
हज कैसे करें (संछिप्त)
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फ़िक़्ह
- at 20 December 2021
“बेशक मैंने इबराहीम के रास्ते पर रहते हुए यकसू होकर अपना रुख़ उस हस्ती की तरफ़ कर लिया जिसने ज़मीन और आसमानों को पैदा किया और मैं मुशरिक नहीं हूँ। बेशक मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी, मेरा जीना और मेरा मरना अल्लाह ही के लिए है जो तमाम जहानों का रब है। उसका कोई शरीक नहीं है। मुझे उसी का हुक्म है और सबसे पहले हुक्म माननेवाला मैं हूँ। ऐ अल्लाह, ये तेरे लिए है और तेरा ही दिया हुआ है। "
सैयद हामिद अली
प्रकाशक: एम. एम. आई. (MMI) पब्लिशर्स
भूमिका
हज जैसी अज़ीमुश्शान इबादत भी आज बेअसर हो चुकी है, न हाजियों की ज़िन्दगी में इससे कोई अच्छा इनक़िलाब आता है और न ही मुस्लिम उम्मत के बेरूह जिस्म में ज़िन्दगी की लहर दौड़ती है। इसकी वजह सिर्फ़ यह है कि हज करनेवाले आम तौर पर हज की हक़ीक़त व रूह और उसके मक़सद से अनजान होते हैं। वे हज को बेरूह रस्मों की तरह अदा करके मुत्मइन हो जाते हैं कि वे अपनी ज़िम्मेदारी से बरी और अल्लाह के यहाँ बड़े अज्र के हक़दार हो गए और ऐसी बेरूह रस्मों का असर सबको मालूम है!
इल्म रखनेवालों की ज़िम्मेदारी थी कि आम मुसलमानों को इस बेख़बरी के दलदल से निकालते लेकिन उनकी तरफ़ से हज पर लिखी गई किताबों में और सब कुछ है, पर हज की हक़ीक़त और उसकी रूह की वज़ाहत (स्पष्टीकरण) ही नहीं है। एक-दो लेखकों ने इस तरफ़ ध्यान दिया भी है तो हज के सिर्फ़ एक रुख़ और उसके एक-दो पहलुओं को सामने रखकर; ज़ाहिर है, जिस इबादत के बहुत-से मक़सद हों और उनमें से कोई भी मक़सद कम अहम न हो तो उसके किसी एक मक़सद की वज़ाहत न काफ़ी हो सकती है और न ही हक़ीक़ी फ़ायदा देनेवाली।
इस संक्षिप्त पुस्तिका में हज करने का तरीक़ा स्पष्ट रूप से बयान किया गया है। साथ ही इसमें मदीना मुनव्वरा की हाज़िरी का बयान भी है। हज करनेवालों को ऐसी किताबें ज़रूर पढ़नी चाहिए जिनसे हज का मक़सद, उसकी हक़ीक़त और उसकी रूह के सभी पहलू उनके सामने आ जाएँ।
-नसीम ग़ाज़ी फ़लाही
बिसमिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
(अल्लाह रहमान, रहीम के नाम से)
आपको हज का मुबारक मौक़ा मिल रहा है, यह अल्लाह का बहुत बड़ा करम है, इस फ़ज़्ल व करम पर आप उसका जितना भी शुक्र अदा करें, कम है। आख़िर इस दुनिया में बहुत-से ऐसे मुसलमान भी तो हैं जिनपर अल्लाह के आदेश—
“और लोगों पर अल्लाह का हक़ है कि जो उस घर तक पहुँचने की ताक़त रखता हो वह उसके घर का हज करे।" (क़ुरआन, सूरा-3 आले-इमरान, आयत-97)
के मुताबिक़ हज फ़र्ज़ हो चुका है मगर उन्हें इसकी अदायगी की तौफ़ीक़ नहीं होती और कितने ही ऐसे बन्दे हैं जो उम्र भर तमन्ना करते रहते हैं कि वे उस पाक जगह पर किसी तरह पहुँच जाएँ मगर उनकी यह तमन्ना पूरी नहीं होती।
आप कितने ख़ुशनसीब हैं कि अपने मालिक और नेमतों से नवाज़नेवाले ख़ुदा की पुकार पर 'लब्बैक' (हाज़िर हूँ) कहने और उसके दरबार में हाज़िरी का मौक़ा मिल रहा है। ख़ुदा आपके मुबारक इरादों को पूरा करे और 'हज्जे-मबरूर' यानी वह हज जो अल्लाह के दरबार में क़बूल हो जाए, अदा करने की तौफ़ीक़ दे।
हज की क़िस्में
हज तीन तरह के हैं –
(1) इफ़राद: यानी मीक़ात (एहराम बाँधने की जगह) से सिर्फ़ हज की नीयत से एहराम बाँधें।
(2) क़िरान: यानी मीक़ात से हज और उमरे दोनों की नीयत करके एहराम बाँधें और दोनों को एक साथ अदा करें।
(3) तमत्तो: यानी मीक़ात से सिर्फ़ उमरे की नीयत से एहराम बाँधें और मक्का पहुँचकर उमरा अदा करके एहराम खोल दें। फिर आठवीं ज़िल-हिज्जा को मस्जिदे-हराम ही से हज का एहराम बाँधें। इफ़राद और क़िरान में एहराम की सारी पाबन्दियाँ हज अदा होने तक क़ायम रहती हैं जिनका निभाना ज़्यादातर लोगों के लिए मुश्किल होता है, इसके बरख़िलाफ़ तमत्तो में आसानियाँ हैं। इसलिए हम नीचे तमत्तो का तरीक़ा लिखते हैं और हाजियों को तमत्तो ही का मशवरा देते हैं।
जहाज़ के 'यलमलम’ (यलमलम पर किसी वजह से एहराम न बाँध सकें तो जद्दा से बाँध सकते हैं। मदीना पहले जा रहे हों तो यहाँ एहराम बाँधने के बजाय मदीना से वापसी पर बाँधे।) के सामने से गुज़रने के पहले ही अपनी हजामत बनवा लें, बग़ल आदि के बाल साफ़ कर लें, नाख़ुन कटवा लें, अच्छी तरह नहा लें कि मैल-कुचैल न रहे। अगर ग़ुस्ल न कर सकें तो वुज़ू कर लें, सिले कपड़े उतारकर तहबन्द बाँध लें, ऊपर से चादर ओढ़ लें, इत्र लगाएँ फिर दो रक्अत नफ़्ल नमाज़ अदा करें। सलाम फेरने के बाद ही सिर से चादर उतार दें और दिल से अल्लाह की रिज़ा के लिए उमरे की नीयत करें। साथ ही ऊँची आवाज़ में तलबियह कहें—
