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سُورَةُ العَنكَبُوتِ

29. अल-अन‌्कबूत 

(मवका में उतरी-आयातें 69)

परिचय

नाम

आयत 41 में आए शब्द 'जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरे संरक्षक बना लिए है उनकी मिसाल मकड़ी (अन‌्कबूत) जैसी है' से लिया गया है। अर्थ यह है कि यह वह सूरा है जिसमें शब्द 'अन‌्कबूत' आया है।

उतरने का समय

आयत 56 से 60 तक साफ़ मालूम होता है कि यह सूरा हबशा की हिजरत से कुछ पहले उतरी थी। शेष विषयों की आन्तरिक गवाही भी इसी की पुष्टि करती है, क्योंकि पृष्ठभूमि में उसी समय के हालात झलकते नज़र आते हैं।

विषय और वार्ताएँ

सूरा को पढ़ते हुए महसूस होता है कि इसके उतरने का समय मक्का मुअज़्ज़मा में मुसलमानों पर बड़ी मुसीबतों और परेशानियों का समय था। [उस समय] अल्लाह ने यह सूरा एक ओर सच्चे ईमानवाले लोगों में संकल्प, हौसला और धैर्य पैदा करने के लिए और दूसरी ओर कमज़ोर ईमानवाले लोगों को शर्म दिलाने के लिए उतारी। इसके साथ मक्का के विधर्मियों को भी इसमें (सत्य-विरोध के अंजाम के बारे में) कठोर धमकी दी गई है। इस सिलसिले में उन सवालों का जवाब भी दिया गया है जिनका कुछ मुस्लिम नौजवानों को उस समय सामना करना पड़ रहा था। जैसे उनके माँ-बाप उनपर ज़ोर डालते थे कि हमारे दीन पर क़ायम रहो। जिस क़ुरआन पर तुम ईमान लाए हो, उसमें भी तो यही लिखा है कि माँ-बाप का हक़ सबसे ज़्यादा है, तो जो कुछ हम कहते हैं उसे मानो, वरना स्वयं अपने ही ईमान के विरुद्ध काम करोगे। इसका उत्तर आयत 8 में दिया गया है। इसी तरह कुछ नव-मुस्लिमों से उनके क़बीले के लोग कहते थे कि अज़ाब-सवाब हमारी गर्दन पर, तुम हमारा कहना मानो और इस आदमी से अलग हो जाओ। [अल्लाह के यहाँ इसके उत्तरदायी हम होंगे।] इसका जवाब आयत 12-13 में दिया गया है। जो क़िस्से इस सूरा में बयान किए गए हैं उनमें भी अधिकतर यही पहलू उभरा हुआ है कि पिछले नबियों को देखो, कैसी-कैसी सख़्तियाँ उनपर गुज़रीं और कितनी-कितनी मुद्दत वे सताए गए। फिर अन्तत: अल्लाह की ओर से उनकी मदद हुई, इसलिए घबराओ नहीं, अल्लाह की मदद ज़रूर आएगी, मगर आज़माइश का एक दौर गुज़रना बहुत ज़रूरी है। फिर मुसलमानों को निर्देश दिया गया कि अगर ज़ुल्मो-सितम तुम्हारे लिए असह्य हो जाए, तो ईमान छोड़ने के बजाय घर-बार छोड़कर निकल जाओ। अल्लाह की ज़मीन बहुत बड़ी है। जहाँ अल्लाह की बन्दगी कर सको, वहाँ चले जाओ। इन सब बातों के साथ विधर्मियों को समझाने का पहलू भी छूटने नहीं पाया है, बल्कि तौहीद और आख़िरत दोनों सच्चाइयों को प्रमाणों के साथ उनके मन में बिठाने की कोशिश की गई है।

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سُورَةُ العَنكَبُوتِ
29. अल-अन्‌कबूत
بِسۡمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحۡمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
अल्लाह के नाम से जो बेइन्तिहा मेहरबान और रहम फ़रमानेवाला है।
الٓمٓ
(1) अलिफ़-लाम-मीम।
أَحَسِبَ ٱلنَّاسُ أَن يُتۡرَكُوٓاْ أَن يَقُولُوٓاْ ءَامَنَّا وَهُمۡ لَا يُفۡتَنُونَ ۝ 1
(2) क्या लोगों ने यह समझ रखा है कि वे बस इतना कहने पर छोड़ दिए जाएँगे कि “हम ईमान लाए” और उन्हें आज़माया न जाएगा?1
