाते हैं। अत: माल का मामला इबादात से लेकर ‘मुनाकहात’ तक, और ‘मुनाकहात’ से लेकर मामलात और फ़िक़्ह के शेष अध्यायों तक हर जगह मौजूद है। हर विभाग जीवन में माल से वास्ता पड़ता है, और माल के होने या न होने, वैध या अवैध माल का सवाल पैदा होता है। अब माल किसको कहते हैं।
फ़ुक़हा ने माल की जो परिभाषा की है, आज से नहीं, बल्कि चौदह सौ वर्ष पहले जो परिभाषा की थी, बड़ी आश्चर्यजनक बात यह है कि आजकल के पश्चिमी अर्थशास्त्री भी माल की लगभग वही परिभाषा करते हैं। फ़ुक़हा की परिभाषा ज़्यादा व्यापक है। वे कहते हैं कि माल से मुराद वह चीज़ है जिसमें तीन विशेषताएँ पाई जाती हों। सबसे पहली विशेषता यह है कि इंसान का दिल उसकी तरफ़ माइल होता हो। इंसान की तबीयत उसकी तरफ़ माइल होती हो। दूसरी विशेषता यह है कि उसको प्राप्त किया जा सके और सुरक्षित किया जा सके, यानी storable हो। उसको क़ब्ज़े में लिया जा सके। तीसरी विशेषता यह है कि उससे कोई ऐसा लाभ प्राप्त किया जा सके जिससे इंसान परिचित हैं और उनको इस लाभ की आवश्यकता हो। यह लाभ किसी भी प्रकार का हो सकता है। ये तीन मौलिक गुण हैं जो माल में पाए जाने चाहिएँ। जिस चीज़ में ये तीन गुण पाए जाते हों उसको माल क़रार दिया जाएगा।
कुछ फ़ुक़हा ने माल की परिभाषा में एक चौथी शर्त की भी वृद्धि की है। कुछ दूसरे फ़ुक़हा इस वृद्धि की आवश्यकता नहीं समझते और कुछ आवश्यकता महसूस करते हैं। वह चौथी शर्त यह है कि वह चीज़ ऐसी हो कि इंसानों की एक उल्लेखनीय संख्या उसको माल समझती हो और उसको बतौर माल प्राप्त करना चाहती हो। उदाहरण के रूप में काग़ज़ का यह पुर्ज़ा है। आपने इसको सड़क पर फेंक दिया। अब फ़ुक़हा की इस परिभाषा के अनुसार यह माल नहीं होगा। इसलिए कि कोई व्यक्ति इसकी तरफ़ उन्मुख नहीं होगा, कोई व्यक्ति इसको उठाना नहीं चाहेगा। किसी को इसकी आवश्यकता नहीं होगी। कोई इसको उठाकर आवश्यकता के समय के लिए सुरक्षित नहीं करेगा। अगर लाखों में किसी एक आदमी को किसी समय संयोगवश इसकी आवश्यकता पड़ जाए तो वह उल्लेखनीय नहीं है। शर्त यह है कि इंसानों की एक उल्लेखनीय संख्या उस चीज़ को अपने लिए लाभदायक समझती हो।
ये चार गुण जिस चीज़ में पाए जाते हों वह माल है, और उनमें तीन गुण के बारे में तो सर्वसहमति है, और चौथे गुण की कुछ लोगों ने वृद्धि की है जो अच्छी वृद्धि है, अत: हर वह चीज़ जिसमें ये तीन या चार विशेषताएँ मौजूद हों वह माल समझा जाएगा। इस परिभाषा के अनुसार आप देखें तो दुनिया में इंसान जो जो चीज़ें प्रयुक्त करता है वे सब माल हैं। पैसा भी माल है, फ़र्नीचर, घर और ज़मीन और सम्पत्ति भी माल है। ज़ेवर और कपड़ा भी माल है। खाना और घर की शेष चीज़ें भी माल हैं। यह सब माल की परिभाषा पर पूरे उतरते हैं।
माल के प्रकार
इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने शरीअत के आदेशों को सामने रखते हुए माल को चार बड़ी क़िस्मों में बाँटा है। यह बड़े महत्वपूर्ण विभाजन हैं। उनमें कुछ को आप ज़रूर याद रखें। सबसे पहला विभाजन है ‘माले-मुतक़व्विम’ और ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’। ‘माले-मुतक़व्विम’ से मुराद वह चीज़ है जिसको एक माल के तौर पर और एक क़ीमती चीज़ के तौर पर शरीअत स्वीकार करती हो, शरीअत यह मानती हो कि आपके लिए यह एक जायज़ चीज़ है और आप इसको अपने पास माल के तौर पर रख सकते हैं। और यह चीज़ जायज़ तौर पर शरई रूप से आपकी मिल्कियत में आ सकती है। ऐसी चीज़ ‘माले-मुतक़व्विम’ है। माल की यह क़िस्म विभिन्न व्यक्तियों के लिए विभिन्न हो सकती है। एक चीज़ हो सकता है कि आपके लिए क़ीमत रखती हो और किसी दूसरे के लिए कोई क़ीमत न रखती हो। मेरे बचपन के कुछ वर्ष भारत में गुज़रे हैं। बाद में भी जाने का कई बार मौक़ा मिला। वहाँ मैंने देखा कि हिन्दू गाय के गोबर और पेशाब को बड़ा पवित्र समझते हैं। बर्तनों में सुरक्षित रखते हैं और एक-दूसरे को तोहफ़े में भेजते हैं। यह चीज़ हमारे लिए अत्यन्त मकरूह और गंदी है और हम समझते हैं कि जितनी जल्दी जान छूटे अच्छा है। अगर किसी हिन्दू के यहाँ रखे हुए गोबर को आप फेंक दें या उसका अपमान कर दें तो वह लड़ने-मरने पर आमादा हो जाता है। उसके नज़दीक वह ‘माले-मुतक़व्विम’ है और हमारे हाँ ‘माले-मुतक़व्विम’ नहीं है। एक ईसाई या एक ग़ैर-मुस्लिम के नज़दीक शराब का गिलास ‘माले-मुतक़व्विम’ है, हमारे लिए शराब ‘माले-मुतक़व्विम’ नहीं है। जो क़ौमें सूअर का गोश्त खाती हैं, उनके नज़दीक सूअर ‘माले-मुतक़व्विम’ है, सम्भव है क़ीमती चीज़ हो, मालूम नहीं कितने का मिलता है, लेकिन मुसलमान के नज़दीक वह एक नापाक और गंदी चीज़ है, वे उसकी शक्ल भी देखना गवारा नहीं करते। गोया किसी माल का ‘मुतक़व्विम’ या ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ होना परिस्थितियों के हिसाब से भिन्न हो सकता है।
मुसलमान के लिए कारोबार, व्यापार और लेन-देन केवल उस माल का हो सकता है जो ‘मुतक़व्विम’ हो। ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ के आधार पर कोई लेन-देन नहीं हो सकता। अगर कोई लेन-देन ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ के आधार पर होता है तो वह कारोबार नाजायज़ है, बातिल और फ़ासिद है। कुछ स्थितियों में बातिल और कुछ स्थितियों में फ़ासिद है। अगर ‘शैए-मबीअ’ या ‘शैए-मुस्ताजिरा’ ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ है तो वह समझौता अमान्य है। और अगर क़ीमत या पारिश्रमिक जो दिया गया है वह ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ है तो समझौता फ़ासिद है। यह बड़ी मौलिक चीज़ है और इसके आधार पर फ़िक़्ह के बेशुमार आदेश संकलित हुए हैं। कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि मेरे और आपके लिए एक चीज़ ‘माले-ग़ैर-मुतक़व्विम’ हो, जिसकी कोई क़ीमत शरीअत स्वीकार नहीं करती। लेकिन दूसरे के लिए वह ‘माले-मुतक़व्विम’ हो। उसको यह ‘हक़’ है कि वह उसको बतौर माल अपने पास रखे। अगर कोई मुसलमान उसको नष्ट कर दे तो उसका जुर्माना अदा करना पड़ेगा। अगर कोई मुसलमान किसी ग़ैर-मुस्लिम से मिलने जाए जो मुसलमानों ही के देश में रहता हो, और वह मुसलमान इस ग़ैर-मुस्लिम के पास मौजूद शराब की बोतल तोड़ दे तो तोड़नेवाले को उसका जुर्माना देना पड़ेगा। इसलिए कि शरीअत ने अनुमति दी है कि अगर ग़ैर-मुस्लिम शराब पीना चाहे तो पी सकता है। मुसलमान ने जब शराब की बोतल नष्ट कर दी तो गोया उसने ग़ैर-मुस्लिम की नज़र में एक क़ीमती चीज़ नष्ट कर दी। वह सौ दो सौ रुपये की ख़रीद कर लाया था और तोड़ने से उसके पैसे नष्ट हो गए। इसलिए इस नष्ट हो चुके माल का जुर्माना देना पड़ेगा। लेकिन अगर कोई ग़ैर-मुस्लिम किसी मुसलमान की शराब की बोतल तोड़ दे तो उसपर जुर्माना वाजिब नहीं होगा। इसलिए कि मुसलमान के लिए शराब ‘माले-मुतक़व्विम’ नहीं। इसलिए वह किसी जुर्माने की अदायगी का पाबंद नहीं, क्योंकि मुसलमान शराब का जायज़ मालिक हो ही नहीं सकता। कोई मुसलमान किसी नाजायज़ चीज़ का मालिक हो ही नहीं सकता। और अगर वह किसी नाजायज़ चीज़ की मिल्कियत का दावा करता है तो वह दावा बातिल है। यह अन्तर है ‘माले-मुतक़व्विम’ और ‘ग़ैर-मुतक़व्विम’ में जिसके आधार पर लेन-देन के बहुत-से आदेशों में अन्तर पड़ता है।