लब्बै-क, अल्लाहुम्-म लब्बै-क, लब्बैक ला शरी-क ल-क लब्बैक, इन्नल हम-द वन्-निअ-म-त ल-क वल मुल्-क, ला शरी-क ल-क।
“मैं हाजिर हूँ, ऐ अल्लाह, मैं हाज़िर हूँ! (तेरे दरबार में) मैं हाज़िर हूँ! तेरा कोई शरीक नहीं, मैं हाज़िर हूँ! बेशक तारीफ़ तेरे ही लिए है! नेमतें तेरी ही हैं और बादशाहत तेरे ही लिए है। तेरा कोई शरीक नहीं।"
पूरे शौक़ के साथ ख़ुदा को हाज़िर और नाज़िर जानते हुए उसे मुख़ातब करते हुए तलबियह कही जाए और ख़ूब सोच-समझकर कही जाए।
नाजाइज़ काम
अब आप एहराम की हालत में हैं। इस हालत में आपके लिए सिला हुआ कपड़ा पहनना, सिर और चेहरा ढाँकना, टख़ने ढाँकनेवाला जूता या मोज़ा पहनना, नाख़ुन काटना, बदन के किसी भी हिस्से से बाल काटना, कंघी करना, तेल लगाना, बदन या कपड़ों की जूँ मारना, ख़ुशबू लगाना, सहवास करना, किसी भी तरह की शहवानी (काम-वासना सम्बन्धी) बात या हरकत करना, ख़ुशकी के जानवरों का शिकार करना वग़ैरा ये सब बातें हराम हैं। हाँ, औरतें सिले हुए कपड़े और मोज़े पहन सकती हैं और सिर ढाँक लेंगी। परन्तु चेहरे पर कपड़ा डालना, हाथ में दस्ताने पहनना और ज़ाफ़रान से रंगा हुआ कपड़ा पहनना उनके लिए भी मना है।
एहराम की हालत में ख़ालिस पानी से नहाना जाइज़ है, परन्तु मैल दूर न करें। और बिना ख़ुशबू का सुरमा लगाना, मूज़ी (कष्ट देनेवाले) जानवरों को मारना, रुपये की थैली या पेटी तहबन्द के ऊपर या नीचे बाँधना और तहबन्द में रुपया या घड़ी के लिए जेब लगाना जाइज़ है।
करने के काम
अब मक्का पहुँचने तक आपके लिए कोई ख़ास काम नहीं है। आप अपना सारा वक़्त अल्लाह को राज़ी करने में और उसकी इबादत में गुज़ारिए, नमाज़ें एहतिमाम के साथ पढ़िए, क़ुरआन की समझकर तिलावत कीजिए, तौबा और इसतिग़फ़ार कीजिए, अल्लाह को ख़ूब याद कीजिए और उससे गिड़गिड़ाकर दुआएँ माँगिए और तलबियह ज़्यादा-से-ज़्यादा पढ़िए, क्योंकि यही आपका ख़ास ज़िक्र है। किसी से मिलते वक़्त, ऊपर चढ़ते और नीचे उतरते वक़्त, सुबह होने पर और नमाज़ों के बाद ऊँची आवाज़ से बार-बार तलबियह पढ़िए और इसका मतलब समझकर अपनी ज़िम्मेदारियाँ याद कीजिए। लड़ाई-झगड़ा करने, लोगों को तकलीफ़ देने और बेकार और फ़ज़ूल की बातों से बचिए। लोगों की सेवा कीजिए, दीन का इल्म हासिल कीजिए, लोगों को दीन की तालीम दीजिए और ये सब शौक़ और मुहब्बत के साथ अल्लाह की रिज़ा के लिए कीजिए।
मक्का में ठहरना
जद्दा से चलने के बाद 'शमीसिया' नामक एक जगह है। यहाँ से हरम की हदें शुरू हो जाती हैं। यहीं हुदैबिया का मैदान है जहाँ नबी (सल्ल.) ने अल्लाह की राह में मर मिटने के लिए सहाबा किराम (रज़ि.) से बैअत ली थी। इस जगह से गुज़रते वक़्त उस बैअत का तसव्वुर कीजिए। और चूँकि आप हरम की हद में दाख़िल हो रहे हैं, इसलिए अदब, एहतिराम के जज़बात और ख़ुशू के साथ (विनम्रतापूर्वक) दुआएँ माँगते हुए आगे बढ़िए। मक्का में दाख़िल होने से पहले ग़ुस्ल कीजिए और दो रक्अत नमाज़ पढ़ लीजिए। बेहतर है कि आप जद्दा ही में नहा लें, क्योंकि गाड़ीवाले आपकी मरज़ी के मुताबिक़ गाड़ी नहीं रोकते। मक्का मुअज़्ज़मा में ख़ुशू और ख़ुज़ू के साथ अदब और एहतिराम से तलबियह पढ़ते हुए दाख़िल हों।
मक्का में दाख़िल होने के बाद वुज़ू करके अल्लाह के दरबार में उसकी अज़मत और जलाल (प्रताप) का ध्यान रखते हुए ख़ुशू व ख़ुज़ू के साथ मस्जिदे-हराम में उस दरवाज़े से दाख़िल हो जाइए जिसका नाम बाबुस्सलाम है। और सीधे हजरे-असवद के पास आइए और एहराम की चादर को दाहिने कन्धे के नीचे से निकालकर बाएँ कन्धे पर डाल दीजिए, फिर हजरे-असवद की तरफ़ बैतुल्लाह के सामने इस तरह खड़े हो जाइए कि आपका दाहिना कन्धा हजरे-असवद के पश्चिमी किनारे के सामने हो और पूरा हजरे-असवद आपकी दाहिनी तरफ़ हो, फिर तवाफ़ की नीयत करके दाहिनी तरफ़ इतना चलिए कि हजरे-असवद आपके सामने हो जाए और—
बिसमिल्लाहि अल्लाहु अकबर, ला इला-ह इल्लल्लाहु व लिल्लाहिल-हम्द।
“अल्लाह के नाम से, अल्लाह ही बड़ा है, अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, तारीफ़ अल्लाह ही के लिए है।"