1. जिन हालात में यह बात कही गई है वे ये थे कि मक्का में जो शख़्स इस्लाम क़ुबूल करता था उसपर आफ़तों और मुसीबतों और ज़ुल्मों का एक तूफ़ान टूट पड़ता था कोई ग़ुलाम या ग़रीब होता तो उसको बुरी तरह मारा-पीटा जाता और सख़्त नाक़ाबिले-बरदाश्त तकलीफ़ें दी जातीं। कोई दुकानदार या कारीगर होता तो उसकी रोज़ी के दरवाज़े बन्द कर दिए जाते, यहाँ तक कि भूखों मरने की नौबत आ जाती। कोई किसी असरदार ख़ानदान का आदमी होता तो उसके अपने ख़ानदान के लोग उसको तरह-तरह से तंग करते और उसका जीना दूभर कर देते थे। इन हालात ने मक्का में एक सख़्त ख़ौफ़ और दहशत का माहौल पैदा कर दिया था जिसकी वजह से बहुत-से लोग तो नबी (सल्ल०) की सच्चाई को जान लेने के बावजूद ईमान लाते हुए डरते थे, और कुछ लोग ईमान लाने के बाद जब दर्दनाक तकलीफ़ों से गुज़रते तो हिम्मत हारकर इस्लाम-दुश्मनों के आगे घुटने टेक देते थे। इन हालात ने अगरचे पक्के ईमानवाले सहाबा के इरादे और जमाव में कोई लड़खड़ाहट पैदा नहीं की थी, लेकिन इनसानी फ़ितरत के तक़ाज़े से अकसर उनपर भी एक सख़्त बेचैनी की कैफ़ियत छा जाती थी। चुनाँचे इसी कैफ़ियत का एक नमूना हज़रत ख़ब्बाब-बिन-अरत की वह रिवायत पेश करती है जो बुख़ारी, अबू-दाऊद और नसई ने नक़्ल की है। वे फ़रमाते हैं कि जिस ज़माने में मुशरिकों की साख़्तियों से हम बुरी तरह तंग आए हुए थे, एक दिन मैंने देखा कि नबी (सल्ल०) काबा की दीवार के साए में तशरीफ़ रखते हैं। मैंने हाज़िर होकर अर्ज़ किया, “ऐ अल्लाह के रसूल! आप हमारे लिए दुआ नहीं करते?” यह सुनकर आप (सल्ल०) का चेहरा जोश और जज़बे से लाल हो गया और आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, “तुमसे पहले जो ईमानवाले गुज़र चुके हैं, उनपर इससे ज़्यादा सख़्तियाँ की गई हैं। उनमें से किसी को ज़मीन में गड्ढा खोदकर बिठाया जाता और उसके सर पर आरा चलाकर उसके दो टुकड़े कर डाले जाते। किसी के जोड़ों पर लोहे के कंघे घिसे जाते थे, ताकि वह ईमान छोड़ दे। ख़ुदा की क़सम! यह काम पूरा होकर रहेगा यहाँ तक कि एक शख़्स सनआ से हज़रेमौत तक बे-खटके सफ़र करेगा और अल्लाह के सिवा कोई न होगा, जिससे वह डरे। इस बेचैनी और बेक़रारी की कैफ़ियत को ठण्डे सब्र और बरदाश्त में तब्दील करने के लिए अल्लाह ताला ईमानवालों को समझाता है कि हमारे जो वादे दुनिया और आख़िरत की कामयाबियों के लिए हैं, कोई शख़्स सिर्फ़ ज़बान से ईमान का दावा करके उनका हक़दार नहीं हो सकता, बल्कि हर दावेदार को ज़रूर ही आज़माइशों की भट्टी से गुज़रना होगा, ताकि वह अपने दावे की सच्चाई का सबूत दे। हमारी जन्नत इतनी सस्ती नहीं है, और न दुनिया ही में हमारी ख़ास मेहरबानियाँ ऐसी सस्ती हैं कि तुम बस ज़बान से हमपर ईमान लाने का एलान करो और हम वह सब कुछ तुम्हें दे दें। इनके लिए तो इम्तिहान शर्त है, हमारी ख़ातिर मशक़्क़तें उठानी होंगी। जान-माल का घाटा बरदाश्त करना होगा। तरह-तरह की सख़्तियाँ झेलनी होंगी ख़तरों, मुसीबतों और मुश्किलों का मुक़ाबला करना होगा। डर से भी आज़माए जाओगे और लालच से भी। हर चीज़ जिसे बहुत पसन्द करते हो, हमारी मरज़ी पर उसे क़ुरबान करना पड़ेगा, और हर तकलीफ़ जो तुम्हें नागवार है, हमारे लिए बरदाश्त करनी होगी। तब कहीं यह बात खुलेगी कि हमें मानने का जो दावा तुमने किया था, वह सच्चा था या झूठा। यह बात क़ुरआन मजीद में हर उस मक़ाम पर कही गई है जहाँ मुसीबतों और सख़्तियों के हुजूम में मुसलमानों पर घबराहट छाई है। हिजरत के बाद मदीना की इब्तिदाई ज़िन्दगी में जब मआशी (आर्थिक) मुश्किलों, बाहरी ख़तरों और यहूदियों और मुनाफिक़ों की अन्दरूनी शरारतों ने ईमानवालों को सख़्त परेशान कर रखा था, उस वक़्त फ़रमाया— “क्या तुमने यह समझ रखा है कि तुम जन्नत में दाख़िल हो जाओगे, हालाँकि अभी तुमपर वे हालात नहीं गुज़रे जो तुमसे पहले गुज़रे हुए (ईमानवाले) लोगों पर गुज़र चुके हैं? उनपर साख़्तियाँ और तकलीफ़ें आईं और वे हिला मारे गए यहाँ तक कि रसूल और उसके साथ ईमानवाले लोग पुकार उठे कि अल्लाह की मदद कब आएगी? (तब उन्हें ख़ुशख़बरी सुनाई गई कि) ख़बरदार रहो, अल्लाह की मदद क़रीब है।