मुहम्मद (स॰)
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हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का आदर्श
लेखक एक हिंदू चिंतक तथा विचारक हैं, पंजाब के निवासी हैं। उनको ज्ञान तथा कला में विशेष रुचि है। अपने जीवन का एक भाग मध्यपूर्व के इस्लामी संस्कृति के गढ़ में बिताने के कारण उन्हें उसे निकट से देखने-समझने का अवसर मिला है, इसीलिए इस्लाम की विशेष जानकारी रखने वालों में उनकी गणना होती है। उनकी एक और पुस्तक 'इस्लाम और औरत' भी है, जो अति लोकप्रिय है।पुस्तक लेख 'दयामूर्ति का रवैया अपने शत्रुओं के साथ' के शीर्षक से पहले लेख-माला के रूप में 'फ़ारान' उर्दू मासिक, कराची में प्रकाशित हुआ था। उन्हीं लेखों के इस संग्रह को बाद में पुस्तक रूप दिया गया, जिसका अनुवाद यहां प्रस्तुत है।

इस्लाम के पैग़म्बर, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम)
इस्लाम के पैग़म्बर, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) को सही अर्थों में विश्व-नेता कहा जा सकता है, इसलिए कि आपने किसी विशेष जाति, वंश या वर्ग की भलाई के लिए नहीं, बल्कि सारे संसार के मनुष्यों की भलाई के लिए काम किया। आप की दृष्टि में सब जातियां और सब मनुष्य समान हैं, आप सबके समान शुभ चिंतक हें। आप ने ऐसे सिद्धांत पेश किए हैं जो सारे संसार के मनुष्यों का पथ-प्रदर्शन करते हैं और उनमें मानव-जीवन की सारी समस्याओं का समाधान है। आपका पथ-प्रदर्शन किसी विशेष काल के लिए नहीं, बल्कि हर काल और हर स्थिति में समान रूप से लाभदायक और समान रूप से शुद्ध और समान रूप से अनुकरणीय है। । हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने केवल सिद्धांत ही पेश नहीं किये, बल्कि उन सिद्धांतों को जीवन में कार्यान्वित करके भी दिखा दिया और उनके आधार पर एक जीता-जागता समाज भी बना दिया। यही कारण है कि जो लोग इस्लाम के अनुयायी नहीं हैं वे भी निष्पक्ष होकर अध्ययन करें तो यही महसूस करते हैं कि यह किसी राष्ट्रवादी या देश-प्रेमी का जीवन नहीं है, बल्कि एक मानव-प्रेमी और विश्वव्यापी दृष्टिकोण रखने वाले मनुष्य का जीवन है। प्रस्तुत है हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के बारे में प्रोफ़ेसर के. एस. रामाकृष्णा राव के विचार। [-संपादक]

हमारे रसूले-पाक (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
मेरे दिल में भी बहुत दिनों से ख़ाहिश थी कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की एक ऐसी सीरत (जीवनी) लिखूँ— 1. जो मुख़्तसर हो लेकिन उसमें कोई ज़रूरी बात न छूटे। 2. जिसमें जंचे-तुले हालात और आख़िरी हद तक सच्चे वाक़िआत दर्ज हों। 3. जिसकी ज़बान इतनी आसान और सुलझी हुई हो कि उसको छोटी उम्र के लड़के-लड़कियाँ और कम पढ़े-लिखे लोग भी आसानी से समझ सकें। 4. जो स्कूलों और मदरसों के कोर्स में शामिल की जा सके। 5. जिसकी रौशनी में माँ-बाप और उस्ताद (शिक्षक) अपने बच्चों और शागिर्दों को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पाक ज़िन्दगी के वाक़िआत को आसानी से याद करा सकें। 6. जिसमें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बेहतरीन अख़लाक़ के अलग-अलग पहलुओं को दिल में उतर जानेवाले तरीक़े से ज़िक्र किया गया हो।