कहकर हजरे-असवद पर दोनों हाथ रखकर धीरे से उसे चूमिए और अगर ऐसा न हो सके तो हाथ से छूकर हाथ चूम लीजिए या किसी छड़ी वग़ैरा से हजरे-असवद को छूकर उसे चूम लीजिए या अपनी जगह खड़े-खड़े दोनों हाथों की हथेलियाँ हजरे-असवद की तरफ़ कर दीजिए और ऊपरवाली दुआ पढ़कर उन्हीं को चूम लीजिए। इनमें से जो हो सके कर लीजिए, लेकिन किसी को किसी भी तरह तकलीफ़ न पहुँचाएँ। इसके बाद काबा के दरवाज़े (काबा का दरवाज़ा हजरे-असवद के दाहिनी तरफ़ है और हजरे-असवद दरवाज़े के बाईं तरफ़ है।) की तरफ़ चलिए, इस तरह कि काबा बाएँ कन्धे की तरफ़ रहे और 'हतीम' के अन्दर घुसकर नहीं बल्कि बाहर से तवाफ़ कीजिए। 'रुक्ने-यमानी' के पास पहुँचकर उसे छूते हुए या उसकी तरफ़ इशारा करते हुए गुज़र जाइए, फिर हजरे-असवद के पास पहुँचिए। यह एक चक्कर हुआ, इसी तरह हर बार हजरे-असवद को चूमकर सात चक्कर लगाए जाते हैं। सातवें चक्कर के बाद हजरे-असवद को फिर बोसा दीजिए (चूमिए), अब एक तवाफ़ हुआ। इस तवाफ़ में शुरू के तीन चक्करों में ज़रा कन्धे हिलाकर, अकड़कर, पास-पास क़दम डालकर कुछ तेज़ चलिए, बाक़ी चार चक्करों में मामूली रफ़्तार से चलिए। तवाफ़ में मुअल्लिम लोग लम्बी-लम्बी दुआएँ पढ़वाते हैं, ये दुआएँ नबी (सल्ल.) से साबित नहीं हैं। आप कोई भी मसनून दुआ या ज़िक्र जो याद हो और जिसमें आपका दिल लगे उसे बार-बार पढ़ सकते हैं, क़ुरआन की तिलावत कर सकते हैं, कलिमा पढ़ सकते हैं, तौबा व इसतिग़फ़ार कर सकते हैं। अपनी ज़बान (भाषा) में अल्लाह से दुआ कर सकते हैं। वैसे बिना किसी ज़िक्र या दुआ के भी तवाफ़ हो जाता है। अगर आप याद कर सकें तो यह छोटी-सी दुआ (कुछ रिवायतों में है कि यह दुआ रुकने-यमानी और हजरे-असवद के बीच पढ़नी चाहिए।) बेहतर रहेगी जो क़ुरआन की आयत भी है—
रब्बना आतिना फ़िद्दुनिया ह-स-न-तौं व फ़िल आख़ि-र-ति ह-स-न-तौं व क़िना अज़ाबन्नार।
“ऐ हमारे रब! हमें दुनिया में भी भलाई दे और आख़िरत में भी भलाई दे और हमें जहन्नम के अज़ाब से बचा।"
तवाफ़ कर चुकने के बाद 'मक़ामे-इबराहीम' की तरफ़ आइए अगर बिना कशमकश के 'मक़ामे-इबराहीम' के पीछे जगह मिल जाए तो 'मक़ामे-इबराहीम' के पीछे वरना आसपास जहाँ भी जगह मिल जाए, दो रक्अत नमाज़ पढ़ लीजिए। इन रक्अतों में सूरा-109 काफ़िरून और सूरा-112 इख़लास पढ़ें तो बेहतर है। यह दो रक्अत नमाज़ हर तवाफ़ के बाद पढ़नी चाहिए और अगर मकरूह वक़्त हो तो उस वक़्त के गुज़रने के बाद पढ़िए।
नोट: इस तवाफ़ के शुरू होने पर तलबियह कहना बन्द कर दीजिए, अब हज का एहराम बाँधने पर तलबियह शुरू होगा।
सफ़ा और मरवा के बीच सई
अब फिर हजरे-असवद के पास आइए और उसे चूमिए या ऊपर बताए गए तरीक़ों में से जो तरीक़ा भी बिना कशमकश के मुमकिन हो अपनाइए। फिर मस्जिदे हराम के 'बाबुस्सफ़ा' नामक दरवाज़े से बाहर निकलिए और सफ़ा पहाड़ी की तरफ़ जाइए। (सफ़ा और मरवा दो पहाड़ियाँ थीं, लेकिन अब उनका केवल निशान बाक़ी है, ये पहले मस्जिदे-हराम के बाहर थीं, अब ये मस्जिद के अन्दर ही शामिल हैं।) सफ़ा के पास पहुँचें तो बेहतर है कि यह कहें—
इन्नस्सफ़ा वल मर-व-त मिन शआइरिल्लाह, अब्दउ बिमा ब-द-अल्लाहु बिहि।
“सफ़ा और मरवा अल्लाह (के दीन) की निशानियाँ हैं, मैं उसी (सफ़ा) से शुरू करता हूँ जिससे अल्लाह ने शुरू किया।”
फिर सफ़ा की सीढ़ियों पर इतना चढ़िए कि आपको काबा नज़र आने लगे। अब काबा की तरफ़ मुँह करके खड़े हो जाइए और दोनों हाथ दुआ के लिए कन्धों तक उठाइए और कहिए-अल्लाहु अकबर, अल्लाहु अकबर, ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहू ला शरी-क लहू, लहुल-मुल्कु, व लहुल-हम्दु व हु-व अला कुल्लि शैइन क़दीर, ला इला-ह इल्लल्लाहु वहदहू, अन्ज-ज़ वअ-दहू व न-स-र अब्द-हू व ह-ज़-मल अहज़ा-ब वहदहू।
“अल्लाह ही बड़ा है! अल्लाह ही बड़ा है! अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, अकेला वही माबूद है, उसका कोई शरीक नहीं, उसी के लिए बादशाहत है और उसी के लिए तारीफ़, और वह हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है। अल्लाह के सिवा कोई इलाह नहीं, अकेला वही इलाह (माबूद) है, उसने अपना वादा पूरा किया, अपने बन्दे की मदद की और दल-की-दल सेनाओं को अकेले पराजित किया।”