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-214) इसी तरह उहुद की जंग के बाद जब मुसलमानों पर फिर मुसीबतों का एक सख़्त दौर आया तो कहा गया— “क्या तुमने समझ रखा है कि जन्नत में दाख़िल हो जाओगे, हालाँकि अभी अल्लाह ने यह तो देखा ही नहीं कि तुममें से जिहाद में जान लड़ानेवाले और मज़बूती के साथ डट जानेवाले कौन लोग हैं।” (क़ुरआन, सूरा-3 आले-इमरान, आयत-142) क़रीब-क़रीब यही बात सूरा-3 आले-इमरान, आयत-179; सूरा-9 तौबा, आयत-16 और सूरा-47 मुहम्मद, आयत-31 में भी बयान हुई है। इन फ़रमानों से अल्लाह तआला ने यह हक़ीक़त मुसलमानों के ज़ेहन में बिठाई है कि आज़माइश ही वह कसौटी है जिससे खोटा और खरा परखा जाता है, खोटा ख़ुद-ब-ख़ुद अल्लाह तआला की राह से हट जाता है और खरा छाँट लिया जाता है, ताकि अल्लाह के वे इनामात उसे दिए जाएँ जो सिर्फ़ सच्चे ईमानवालों का ही हिस्सा हैं।
وَلَقَدۡ فَتَنَّا ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡۖ فَلَيَعۡلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ صَدَقُواْ وَلَيَعۡلَمَنَّ ٱلۡكَٰذِبِينَ ۝ 2
(3) हालाँकि हम उन सब लोगों को आज़मा चुके हैं जो इनसे पहले गुज़र हैं।2 अल्लाह को तो ज़रूर यह देखना है3 कि सच्चे कौन है और झूठे कौन।
2. यानी यह कोई नया मामला नहीं है जो तुम्हारे साथ ही पेश आ रहा हो। इतिहास में हमेशा यही हुआ है कि जिसने भी ईमान का दावा किया है उसे आज़माइशों की भट्टी में डालकर ज़रूर तपाया गया है। और जब दूसरों को इम्तिहान के बिना कुछ नहीं दिया गया तो तुम्हारी क्या ख़ास बात है कि तुम्हें सिर्फ़ ज़बानी दावे पर इनाम दे दिया जाए।
3. अस्ल अरबी अलफ़ाज़़ हैं 'फ़-स-यअ-ल-मन्नालाहु' जिनका लफ़्ज़ी तर्जमा यह होगा “ज़रूर है अल्लाह यह मालूम करे।” इसपर एक शख़्स यह सवाल कर सकता है कि अल्लाह को तो सच्चे की सच्चाई और झूठे का झूठ ख़ुद ही मालूम है, आज़माइश करके उसे मालूम करने की क्या ज़रूरत है। इसका जवाब यह है कि जब तक एक शख़्स के अन्दर किसी चीज़ की सिर्फ़ सलाहियत और क़ाबिलियत ही होती है, अमली तौर पर वह सामने नहीं आ जाती, उस वक़्त तक इनसाफ़ की रू से न तो वह किसी इनाम का हक़दार हो सकता है और न सज़ा का। मसलन एक आदमी में अमानतदार होने की सलाहियत है और एक-दूसरे में ख़ियानत (बेईमानी) की सलाहियत। इन दोनों पर जब तक आज़माइश न आए और एक से अमानतदारी और दूसरे से ख़ियानत अमली तौर पर ज़ाहिर न हो जाए, यह बात अल्लाह के इनसाफ़ से दूर है कि वह सिर्फ़ अपने इल्मे-ग़ैब (परोक्ष-ज्ञान) की बुनियाद पर एक को अमानतदारी का इनाम दे दे और दूसरे को ख़ियानत की सज़ा दे डाले । इसलिए वह इल्म जो अल्लाह को लोगों के अच्छे और बुरे कामों से पहले उनकी सलाहियतों के बारे में और उनके आगे अपनाए जानेवाले रवैये के बारे में पहले से हासिल है, इनसाफ़ के मक़सदों के लिए काफ़ी नहीं है। अल्लाह के यहाँ इनसाफ़ इस इल्म की बुनियाद पर नहीं होता कि फ़ुलाँ शख़्स चोरी का रुझान रखता है और चोरी करेगा या करनेवाला है, बल्कि इस इल्म की बुनियाद पर होता है कि उस शख़्स ने चोरी कर डाली है। इसी तरह बख़्शिशें और इनामात भी उसके यहाँ इस इल्म की बुनियाद पर नहीं दिए जाते कि फ़ुलाँ शख़्स आला दरजे का मोमिन और मुजाहिद बन सकता है या बनेगा, बल्कि इस इल्म की बुनियाद पर दिए जाते हैं कि फ़ुलाँ शख़्स ने अपने अमल से यह साबित कर दिया है कि वह अपने ईमान में सच्चा है और उसने अल्लाह की राह में जान लड़ाकर दिखा दी है। इसी लिए हमने आयत के इन अलफ़ाज़ का तर्जमा “अल्लाह को तो ज़रूर यह देखना है” किया है।