क्या पैग़म्बर की फ़रमाँबरदारी ज़रूरी नहीं?
यह किताब अस्ल में मौलाना सैयद अबुल-आला मौदूदी (1903-1979 ई.) के दो लेखों (इत्तिबाअ् व इताअते-रसूल' और 'रिसालत और उसके अह्काम) का हिन्दी तर्जमा है। ये लेख मौलाना के लेखों के उर्दू संग्रह तफ़हीमात, हिस्सा-1 में प्रकाशित हुए हैं। ये लेख उन्होंने सन् 1934 और 1935 ई. में उर्दू पत्रिका 'तर्जुमानुल-क़ुरआन' में कुछ लोगों के सवाल के जवाब में लिखे थे। सवाल पैग़म्बर की फ़रमाँबरदारी करने के बारे में था। मौलाना मौदूदी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने बड़े ही प्रभावकारी ढंग से दलीलों के साथ उनका जवाब दिया। आज भी इस तरह के सवाल बहुत से लोगों के दिमाग़ों में आते हैं या दूसरे लोगों के ज़रिए पैदा किए जाते हैं और लोग उन सवालों की ज़ाहिरी शक्ल को देखकर मुतास्सिर हो जाते हैं कि अगर कोई आदमी ख़ुदा को एक मानता है और कुछ अच्छे काम भी करता है तो क्या उसके लिए पैग़म्बर पर ईमान लाना और उसकी फ़रमाँबरदारी ज़रूरी है? और अगर ज़रूरी है तो क्यों? इसलिए ज़रूरत महसूस की गई कि ऐसे क़ीमती लेखों का हिन्दी में तर्जमा प्रकाशित किया जाए।

प्यारे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कैसे थे?
इरफ़ान ख़लीली नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़िन्दगी के गुलदस्ते का हर फूल बेमिसाल, हर एक की ख़ुशबू मेरे दिल के दामन को अपनी ओर खींच रही थी। मैं अजीब कशमकश में पड़ा हुआ था। न छोड़ते बनता था, न पकड़ते। मेरे अल्लाह ने मेरी मदद की। ज़ेहन में एक ख़याल उभरा— "क्यों न नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़िन्दगी के उन वाक़िआत को जमा कर दूँ जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से सीधा ताल्लुक़ रखते हों।" इस किताब के पढ़नेवालों से गुज़ारिश है कि इसे ग़ौर से पढ़ें और इस की बातों को अपनी ज़िन्दगियों में समोने की कोशिश करें।

आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
अल्लाह तीन प्रकार से इन्सानों को संबोधित करता है:- 1.अन्तः प्रेरणा द्वारा जो अल्लाह धार्मिक व्यक्तियों के मन या मस्तिष्क में सुझाव या विचार के रूप में डाल देता है। 2.किसी पर्दे के पीछे से दृश्य या दर्शन के रूप में जब योग्यतम व्यक्ति नींद या आलमेजज़्ब (आत्मविस्मृति) में हो, और- 3. ईश्वरीय संदेशवाहक हज़रत जिब्रील द्वारा प्रत्यक्ष ईश्वरीय संदेश के साथ, जिन्हें ईश्वर के चुने दूत तक पहुँचाने के लिए अवतरित किया जाता है। (क़ुरआन 42 : 51) यह आख़िरी रूप उच्च कोटि का है और इसी रूप में क़ुरआन हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर अवतरित हुआ। यह सीमित है केवल ईश-दूतों तक, जिनमें हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अन्तिम हैं और ईश दूतत्व की अन्तिम कड़ी हैं।

जीवनी हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम
इस किताब के अध्ययन से अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के जीवन की प्रमुख झलकियाँ आपके सामने आएंगी और इस किताब को पढ़नेवाला ऐसा महसूस करेगा, जैसे वह ख़ुद उस दौर से गुज़र रहा है, जिस दौर से पैग़म्बरे इस्लाम गुज़रे हैं।सलामती और रहमत हो उस पाक नबी पर जिसने मानवता को दुनिया में रहने का सही ढंग और ख़ुदा तक पहुँचने का सच्चा मार्ग दिखाया। मुबारकबाद हो उन लोगों को जो स्वयं अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) के मार्ग पर चलें और दुनिया को इस मार्ग पर चलने की दावत दें।