फिर ख़ूब गिड़गिड़ाकर दुआ कीजिए, अपनी और दूसरों की हिदायत, मग़फ़िरत, दीन पर जमे रहने और दीने-हक़ की सरबुलन्दी के लिए। इसके अलावा तमाम जाइज़ दुआएँ और जो आपके अपने हाल और ज़रूरत के मुताबिक़ दुआएँ हों सब माँग सकते हैं। इस दुआ के बाद फिर ऊपर लिखा ज़िक्र कीजिए। यह ज़िक्र और इसके बाद दुआ तीन बार कीजिए। फिर नीचे उतरकर मरवा की तरफ़ चल दीजिए, ऐसा समझिए कि आप अल्लाह की राह पर लपक रहे हैं, उसकी इताअत में सरगर्म हैं, उसके दीन को ग़ालिब करने के लिए दौड़-धूप में लगे हैं। यदि ख़ामोश चलें तब भी सई हो जाएगी लेकिन अच्छा यही है कि आप अल्लाह के ज़िक्र में लगे रहें। (इसके लिए कोई ख़ास ज़िक्र नहीं है, जो ज़िक्र आप चाहें करें।) रास्ते में एक मक़ाम पर रास्ते के दोनों तरफ़ हरे रंग के दो निशान मिलेंगे, यहाँ पहुँचें तो ज़रा लपककर चलिए। कुछ आगे फिर हरे रंग के दो निशान मिलेंगे, बस यहाँ तक लपककर चलिए। सफ़ा से मरवा और मरवा से सफ़ा जाते इन दोनों निशानों के बीच ज़रा लपककर चलिए, बाक़ी हिस्से में मामूली रफ़्तार से चलिए। मरवा पहुँचने के बाद उसकी एक दो सीढ़ियों पर चढ़िए। यहाँ भी क़िबला की तरफ़ मुँह करके खड़े हो जाइए और हाथ उठाकर उसी तरह ज़िक्र और दुआ में लग जाइए जिस तरह सफ़ा पर किया था। (सफ़ा और मरवा पर ज़िक्र व दुआ करना मसनून है।)
यह सई का एक चक्कर हुआ। इसके बाद मरवा से उतरकर सफ़ा की तरफ़ चलें और बेहतर यही है कि अल्लाह के ज़िक्र में लगे रहें। सफ़ा पर पहुँचने के बाद जैसे पहले ज़िक्र और दुआ में लगे रहे थे वैसे ही फिर लग जाइए, यह दूसरा चक्कर हुआ। इसी तरह सात चक्कर कीजिए। (सफ़ा और मरवा के बीच दौड़ना न ज़रूरी है और न सही। हरे रंग के निशानों के बीच भी सिर्फ़ लपककर चलना चाहिए।)
इसके बाद आप सिर के बाल मुंडवा दीजिए या कतरवा दीजिए। अब आप उमरे से फ़ारिग़ हो गए और उमरे का एहराम भी ख़त्म हो गया। अब आपके लिए वे तमाम चीज़ें हलाल हो गईं जो एहराम की हालत में मना थीं और जब तक आप हज का एहराम न बाँधेंगे, ये सब चीजें जाइज़ ही रहेंगी।
हज से पहले के काम
हज का एहराम आप आठवीं ज़िल-हिज्जा को बाँधेंगे। इससे पहले आप मक्का में बिना एहराम के रहेंगे। इस वक़्त की क़द्र कीजिए, बेकार बातों से बचिए, बैतुल्लाह का ज़्यादा-से- ज़्यादा तवाफ़ कीजिए। इन तवाफ़ों में शुरू के तीन चक्करों में न तो रमल (दौड़कर चलना) होगा न इज़तिबाअ ( चादर को दाहिनी बग़ल से निकालकर बाएँ कन्धे पर डाल लेना और दायाँ कन्धा खुला छोड़ना) और न तवाफ़ के बाद सफ़ा और मरवा के बीच ‘सई’ होगी। अपना ज़्यादा-से-ज़्यादा वक़्त मस्जिदे-हराम में गुज़ारिए और तवाफ़, नफ़्ल नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, ज़िक्र, दुआ और तौबा व इसतिग़फ़ार की ज़्यादती कीजिए, परन्तु सोच-समझकर और ख़ुलूस व ख़ुशू के साथ कीजिए। इन कामों के अलावा लोगों की इस्लाह और दीन की दावत व तबलीग़ के मौक़ों को भी हाथ से न जाने दीजिए। साथियों की ख़िदमत और बीमारों की ख़ैरियत पूछना बहुत ज़्यादा अज्र का काम है।
हज का एहराम
हालाँकि आप हज का एहराम पहले भी बाँध सकते हैं लेकिन सुन्नत यही है कि आठवीं ज़िल-हिज्जा को सुबह सवेरे मस्जिदे-हराम से एहराम बाँधें। नहा सकते हों तो नहा लें वरना वुज़ू कर लें और मस्जिदे-हराम ही में दो रक्अत नफ़्ल नमाज़ पढ़ें, सलाम फेरते हुए सिर खोलकर दिल में अल्लाह के लिए हज की नीयत करते हुए ख़ुलूस और ख़ुशू और सूझ-बूझ व सोच-समझकर तलबियह कहें—
लब्बैक, अल्लाहु-म लब्बै-क, लब्बैक ला शरी-क ल-क लब्बै-क, इन्नल हम्-द वन्-निअ-म-त ल-क वल् मुल्-क, ला शरी-क ल-क।
अब आप फिर एहराम की हालत में हैं और आप पर एहराम की सारी पाबन्दियाँ लागू हो गईं। आप चलते-फिरते, उठते-बैठते, लोगों से मिलते-जुलते, ज़ौक़-शौक़, समझ-बूझ, इख़लास व तवज्जोह के साथ ज़्यादा-से-ज़्यादा तलबियह पुकारिए। (हज के कामों में एक बार सफ़ा-मरवा की 'सई' करना वाजिब है। यह सई मिना की रवानगी के पहले 8 ज़िल-हिज्जा को भी कर सकते हैं और 10 ज़िल-हिज्जा को तवाफ़े-ज़ियारत के बाद भी। अगर आठ ज़िल-हिज्जा को सई करें तो पहले तवाफ़े काबा करें, क्योंकि तवाफ़ के बिना सई नहीं होती।) (प्रकाशक)
मिना में ठहरना