وَمَن جَٰهَدَ فَإِنَّمَا يُجَٰهِدُ لِنَفۡسِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَغَنِيٌّ عَنِ ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 3
(6) जो शख़्स भी जिद्दो-जहद करेगा अपने ही भले के लिए करेगा,8 अल्लाह यक़ीनन दुनिया जहानवालों से बेनियाज़ (निस्पृह) है।9
8. अस्ल अरबी में ‘जाह-द' और 'युजाहिदु' अलफ़ाज़ आए हैं जो 'मुजाहदा' से बने हैं। 'मुजाहदा' का मतलब किसी मुख़ालिफ़ ताक़त के मुक़ाबले में कशमकश और जिद्दो-जुह्द करना है। और जब किसी ख़ास मुख़ालिफ़ ताक़त की निशानदेही न की जाए बल्कि सिर्फ़ 'मुजाहदा' का लफ़्ज़ इस्तेमाल किया जाए तो इसका मतलब यह है कि यह एक हमागीर (व्यापक) और हर मैदान में की जानेवाली कशमकश है। ईमानवाले को इस दुनिया में जो कशमकश करनी है वह कुछ इसी तरह की है। उसे शैतान से भी लड़ना है जो उसको हर पल नेकी के नुक़सानात से डराता और बुराई के फ़ायदों और मज़ों का लालच दिलाता रहता है। अपने नफ़्स (मन) से भी लड़ना है जो उसे हर वक़्त अपनी ख़ाहिशों का ग़ुलाम बनाने के लिए ज़ोर लगाता रहता है। उसे अपने घर से लेकर पूरी दुनिया तक के उन तमाम इनसानों से भी कशमकश करनी है जिनके नज़रिए, रुझान, अख़लाक़ी उसूल, रस्मो-रिवाज, रहन-सहन का ढंग और मईशत (आर्थिक) और सामाजिक क़ानून सच्चे दीन से टकराते हों। और उस रियासत से भी कशमकश करनी है जो ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी से आज़ाद रहकर अपना फ़रमान चलाए और नेकी के बजाय बुराई को बढ़ावा देने में अपनी क़ुव्वतें लगा दे। यह मुजाहदा एक दो दिन का नहीं, उम्र भर का, और दिन के चौबीस घण्टों में से हर लम्हे का है। किसी एक मैदान में नहीं, ज़िन्दगी के हर पहलू में हर मोरचे पर है। इसी के बारे में हसन बसरी (रह०) फ़रमाते हैं, “आदमी जिहाद करता है चाहे वह कभी एक बार भी तलवार न चलाए।"
9. यानी अल्लाह इस मुजाहदे की माँग तुमसे इसलिए नहीं कर रहा है कि अपनी ख़ुदाई क़ायम करने और क़ायम रखने के लिए उसे तुम्हारी किसी मदद की ज़रूरत है और तुम्हारी इस लड़ाई के बिना उसकी ख़ुदाई न चलेगी, बल्कि वह इसलिए तुम्हें इस कशमकश में पड़ने की हिदायत करता है कि यही तुम्हारी तरक़्क़ी का रास्ता है। इसी ज़रिए से तुम बुराई और गुमराही के चक्कर से निकलकर नेकी और सच्चाई की राह पर बढ़ सकते हो। इसी से तुममें यह ताक़त पैदा हो सकती है कि दुनिया में भलाई और सुधार के अलमबरदार और आख़िरत में ख़ुदा की जन्नत के हक़दार बनो। तुम यह लड़ाई लड़कर ख़ुदा पर कोई एहसान न करोगे, अपना ही भला करोगे।
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَنُكَفِّرَنَّ عَنۡهُمۡ سَيِّـَٔاتِهِمۡ وَلَنَجۡزِيَنَّهُمۡ أَحۡسَنَ ٱلَّذِي كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ۝ 4
(7) और जो लोग ईमान लाएँगे और भले काम करेंगे उनकी बुराइयाँ हम उनसे दूर कर देंगे और उन्हें उनके बेहतरीन आमाल का बदला देंगे।10