जगत्-गुरु (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)
अबू-ख़ालिद जगत-गुरु (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) दरअस्ल 'हादी-ए-आज़म (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)' (उर्दू) का नया हिन्दी तर्जमा है। 'हादी-ए-आज़म' किताब जनाब अबू-ख़ालिद साहब (एम॰ ए॰) ने ख़ास तौर पर बच्चों के लिए लिखी थी, जो बहुत ज़्यादा पसंद की गई और बहुत-से स्कूलों और मदरसों में यह किताब पढ़ाई जा रही है।

जायसी के दोहे और इस्लाम के अन्तिम पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०)
सोरठा : साईं केरा नाँव, हिया पूर, काया भरी । मुहम्मद रहा न ठाँव, दूसर कोइ न समाइ अब ॥ अर्थ :- साईं (मुहम्मद (सल्ल०)) के नाम से तन एवं हृदय पूर्ण रूप से भर चुका है, मुहम्मद (सल्ल०) के बिना चैन नहीं है, अब हृदय में दूसरा कोई समा भी नहीं सकता।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.): एक महान समाज-सुधारक
दुनिया में ऐसे तो लाखों पैग़म्बर और सुधारक आते रहे और बड़े-बड़े इनक़िलाब लाते रहे। लेकिन जो इनक़िलाब मुहम्मद (सल्ल०) के द्वारा आया और जिस प्रकार और जिस थोड़ी अवधि में आया उसका उदाहरण दुनिया के इतिहास में न कभी मिला और न मिलेगा। आप (सल्ल०) ने इस्लाम को जिस प्रकार लोगों के सामने प्रस्तुत किया वह दूसरे धर्मों से नितान्त भिन्न है। विशेष रूप से इन अर्थों में कि यह एक सामाजिक आन्दोलन था, जिसका उद्देश्य दुनिया में न्याय की स्थापना और शोषण को समाप्त करना था। इस आन्दोलन ने न केवल पूरी क़ौम का स्वभाव बदल दिया बल्कि समाज के आर्थिक, नैतिक, सांस्कृतिक और सामाजिक ढाँचे को पूर्णतः परिवर्तित कर दिया। यह एक चमत्कार था— ऐसा चमत्कार जिससे दुनिया के बड़े-बड़े बुद्धिमान और विचारक आश्चर्य में पड़ गए।

हज़रत मुहम्मद (स०): जीवन और सन्देश
अल्लाह ने इन्सान को पैदा किया और उसके लिए जीवन-सामग्री प्रदान की, जिससे वह जीवित रहता है और अपनी ज़रूरतें पूरी करता है। इसके लिए उसने धरती और इसके चारों ओर के वायुमंडल में आश्चर्यजनक प्रबंध किया और इससे फ़ायदा उठाने की राहें इन्सानों के लिए आसान कर दीं। अल्लाह ने इन्सान के पथ-प्रदर्शन और रहनुमाई का भी अपनी ओर से प्रबंध किया, ताकि वह सीधी राह पर चलनेवाला बने और अज्ञानता व नादानी के कारण गुमराही में न फंसे। इसके लिए जब से इन्सान धरती पर आबाद है, अल्लाह ने अपने रसूल भेजे और उनमें से कुछ पर अपनी किताबें भी उतारीं। यह सिलसिला हज़ारों साल तक कौमों और देशों में जारी रहा। अल्लाह के रसूल आते और सन्मार्ग दिखाते रहे, लेकिन जब सभ्यता ने उन्नति की, क़ौमों और देशों के संबंधों में व्यापकता आई और एक-दूसरे के विचारों को जानने के अवसर उन्हें प्राप्त होने लगे, तो अल्लाह ने सारी दुनिया के मार्गदर्शन के लिए और सदा के लिए हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) को अंतिम रसूल की हैसियत से भेजा और अपना अंतिम हिदायतनामा (आदेश-पुस्तक) पवित्र क़ुरआन आप पर उतारा।