एक और विभाजन याद रखिएगा जो आइन्दा बहुत काम आ सकता है। यह ‘मिस्ली’ और ‘क़ीमी’ का विभाजन है। कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जिनको ‘मिस्ली’ कहा जाता है यानी जिसका समतुल्य बाज़ार में हर जगह आसानी से मिल जाता है। आपके पास यह बाल प्वाइंट है। यह दस रुपये का हर जगह मिलता है। जहाँ से मर्ज़ी हो ख़रीद लें। अगर दस बाल प्वाइंट भी गुम हो जाएँ तो आपको इसी क़ीमत पर इसी शक्ल का ग्यारहवाँ बाल प्वाइंट मिल जाएगा। इस तरह की चीज़ें ‘मिस्ली’ कहलाती हैं। ‘मिस्ली’ के विपरीत कुछ चीज़ें वे हैं जिनमें से हर यूनिट की क़ीमत अलग होती है। ऐसी चीज़ को क़ीमी कहते हैं। उदाहरण के रूप में मकान है। इस सड़क पर जितने मकानात हैं उनमें से हर एक की क़ीमत उसकी बनावट और जगह के हिसाब से अलग-अलग है। आप क़ुर्बानी के लिए जानवर ख़रीदना चाहें तो हर जानवर की क़ीमत अलग है। यह नहीं होगा कि हर जानवर हज़ार रुपये का हो। कोई हज़ार का होगा तो कोई दो हज़ार का। ये सब चीज़ें ‘क़ीमी’ हैं। ‘क़ीमी’ उन चीज़ों को कहते हैं जिनमें से हर यूनिट की क़ीमत अलग हो। ‘मिस्ली’ चीज़ें या तौलकर बिकती हैं या नापकर बिकती हैं या गिनकर बिकती हैं। जो चीज़ें गिनकर बिकती हैं उनका साइज़ और क्वालिटी लगभग एक जैसी होती है। और अगर अन्तर होता है तो वह इतना मामूली होता है कि उसको नज़रअंदाज कर दिया जाता है। कभी कोई समझदार इंसान जब अंडे ख़रीदने जाता है तो किसी अंडे के साइज़ पर आपत्ति नहीं करता कि यह छोटा है वापस कर दो। कोई अंडा ज़रा छोटा होता है, कोई अंडा ज़रा बड़ा होता है और सब एक ही क़ीमत में ख़रीदे और बेचे जाते हैं। बाज़ार में इसी तरह होता है। तो यह दो क़िस्में अच्छी तरह समझ लें।
जब दो ‘मिस्ली’ चीज़ों का आपस में लेन-देन किया जाएगा, उनमें कमी-बेशी नहीं हो सकती। कमी-बेशी होगी तो वह रिबा होगा और सूद कहलाएगा। लेकिन दो क़ीमी चीज़ों का लेन-देन होगा तो उनमें कमी-बेशी हो सकती है। आपके पास इस्लामाबाद में दो मकान हैं। इन दो मकानों को देकर आप उसके बदले एक मकान किसी और जगह ले लें तो यह जायज़ है। इसलिए कि इन दोनों मकानों की क़ीमतें अलग-अलग हैं। और इस एक मकान की अलग क़ीमत है। लेकिन अगर आपके पास इस तरह के दो क़लम हों और आप दो क़लम देकर एक ले-लें तो यह जायज़ नहीं है। इसलिए कि दोनों की क़ीमत, क्वालिटी और साइज़ एक है। एक किलो गेहूँ लेकर आप दो किलो गेहूँ वापस ले लें, यह भी जायज़ नहीं है। इसलिए कि गेहूँ की बनावट, उसका नाप और इसका पैमाना एक जैसा होता है। बाज़ार में जाएँ तो हर जगह एक ही तरह का गेहूँ मिलता है। अगर कोई अन्तर है तो बहुत थोड़ा है और नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। इसी तरह नमक है, चीनी है, जौ है, सोना है, चाँदी है, उनकी हर जगह एक ही क्वालिटी और एक ही क़ीमत होती है। करंसी की क़ीमत हर जगह एक जैसी होती है। डॉलर या रियाल का रेट हर जगह लगभग एक ही होता है और एक नोट की जगह दूसरा नोट हर जगह सुविधा से स्वीकार किया जाता है। ये वे चीज़ें हैं जो ‘मिस्ली’ कहलाती हैं और इनके लेन-देन में कमी-बेशी नहीं होनी चाहिए।
‘मिस्ली’ और ‘क़ीमी’ का यह विभाजन व्यापार और क्रय-विक्रय के आदेश में बड़ा महत्व रखता है। ख़ास तौर पर ‘रिबा’ की समस्याओं को समझने में इससे बड़ी सहायता मिलती है। कुछ लोग इस विभाजन को न जानने की वजह से ‘रिबा’ की समस्याओं को समझने में बड़ी-बड़ी गलतियाँ कर जाते हैं। बहुत-से लोग आपको तरह-तरह के उदाहरण देंगे और इस बारे में उलझन में डालना चाहेंगे कि ‘रिबा’ को ‘रिबा’ मानने के लिए ज़रूरी है कि आप अमुक-अमुक चीज़ को भी हराम स्वीकार करें, और उदाहरण देंगे ‘क़ीमी’ चीज़ों का, लेकिन याद रखें कि ‘क़ीमी’ का उदाहरण अलग है और ‘मिस्ली’ का उदाहरण अलग है। ‘रिबा’ ‘मिस्लियात’ में चलता है ‘क़ीमियात’ में नहीं चलता।
माल की एक तीसरी क़िस्म है जिसके लिए फ़ुक़हा ने ‘इस्तेमाली’ और ‘इस्तेहलाकी’ की शब्दावली प्रयुक्त की है। यह भी बहुत महत्वपूर्ण है और इसको भी याद रखिएगा। ‘इस्तेमाली’ और ‘इस्तेहलाकी’ भी माल है। ‘इस्तेमाली’ से मुराद वह चीज़ है जिसको आप बार-बार बरत सकें और बार-बार बरतने और बार-बार प्रयुक्त करने ही के लिए इसको आम तौर से प्राप्त किया जाता है। इसके विपरीत ‘इस्तेहलाकी’ से मुराद वह चीज़ है जिसको एक बार ख़र्च करने के बाद दूसरी बार ख़र्च न किया जा सके। उदाहरण के रूप में पानी या दूसरे मशरूबात ‘इस्तेहलाकी’ हैं। आज इस गिलास में पानी नहीं है। आपने इसमें रखा नहीं, लेकिन कल रखा था, यह इस्तहलाकी है। इस पानी को मैंने पीकर समाप्त कर दिया। यह पानी जो मैंने कल पी लिया था आज मैं आपको वापस नहीं दे सकता। वह तो मैंने पी लिया। उदाहरणार्थ आपने मुझे एक गिलास दूध दिया। अब वह गिलास जब मैंने पी लिया तो वह दूध आपको किसी क़ीमत पर दोबारा नहीं मिल सकता। आपने मुझे गेहूँ दिया। मैंने उसकी रोटी बनवाकर खाली। अब वह गेहूँ आपको किसी हाल में भी वापस नहीं मिल सकता। ‘इस्तेहलाक’ यानी consume हो गया। ‘इस्तेहलाकी’ यानी consumable. यह एक प्रकार है। दूसरी क़िस्म है ‘इस्तेमाली’, कि मैंने गिलास में पानी पीकर आपको गिलास ज्यों-का-त्यों वापस कर दिया। यह प्लेट मैंने माँगी और इस्तेमाल करके वापस कर दी। आपकी प्लेट आपको ज्यों-की-त्यों मिल गई। यह ‘इस्तेमाली’ योनी usable है। use और consume में जो अन्तर है उसको याद रखें।
अरबी भाषा में दोनों के लिए अलग-अलग शब्द हैं। एक के लिए शब्द है क़र्ज़। दूसरे के लिए शब्द है ‘आरियः’ अंग्रेज़ी में दोनों के लिए borrow का शब्द आता है। ‘आरियः’ से अभिप्रेत है कोई ऐसी चीज़ लेना जिसको बरतकर और इस्तेमाल करके ज्यों-का-त्यों वापस कर दिया जाए। ‘आरियः’ के प्रयोग की सीमाएँ हैं। इसको बरतने के नियम हैं। इसके विपरीत क़र्ज़ से मुराद है कोई ऐसी चीज़ लेना जिसको ख़र्च करना अभीष्ट हो। जो चीज़ क़र्ज़ ली गई वह अब पूरी तरह आपके उपभोग में है। आपको उसके पूरे उपभोग की आज़ादी है। जिस तरह चाहें इस्तेमाल करें। और जब वापस करने का मौक़ा आए तो उस जैसी, उतनी ही मालियत की वैसी ही चीज़ आपको वापस करनी होगी। उदाहरणार्थ आपने अपने मुहल्लेवालों के यहाँ से एक किलो चीनी क़र्ज़ मँगवाई। आपने वह चीनी मेहमानों के लिए ख़र्च कर दी। अब वह चीनी तो समाप्त हो गई। जब वापस करेंगे तो आप उतनी ही चीनी यानी एक किलो वापस करेंगे, जितनी आपने ली थी। यह क़र्ज़ है ‘आरियः’ नहीं है। ‘आरियः’ यह है कि आपके मेहमान ज़्यादा आ गए तो आपने पड़ोस से छः गिलास मँगवा लिए। प्रयोग किए और जैसे थे वैसे ही वापस कर दिए। यह ‘आरियः’ है, क़र्ज़ नहीं है। ‘रिबा’ ‘इस्तेहलाकियात’ में होता है। इस्तेमालियात में नहीं होता। जो चीज़ें इस्तेमाल के बाद ज्यों-की-त्यों वापस की जा सकती है उनमें रिबा नहीं होता। जो चीज़ें ख़र्च हो जाएँ और उनके बजाय उन जैसी ‘मिस्ली’ चीज़ें वापस करनी हों तो उनमें ‘रिबा’ होता है। यह भी बड़ी महत्वपूर्ण बात है इसको याद रखिएगा।
कुछ लोग आपसे कहेंगे कि मकान पर किराया क्यों लेते हो। गाड़ियों का किराया क्यों लेते हो। अगर ये चीज़ें जायज़ हैं तो बैंक इंट्रेस्ट क्यों जायज़ नहीं है। बहुत-से लोग जो हदीस और सुन्नत को नहीं मानते हैं या रिबा को जायज़ क़रार देना चाहते हैं और वर्तमान बैंकिंग व्यवस्था का बचाव करना चाहते हैं तो वे जान-बूझकर बहुत सारी उलझनें और सन्देह पैदा करते हैं। इन सन्देहों में से एक जो बार-बार दोहराया जाता है यह भी है कि अगर मकान का किराया जायज़ है तो दौलत का किराया भी जायज़ होना चाहिए। मकान का किराया जायज़ हो और दौलत का जायज़ न हो, यह बात अनभिज्ञ आदमी को आरम्भ में अजीब-सी मालूम होती है। अब जिसको यह अन्तर मालूम न हो तो वह उलझन में पड़ जाता है। मकान जब आपने इस्तेमाल किया तो ज्यों-का-त्यों मकान वापस कर दिया। उसमें से आपने कोई चीज़ कम नहीं की। आपके रहने से वह ख़र्च नहीं हुआ। मकान मौजूद है। आपने वापस कर दिया है। इसलिए जो चीज़ें ज्यों-की-त्यों वापस कर दी जाएँ उनके इस्तेमाल का पारिश्रमिक लिया जा सकता है। इसलिए कि अस्ल चीज़ आपने वापस कर दी। जो लाभ उठाया उसका पारिश्रमिक दे दिया। जो चीज़ कंज़्यूम यानी ख़र्च हो गई वह तो अस्ल वापस नहीं की जा सकती, बल्कि उस जैसी और वैसी ही (मिस्ली) एक और चीज़ वापस करनी होगी। उसका किराया नहीं हो सकता। उसका किराया नहीं लिया जा सकता। इन दोनों में अन्तर है इसका ध्यान रखना चाहिए।