10. ईमान से मुराद उन तमाम चीज़ों को सच्चे दिल से मानना है जिन्हें मानने की दावत अल्लाह के रसूल और उसकी किताब ने दी है। और 'अमले-सॉलेह' (भले कर्म) से मुराद अल्लाह और उसके रसूल की हिदायत के मुताबिक़ अमल करना है। दिल और दिमाग़ का अमले-सॉलेह या है कि आदमी की सोच और उसके ख़यालात और इरादे दुरुस्त और पाकीज़ा हों, ज़बान का अमले-सॉलेह यह है कि आदमी बुराई पर ज़बान खोलने से बचे और जो बात भी करे हक़ और इनसाफ़ और सच्चाई के मुताबिक़ करे और जिस्म के हिस्सों (अंगों) का अमले-सॉलेह यह है कि आदमी की पूरी ज़िन्दगी अल्लाह की फ़रमाँबरदारी और बन्दगी में, और उसके हुक्मों और क़ानूनों की पाबन्दी में गुज़रे, इस ईमान और अमले-सॉलेह के दो नतीजे बयान किए गए हैं एक वह कि आदमी की बुराइयाँ उससे दूर कर दी जाएँगी। दूसरा यह कि उसे उसके अच्छे कामों का, और उसके कामों से बेहतर इनाम दिया जाएगा। बुराइयों दूर करने से मुराद कई चीज़ें हैं। एक यह कि ईमान लाने से पहले आदमी ने चाहे कैसे ही गुनाह किए हों, ईमान लाते ही वे सब माफ़ हो जाएँगे। दूसरी यह कि ईमान लाने के बाद आदमी ने बग़ावत के जज़बे से नहीं, बल्कि इनसानी कमज़ोरी से जो क़ुसूर किए हों, उसके नेक कामों का लिहाज़ करके उनकी अनदेखी कर दी जाएगी। तीसरी यह कि ईमान और अमले-सॉलेह की ज़िन्दगी अपनाने से आदमी के नफ़्स (मन) का सुधार आप-से-आप होगा और उसकी बहुत-सी कमज़ोरियाँ दूर हो जाएँगी। ईमान और अमले-सॉलेह के इनाम के बारे में जो जुमला कहा गया है वह है, “और उन्हें उनके बेहतरीन आमाल का इनाम देंगे।” इसके दो मतलब हैं। एक यह कि आदमी के नेक आमाल में से जो आमाल सबसे ज़्यादा अच्छे होंगे, उनका ख़याल रखकर उसके लिए इनाम तय किया जाएगा। दूसरा यह कि आदमी अपने अमल के लिहाज़ से जितने इनाम का हक़दार होगा उससे ज़्यादा अच्छा इनाम उसे दिया जाएगा। यह बात दूसरी जगहों पर भी क़ुरआन में कही गई है। मिसाल के तौर पर सूरा-6 अनआम में फ़रमाया, “जो शख़्स नेकी लेकर आएगा उसका उससे दस गुना इनाम दिया जाएगा।” (आयत-160) और सूरा-28 क़सस में फ़रमाया, “जो शख़्स नेकी लेकर आएगा उसको उससे बेहतर इनाम दिया जाएगा।” (आयत-84) और सूरा-4 निसा में फ़रमाया, “अल्लाह ज़ुल्म तो ज़र्रा बराबर नहीं करता, और अगर नेकी हो तो उसको कई गुना बढ़ाता है।” (आयत-40)
وَوَصَّيۡنَا ٱلۡإِنسَٰنَ بِوَٰلِدَيۡهِ حُسۡنٗاۖ وَإِن جَٰهَدَاكَ لِتُشۡرِكَ بِي مَا لَيۡسَ لَكَ بِهِۦ عِلۡمٞ فَلَا تُطِعۡهُمَآۚ إِلَيَّ مَرۡجِعُكُمۡ فَأُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ۝ 5
(8) हमने इनसान को ताकीद की कि अपने माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करे। लेकिन अगर वे तुझपर दबाव डालें कि तू मेरे साथ किसी ऐसे (माबूद) को शरीक ठहराए जिसे तू (मेरे शरीक की हैसियत से) नहीं जानता तो उनका कहना न मान।11 मेरी ही तरफ़ तुम सबको पलटकर आना है, फिर मैं तुमको बता दूँगा कि तुम क्या करते रहे हो।12
11. इस आयत के बारे में मुस्लिम तिरमिज़ी, अहमद, अबू-दाऊद और नसाई की रिवायत है कि यह हज़रत सअद-बिन-अबी-वक़्क़ास (रज़ि०) के बारे में उतरी है। वे 18-19 साल के थे जब उन्होंने इस्लाम क़ुबूल किया। उनकी माँ हमना-बिन्ते-सुफ़ियान-बिन-उमैया (अबू-सुफ़ियान की भतीजी) को जब मालूम हुआ कि बेटा मुसलमान हो गया है तो उसने कहा कि जब तक तू मुहम्मद का इनकार न करेगा में न खाऊँगी, न पियूँगी, न छाँव में बैठूँगी। माँ का हक़ अदा करना तो अल्लाह का हुक्म है। तू मेरी बात न मानेगा तो अल्लाह की भी नाफ़रमानी करेगा। हज़रत सअद (रज़ि०) इसपर सख़्त परेशान हुए और अल्लाह के रसूल (सल्ल०) की ख़िदमत में हाज़िर होकर माजरा सुनाया। इसपर यह आयत उतरी। मुमकिन