एहराम बाँधने के बाद उसी दिन जल्द-से-जल्द मिना के लिए रवाना हो जाइए। सुबह-सवेरे ठंडे चल दें तो बेहतर है। मक्का से मिना की दूरी सिर्फ़ तीन या साढ़े तीन मील है, रास्ते में तलबियह पुकारते जाइए। मिना पहुँचकर आपको कोई ख़ास काम नहीं करना है। बस आठवीं ज़िल-हिज्जा के दिन और उसके बाद आनेवाली पूरी रात यहाँ ठहरना है और ज़ुहर से फ़ज्र तक की नमाज़ें यहीं पढ़नी हैं। नमाज़ें पूरे एहतिमाम और ख़ुशू व ख़ुज़ू के साथ पढ़नी हैं। समझ-समझकर क़ुरआन की तिलावत कीजिए, अल्लाह का ज़िक्र और उससे दुआएँ कीजिए, तलबियह की ज़्यादती कीजिए और लोगों का सुधार और दावत व तबलीग़ का काम भी अच्छे और हिकमत के साथ कीजिए।
अरफ़ात में ठहरना
नवीं ज़िल-हिज्जा को सूरज निकलने के बाद अरफ़ात के लिए चल दीजिए, मिना से अरफ़ात छः मील है। अरफ़ात में नवीं ज़िल-हिज्जा के ज़वाल (सूरज ढलने) से लेकर दसवीं ज़िल-हिज्जा की सुबह सादिक़ के तुलू होने (पौ फटने) तक किसी वक़्त भी ठहरना हज का रुक्ने-आज़म (सबसे बड़ा रुक्न) है, जिसके बिना हज नहीं होता। रास्ते में पूरे वक़ार और ख़ुशू के साथ अल्लाह का ज़िक्र करते और तलबियह पढ़ते हुए जाइए। ज़वाल से पहले अरफ़ात में दाख़िल न हों तो बेहतर है। उस वक़्त तक 'मस्जिदे-नमिरा' (जो अरफ़ात से मिली हुई है) के क़रीब ठहरें। ज़वाल का वक़्त क़रीब आने पर बेहतर है कि ग़ुस्ल कर लें। परन्तु मैल न छुड़ाएँ। खाने-पीने से भी उसी वक़्त फ़ारिग़ हो जाएँ। ज़वाल होते ही मस्जिदे-नमिरा में ज़ुहर और अस्र की नमाज़ें एक साथ (यानी पहले ज़ुहर फिर अस्र की) ज़ुहर के वक़्त इमाम के पीछे पढ़ें। नमाज़ से पहले ख़ुतबा सुनिए, अगर आपको जमाअत न मिले तो ज़ुहर की नमाज़ ज़ुहर के वक़्त में और अस्र की नमाज़ अस्र के वक़्त में पढ़ें। नमाज़ पढ़ने के तुरन्त बाद अरफ़ात के मैदान में दाख़िल हो जाइए। बतने-उरना (मस्जिदे-अरफ़ात से पश्चिम की तरफ़ सटी हुई एक वादी है।) के अलावा जहाँ चाहें ठहरें, बस लोगों से अलग और रास्ते में न ठहरें।
अरफ़ात का यह क़ियाम पूरे हज का निचोड़ है। यहाँ एक पल भी ग़फ़लत में बरबाद न कीजिए। तलबियह, ज़िक्र, दुआ, क़ुरआन की तिलावत और तौबा व इसतिग़फ़ार में अपना सारा वक़्त गुज़ारिए। (मुअल्लिम के इन्तिज़ार में वक़्त बरबाद न कीजिए, जो कुछ कीजिए ख़ुद ही कीजिए।) अरफ़ात में आप लेट-बैठ भी सकते हैं परन्तु बेहतर यही है कि जहाँ तक हो सके खड़े रहें और हाथ उठाकर गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ाकर और रो-रोकर दुआ करते रहें। अल्लाह से ख़ूब रो-रोकर दुआएँ करना, तौबा-इसतिग़फ़ार करना अरफ़ात में करने के असली काम हैं। आप ख़ुदा से अपनी हिदायत, मग़फ़िरत, दीने-हक़ की ठीक-ठीक पैरवी, उसकी सरबुलन्दी के लिए कोशिश और ख़ुदा की राह में सब्र व इसतिक़ामत के लिए ख़ूब गिड़गिड़ाकर दुआ कीजिए कि ख़ुदा की रिज़ा और आख़िरत की कामयाबी आपकी तमाम सरगर्मियों का मरकज़ और आपका और तमाम मुसलमानों की ज़िन्दगी का मक़सद बन जाए और मुस्लिम उम्मत फिर से दीन की शहादत और इक़ामत के पद को सँभाल ले। दुआ के अलावा अरफ़ात के मैदान में हश्र के मैदान का और क़ियामत के दिन जमा होने का विचार करके अपनी पूरी ज़िन्दगी का कड़ा और बेलाग जाइज़ा लीजिए। एक मोमिन की ज़िन्दगी कैसी होनी चाहिए और ईमान व इस्लाम के तक़ाज़े और माँगें क्या-क्या हैं? इन सबको सामने रखकर हर-हर पहलू से अपनी ज़िन्दगी के एक-एक पहलू का कड़ा हिसाब लीजिए, फिर आपको जो-जो कोताहियाँ नज़र आएँ उनपर दिल से शरमिन्दा हो जाइए, आजिज़ी और गिड़गिड़ाहट के साथ उनसे तौबा कीजिए और मज़बूत इरादे और पूरी सूझ-बूझ के साथ अहद (प्रतिज्ञा) कीजिए कि आप आइन्दा ख़ुदा के दीन की पैरवी और उसकी दावत तथा इक़ामत के सिलसिले में अपनी हैसियत और सकत के मुताबिक़ कोई कोताही न करेंगे। यह है अरफ़ात का क़ियाम, और यह दुआ, यह तौबा और यह अहद ही इस क़ियाम (ठहरने) के हासिल हैं। (अरफ़ात में एक पहाड़ी 'जबले-रहमत' है, वहाँ दुआ करने का मौक़ा मिले तो ज़रूर करना चाहिए।)
मुज़्दलिफ़ा में ठहरना
सूरज डूबने पर मग़रिब की नमाज़ पढ़े बिना तलबियह पुकारते और अल्लाह का ज़िक्र करते हुए मुज़्दलिफ़ा को चल दीजिए। मुज़्दलिफ़ा में इशा के वक़्त में पहले मग़रिब की और उसके फ़ौरन बाद सुन्नतें पढ़े बिना इशा की नमाज़ पढ़िए। मुज़्दलिफ़ा में जहाँ चाहें ठहर सकते हैं, बस लोगों से अलग, रास्ते में और वादी-ए-मुहस्सर में न ठहरें। 'जबले-क़ज़ह' के क़रीब ठहरें तो बेहतर है, यहाँ भी आप ज़िक्र व दुआ और तौबा व इसतिग़फ़ार वग़ैरा में लगे रहें। अलबत्ता थोड़ा-बहुत सो लीजिए क्योंकि यह सुन्नत है। सुबह सादिक़ होने (पौ फटने) के फ़ौरन बाद नमाज़ पढ़िए, फिर सुबह की रौशनी ख़ूब फैलने तक अल्लाह की हम्दो-सना, तकबीर-तहलील और दुआ-इसतिग़फ़ार में व्यस्त रहिए।