चौथा विभाजन चल-सम्पत्ति और अचल-सम्पत्ति का है। कुछ जायदादें चल-सम्पत्ति होती हैं और कुछ अचल-सम्पत्ति होती हैं। इसमें भी कुछ आदेशों की दृष्टि से अन्तर है, लेकिन वह इतना महत्वपूर्ण नहीं है। मैं इसको छोड़ देता हूँ। क्रय-विक्रय के आदेशों, इजारा के आदेशों में चल-सम्पत्ति और अचल-सम्पत्ति की वजह से थोड़ा-सा अन्तर आ जाता है यह इसलिए चल और अचल-सम्पत्ति के आदेश भी अलग-अलग समझ लेने चाहिएँ। ये चार बड़े-बड़े विभाजन हैं। इनके अलावा और विभाजन भी हैं जो अधिक महत्वपूर्ण नहीं हैं।
माल के बारे में सामान्य मार्गदर्शन
माल के बारे में पवित्र क़ुरआन ने कुछ मौलिक निर्देश दिए हैं। एक मौलिक निर्देश यह दिया है कि माल वास्तव में अल्लाह की मिल्कियत है। माल सारा का सारा अल्लाह का है। अल्लाह ने हमें और आपको उपभोग के लिए दिया है। हमारी हैसियत इस माल के बारे में अमानतदार और रखवाले की है। वास्तविक स्वामी कोई और है, हम मात्र रखवाले हैं। जैसे कोई व्यक्ति आपको अपनी सम्पत्ति का मैनेजर नियुक्त कर दे। और इस सम्पत्ति के प्रबन्ध के लिए कुछ शर्तें भी तय कर दे कि आप इस सम्पत्ति का प्रबन्ध करें। इसमें से आपको खाने की भी अनुमति है। बाग़ है तो इसका फल खाने की अनुमति है। इसकी आय अपने ख़र्च में लाएँ, अपनी जायज़ आवश्यताओं पर ख़र्च करें। अगर इसमें कोई मकान है तो उसमें रहें। अगर उसमें मवेशी हैं तो आप उनका दूध इस्तेमाल करें और दूसरे लाभ प्राप्त करें। लेकिन यह सब कुछ उन शर्तों के अनुसार होगा जो मालिक ने आपके साथ तय की हैं। लगभग यही कैफ़ियत उस माल की है जो मेरी और आपकी मिल्कियत में समझा जाता है। यह माल अल्लाह का है और अल्लाह ने मुझे और आपको उसका ज़िम्मेदार बनाया है। इंसान जिस चीज़ का ज़िम्मेदार हो और जिस चीज़ के उपभोग की इसको अनुमति हो, उसको वह लाक्षणिक रूप से अपना कह देता है। उदाहरणार्थ मेरे पास यूनिवर्सिटी की गाड़ी है। मैं यूनिवर्सिटी की अनुमति से इसको इस्तेमाल करता हूँ। यूनिवर्सिटी ने इस गाड़ी के इस्तेमाल के नियम नियुक्त किए हैं जिनका पालन करना मेरे लिए ज़रूरी है। इस गाड़ी को लाक्षणिक रूप से मैं अपनी गाड़ी कह देता हूँ। आम तौर पर लोग कहते हैं कि यह ग़ाज़ी साहब की गाड़ी है। मैं भी आम बोल-चाल में इसको अपनी गाड़ी ही कहता हूँ। हालाँकि मैं इस गाड़ी का अस्ल मालिक नहीं हूँ। मैं तो यूनिवर्सिटी की तरफ़ से इसका ज़िम्मेदार हूँ। यूनिवर्सिटी ने मुझे इसके उपयोग की अनुमति दी है। इसलिए मैं लाक्षणिक रूप से इसको अपना कह सकता हूँ। यूनिवर्सिटी की तरफ़ से दूसरों को इस गाड़ी के प्रयोग करने की अनुमति नहीं है इसलिए दूसरे इसको इस्तेमाल नहीं करेंगे। मैं शर्तों के अनुसार प्रयोग करूँगा तो जायज़ है, अगर कोई दूसरा इसको प्रयोग करे तो जायज़ नहीं है। मैं भी अगर शर्तों से हटकर इस्तेमाल करूँगा तो जायज़ नहीं होगा। अगर मैं एक ड्राइवर नियुक्त करके कहूँ कि शाम को यह गाड़ी टैक्सी के तौर पर चलाया करो और इसकी आय मुझे दिया करो तो यह नाजायज़ होगा। इसलिए कि यूनिवर्सिटी ने इस तरह इस गाड़ी को इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी।
इसी तरह से सारा माल अल्लाह का है। हम और आप उसके ज़िम्मेदार हैं और उन ही शर्तों के अनुसार इस्तेमाल करने के पाबंद हैं जिन शर्तों के तहत सर्वोच्च अल्लाह ने इस माल के उपयोग की हमें अनुमति दी है। जो शर्तें नियुक्त की हैं उनका पालन किया जाएगा तो माल का इस्तेमाल जायज़ होगा। शर्तों का उल्लंघन किया जाएगा तो माल का उपयोग नाजायज़ होगा।। पवित्र क़ुरआन ने इस बात को बहुत-सी आयतों में बयान किया है। एक जगह कहा गया है, “तुम इन ग़रीबों और हक़दारों को अल्लाह के उस माल में से दो जो अल्लाह ने तुम्हें दिया है।” (क़ुरआन, 24:33) यहाँ आपके माल को ‘मालुल्लाह’ (अल्लाह का माल) कहा गया है यानी अल्लाह का माल। यहाँ यह बताया गया कि माल अल्लाह का है, उसने हमें उपयोग के लिए दे रखा है।
एक और जगह आया है कि “अल्लाह ने जिस माल में तुम्हें अपना ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) बनाया है उस माल में से ख़र्च करो।” (क़ुरआन, 57:7) मानो तुम अस्ल मालिक नहीं हो, बल्कि अस्ल मालिक के उत्तराधिकारी और स्थानापन्न हो। जिस तरह से स्थानापन्न को प्रयुक्त करने का अधिकार होता है, लाभ उठाने का भी और किसी हद तक दूसरों को साझेदार करने का, तो इस हद तक तुम कर सकते हो। इससे आगे नहीं कर सकते।
पवित्र क़ुरआन ने एक जगह बिलकुल अलग शब्द प्रयुक्त किया है… ‘तय्यिबात’ कि सर्वोच्च अल्लाह ने ‘तय्यिबात’ को तुम्हारे लिए हलाल क़रार दिया है, और ‘ख़बीसात’ को तुम्हारे लिए हराम क़रार दिया। यानी पाकीज़ा और सुथरी चीज़ें तुम्हारे लिए जायज़ हैं और गंदी और नापाक चीज़ें तुम्हारे लिए नाजायज़ हैं। अब पवित्र क़ुरआन में बहुत-से उदाहरण पाकीज़ा चीज़ों के दिए गए हैं। पानी, गेहूँ, हलाल जानवर, शहद, फल और इस तरह की बहुत-सी चीज़ों का ज़िक्र है। लेकिन यह सूची कोई exhaustive सूची नहीं है। इसी तरह से पवित्र क़ुरआन में नापाक और ख़राब चीज़ों को हराम क़रार दिया गया है। कुछ नापाक चीज़ों का भी उल्लेख है कि अमुक-अमुक प्रकार की चीज़ें हराम हैं। यह लिस्ट भी एग्ज़ास्टिव नहीं है। अब फ़ुक़हा के दरमियान यह सवाल पैदा हुआ कि इन चीज़ों के अलावा अगर कुछ चीज़ों को ‘तय्यिबात’ क़रार दिया जाएगा तो किस आधार पर किन-किन चीज़ों को ‘तय्यिबात’ क़रार दिया जाएगा। और अगर पवित्र क़ुरआन में बयान की गई गंदी और ‘ख़बीस’ चीज़ों के अलावा किसी चीज़ को ‘‘ख़बीस’’ (बुरा) क़रार देना हो तो किस आधार पर किन-किन चीज़ों को ‘ख़बीस’ और नापाक क़रार दिया जाएगा।
पवित्र क़ुरआन में कुछ ‘तय्यिबात’ का ज़िक्र है और कुछ ‘ख़बीसात’ का ज़िक्र है। तो क्या इनके अलावा कुछ और ‘तय्यिबात’ और ‘ख़बीसात’ भी हैं, जिनका नाम पवित्र क़ुरआन या हदीस में नहीं आया? इसमें फ़ुक़हा के तीन कथन हैं और मेरी नज़र में ये तीनों रायें बहुत सही हैं। यह कहना बड़ा मुश्किल है कि ज़्यादा सही राय कौन-सी है।
हज़रत इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) फ़रमाते हैं कि चूँकि पवित्र क़ुरआन क़ुरैश की भाषा में अवतरित हुआ है और क़ुरैश के मुहावरे में अवतरित हुआ है। और आम तौर से हिजाज़ का जो मुहावरा है वह पवित्र क़ुरआन में प्रयुक्त हुआ है। इसलिए क़ुरैश में विशेषकर और हिजाज़ में आम तौर से जिन चीज़ों को ‘तय्यिबात’ समझा जाता था वे ‘तय्यिबात’ समझी जाएँगी। जिन चीज़ों को उनके यहाँ ‘ख़बीसात’ क़रार दिया जाता था उन सबको ‘ख़बीसात’ क़रार दिया जाएगा। यानी खाने-पीने की किसी चीज़ का ‘तय्यिब’ या ‘ख़बीस’ होना क़ुरैश और अरब के दृष्टिकोण के अनुसार तय किया जाएगा कि ‘तय्यिबात’ क्या हैं और ‘ख़बीसात’ क्या हैं। यह बज़ाहिर बड़ी सही बात मालूम होती है।
इमाम शाफ़िई (रह॰) और इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह॰) फ़रमाते हैं कि किसी इलाक़े के या किसी ज़माने के जो सदाचारी लोग हैं वे जिस चीज़ को ‘तय्यिब’ क़रार देते हों वह ‘तय्यिब’ मानी जाएगी, और जिस चीज़ को वह ‘ख़बीस’ क़रार देते हों वह ‘ख़बीस’ क़रार दी जाएगी। गोया इस मामले में हर इलाक़े और हर ज़माने के सदाचारी और शरीफ़ लोगों की पसंद-नापसंद और उनकी रुचि बड़ा महत्व रखती है। इन मामलों के निर्धारण में इसका ध्यान रखा जाएगा। इसलिए कि पवित्र क़ुरआन हर ज़माने और हर इलाक़े के लिए है। अत: हर इलाक़े के सदाचारी इंसान जो इस्लामी शरीअत को स्वीकार करते हों, उनकी रुचि के अनुसार तय किया जाएगा कि क्या चीज़ ‘तय्यिब’ है और क्या चीज़ ‘ख़बीस’ है। यह बात भी बड़ी उचित मालूम होती है।