है कि ऐसे ही हालात से दूसरे वे नौजवान भी दोचार हुए हों जो मक्का के इबतिदाई दौर में मुसलमान हुए थे। इसी लिए इस मज़मून (विषय) को सूरा-31 लुक़मान में भी पूरे ज़ोर के साथ दोहराया गया है (देखिए आयत-15) आयत का मंशा यह है कि इनसान पर इनसानों में से किसी का हक़ सबसे बढ़कर है तो ये उसके माँ-बाप हैं। लेकिन माँ-बाप भी अगर इनसान को शिर्क (यानी ख़ुदा के साथ दूसरों को इबादत में शरीक करने) पर मजबूर करें तो उनकी बात क़ुबूल न करनी चाहिए, कहाँ यह कि किसी और के कहने पर आदमी ऐसा करे। फिर अलफ़ाज़ ये हैं कि “अगर वे दोनों तुझे मजबूर करने के लिए अपना पूरा ज़ोर भी लगा दें।” इससे मालूम हुआ कि कमतर दरजे का दबाव, या माँ-बाप में से किसी एक का ज़ोर देना तो सबसे पहले रद्द कर देने के लायक़ है। इसके साथ “जिसे तू मेरे शरीक की हैसियत से नहीं जानता” का जुमला भी क़ाबिले-ग़ौर है। इसमें उनकी बात न मानने के लिए एक बहुत मुनासिब दलील दी गई है। माँ-बाप का यह हक़ तो बेशक है कि औलाद उनकी ख़िदमत करे, उनका अदब और एहतिराम करे, उनकी जाइज़ बातों में उनकी फ़रमाँबरदारी भी करे, लेकिन यह हक़ उनको नहीं पहुँचता कि आदमी अपने इल्म के ख़िलाफ़ उनकी अंधी पैरवी करे। कोई वजह नहीं है कि एक बेटा या बेटी सिर्फ़ इस बुनियाद पर एक मज़हब की पैरवी किए जाए कि यह उसके माँ-बाप का मज़हब है। अगर औलाद को यह इल्म हासिल हो जाए कि माँ-बाप का मज़हब ग़लत है तो उसे उस मज़हब को छोड़कर सही मज़हब अपनाना चाहिए और उनके दबाव डालने पर भी उस तरीक़े की पैरवी न करनी चाहिए जिसकी गुमराही उसपर खुल चुकी हो। और वह मामला जब माँ-बाप के साथ है तो फिर दुनिया के हर शख़्स के साथ भी यही होना चाहिए। किसी शख़्स की तक़लीद (पैरवी) भी जाइज़ नहीं है जब तक आदमी यह न जान ले कि वह शख़्स हक़ (सत्य) पर है।
12. यानी यह दुनिया की रिश्तेदारियाँ और उनके हक़ तो बस इसी दुनिया की हद तक हैं। आख़िरकार माँ-बाप को भी और औलाद को भी अपने पैदा करनेवाले ख़ुदा के सामने पलटकर जाना है, और वहाँ हर एक की पूछ-गछ उसकी निजी ज़िम्मेदारी की बुनियाद पर होनी है। अगर माँ-बाप ने औलाद को गुमराह किया है तो पकड़े जाएँगे। अगर औलाद ने माँ-बाप की ख़ातिर गुमराही क़ुबूल की है तो उसे सज़ा मिलेगी। और अगर औलाद ने सीधी राह अपनाई और माँ-बाप के जाइज़ हक़ अदा करने में भी कोताही न की, लेकिन माँ-बाप ने सिर्फ़ इस क़ुसूर पर उसे सताया कि उसने गुमराही में उनका साथ क्यों न दिया, तो वे अल्लाह की पकड़ से बचे न रह सकेंगे।
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَنُدۡخِلَنَّهُمۡ فِي ٱلصَّٰلِحِينَ ۝ 6
(9) और जो लोग ईमान लाए होंगे और जिन्होंने भले काम किए होंगे उनको हम ज़रूर अच्छों में दाख़िल करेंगे।
وَمِنَ ٱلنَّاسِ مَن يَقُولُ ءَامَنَّا بِٱللَّهِ فَإِذَآ أُوذِيَ فِي ٱللَّهِ جَعَلَ فِتۡنَةَ ٱلنَّاسِ كَعَذَابِ ٱللَّهِۖ وَلَئِن جَآءَ نَصۡرٞ مِّن رَّبِّكَ لَيَقُولُنَّ إِنَّا كُنَّا مَعَكُمۡۚ أَوَلَيۡسَ ٱللَّهُ بِأَعۡلَمَ بِمَا فِي صُدُورِ ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 7
(10) लोगों में से कोई ऐसा है जो कहता है कि हम ईमान लाए अल्लाह पर13 मगर जब वह अल्लाह के मामले में सताया गया तो उसने लोगों की डाली हुई आज़माइश को अल्लाह के अज़ाब की तरह समझ लिया।14 अब अगर तेरे रब की तरफ़ से फ़तह और मदद आ गई तो यही शख़्स कहेगा कि “हम तो तुम्हारे साथ थे।”15 क्या दुनियावालों के दिलों का हाल अल्लाह को अच्छी तरह मालूम नहीं है?