रमी जमरा-ए-अक़बा
सूरज निकलने से थोड़ा पहले सुकून और वक़ार के साथ तलबियह पुकारते और अल्लाह का ज़िक्र करते हुए मिना को चलिए। रमी-ए-जमरात के लिए मुज़्दलिफ़ा से चने के दाने के बराबर कंकड़ियाँ ले लीजिए। बतने-मुहस्सर के पास से तेज़ी के साथ निकल जाएँ कि यहीं हाथीवाले (असहाबे-फ़ील) अल्लाह के अज़ाब से हलाक हुए थे। मिना पहुँचकर सीधे जमरा-ए-अक़बा (मक्का की ओर आख़िरी खंभा) पर पहुँचिए। इस खंभे से पाँच-छः हाथ की दूरी पर नीचे की तरफ़ इस तरह खड़े हो जाइए कि मिना आपकी दाहिनी तरफ़ हो और काबा बाईं तरफ़। हर बार एक कंकड़ी दाहिने हाथ के अंगूठे और कलिमे की उँगली से पकड़कर खंभे के नीचले हिस्से पर 'अल्लाहु अकबर' कहकर मारिए। इसी तरह एक के बाद एक सात कंकड़ियाँ मारिए। आज आपको बस इसी जमरे की रमी करनी है। याद रखिए कि इस जमरे पर पहली कंकड़ी मारते ही तलबियह कहना बन्द हो जाएगा, अब आप तलबियह न पुकारेंगे। (जमरा एक ओर से जाएँ और दूसरी ओर से वापस आएँ।)
क़ुरबानी
रमी के बाद क़ुरबानगाह जाकर क़ुरबानी कीजिए और हो सके तो अपने हाथ से कीजिए। क़ुरबानी से पहले दुआ पढ़िए। इस दुआ में 'अन' के बाद अपना और जिन-जिन लोगों की तरफ़ से क़ुरबानी हो उनका नाम लीजिए।
इन्नी वज्जहतु वज्-हि-य लिल्ल-ज़ी फ़-त-रस्समावाति वल-अर्-ज़, अला मिल्लति इबराही-म हनीफ़ौं-व मा अना मिनल-मुशरिकीन, इन्-न सलाती, व नुसुकी व मह्या-य, व ममाती लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, ला शरी-क लहू व बिज़ालि-क उमिरतु व अना मिनल-मुसलिमीन। अल्लाहुम-म ल-क व मिन्-क अन.....बिसमिल्लाहि वल्लाहु अकबर।
“बेशक मैंने इबराहीम के रास्ते पर रहते हुए यकसू होकर अपना रुख़ उस हस्ती की तरफ़ कर लिया जिसने ज़मीन और आसमानों को पैदा किया और मैं मुशरिक नहीं हूँ। बेशक मेरी नमाज़, मेरी क़ुरबानी, मेरा जीना और मेरा मरना अल्लाह ही के लिए है जो तमाम जहानों का रब है। उसका कोई शरीक नहीं है। मुझे उसी का हुक्म है और सबसे पहले हुक्म माननेवाला मैं हूँ। ऐ अल्लाह, ये तेरे लिए है और तेरा ही दिया हुआ है। ... की तरफ़ से अल्लाह के नाम से, अल्लाह ही बड़ा है।"
हलक़ और क़स्र
क़ुरबानी के बाद सिर के बाल मुँडा दीजिए (यह बेहतर है) या कतरवा दीजिए। औरतें अपनी चोटी का सिरा पकड़कर कुछ बाल काट लें और बस अब आपका एहराम ख़त्म हो गया और हमबिस्तरी (सहवास) के अलावा वे तमाम चीज़ें जो एहराम की वजह से हराम थीं, अब हलाल हो गईं।
तवाफ़े-ज़ियारत
हालाँकि तवाफ़े-ज़ियारत बारहवीं ज़िल-हिज्जा की शाम तक हो सकता है, मगर अफ़ज़ल यही है कि दसवीं ज़िल-हिज्जा को हलक़ या क़स्र के बाद कर लें। ख़ूब नहा धोकर, सिले कपड़े पहनकर मक्का के लिए चल दीजिए और जिस तरह पहले लिखा जा चुका है, तवाफ़ कीजिए। दो रक्अत नमाज़े-तवाफ़ पढ़ने के बाद ज़मज़म पर जाकर बिसमिल्लाह पढ़कर पानी पीजिए। इसके बाद क़ायदे के मुताबिक़ और मरवा के बीच सई कीजिए। आठ ज़िल-हिज्जा को मिना जाने पहले सई कर चुके हों तो सई करने की ज़रूरत नहीं। अब आप पर से एहराम की तमाम पाबन्दियाँ उठ गईं। औरत यदि हाइज़ा (महीने से) हो तो पाक होने के बाद तवाफ़ सई और करे। (एहराम, अरफ़ात का क़ियाम और तवाफ़े-ज़ियारत के अरकान हैं, इनके बिना हज नहीं होता।)
मिना में क़ियाम और रमी-ए-जमरात
सई के बाद उसी दिन ज़ुहर की नमाज़ पढ़कर मिना के लिए रवाना हो जाइए। दसवीं ज़िल-हिज्जा की रात से लेकर कम-से-कम बारह (12) ज़िल-हिज्जा तक आपको मिना में रहना और तीनों जमरों की रमी करना है। अच्छा तो यह है कि तेरह (13) को भी मिना में रमी करके वापस जाएँ। रमी-ए-जमरात का वक़्त ज़वाल के बाद से सूरज डूबने तक है। ग्यारहवीं ज़िल-हिज्जा को नमाज़े-ज़ुहर के बाद पहले जमरा-ए-ऊला जो (मस्जिदे-ख़ीफ़ के पास है) की रमी कीजिए क़ायदे के मुताबिक़ सुतून की जड़ में सात कंकड़ियाँ मारिए, फिर खड़े होकर ख़ुदा से दुआ और उसे याद कीजिए। इसके बाद जमरा-ए-वुसता (बीच का जमरा) की रमी कीजिए। यहाँ भी रमी के बाद क़िबले की तरफ़ मुँह करके ज़िक्र और दुआ कीजिए। इसके बाद जमरा-ए-अक़बा की रमी कीजिए, मगर इस जमरे की रमी के बाद ठहरकर दुआ नहीं होती। रमी के बाद अपने क़ियाम की जगह आ जाइए। ख़ास तौर से रात को मिना ही में रहिए। बारहवीं ज़िल-हिज्जा को भी इसी तरह रमी कीजिए। और अगर तेरहवीं ज़िल-हिज्जा को रहें तो उस दिन भी रमी करें। मिना में ठहरने के दौरान अपने वक़्त को बेकार बरबाद न करें। नमाज़ें पूरी तवज्जोह और ख़ुशू व ख़ुज़ू के साथ मस्जिदे-ख़ीफ़ में जमाअत के साथ पढ़ें। ज़िक्र, दुआ और तौबा व इसतिग़फ़ार में ज़्यादा से ज़्यादा लगे रहें। दावत व तबलीग़ के मौक़े यहाँ ज़्यादा हैं, उन्हें हाथ से न जाने दें।