इमाम मालिक (रह॰) यह फ़रमाते हैं कि मुहर्रमात (हराम ठहराई हुई चीज़ें और रिश्ते) तो केवल वे हैं जो पवित्र क़ुरआन में आए हैं। इसके अलावा हर इंसान को अधिकार है कि जिस चीज़ को उसकी रुचि ‘तय्यिब’ क़रार देती हो वह ‘तय्यिब’ है और जिसको वह ‘तय्यिब’ न समझे उसको नाजायज़ क़रार दे। यह लोगों की व्यक्तिगत रुचि पर है। इन मुहर्रमात के अलावा जिनको पवित्र क़ुरआन में स्पष्ट रूप से ‘ख़बाइस’ क़रार दिया गया है। कोई और चीज़ क़तई ‘ख़बीस’ और हराम नहीं है। सामान्य रूप से पवित्र क़ुरआन और शरीअत के स्पष्ट आदेशों को देखें तो यह बात भी बहुत वज़नी मालूम होती है। पवित्र क़ुरआन का उसूल यह है कि वह मुहर्रमात की निशानदेही कर देता है और उनके अलावा शेष चीज़ें जायज़ क़रार देता है। एक जगह आया है कि ये और ये चीज़ें हराम हैं और इनके अलावा जो कुछ है वह सब हलाल है। अगर यह उसूल है तो जो मुहर्रमात क़ुरआन में आए हैं तो वे हराम हैं और शेष सब जायज़ हैं। यह बात भी बड़ी वज़नी मालूम होती है। इन तीनों में कौन-सी बात ज़्यादा दुरुस्त है यह कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन ‘तय्यिबात’ के ये तीनों अर्थ हैं जो इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने समझे। इसलिए मैं यह कहना चाहता हूँ कि स्वयं पवित्र क़ुरआन के शब्दों को समझना अत्यन्त ज़रूरी है, एक-एक शब्द में समझ का मतभेद हो सकता है और इससे विवरण में अन्तर पैदा हो सकता है। कुछ फ़ुक़हा का कहना यह है कि ‘तय्यिबात’ वे हैं जिनमें कोई उल्लेखनीय लाभ इंसानों के लिए मौजूद हो। और वह लाभ उनके नुक़्सान से ज़्यादा हो। जिसमें लाभ ज़्यादा और नुक़्सान थोड़ा हो वे ‘तय्यिबात’ हैं। जिसका नुक़्सान ज़्यादा और फ़ायदा कम हो, वे ‘ख़बीसात’ हैं। यह एक चौथी राय है। इसका भी पवित्र क़ुरआन से समर्थन होता है। पवित्र क़ुरआन में शराब और जूए के बारे में एक स्थान पर आया है कि “उनका गुनाह उनके फ़ायदे से भी बढ़कर है।” (क़ुरआन, 2:219) गोया शराब और जूए के लाभ के अस्तित्व को क़ुरआन ने स्वीकार किया है, लेकिन लाभ थोड़ा है और नुक़्सान ज़्यादा है। यह भी ‘ख़बीसात’ की परिभाषा हो सकती है।
माल में उपभोग की सीमाएँ
इंसान जिस चीज़ का मालिक होता है उसमें इंसान को ‘तसर्रुफ़’ (उपभोग) करने का अधिकार है। ‘तसर्रुफ़’ फ़िक़्ह की एक और शब्दावली है जो अक्सर जगह प्रयुक्त होती है। ‘तसर्रुफ़’ का मूल अर्थ तो है disposal या कार्रवाई। लेकिन इससे मुराद अपने माल में इसके जायज़ इस्तेमाल का ‘हक़’ है। नाजायज़ इस्तेमाल का ‘हक़’ ‘तसर्रुफ़’ में शामिल नहीं है। अपने माल के भी नाजायज़ इस्तेमाल का ‘हक़’ किसी को नहीं है। कोई अपना माल जूए में इस्तेमाल करे, किसी नाजायज़ गतिविधि में इस्तेमाल करे। अपना माल मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िश में इस्तेमाल करे, यह जायज़ नहीं होगा। जायज़ काम में, जायज़ तरीक़े से जो काम भी आप अपने माल के सिलसिले में करें वह ‘तसर्रुफ़’ कहलाता है।
‘तसर्रुफ़’ की पाँच शर्तें हैं। इन पाँच शर्तों के अनुसार जब ‘तसर्रुफ़’ होगा वह जायज़ होगा। जहाँ इन पाँच शर्तों में से किसी शर्त का उल्लंघन होगा वह ‘तसर्रुफ़’ जायज़ नहीं होगा।
पहली शर्त यह है कि वह ‘तसर्रुफ़’ शरीअत की सीमाओं के अन्दर हो। यह एक सामान्य शर्त है जिसमें शेष शर्तें भी आ जाती हैं। और स्पष्टीकरण के लिए इनको अलग-अलग भी बयान कर दिया गया है।
दूसरी शर्त यह है कि माल को नष्ट न किया जाए। माल को नष्ट करने की मनाही की दो हिकमतें हैं। एक हिकमत (तत्वदर्शिता) तो यह है कि सर्वोच्च अल्लाह ने माल इंसानों के कल्याण और लाभ के लिए उतारा है। आपको अधिकार नहीं कि उसे नष्ट करें। दूसरी तत्वदर्शिता यह है कि अस्ल मालिक तो अल्लाह है, आप तो रखवाले हैं। कोई व्यक्ति अपने बाग़ में आपको रखवाला नियुक्त कर दे और आपको अनुमति दे कि आप अपनी आवश्यकता के अनुसार खाया भी करें, खिलाया भी करें। लेकिन आप उसके फल तोड़-तोड़कर नहर में बहा दें कि उसने मुझे ‘तसर्रुफ़’ की अनुमति दी है। यह हरकत जायज़ नहीं होगी। इसलिए कि अस्ल मालिक ने फलों के जायज़ और उचित उपयोग की अनुमति दी थी। उसने नष्ट करने की अनुमति नहीं दी थी।
सर्वोच्च अल्लाह ने भी माल को नष्ट करने की अनुमति नहीं दी है। हदीस में आता है “नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने इस हदीस में तीन चीज़ों से मना किया है— अकारण और फ़ालतू बात करने से, माल को बरबाद करने से और बहुत अधिक सवाल करने से।” (हदीस : बुख़ारी) अत: माल को नष्ट करने की अनुमति नहीं है।
तीसरी शर्त यह है कि ख़र्च करने में सन्तुलन से काम लिया जाए। “ईमानवालों का गुण है कि जब वे ख़र्च करते हैं तो न कंजूसी से काम लेते हैं और न फ़ुज़ूलख़र्ची करते हैं। इन दोनों के दरमियान सन्तुलन के साथ ख़र्च करते हैं।” (क़ुरआन, 25:67) सन्तुलन के लिए ज़रूरी है कि इंसान दो चीज़ों से बचे। एक ‘इसराफ़’ से, दूसरे ‘तबज़ीर’ से। पवित्र क़ुरआन ने इन दोनों से मना किया है। ‘इसराफ़’ यह है कि किसी जायज़ काम में आवश्यकता से ज़्यादा माल ख़र्च किया जाए। इसकी अनुमति नहीं है। एक सहाबी ने पूछा कि या अल्लाह के रसूल है क्या वुज़ू में भी ‘इसराफ़’ होता है? तो नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फ़रमाया कि “हाँ, वुज़ू में भी ‘इसराफ़’ होता है।” अगर बहते हुए दरिया के किनारे भी वुज़ू कर रहे हो तो वहाँ भी आवश्यकता से ज़्यादा इस्तेमाल जायज़ नहीं है। अगर दो लीटर पानी से वुज़ू हो सकता हो तो तीन लीटर पानी का इस्तेमाल जायज़ नहीं होगा। अगर आप एक लीटर पानी से वुज़ू कर सकते हैं तो दो लीटर पानी का इस्तेमाल जायज़ नहीं होगा। यह जायज़ काम में आवश्यकता से ज़्यादा ख़र्च करना है। इसको ‘इसराफ़’ कहते हैं और इसकी अनुमति नहीं है। ‘इसराफ़’ के बारे में एक बात ख़ास तौर से याद रखिएगा। बहुत-से लोग इसमें उलझ जाते हैं। ‘इसराफ़’ का निर्धारण किसी इलाक़े की आर्थिक स्थिति से होता है। हर इलाक़े की आर्थिक स्थिति के हिसाब से यह तय किया जाता है कि क्या ‘इसराफ़’ है और क्या ‘इसराफ़’ नहीं है। उदाहरणार्थ आज से पाँच सौ वर्ष पहले अगर किसी इलाक़े में बहुत ज़्यादा ग़रीबी और भुखमरी थी, वहाँ ‘इसराफ़’ का अर्थ और होगा। सऊदियों के लिए ‘इसराफ़’ का अर्थ और होगा। कुवैतियों के लिए और होगा। बंगलादेशियों के लिए और होगा। इस्लामाबाद और कराची के रहनेवालों के लिए और होगा। गाँव और देहात के लिए कोई और होगा। इसका कोई निर्धारित पैमाना या कोई लगा-बंधा सिद्धान्त नहीं है कि यह चीज़ ‘इसराफ़’ है कि नहीं है। यह हर व्यक्ति स्वयं ही फ़ैसला करेगा कि उसके लिए क्या ‘इसराफ़’ है और क्या नहीं है। मौलिक सिद्धान्त है कि जायज़ काम में आवश्यकता से ज़्यादा ख़र्च करना ‘इसराफ़’ है। ‘इसराफ़’ का अर्थ निर्धारित करने में एक और चीज़ से भी बात को समझने में भी सहायता मिल सकती है। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की सेवा में एक साहिब आए। उनका लिबास बहुत पुराना था और जिस्म पर ग़रीबी एवं भुखमरी के आसार नुमायाँ थे। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने यह देखकर समझा कि शायद उस आदमी के पास संसाधनों की कमी है। पूछा कि क्या करते हो, कौन हो। जवाब दिया तो मालूम हुआ कि आदमी ख़ासा मालदार है। नबी (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) फ़रमाया कि फिर तुमने ऐसा हुलिया क्यों बनाया हुआ है। फिर उन्होंने फ़रमाया कि सर्वोच्च अल्लाह इस बात को पसंद करता है कि जब वह किसी बन्दे को कोई नेमत दे तो इस बन्दे के जिस्म पर इस नेमत का प्रभाव ज़ाहिर हो। यह चीज़ भी सामने रखनी चाहिए कि सर्वोच्च अल्लाह ने जिसको जितना कुछ दिया है वह उसके अनुसार जीवन गुज़ारे। ग़ैर-ज़रूरी तौर पर बहुत ज़्यादा फ़क़्रो-फ़ाक़े का प्रदर्शन करना फ़ुज़ूलख़र्ची से बचने का तक़ाज़ा नहीं है।
‘तबज़ीर’ यह है कि नाजायज़ काम में पैसा ख़र्च किया जाए। एक पैसा भी किसी नाजायज़ काम में ख़र्च किया जाएगा तो यह ‘तबज़ीर’ होगी। शराब का एक घूँट भी नाजायज़ है और दस घूँट भी नाजायज़ हैं। शराब में ख़र्च करने को ‘इसराफ़’ नहीं कहेंगे, ‘तबज़ीर’ कहेंगे। ‘इसराफ़’ चाय में होगा, पानी में होगा, खाने-पीने और दूसरी हलाल चीज़ों में होगा। ‘तबज़ीर’ जूए में होगी, शराब में होगी और शेष नाजायज़ कामों में होगी।