13. अगरचे कहनेवाला एक शख़्स है, मगर “मैं ईमान लाया कहने के बजाय कह रहा है हम ईमान लाए।” इमाम राज़ी (रह०) ने इसमें एक बारीक नुक्ते (Point) की निशानदेही की है। वे कहते हैं कि मुनाफ़िक़ अपने आपको हमेशा ईमानवालों के गरोह में शामिल करने की कोशिश करता है और अपने ईमान का ज़िक्र इस तरह करता है कि मानो वह भी वैसा ही ईमानवाला है जैसे दूसरे हैं। उसकी मिसाल ऐसी है जैसे एक बुज़दिल अगर किसी फ़ौज के साथ गया है और उस फ़ौज के बहादुर सिपाहियों ने लड़कर दुश्मनों को मार भगाया है, तो चाहे उसने ख़ुद कोई कारनामा अंजाम न दिया हो, मगर वह आकर यूँ कहेगा कि हम गए और ख़ूब लड़े और हमने दुश्मन को बुरी तरह हरा दिया। मानो आप भी उन्हीं बहादुरों में से हैं जिन्होंने बहादुरी के करतब दिखाए हैं।
14. यानी जिस तरह अल्लाह के अज़ाब से डरकर कुफ़्र और गुनाह छोड़ देना चाहिए, यह शख़्स बन्दों की दी हुई तकलीफ़ों से डरकर ईमान और नेकी छोड़ बैठा। ईमान लाने के बाद इस्लाम-दुश्मनों की धमकियों और मार-पीट और क़ैद किए जाने से जब उसे पाला पड़ा तो उसने समझा कि अल्लाह की वह दोज़ख़ भी बस इतनी ही कुछ होगी जिससे मरने के बाद कुफ़्र (नाफ़रमानी) की सज़ा में पाला पड़ना है। इसलिए उसने फ़ैसला कर लिया कि वह अज़ाब तो बाद में भुगत लूँगा, यह नक़द अज़ाब जो अब मिल रहा है इससे बचने के लिए मुझे ईमान छोड़कर फिर इस्लाम-मुख़ालिफ़ों के गरोह में जा मिलना चाहिए ताकि दुनिया की ज़िन्दगी तो ख़ैरियत से गुज़र जाए।
15. यानी आज तो वह अपनी खाल बचाने के लिए इस्लाम-दुश्मनों से जा मिला है और ईमानवालों का साथ उसने छोड़ दिया है, क्योंकि सच्चे दीन को फैलाने के लिए वह अपनी नकसीर तक फुड़वाने को तैयार नहीं है। मगर जब इस दीन की ख़ातिर सिर-धड़ की बाज़ी लगा देनेवालों को अल्लाह तआला जीत और कामयाबी देगा तो यह आदमी जीत के फलों में हिस्सा बँटाने के लिए, आ मौजूद होगा और मुसलमानों से कहेगा कि दिल से तो हम तुम्हारे ही साथ थे, तुम्हारी कामयाबी के लिए दुआएँ माँगा करते थे, तुम्हारी जी-तोड़ मेहनतों और क़ुरबानियों की बड़ी क़द्र हमारी निगाह में थी। यहाँ इतनी बात और समझ लेनी चाहिए कि बरदाश्त से बाहर तकलीफ़ या नुक़सान, या बहुत ज़्यादा डर की हालत में किसी शख़्स का कुफ़्र की कोई बात कहकर अपने आपको बचा लेना शरई तौर पर जाइज़ है, शर्त यह है कि आदमी सच्चे दिल से ईमान पर जमा रहे। लेकिन बहुत बड़ा फ़र्क़ है उस सच्चे मुसलमान में जो मजबूरी की हालत में जान बचाने के लिए कुफ़्र (अधर्म) का इज़हार करे, और उस मस्लहत-परस्त (मौक़ा-परस्त) इनसान में जो नज़रिए के एतिबार से इस्लाम ही को हक़ और दुरुस्त जानता और मानता हो मगर ईमानी ज़िन्दगी के ख़तरों को देखकर इस्लाम-दुश्मनों से जा मिले। बज़ाहिर इन दोनों की हालत एक-दूसरे से कुछ ज़्यादा अलग नज़र नहीं आती। मगर हक़ीक़त में जो चीज़ उनके बीच ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ कर देती है वह यह है कि मजबूरन कुफ़्र ज़ाहिर करनेवाला सच्चा मुसलमान न सिर्फ़ अक़ीदे के एतिबार से इस्लाम का चाहनेवाला रहता है, बल्कि अमली तौर से भी उसकी दिली हमदर्दियों दीन और दीनवालों के साथ रहती हैं। उनकी कामयाबी से वह ख़ुश और उनको चोट पहुँचने से वह बेचैन हो जाता है। मजबूरी की हालत में भी वह मुसलमानों का साथ देने के हर मौक़े से फ़ायदा उठाता है, और इस ताक में रहता है कि जब भी उसपर से दीन के दुश्मनों की पकड़ ढीली हो वह अपने मज़हबवालों के साथ जा मिले। इसके बरख़िलाफ़ मस्लहत-परस्त आदमी जब दीन की राह कठिन देखता है, और ख़ूब नाप-तौलकर देख लेता है कि सच्चे दीन (सत्यधर्म) का साथ देने के नुक़सानात इस्लाम-मुख़ालिफ़ों के साथ जा मिलने के फ़ायदों से ज़्यादा हैं, तो वह ख़ालिस आफ़ियत और फ़ायदे की ख़ातिर दीन और दीनवालों से मुँह मोड़ लेता है, इस्लाम-मुख़ालिफ़ों से दोस्ती का रिश्ता जोड़ता है और अपने फ़ायदे की ख़ातिर उनकी कोई ऐसी ख़िदमत कर देने से भी बाज़ नहीं रहता जो दीन के सख़्त ख़िलाफ़ और दीनवालों के लिए निहायत नुक़सानदेह हो। लेकिन इसके साथ वह इस इमकान से भी आँखें बन्द नहीं कर लेता कि शायद किसी वक़्त सच्चे दीन ही का बोलबाला हो जाए। इसलिए जब