मक्का में क़ियाम
रमी के बाद बारहवीं या तेरहवीं ज़िल-हिज्जा को मक्का आ जाइए और जब तक आपकी रवानगी की बारी न आए, यहाँ के क़ियाम को बड़ा क़ीमती जानकर इससे ज़्यादा-से-ज़्यादा फ़ायदा उठाइए। पता नहीं फिर कभी यहाँ आना नसीब हो या न हो, इसलिए काबा का ख़ूब तवाफ़ कीजिए। मस्जिदे-हराम में ज़्यादा-से-ज़्यादा नफ़्ल नमाज़ें पढ़िए। ज़िक्र, दुआ, क़ुरआन की तिलावत और तौबा व इसतिग़फ़ार में ज़्यादा-से-ज़्यादा लगे रहिए। मुल्तज़म (हजरे-असवद और काबा के दरवाज़े के बीच की काबा की दीवार) से लिपट-लिपटकर दुआएँ कीजिए और जब भी मौक़ा मिले, लोगों की इस्लाह और दीन की दावत में कोई कमी न छोड़िए।
तवाफ़े-विदा
मक्का से रवाना होने से पहले यह तवाफ़ किसी भी वक़्त किया जा सकता है। परन्तु अच्छा यही है कि जिस दिन और जिस वक़्त आप रवाना हो रहे हों, उसी दिन और उसी वक़्त अलविदाई तवाफ़ करें और ज़ौक़-शौक़, ख़ुशू-ख़ुज़ू और गिड़गिड़ाते हुए तवाफ़ करके 'काबा' से विदा हों।
कुछ अन्य मसले
(1) अच्छा है कि आप कुछ साथियों के साथ हज का सफ़र करें और ये सब लोग अपने में से मुनासिब आदमी को अपना अमीर बना लें, जिसकी इताअत करें जो सब की सलाह से काम करे। सफ़र के अलावा भी इस्लाम में इजतिमाइयत की बड़ी अहमियत है। इसलिए हज के बाद जब आप घर आएँ तो इसकी फ़िक्र करें कि आपकी ज़िन्दगी इजतिमाइयत के साथ बसर हो और आप किसी इस्लामी नज़्म (व्यवस्था) के पाबन्द होकर सच्चे दीन का पालन करें और दीन की दावत के काम में लग जाएँ। अगर हज से वापसी के तुरन्त बाद आपने अपने अहद (प्रतिज्ञा) को पूरा करने की कोशिश न की तो डर है कि आपकी भावनाएँ और जज़बात ठंडे पड़ जाएँ और आप उस अहद को पूरा न कर सकें, जो आपने अल्लाह से किया है।
(2) हज हक़ीक़त में मुसलमानों के ख़लीफ़ा (शासक) या उसके मुक़र्रर किए हुए किसी नायब के एहतिमाम में होना चाहिए। हज के कुछ मनासिक (प्रथाएँ) तो बिलकुल उन्हीं से सम्बन्धित हैं। यह इस उम्मत की बदक़िस्मती है कि इस नेमत से महरूम हैं। और न सिर्फ़ हज बल्कि पूरे दीन के बारे में भारी नुक़सान उठा रही है।
(3) तवाफ़ के लिए जनाबत (नहाना फ़र्ज़ होना) और हैज़ (महीना) वग़ैरा से पाक और बावुज़ू होना ज़रूरी है।
(4) 'काबा' के अन्दर दाख़िल होना हज का कोई हिस्सा नहीं है। फिर ज़्यादा-से-ज़्यादा उसे मुस्तहब कहा जा सकता है। इसके लिए लोगों से कशमकश करना हरगिज़ जाइज़ नहीं। यदि आप अन्दर दाख़िल हो जाएँ तो दो रक्अत नफ़्ल नमाज़ अन्दर किसी भी तरफ़ मुँह करके पढ़ लें।
(5) हरम की हदों में किसी जानवर को डाँटना, शिकार करना और घास वग़ैरा काटना मना है। हाँ! मूज़ी (तकलीफ़ देनेवाले) जानवरों को मारना जाइज़ है।
(6) हज में तीन चीज़ें फ़र्ज़ हैं: (1) हज की नीयत करके एहराम बाँधना, (2) अरफ़ात में नौ (9) ज़िल-हिज्जा को ठहरना, (3) तवाफ़े-ज़ियारत जो दस (10) ज़िल-हिज्जा से बारह (12) ज़िल-हिज्जा तक किसी भी दिन हो सकता है। इनमें से कोई चीज़ छूट जाए तो हज नहीं होगा।
मदीना की हाज़िरी
मदीना की हाज़िरी हज का हिस्सा नहीं है। उलमा ने यहाँ तक लिखा है कि अगर किसी के पास सिर्फ़ इतनी रक़म हो कि वह मक्का जाकर वापस आ सकता है और मदीना नहीं जा सकता तो उसपर हज फ़र्ज़ हो गया और उसे हज की अदायगी की फ़िक्र करनी चाहिए।
परन्तु ऐसा कौन मुसलमान हो सकता है जो दूर-दराज़ देशों और इलाक़ों से सफ़र करके मक्का आए और उसे मदीना आने का शौक़ न हो। हदीसों में मदीना की बड़ी फ़ज़ीलत बताई गई है। यहीं नबी (सल्ल.) की मस्जिद (मस्जिदे-नबवी) है जो नबी (सल्ल.) और आप (सल्ल.) के सहाबा (रज़ि.) की तामीर की हुई है। और यह मस्जिद नबी (सल्ल.) और ख़िलाफ़ते-राशिदा के दौर में दावते-दीन, इस्लाह और तरबियत और इक़ामते-दीन का मरकज़ रही है। नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया—