चौथी शर्त यह है, जो एक हदीस के शब्द हैं ‘ला-ज़र-र वला ज़िरार’ (न स्वयं नुक़्सान उठाओ, न दूसरे को जवाबी नुक़्सान पहुँचाओ)। जब अपने माल में ‘तसर्रुफ़’ करो तो वह ऐसा न हो कि दूसरे को नुक़्सान पहुँचे। अपने माल में जायज़ ‘तसर्रुफ़’ उस समय तक जायज़ है जब तक इससे दूसरे को नुक़्सान न हो। उदाहरण के तौर पर मुझे अधिकार है कि मैं दो मंज़िला इमारत बना लूँ। अल्लाह ने मुझे अनुमति दी है। लेकिन अगर मैं इसमें ग़ैर-ज़रूरी तौर पर उस तरफ़ खिड़कियाँ बनाऊँ जहाँ पड़ोसियों का सेहन है और वहाँ से ना-महरम महिलाएँ नज़र आती हैं, तो यह जायज़ नहीं होगा। ‘तसर्रुफ़’ मेरे मकान में है। मैं अपनी सम्पत्ति में ‘तसर्रुफ़’ कर रहा हूँ, लेकिन चूँकि इसमें दूसरे का नुक़्सान है इसलिए यह ‘तसर्रुफ़’ जायज़ नहीं होगा। मुझे अधिकार है कि मैं मकान में लोहे की एक भट्टी बना लूँ। लेकिन ऐसा करने से मुहल्ले के सारे लोगों को नुक़्सान होगा। वे परेशान होंगे, उनकी सेहत ख़तरे में पड़ जाएगी, क्योंकि धुआँ फैलेगा। इसलिए मेरे लिए जायज़ नहीं कि मैं अपनी ही सम्पत्ति में वह काम करूँ जिससे मुहल्ले के दूसरे लोगों को नुक़्सान हो। इसलिए कि उसूल है “न नुक़्सान पहुँचाओ और न नुक़्सान का जवाब नुक़्सान से दो।”
एक जगह सब दुकानें कपड़े की हैं। कपड़ा नाज़ुक चीज़ है जिसमें नाइलोन और रेशम के कपड़े भी शामिल हैं। वहाँ मैं दरमियान में केमिकल्ज़ की दुकान खोल लूँ। जहाँ हर लम्हे इस बात का ख़तरा हो कि किसी दुकान के कपड़ों में आग लग जाएगी। ऐसा करना मेरे लिए जायज़ नहीं होगा, हालाँकि दुकान मेरी है और मुझे अधिकार है कि मैं अपनी सम्पत्ति में जिस जायज़ कारोबार के लिए चाहूँ, दुकान खोल लूँ। लेकिन चूँकि दूसरों के नुक़्सान का शदीद ख़तरा है इसलिए जायज़ नहीं है। यह एक मौलिक सिद्धान्त है जो किसी भी माल के ‘तसर्रुफ़’ में एक शर्त की हैसियत रखता है और आख़िरी शर्त यह है कि माल को अल्लाह की अमानत ही समझा जाए और उसको अल्लाह की अमानत के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाए।
मिल्कियत की धारणा
माल के बाद एक और महत्वपूर्ण धारणा माल की मिल्कियत (स्वामित्व) की है, बल्कि माल और मिल्कियत दोनों गोया एक ही चीज़ के दो पहलू हैं। माल में ‘तसर्रुफ़’ का ‘हक़’ इंसान को मिल्कियत की वजह से प्राप्त होता है। इंसान चूँकि मालिक समझा जाता है। इसलिए मिल्कियत का सवाल पैदा होता है कि मिल्कियत क्या होती है। हर चीज़ की वास्तविक मिल्कियत सर्वोच्च अल्लाह के पास है। इंसान को लाभ उठाने के हक़ की वजह से लाक्षणिक रूप से मालिक कहा जाता है। इंसान के पास ये जितने माल और मिल्कियतें हैं बतौर ‘आरिय:’ के हैं। इंसान वास्तविक मालिक का वकील और प्रतिनिधि है।
हमारे विचार में यह जो लाक्षणिक मिल्कियत है, इसके दो प्रकार हैं।
एक मिल्कियते-ताम्मा यानी पूरी मिल्कियत कहलाती है।
दूसरी मिल्कियते-नाक़िसा यानी अधूरी मिल्कियत कहलाती है।
मिल्कियते-ताम्मा प्राप्त करने के चार साधन हैं। यानी अगर कोई व्यक्ति किसी माल की पूरी मिल्कियत प्राप्त करना चाहे तो वह चार साधनों में से किसी एक साधन से प्राप्त हो सकती है।
1. एक ज़रिया यह है कि ऐसा कोई मुबाह (जायज़) माल, जो किसी की मिल्कियत न हो। आप जाकर अपने क़ब्ज़े में ले लें। यह मिल्कियत प्राप्ति का सबसे पहला और स्वाभाविक ज़रिया है। परिंदे उड़ रहे हैं, आपने जाकर शिकार कर लिया और शिकार करके परिंदे पर क़ब्ज़ा कर लिया, वह आपकी मिल्कियत में आ गया। आप कराची गए, वहाँ समुद्र में हज़ारों मछलियाँ हैं, जो किसी की मिल्कियत नहीं। जो मछलियाँ आपने शिकार करके जायज़ तौर पर अपने क़ब्ज़े में ले लीं तो वे आपकी मिल्कियत हो गईं। नदी में पानी बह रहा है। किसी की मिल्कियत नहीं। आप घड़ा भरकर घर ले आए, वह आपकी मिल्कियत हो गया। घास खड़ी है। आपने एक आदमी को मज़दूरी देकर कटवा ली और घर ले आए। अब यह आपकी मिल्कियत है। आपके क़ब्ज़े में आने से पहले वह किसी की मिल्कियत नहीं थी। यह मिल्कियत का सबसे पहला ज़रिया है जो शरीअत ने स्वीकार किया है। यानी ऐसे मुबाह माल को जो किसी की मिल्कियत न हो। और किसी व्यक्ति या गिरोह के कंट्रोल में न हो। जिससे लाभ उठाने की हर व्यक्ति को अनुमति हो। तो जो व्यक्ति पहले जाकर उसको प्राप्त कर ले और उसपर क़ब्ज़ा कर ले वह उसकी मिल्कियत हो जाता है। इसको फ़ुक़हा की शब्दावली में ‘एहराज़े-मुबाहात’ कहते हैं।
2. मिल्कियत का दूसरा ज़रिया यह है कि कोई ऐसा जायज़ अक़्द (अनुबन्ध), लेन-देन या क्रय-विक्रय हो, जिसको शरीअत जायज़ स्वीकार करती हो, जिसके परिणामस्वरूप कोई चीज़ आपकी मिल्कियत में आ जाए। अत: जिस चीज़ को आप क्रय-विक्रय के किसी जायज़ अनुबन्ध आदि के द्वारा प्राप्त करेंगे, वह आपकी मिल्कियत होगी और आप उसके मालिक होंगे। आपने पैसे दिए और मकान ख़रीद लिया, या रक़म अदा की और गाड़ी ख़रीद ली, पैसे दिए और बाज़ार में जो जी चाहा ख़रीद लिया। ये सब चीज़ें जो आपने जायज़ तौर पर क़ीमत अदा करके ख़रीदीं, ये सब आपकी ‘मिल्कियते-ताम्मा’ में शामिल हैं।
3. मिल्कियत ताम्मा का तीसरा ज़रिया क़ुदरती इज़ाफ़ा या स्वाभाविक बढ़ोतरी है। उदाहरणार्थ कोई चीज़ पहले से आपकी मिल्कियते-ताम्मा में थी और उसमें क़ुदरती और प्राकृतिक रूप से बढ़ोतरी हो गई तो वह बढ़ोतरी भी आपकी जायज़ मिल्कियत है। आपने एक छोटा-सा पौधा ख़रीदकर लगाया। वह एक फलदार वृक्ष बन गया। उसमें जितने फल आएँगे वे आपकी मिल्कियत हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि आपने तो छोटा-सा पौधा लिया था, ये फल कहाँ से आ गया। जानवर ख़रीदा था, उसकी नस्ल बढ़ गई। जब तक बढ़ती जाएगी वह आपकी मिल्कियत में रहेगी। जायज़ मिल्कियत के जो जायज़ फल हैं वे सब आपकी मिल्कियत है और आपकी मिल्कियते-तामा शुमार होगी।
4. चौथा ज़रिया है कि किसी चीज़ के अस्ल मालिक के बजाय आप शरीअत के आदेश, क़ानून के आदेश या अस्ल मालिक के फ़ैसले की वजह से मालिक बन गए। जैसे विरासत में होता है। बाप के देहान्त के बाद बेटा वारिस हो गया। बेटे की मुकम्मल मिल्कियत हो गई, क़ानून के आदेश से कि क़ानून ने किसी व्यक्ति को किसी का वारिस क़रार दिया था, या किसी सम्पत्ति को उसका ‘हक़’ क़रार दिया था। हुकूमत ने एक सम्पत्ति किसी के नाम अलाट कर दी। बाद में यह पता चला कि अलाटमेंट दुरुस्त नहीं था। हुकूमत ने कहा कि अमुक व्यक्ति के मरने के बाद यह सम्पत्ति अमुक के नाम अलाट कर दी जाएगी। वह जायज़ मिल्कियत होगी जिसको आप ले सकते हैं। देश के क़ानून और सरकारी फ़ैसले ने उसको आपकी मिल्कियत क़रार दिया। इसी तरह अस्ल मालिक ने वसीयत कर दी कि मेरे मरने के बाद मेरी सम्पत्ति का एक तिहाई हिस्सा या अमुक मकान अमुक व्यक्ति को दे दिया जाए। मेरी गाड़ी अमुक को दे दी जाए। ये किताबें अमुक को दे दी जाएँ। यह भी जायज़ मिल्कियत है, क्योंकि अस्ल मालिक का उत्तराधिकार आपको प्राप्त हो गया और इसके साथ पूरी मिल्कियत भी प्राप्त हो गई। ये चारों ज़रिए मिल्कियते-ताम्मा हैं।
मिल्कियत की विभिन्न किस्में हैं। साझा मिल्कियत भी होती है। निजी और व्यक्तिगत मिल्कियत भी होती है। साझा मिल्कियत के इस्तेमाल के बहुत-से आदेश और शिष्टाचार और नियम हैं जिनका विवरण बयान करने का यहाँ मौक़ा नहीं। अलबत्ता संक्षेप में कुछ ज़रूरी बातें बता देता हूँ। साझा मिल्कियत के दो बड़े-बड़े प्रकार हैं।
मिल्के-मुश्तरक मुतमय्यज़
‘मुतमय्यज़’ से मुराद वह मिल्कियत है जो दो या अधिक साझेदारों की साझी मिल्कियत हो, लेकिन हर साझेदार का हिस्सा अलग-अलग निर्धारित हो। उदाहरणार्थ एक बड़े बाग़ के चार हिस्से हैं और चारों भाइयों की साझा मिल्कियत में हैं। इस तरह की साझा मिल्कियत के आदेश आसान और स्पष्ट हैं।
मिल्के-मुश्तरक मुशाअ