प्यारे नबी (सल्ल.) कैसे थे?
अल्लाह के आखिरी नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) की मिसाली ज़िन्दगी पर बहुत-सी किताबें लिखी गई हैं और लिखी जा रही हैं। मेरे दिल में भी यह आरजू बहुत दिनों से थी कि नबी (सल्ल.) की मिसाली ज़िन्दगी पर कोई ऐसी किताब लिखी जाए जिससे हर व्यक्ति फ़ायदा उठा सके। मेरे अल्लाह ने मेरी मदद की। ज़ेहन में एक खयाल उभरा-"क्यों न नबी (सल्ल.) की ज़िन्दगी के उन वाक़िआत को जमा कर दूँ जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से सीधा ताल्लुक़ रखते हों।" अल्लाह की मदद मुझ ग़रीब के साथ रही और यह छोटी सी किताब तैयार हो गई। इसकी ज़ुबान भी बड़ी आसान है।

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) का रवैया अपने दुश्मनों के साथ
धर्मप्रधान व्यक्तियों तथा जातियों का एक-दूसरे से भ्रातृत्व सम्बन्ध होना अत्यावश्यक है, मुख्य रूप से देश-हित में तो ऐसा होना अनिवार्य समझा जाता है। धर्मों के बारे में पाई जानेवाली ग़लतफ़हमियों का निवारण तो होना ही चाहिए। ज़रूरत इस बात की भी है कि धर्मों का निष्पक्ष भाव से अध्ययन-मनन किया जाए। यही भाव लेकर श्री नाथू राम जी ने कुछ लेख लिखे हैं। जिन्हें पहले लेखमाला के रूप में ‘फ़ारान' उर्दू मासिक, कराची में प्रकाशित किया गया। उसके बाद उन्हें पुस्तक रूप दिया गया।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) सब के लिए
मनुष्य को आदर्श जीवन बिताने के लिए मार्गदर्शन केवल दो ही साधनों से मिला है- एक अल्लाह की अवतरित किताबों से और दूसरे ईश-दूतों के जीवन-चरित्र से। ये दोनों चीज़ें आपस में इस प्रकार जुड़ी हुई हैं कि एक को दूसरे से अलग करके ईश्वरीय इच्छा को समझा ही नहीं जा सकता। जिन लोगों ने भी यह हरकत की वे पथ-भ्रष्ट होकर रह गए और अपने विभिन्न धर्म बना लिए। जबकि अल्लाह ने हमेशा एक ही दीन भेजा था। क़ुरआन मजीद और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) इसी सत्य-मार्ग और ईश्वरीय मार्गदर्शन की अन्तिम कड़ी हैं, जो रहती दुनिया तक मानवजाति के लिए मार्ग-ज्योति हैं। ईश्वरीय मार्गदर्शन पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। मुसलमान तो वास्तव में इस मार्गदर्शन के अमीन (अमानतदार) बनाए गए हैं। यह पुस्तक मुस्लिम और गैर-मुस्लिम दोनों में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) और इस्लाम के परिचय के लिए सहायक हो सकती है।

हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) : एक संक्षिप्त परिचय
यह छोटी सी पुस्तिका अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का परिचय कराने की एक कोशिश है। इस में आप (सल्ल.) के जीवन और शिक्षा का सार पेश किया गया है। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की शिक्षाओं का उद्देश्य यह है कि इन्सान अपने एकमात्र स्रष्टा और पालनहार के बताये हुए मार्ग पर चलकर ही ज़िन्दगी गुज़ारे ताकि वह इस लोक और परलोक में सफलता प्राप्त कर सके।