“सफ़र न किया जाए, मगर तीन मस्जिदों की तरफ़ (1) मस्जिदे-हराम, (2) मस्जिदे-अक़सा और (3) मेरी यह मस्जिद (मस्जिदे-नबवी)।” (हदीस: बुख़ारी, मुस्लिम)
दूसरी मस्जिदों के मुक़ाबले में— सिवाय मस्जिदे हराम के मस्जिदे नबवी में नमाज़ पढ़ने का अज्र हज़ार गुना ज़्यादा है। (हदीस : बुख़ारी, मुस्लिम)
मस्जिदे नबवी में नबी (सल्ल.) के घर '(रोज़ा-ए मुबारक)' और मिम्बर (मंच) के बीच एक जगह रियाज़ुल-जन्नह (जन्नत का बग़ीचा) है (हदीस: बुख़ारी, मुस्लिम)। इसी मस्जिद से सटा हुआ आप (सल्ल.) का 'मज़ारे-मुबारक' है। मदीना हाज़िर हों तो ज़्यादा समय मस्जिदे नबवी में गुज़ारें। बेहतर तो यह है कि चालीस वक़्त (आठ दिन) की फ़र्ज़ नमाज़ें लगातार मस्जिदे नबवी में अदा करें। फ़र्ज़ नमाज़ों के अलावा तहज्जुद की नमाज़ और दूसरी नफ़्ल नमाज़ें भी पढ़ें। लेकिन जो नमाज़ भी पढ़ें, शऊर और ख़ुशू और इत्मीनान के साथ पढ़ें। रियाज़ुल-जन्नह में मौक़ा मिलने पर दो रक्अत नमाज़ नफ़्ल ज़रूर पढ़ें। मगर दूसरे लोगों के लिए जगह जल्द ख़ाली कर दें। मस्जिदे-नबवी में नमाज़ों के अलावा तिलावत, ज़िक्र, दुआ, इसतिग़फ़ार और दुरूद का एहतिमाम करें।
रौज़ा-ए-नबवी पर हर नमाज़ के बाद हाज़िरी ज़रूरी नहीं है। आप दिन में एक बार हाज़िर हों या एक से अधिक बार, जब भी हाज़िर हों अदब और एहतिराम के साथ धीरे-धीरे दुरूद और सलाम अर्ज़ करें—मस्जिदे-नबवी में ज़ोर-ज़ोर से बात करने की मनाही है। आप (सल्ल.) के बराबर ही आप (सल्ल.) के दोनों साथियों, हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि.) और हज़रत उमर (रज़ि.) के मज़ारात (क़ब्रें) हैं, उनपर भी दुरूद व सलाम भेजें, फिर इधर से रुख़ मोड़कर और क़िबले की तरफ़ मुँह करके ख़ुदा से अपनी दुनिया और आख़िरत की कामयाबी, उन पाक और बा-बरकत बुज़ुर्गों की सच्ची पैरवी और अल्लाह के कलिमे को ऊँचा करने के लिए दुआ करें। नबी (सल्ल.) के रौज़े पर सजदा करने, आप (सल्ल.) से दुआ करने या रौज़े की जाली चूमने की कोशिश न करें, क्योंकि ये सब काम शरीअत के ख़िलाफ़ हैं। जन्नतुल-बक़ी (मदीना का क़ब्रिस्तान जिसमें बेशुमार सहाबा (रज़ि.) और उम्मत के सालेह लोग दफ़न हैं) और उहुद के शहीदों के मज़ारों पर जाएँ तो उनके लिए दुआ करें और शरीअत के ख़िलाफ़ कामों से बचें। (मस्जिदे-क़ुबा, जन्नतुल-बक़ीअ और उहुद के शहीदों की मज़ारों के लिए कोई ख़ास दुआएँ नहीं हैं।)
मदीना की हाज़िरी के दौरान आप अल्लाह से अहद करें कि आप अल्लाह के रसूल (सल्ल.) और सहाबा (रज़ि.) की पैरवी करते हुए दीने-हक़ की पैरवी और दावत व इक़ामत का हक़ अदा करेंगे और अल्लाह की राह में हर तरह की क़ुरबानियाँ देकर उसे राज़ी और ख़ुश करने की कोशिश करेंगे। हज और मदीना की हाज़िरी के बाद वापस आकर आपकी ज़िन्दगी इस्लाम के साँचे में ढल गई और आप इस्लाम के दाई और अलमबरदार बन गए तो आपका हज ‘हज्जे-मबरूर' और आपकी ज़ियारत क़बूल हो गई इन्शा अल्लाह!
ज़मज़म का पानी
हदीस में है कि प्यारे नबी (सल्ल.) ने तवाफ़े-ज़ियारत के बाद दो रक्अत नफ़्ल नमाज़ पढ़ी और फिर ज़मज़म पर आकर ख़ूब पानी पिया। प्यारे नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया, “ज़मज़म का पानी हर मक़सद के लिए फ़ायदेमन्द है— अगर तुम इसे बीमारियों से शिफ़ा के लिए पियोगे तो तुम्हें शिफ़ा मिलेगी, अगर तुम इसे दिल के इत्मीनान और सुकून के लिए पियोगे तो तुम्हें इत्मीनान और सुकून मिलेगा, अगर इसे प्यास बुझाने के लिए पियोगे तो अल्लाह तआला तुम्हारी प्यास बुझा देगा। इस कुएँ को हज़रत जिबरील (अलैहि.) ने एक चट्टान पर चोट मारकर बनाया और यह हज़रत इसमाईल (अलैहि.) के पानी पीने की जगह है। (हदीस: दारक़ुतनी)
हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-अब्बास (रज़ि.) से रिवायत है कि नबी (सल्ल.) ने फ़रमाया, “ज़मीन पर मौजूद तमाम पानी से बेहतर 'ज़मज़म' का पानी है, यह भूखे के लिए ग़िज़ा (भोजन) और बीमार के लिए शिफ़ा है।" (हदीस: इब्ने-हिब्बान)
ज़मज़म के पानी को खड़े होकर पीना चाहिए। इसे ‘बिसमिल्लाह’ पढ़कर पीना चाहिए और पीने के बाद यह दुआ पढ़नी चाहिए—
अल्लाहुम्-म इन्नी अस्-अलु-क इल्मन नाफ़िऔं व रिज़्क़ौं वासिऔं व शिफ़ाअम्-मिन कुल्लि दाइन्।
“ऐ अल्लाह मैं तुझसे माँगता हूँ नफ़ा देनेवाला इल्म और रिज़्क़ की कुशादगी और हर मर्ज़ से शिफ़ा।” (हदीस: नैलुल-औतार)
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