‘मिल्के-मुशाअ’ से मुराद वह मिल्कियत है जिसमें साझेदारों के हिस्से अलग-अलग निर्धारित न हों, बल्कि हर साझेदर मिल्कियत के हर-हर हिस्से में साझेदार हो। उदाहरण के रूप में एक मोटरकार दो आदमियों की साझा मिल्कियत हो तो यह नहीं कहा जा सकता कि एक साझेदार मोटरकार की अगली सीटों का मालिक है और दूसरा साझेदार पिछली सीटों का, बल्कि दोनों साझेदार मोटरकार के हर-हर हिस्से के बराबर मालिक हैं। ‘मिल्के-मुशाअ’ में फिर दो सूरतें होती हैं। एक तो ‘मिल्के-मुशाअ’ वह होती है जो विभाज्य हो। जैसे दुकान में रखी हुई व्यापार सामग्री, बड़े-बड़े मकानात, हवेलियाँ या कृषि की ज़मीन। जो साझे मालिकों में से किसी की माँग पर आसानी से विभाजित की जा सकें। ‘मिल्के-मुशाअ’ का दूसरा प्रकार वह है जो विभाजित न किया जा सके। उदाहरणार्थ मोटरकार, घड़ी, क़लम, सवारी का जानवर, दूध देनेवाले जानवर आदि।
इन तीनों प्रकारों में से पहले दो प्रकारों के आदेश तुलनात्मक रूप से आसान हैं। आख़िरी और तीसरे प्रकार या अविभाज्य ‘मिल्के-मुशाअ’ के आदेश ज़रा मुश्किल और तुलनात्मक रूप से ज़्यादा विस्तृत हैं। अगर सब मालिकों में आपसी सहमति और समझौता हो तो साझा मिल्कियत से लाभान्वित होने में कोई मुश्किल पैदा नहीं होती। मुश्किल तब पैदा होती है जब एक या एक से अधिक पक्ष समझौता और सहयोग से काम न लें। ऐसी स्थिति से निबटने के विस्तृत आदेश प्रतिष्ठित फ़ुक़हा ने संकलित किए हैं। अगर इन आदेशों पर कार्यान्वयन के बावजूद कोई पक्ष सन्तुष्ट न हो तो आख़िरी हल के तौर पर साझा सम्पत्ति को विभाजित कर दिया जाएगा। फ़िक़्ह की किताबों में ‘किताबुल-क़िस्मत’ के नाम से विस्तृत अध्याय मौजूद हैं जिनमें विभाजन के आदेश बयान किए गए हैं। विभाजन का एक प्रकार ‘महायात’ कहलाता है। यह आम तौर से उस मुशाअ जायद में अपनाई जाती है जो अविभाज्य हो। ‘महायात’ का अर्थ है कि दोनों साझेदार सम्पत्ति या मिल्कियत के लाभ को बारी-बारी प्रयोग करें। उदाहरणार्थ एक साझेदार एक दिन प्रयुक्त करे, दूसरा साझेदार दूसरे दिन प्रयुक्त करे। ‘महायात’ के फ़िक़्ही आदेशों की किताबों में विस्तार से लिखा है।
कभी-कभी क़ानूने-शरीअत ने अधिकार दिया है कि आपकी जायज़ और पूरी मिल्कियत को आपसे ज़बरदस्ती ले लिया जाए। इस तरह की चार शक्लें शरीअत ने क़रार दी हैं कि किसी व्यक्ति की मिल्कियत को उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उससे लिया जा सकता है। एक शक्ल तो यह है कि कोई व्यक्ति क़र्ज़दार (ऋणी) है। और क़र्ज़ देनेवालों का क़र्ज़ नहीं दे रहा। दस लाख रुपये क़र्ज़ लिया था और अब जब क़र्ज़ अदा करने का समय आया तो कह रहा है कि मेरे पास क़र्ज़ अदा करने के लिए पैसे नहीं हैं। लेकिन उसके मकान की क़ीमत दस लाख रुपये है। तो अदालत उसके मकान को ख़ाली कराकर नीलाम कर देगी और क़र्ज़ अदा कर दिया जाएगा। यह ज़बरदस्ती मिल्कियत लेने की एक शक्ल है।
दूसरी शक्ल यह है कि आम लोगों के लाभ के लिए किसी सम्पत्ति की आवश्यकता हो। ऐसे जनहित public utilities जो आपकी सम्पत्ति को ज़बरदस्ती लिए बिना पूरे न किए जा सकें। इसका उदाहरण हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ज़माने में प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) के इजमा (सर्वसहमति) से तय हुआ। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने यह तय किया कि मस्जिदे-नबवी का विस्तार करेंगे। इसके लिए आस-पास के मकान प्राप्त करने ज़रूरी थे। हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने मदीने के तमाम मकानों की क़ीमत लगवाई और उनमें जो सबसे ज़्यादा क़ीमत थी, उसके हिसाब से मस्जिदे-नबवी के चारों तरफ़ के मकानों के मालिकों को क़ीमत देकर कहा गया कि अपने-अपने मकान ख़ाली कर दें। अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के प्रतिष्ठित चचा हज़रत अब्बास-बिन-अब्दुल-मुत्तलिब ने कहा कि मैं तो अपना मकान नहीं दूँगा। हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने उनको समझाने की कोशिश की और मस्जिदे-नबवी में विस्तार की आवश्यकता से अवगत किया। जब हज़रत अब्बास, बार-बार कहने के बावजूद आमादा न हुए तो हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने फ़रमाया कि अब मैं ज़बरदस्ती लूँगा। हज़रत अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहा कि आपको इसका ‘हक़’ नहीं। हज़रत उमर (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने कहा कि नहीं मुझे यह ‘हक़’ है। दोनों सहाबा में इस बात पर मतभेद हुआ कि क्या किसी हुकूमत या ख़लीफ़ा को यह ‘हक़’ प्राप्त है कि वह ज़बरदस्ती किसी की सम्पत्ति ले-ले या उसको बेचने पर मजबूर कर दे, क्या इस्लामी शरीअत में इसकी अनुमति है।
दोनों ने हज़रत उबई-बिन-कअब को हकम (फ़ैसला करनेवाला) बनाया। हज़रत उबई-बिन-कअब ने हज़रत उमर फ़ारूक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) के ‘हक़’ में फ़ैसला दिया। सब प्रतिष्ठित सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हुम) मौक़े पर मौजूद थे। सबने सहमति जताई और यह तय हो गया कि इस तरह जनहित के लिए किसी व्यक्ति को मजबूर किया जा सकता है कि वह अपनी सम्पत्ति बेच दे। बिना क़ीमत लेने का कोई प्रावधान इस्लाम में नहीं है। जो भी बाज़ार की क़ीमत होगी वह अदा करनी पड़ेगी। उसके बिना किसी सम्पत्ति का कण बराबर लेने का कोई ‘हक़’ इस्लाम में नहीं है। फ़िक़्हे-इस्लामी का सर्वसम्मत सिद्धान्त है कि “इज़तिरार’ (मजबूरी) की वजह से दूसरे का हक़ समाप्त या रद्द नहीं किया जा सकता।” अत: मजबूरी की हालत में भी किसी की चीज़ बिना क़ीमत वुसूल करना जायज़ नहीं। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति को सख़्त प्यास लग रही थी। मरनेवाला था, और किसी ग़ैर-मुस्लिम की शराब रखी हुई थी। उसने जान बचाने के लिए मजबूरी की हालत में दो घूँट पी लिए। इस मौक़े पर शराब के इन दो घूँटों की क़ीमत भी शराब के मालिक को देनी पड़ेगी। इसलिए कि आपकी मजबूरी से दूसरे का हक़ समाप्त नहीं होता। इस तरह का ‘इज़तिरार’ यहाँ तो नहीं था, लेकिन दूसरे का हक़ सख़्त-से-सख़्त ‘इज़तिरार’ में भी समाप्त नहीं होगा।
तीसरी शक्ल जहाँ लोगों की सम्पत्ति को ज़बरदस्ती बेचा जा सकता है और उन्हें मजबूर किया जा सकता है कि वे अपनी चीज़ बेच दें, वह है जहाँ लोग जमाख़ोरी कर रहे हों। मान लीजिए कि दस बारे व्यापारियों ने बाज़ार का सारा या अधिकतर गेहूँ ख़रीद कर अपने गोदामों में संग्रह कर दिया और कहा कि नहीं बेचते और इस प्रतीक्षा में हैं कि जब क़ीमत चढ़ेगी तब बेचेंगे। अनाज की कमी होगी तो ज़्यादा क़ीमत पर बेचेंगे। शरीअत ने इसकी अनुमति नहीं दी और हुकूमत को यह अधिकार दिया है कि ऐसी स्थिति हो तो वह ज़बरदस्ती गोदामों को तोड़ दे और अनाज बिकवा दे और उनको मजबूर कर दे कि वे बाज़ार की क़ीमत पर बेच दें।
चौथी शक्ल हक़्क़े-शुफ़अः की है। शुफ़अः का अधिकार शरीअत ने साझेदार को भी दिया है और पड़ोसी को भी दिया है।
अगरचे शुफ़अः को मिल्कियत को ज़बरदस्ती दूसरे को दिया जाना क़रार नहीं दिया जा सकता। लेकिन चूँकि यहाँ कुछ हद तक सहमति नहीं पाई जाती, इसलिए कुछ समकालीन फ़ुक़हा ने इसको भी मिल्कियत को ज़बरदस्ती लेने के सन्दर्भ में बयान किया है।
‘ज़रूरत’ और ‘इज़तिरार’ की परिकल्पना
फ़िक़्हे-इस्लामी की एक महत्वपूर्ण धारणा या विचारधारा ‘ज़रूरत की विचारधारा’ है। ‘ज़रूरत की विचारधारा’ पर लेख आते रहते हैं। लोग शरीअत का मत समझे बिना इस विचारधारा के बारे में ग़लत-फ़हमियों का इज़हार करते हैं। ‘ज़रूरत की विचारधारा’ या ‘इज़तिरार की धारणा’ यह है कि कोई ऐसी स्थिति जिसमें हराम कार्य अपरिहार्य हो जाए, शरीअत के किसी मौलिक उद्देश्य की रक्षा के लिए किसी नाजायज़ काम का करना अपरिहार्य हो जाए और उस नाजायज़ काम को किए बिना कोई और रास्ता शरीअत के उद्देश्य की रक्षा का न रह जाए। इसको ‘ज़रूरत’ कहते हैं। उदाहरण के रूप में शरीअत के मौलिक उद्देश्यों में से इंसानी जान की रक्षा भी है। अब अगर कोई इंसानी जान किसी जंगल या वीराने में प्यास से बरबाद हो रही है, जहाँ प्यास बुझाने के लिए पानी का क़तरा तक उपलब्ध नहीं है और एक ग़ैर-मुस्लिम हमसफ़र के पास केवल शराब की बोतल है तो इस स्थिति में वह मजबूर और बेक़रार प्यासा जान बचाने के लिए शराब के एक-दो घूँट पीकर जान बचा सकता है। यहाँ हराम काम के करने की अनुमति जान बचाने के लिए दी गई है। लेकिन जान को ख़तरा न हो तो फिर वह हराम काम जायज़ नहीं है। मात्र हल्की-फुल्की प्यास बुझाने और केवल मज़े लेने के लिए जायज़ नहीं है। जायज़ केवल इस हद तक होगा जिस हद तक जान बचाने के लिए अपरिहार्य हो।
यह वह स्थिति है जिसके बारे में फ़िक़्ह का फ़ार्मूला है कि “ज़रूरत नाजायज़ चीज़ों को जायज़ क़रार दे देती है”। लेकिन यहाँ ‘ज़रूरत’ से मुराद हमारी उर्दू/हिन्दी वाली ज़रूरत/आवश्यकता नहीं है। बल्कि ‘ज़रूरत’ फ़िक़्हे-इस्लामी की एक शब्दावली है जिससे मुराद वह स्थिति है जहाँ शरीअत का कोई उद्देश्य तत्काल नष्ट हो रहा हो। उसका मूल सिद्धान्त यह है कि “ज़रूरत पर उसी हद तक अमल किया जाएगा जिस हद तक अमल करना अपरिहार्य है।” अगर एक घूँट से जान बच सकती है तो दो घूँट पीना जायज़ नहीं होगा। दो घूँट से जान बच सकती है तो तीन घूँट पीना जायज़ नहीं होगा। एक निवाला (कौर) सूअर के गोश्त से काम चल सकता हो तो दो निवाले जायज़ नहीं होंगे। इसलिए कि “ज़रूरत पर उसी हद तक अमल किया जाएगा जिस हद तक अमल करना अपरिहार्य है।”
तीसरी शर्त यह है कि जिस आवश्यकता की वजह से नाजायज़ काम जायज़ हो रहा है वह आवश्यकता उस समय व्यावहारिक रूप से मौजूद हो। आगामी रूप से पेश आनेवाली आवश्यकता की आशंका के आधार पर किसी नाजायज़ काम को करना जायज़ नहीं है। तत्काल at that very moment, वह आवश्यकता मौजूद हो, तब नाजायज़ काम करना जायज़ होगा।
‘ज़रूरत’ की बहुत-सी किस्में हैं। कुछ ज़रूरतें ऐसी हैं कि जिनकी मौजूदगी के बावजूद कोई हराम काम हलाल नहीं होता। उदाहरणार्थ किसी मुसलमान का क़त्ल किसी हाल में जायज़ नहीं है। कोई आवश्यकता ऐसी नहीं जिसमें किसी मुसलमान को क़त्ल करना जायज़ क़रार पाए। बदकारी (व्यभिचार) किसी हाल में जायज़ नहीं है। कोई ऐसी स्थिति नहीं जिसमें बदकारी जायज़ क़रार पा जाए और इसे कर दिया जाए। कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि वे हराम तो रहती हैं, लेकिन करने के बावजूद उनके करने से गुनाह नहीं होता। पवित्र क़ुरआन ने कहा है कि यह कार्य हराम तो रहेगा, लेकिन ‘इज़तिरार’ (मजबूरी) की हालत में करनेवाला गुनाहगार नहीं होगा। कोई व्यक्ति ज़बरदस्ती किसी मुसलमान को पकड़ ले और कहे कि अगर कलिमा-ए-कुफ़्र न बका तो मैं गोलीमार दूँगा। तो क़ुरआन ने अनुमति दी है कि जान बचाने के लिए कलिमा-ए-कुफ़्र कहना पड़े तो जान बचाने के लिए ऐसा कर सकते हो। लेकिन जान क़ुर्बान कर दो तो बड़ा ऊँचा दर्जा है। यहाँ कलिमा-ए-कुफ़्र कहना हराम तो रहेगा, लेकिन सर्वोच्च अल्लाह ने अपनी रहमत से इसका गुनाह उठा लिया। हराम तो रहेगा, मगर सज़ा नहीं होगी। ‘इज़तिरार’ (मजबूरी) की कुछ ऐसी शक्लें हैं कि जिसमें एक हराम काम हराम भी नहीं रहता और गुनाह भी नहीं होता। जैसे मरनेवाला भूख से मर रहा हो और जान बचाने के लिए मुर्दार गोश्त खाए। या किसी ऐसे जानवर का गोश्त खा ले जो शरीअत में जायज़ नहीं है।
‘अक़्द’ की धारणा
फ़िक़्हे-इस्लामी, बल्कि दुनिया के लगभग तमाम प्राचीन एवं आधुनिक क़ानूनों में एक महत्वपूर्ण धारणा ‘अक़्द’ या अनुबन्ध की होती है। यानी जब दो या दो से अधिक व्यक्तियों के दरमियान कोई व्यापारिक, दीवानी, पारिवारिक या किसी और प्रकार का कोई मामला या अनुबन्ध हो तो उसके नियम-क़ानून और आदेश क्या हों। यह मामला या अनुबन्ध फ़िक़्हे-इस्लामी की शब्दावली में ‘अक़्द’ कहलाता है। यह शब्दावली स्वयं इसी अर्थ में पवित्र क़ुरआन से उद्धृत है— “ऐ ईमानवालो अपने उक़ूद (अनुबन्धों) को पूरा करो।” (क़ुरआन, 5:1)
इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘अक़्द’ की विभिन्न परिभाषाएँ की हैं। सम्भवत: सबसे व्यापक और संक्षिप्त परिभाषा वह है जो ‘मुजल्लतुल-अहकाम अल-अदलिया’ में दी गई है। ‘मुजल्ला’ की धारा 103 में कहा गया है कि ‘अक़्द’ से मुराद ‘ईजाब’ और ‘क़ुबूल’ का ऐसे क़ानूनी और शरई अंदाज़ में परस्पर जुड़ना जिसका ‘असर’ ‘महले-अक़्द’ पर साबित हो जाए। ‘ईजाब’ से मुराद वह पेशकश या ऑफ़र है जो एक पक्ष किसी मामले के लिए दूसरे पक्ष के सामने करता है। ‘क़ुबूल’ से मुराद इस पेशकश को स्वीकार कर लेना। शरई अंदाज़ से मुराद यह है कि दोनों काम यानी पेशकश और क़ुबूलियत शरीअत एवं क़ानून में दी गई शर्तों और अपेक्षाओं के अनुसार हुए हूँ। ‘महले-अक़्द’ से मुराद वह चीज़, सम्पत्ति, माल, काम, हक़ या सम्बन्ध है जिसकी ख़ातिर कोई अक़्द किया गया हो। ‘असर’ से मुराद वे परिणाम एवं फल हैं जो इस अक़्द के बाद ज़ाहिर हों। उदाहरणार्थ मिल्कियत का स्थानांतरण वग़ैरा। अक़्द के जायज़ होने की मौलिक शर्तें तीन हैं—
1. अक़्द जायज़ काम के लिए हो और ‘माले-मुतक़व्विम’ के आधार पर हुआ हो।
2. दोनों पक्षों की पूरी सहमति (तराज़ी) से हुआ हो।
3. आपस की शर्तें और मामला शरीअत से टकराता न हो।
इस्लाम में क़ानूने-अक़्द का बहुत-सा विस्तृत विवरण इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने संकलित किया है। उसमें से बहुत-से विवरण के बारे में प्रतिष्ठित फ़ुक़हा सहमत हैं, जबकि कुछ के बारे में उनके बीच मतभेद पाया जाता है। अक़्द के बारे में सबसे नर्म और लिबरल दृष्टिकोण इमाम अहमद-बिन-हंबल (रह॰) और उनके समविचार फ़ुक़हा का है। अक़्द के प्रकार, उनके आदेश और शर्तें इस्लाम के दीवानी क़ानून का सम्भवतः सबसे महत्वपूर्ण अध्याय हैं। यहाँ अक़्द के सारे प्रकार और उनके आदेश बयान करना तो मुश्किल है। अलबत्ता अक़्द की महत्वपूर्ण क़िस्मों का परिचय संक्षिप्त बयान कर देता हूँ।
अक़्द की मौलिक क़िस्में तो दो ही हैं।
1. अक़्दे-सही
2. अक़्दे-ग़ैर-सही
अक़्दे-सही से मुराद वह अक़्द है जिसमें अक़्द के तमाम आदेशों और शर्तों पर अमल किया गया हो। अक़्दे-सही में फिर एक विभाजन अक़्द-नाफ़िज़ और अक़्दे-मौक़ूफ़ का है। ‘नाफ़िज़’ वह है जो तत्काल लागू हो जाए। अक़्दे-मौक़ूफ़ वह है जो स्वयं तो सही हो, लेकिन उसपर कार्यन्वयन और उसके परिणाम तथा फल के प्रकट होने के लिए किसी और की अनुमति दरकार हो।
अक़्दे-नाफ़िज़ के फिर दो और प्रकार हैं। एक प्रकार अक़्दे-लाज़िम कहलाता है। इसमें एक-बार ईजाब और क़ुबूल हो जाने के बाद दोनों पक्षों पर उसके फल एवं परिणाम का पालन कानूनी तौर पर लागू हो जाता है। उदाहरणार्थ अक़्दे-बैअ एक अक़्दे-लाज़िम है। जब एक-बार यह अक़्द हो जाए तो विक्रेता के लिए अनिवार्य है कि विक्रय हेतु चीज़ ख़रीदार के हवाले कर दे और ख़रीदार के लिए अनिवार्य है कि क़ीमत अदा करे। यहाँ कोई एक पक्ष यकतरफ़ा तौर पर अब अनुबन्ध से नहीं निकल सकता। इसके विपरीत अक़्दे-ग़ैर-लाज़िम वह है जहाँ दोनों पक्ष जब चाहें दूसरे पक्ष की अनुमति के बिना अक़्द को समाप्त कर सकते हैं। उदाहरणार्थ वकालत की कुछ स्थितियों में, या ‘इआरा’ में दोनों पक्ष जब चाहें अनुबन्ध समाप्त कर सकते हैं।
अक़्दे-ग़ैर-सही को अहनाफ़ (हनफ़ी) दो उप-प्रकारों में विभाजित करते हैं। उनके यहाँ अक़्दे-फ़ासिद वह है जिसके दोनों स्तंभ यानी ईजाब और क़ुबूल और महले-अक़्द तो दुरुस्त हों लेकिन कोई ऐसी शर्त ग़ायब हो जिसका अक़्द की वास्तविकता से सम्बन्ध न हो। अगर यह कमी पूरी कर दी जाए तो अक़्दे-सही हो जाता है। अक़्दे-ग़ैर-सही का दूसरा प्रकार अहनाफ़ के नज़दीक अक़्दे-बातिल है। अक़्दे-बातिल से मुराद वह अक़्द है जिसमें कोई एक मौलिक स्तंभ ग़ायब हो। अक़्दे-फ़ासिद के कुछ-न-कुछ क़ानूनी प्रभाव होते हैं, जबकि अक़्दे-बातिल सिरे से ab initio (निरस्त) होता है। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि अंग्रेज़ी क़ानून ने भी इमाम अबू-हनीफ़ा (रह॰) के दृष्टिकोण से मिलता-जुलता दृष्टिकोण अपनाया है। अंग्रेज़ी क़ानून में भी void यानी व्यर्थ और निरस्त voidable या अमान्य करणीय (फ़ासिद) में अन्तर बनाए रखा गया है। सम्भव है कि अंग्रेज़ी क़ानून में यह धारणा हनफ़ी फ़ुक़हा के यहाँ से ही ली गई हो।
अक़्द का एक प्रकार मकरूह भी है। यह अक़्द का वह प्रकार है जो कलात्मक दृष्टि से, यानी टेक्निकली, तो दुरुस्त और सही हो, लेकिन किसी नैतिक बुराई या किसी और नकारात्मक पहलू की वजह से उसको नापसंद क़रार दिया गया हो। ऐसे अनुबन्धों पर तत्कालीन हुकूमत अपनी समझ के अधिकार से प्रतिबन्ध या उचित नियम लागू कर सकती है।
मामले के प्रारूप की दृष्टि से भी अक़्द के अनेक उप प्रकार हैं। उदाहरणार्थ अक़ूदुल-मुआवज़ह, जिनमें क्रय-विक्रय, इजारा, सुलम, इस्तिसना (अपवाद), वकाला आदि शामिल हैं, उक़ूदुल-मुशारका जिनमें शिरकत, मुज़ारबत, मज़ारअत और मुसाक़ात आदि शामिल हैं। या उक़ूदुत-तवस्सुक़ जिनमें किफ़ाला, हवाला और रहन नुमायाँ हैं।
अक़्द से मिलती-जुलती दो और शब्दावलियाँ इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) के यहाँ प्रचलित हैं। ‘तसर्रुफ़’ और ‘इल्तिज़ाम’। ‘तसर्रुफ़’ से मुराद यहाँ वे मामलात हैं जो कोई व्यक्ति एकतरफ़ा तौर पर कर सकता हो और जिनके परिणामस्वरूप दूसरों के अधिकार क़ायम हो जाते हों। जैसे हिबा, इक़रार या वसीयत वग़ैरा। इस तरह का ‘इल्तिज़ाम’ (प्रावधान) भी वह एकतरफ़ा कार्रवाई है जिसके परिणामस्वरूप कोई व्यक्ति दूसरे का कोई ‘हक़’ अपने ज़िम्मे ले ले। उदाहरणार्थ वक़्फ़ या इबरा या किफ़ालत के मामलात।
‘अहलियत’ की धारणा
फ़िक़्हे-इस्लामी की एक और महत्वपूर्ण धारणा अहलियत यानी योग्यता है। ‘अहलियत’ से मुराद किसी व्यक्ति की वह प्रतिभा है जिसको प्राप्त करने के बाद उसके क़ानूनी व्यक्तित्व की पूर्ति हो जाती है और वह व्यक्ति फिर वे तमाम काम कर सकता है जो कानूनी रूप से उसके अधिकार में हैं। इसी तरह ‘अहलियत’ की प्राप्ति के बाद उसपर वे तमाम शरई और क़ानूनी ज़िम्मेदारियाँ भी लागू हो जाती हैं जो एक ज़िम्मेदार नागरिक पर लागू होनी चाहिएँ।
‘अहलियत’ की दो क़िस्में और दो दर्जे हैं। क़िस्में तो ‘अहलियते-कामिला’ और ‘अहलियते-नाक़िसा’ हैं, जबकि दर्जे ‘अहलियते-वुजूब’ और ‘अहलियते-अदा’ हैं। ‘अहलियत’ के विभिन्न दौर और मरहले हैं। कुछ मरहलों में ‘अहलियते-नाक़िसा’ और कुछ में ‘अहलियते-कामिला’ होती है। उदाहरण के रूप में भ्रूण, बच्चा, मराहिक़ आदि की ‘अहलियते-नाक़िसा’ है। जबकि बालिग़ (वयस्क) की ‘अहलियत’ कभी नाक़िस (त्रुटिपूर्ण) और कभी कामिल (परिपूर्ण) होती है। पक्की उम्र और पक्की अक़्ल (रुश्द) वाले की ‘अहलियत’ हर दृष्टि से कामिल होती है।
‘अहलियत’ की कुछ कमज़ोरियाँ भी होती हैं जिनकी वजह से ‘अहलियत’ नष्ट या कमज़ोर हो जाती है। ये कमज़ोरियाँ आसमानी या क़ुदरती भी होती हैं और स्वयं अपनाई हुई या प्राप्त की हुई भी होती हैं। इन सबके विवरण का यहाँ मौक़ा नहीं। फ़िक़्हे-इस्लामी की यह कुछ महत्वपूर्ण और मौलिक धारणाएँ हैं जिनका मैंने अत्यन्त संक्षेप में परिचय कराया है। उनमें से कई धारणाएँ मैंने छोड़ दी हैं जिनका केवल उल्लेख कर देता हूँ।
‘तदलीस’ की धारणा
‘तदलीस’ के शाब्दिक अर्थ किसी कमज़ोरी को जान-बूझकर छिपाने के हैं। फ़िक़्ह की शब्दावली में ‘तदलीस’ से मुराद है बेचनेवाले की तरफ़ से बेची जानेवाली वस्तु का ऐब छुपाना। इसके आम अर्थ में ख़रीदार से झूठ बोलकर या उसके सामने ग़लत प्रभाव डालकर उसको कोई कमतर चीज़ ख़रीदने पर आमादा कर लेना भी शामिल है। ‘तदलीस’ शरई रूप से हराम है। अनेक हदीसों में इसका हराम होना बयान किया गया है। ‘तदलीस’ के परिणामस्वरूप होनेवाले क्रय-विक्रय के मामले में प्रतिष्ठित फ़ुक़हा के दरमियान इस बात पर मतैक्य है कि ‘तदलीस’ के शिकार व्यक्ति को सौदा निरस्त कराने का अधिकार है। न केवल क्रय-विक्रय के मामले में, बल्कि हर ऐसे अक़्द में जिसका आधार मुआवज़े पर हो, नुक़सान उठानेवाला व्यक्ति (मुदल्लस अलैह) को अधिकार है कि अक़्द को रद्द कर दे। यह ‘तदलीस’ का अधिकार कहलाता है। प्रतिष्ठित फ़ुक़हा ने यह स्पष्ट भी किया है कि ‘तदलीस’ का जुर्म करनेवाला दंड का पात्र है और तत्कालीन हुकूमत उसको ताज़ीरी सज़ा दे सकती है।
तकलीफ़
‘तकलीफ़’ की सामान्य परिभाषा उसूले-फ़िक़्ह के सन्दर्भ में बयान हो चुकी है। बात का सारांश यह कि ‘तकलीफ़’ से मुराद है शरीअत प्रदान करनेवाले की तरफ़ से किसी काम के करने या न करने का आदेश दिया जाना या किसी कार्य के करने या न करने का अधिकार प्रदान होना। ‘तकलीफ़’ की बहसों का बड़ा गहरा सम्बन्ध ‘अहलियत’ की बहसों से है। इसलिए तकलीफ़ (मुकल्लफ़ क़रार दिए जाने) का अक्सर एवं अधिकतर दारोमदार ‘अहलियत’ पर है।
‘हरज’ की धारणा
शब्दकोशीय दृष्टि से ‘हरज’ का अर्थ तंगी है। शब्दकोश में उस तंग जगह या रास्ते को भी ‘हरज’ कहते हैं जहाँ से कोई गुज़र न सके। शब्दावली में ‘हरज’ से मुराद वह तंगी है जिससे बचना सम्भव हो और शरीअत के आदेशों के पालन में इससे पहले पेश आता हो, ऐसी तंगी से बचना शरीअत की तत्वदर्शिता का एक महत्वपूर्ण अंग है।
‘ज़रर’ की धारणा
‘ज़रर’ के शाब्दिक अर्थ नुक़्सान (Damage) है। शब्दावली की दृष्टि से ‘ज़रर’ से मुराद वह नुक़्सान या परेशानी या तकलीफ़ है जो नाजायज़ तौर पर किसी व्यक्ति को पहुँचे। पवित्र क़ुरआन की अनेक आयतों में ‘ज़रर’ से बचने का उपदेश दिया गया है। हदीसों में सबसे व्यापक हदीस ‘ला ज़र-र वला ज़िरार’ (किसी को नुक़सान पहुँचाना जायज़ नहीं, न शुरू में, न बदले में) है, जिसको इमाम मालिक (रह॰) ने मुवत्ता में बयान किया है।
इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘ज़रर’ के आदेशों को फ़िक़्ह के अनेक नियमों में बयान किया है जो वास्तव में इसी हदीस की व्याख्या की हैसियत रखते हैं। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण नियम ये हैं—
1. ‘ज़रर’ को दूर किया जाएगा।
2. बड़े और ज़्यादा सख़्त ‘ज़रर’ को छोटे और कुछ हल्के ‘ज़रर’ के ज़रिये दूर किया जाएगा।
3. ‘ज़रर’ को उस जैसे दूसरे ‘ज़रर’ से दूर नहीं किया जाएगा।
इस्लामी फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने ‘ज़रर’ से बचने के बहुत विस्तृत आदेश संकलित किए हैं। कुछ समकालीन विद्वानों ने ‘ज़रर’ पर विस्तृत किताबें लिखी हैं।
‘ज़मान’ की धारणा
शाब्दिक दृष्टि से ‘ज़मान’ से मुराद वह जुर्माना या आर्थिक ज़िम्मेदारी है जो किसी व्यक्ति पर क़ानून या अनुबन्ध के परिणामस्वरूप लागू हो। पारिभाषिक अर्थ की दृष्टि से ‘ज़मान’ आम तौर से उस जुर्माने को कहते हैं जो किसी व्यक्ति की किसी ज़्यादती या कोताही के परिणामस्वरूप उसपर लागू हो। चुनाँचे किसी व्यक्ति से किसी की कोई चीज़ अगर नष्ट हो जाए तो मालिक को उसका जुर्माना अदा करना पड़ेगा। यह जुर्माना ‘ज़मान’ कहलाता है। ‘मुजल्लतुल-अहकाम अल-अदलिया’ में कहा गया है कि ‘मिस्ली’ चीज़ का ज़मान ‘मिस्ली’ और ‘क़ीमी’ चीज़ का ज़मान उसकी क़ीमत होगा।
उमूमे-बलवी
‘उमूम-बलवी’ से मुराद कोई ऐसी नापसंदीदा या ख़राब हालत जो इतनी आम हो जाए और इस क़दर फैल जाए कि उससे बचना मुश्किल हो जाए। ‘उमूमे-बलवी’ के परिणामस्वरूप कुछ आदेशों में कमी हो जाती है। ‘उमूमे-बलवी’ का आम उसूल यह है कि जिन मामलों में ‘नस्से-क़तई’ (क़ुरआन या हदीस के स्पष्ट आदेश) मौजूद न हो वहाँ ‘उमूमे-बलवी’ की वजह से मकरूहात में कमी की जा सकती है।
‘ग़रर’
‘ग़रर’ का शाब्दिक अर्थ तो ‘धोखा’ है, लेकिन फ़िक़्ह की शब्दावली में ‘ग़रर’ से मुराद ऐसा अक़्द या अनुबन्ध जिसका अंजाम सन्दिग्ध हो, और जिसके बारे में विश्वास से न कहा जा सके कि वह अंजाम पा सकेगा या नहीं। शरीअत में हर ऐसे अक़्द को नाजायज़ क़रार दिया गया है जिसमें किसी एक पक्ष के अधिकार या ज़िम्मेदारियाँ अनिर्धारित और सन्दिग्ध हों। ‘ग़रर’ का और अधिक विवरण आगे एक अभिभाषण में आएगा।
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