कभी उसे मुसलमानों से बात करने का मौक़ा मिलता है, वह उनके नज़रिए को सही मानने और उनके सामने अपने ईमान का इक़रार करने और हक़ के रास्ते में उनकी क़ुरबानियों की तारीफ़ करने में ज़र्रा बराबर कंजूसी नहीं करता, ताकि यह ज़बानी तौर पर मानना सनद रहे और ज़रूरत के वक़्त पर काम आए। क़ुरआन मजीद एक-दूसरे मौक़े पर इन मुनाफ़िक़ों की इसी सौदागरोंवाली ज़ेहनियत को यूँ बयान करता है— “ये वे लोग हैं जो तुम्हारे मामले में इन्तिज़ार कर रहे हैं (कि ऊँट किस करवट बैठता है) अगर अल्लाह की तरफ़ से जीत तुम्हारी हुई तो आकर कहेंगे कि क्या हम तुम्हारे साथ न थे? और अगर इस्लाम-दुश्मनों का पलड़ा भारी रहा तो उनसे कहेंगे कि क्या हम तुम्हारे ख़िलाफ़ लड़ न सकते थे और हमने फिर भी तुम्हें मुसलमानों से बचाया?” (सूरा-4 निसा, आयत-141)
وَلَيَعۡلَمَنَّ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَلَيَعۡلَمَنَّ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ ۝ 8
(11) और अल्लाह को तो ज़रूर यह देखना ही है कि ईमान लानेवाले कौन हैं और मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) कौन।16
16. यानी अल्लाह आज़माइश के मौक़े इसी लिए बार-बार लाता है ताकि ईमानवालों के ईमान और मुनाफ़िक़ों के निफ़ाक़ (कपट) का हाल खुल जाए और जिसके अन्दर जो कुछ भी छिपा हुआ है वह सामने आ जाए। यही बात सूरा आले-इमरान में कही गई है कि “अल्लाह ईमानवालों को हरगिज़ इस हालत में रहने देनेवाला नहीं है जिसमें तुम इस वक़्त हो (कि सच्चे ईमानवाले और मुनाफ़िक़ सब मिले-जुले हैं)। वह पाक लोगों को नापाक लोगों से अलग नुमायाँ करके रहेगा।" (सूरा-5 आले-इमरान, आयत-179)
وَقَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ لِلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّبِعُواْ سَبِيلَنَا وَلۡنَحۡمِلۡ خَطَٰيَٰكُمۡ وَمَا هُم بِحَٰمِلِينَ مِنۡ خَطَٰيَٰهُم مِّن شَيۡءٍۖ إِنَّهُمۡ لَكَٰذِبُونَ ۝ 9
(12) ये इनकार करनेवाले ईमान लानेवालों से कहते हैं कि तुम हमारे तरीक़े की पैरवी करो और तुम्हारी ख़ताओं को हम अपने ऊपर ले लेंगे।17 हालाँकि उनकी ख़ताओ में से कुछ भी वे अपने ऊपर लेनेवाले नहीं हैं,18 वे बिलकुल झूठ कहते हैं।
17. उनकी इस बात का मतलब यह था कि अव्वल तो मरने के बाद ज़िन्दगी मिलना, सबका इकट्ठा होना, हिसाब लिया जाना और उसके मुताबिक़ इनाम या सज़ा मिलना, ये बातें सब ढकोसला है। लेकिन अगर मान भी लें कि कोई दूसरी ज़िन्दगी है और उसमें कोई पूछ-गछ भी होनी है, तो हम ज़िम्मा लेते हैं कि ख़ुदा के सामने हम सारा अज़ाब-सवाब अपनी गर्दन पर ले लेंगे। तुम हमारे कहने से इस नए दीन को छोड़ दो और अपने बाप-दादा के दीन की तरफ़ वापस आ जाओ। रिवायतों में क़ुरैश के कई सरदारों के बारे में ज़िक्र है कि शुरू में जो लोग इस्लाम क़ुबूल करते थे उनसे मिलकर ये लोग इसी तरह की बातें किया करते थे। चुनाँचे हज़रत उमर (रज़ि०) के बारे में बयान किया गया है कि जब वे ईमान लाए तो अबू-सुफ़ियान और हर्ब-बिन-उमैया-बिन-ख़लफ़ ने उनसे मिलकर भी यही कहा था।
18. यानी अव्वल तो यही मुमकिन नहीं है कि कोई शख़्स ख़ुदा के यहाँ किसी दूसरे की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ले ओर किसी के कहने से गुनाह करनेवाला ख़ुद अपने गुनाह की सज़ा पाने से बच जाए, क्योंकि वहाँ तो हर शख़्स अपने किए का आप ज़िम्मेदार है। लेकिन अगर मान भी लो कि ऐसा हो भी तो जिस वक़्त कुफ़्र और शिर्क का अंजाम एक दहकती हुई जहन्नम की शक्ल में सामने आएगा उस वक़्त किसकी यह हिम्मत है कि दुनिया में जो वादा उसने किया था उसकी लाज रखने के लिए यह कह दे कि जनाब, मेरे कहने से जिस शख़्स ने ईमान को छोड़कर कुफ़्र (अधर्म) का रास्ता अपनाया था, आप उसे माफ़ करके जन्नत में भेज दें, और में जहन्नम में अपने कुफ़्र के साथ उसके कुफ़्र की सज़ा भी भुगतने के लिए तैयार हैं।
وَلَيَحۡمِلُنَّ أَثۡقَالَهُمۡ وَأَثۡقَالٗا مَّعَ أَثۡقَالِهِمۡۖ وَلَيُسۡـَٔلُنَّ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ عَمَّا كَانُواْ يَفۡتَرُونَ ۝ 10
(13) हाँ ज़रूर वे अपने बोझ भी उठाएँगे और अपने बोझों के साथ दूसरे बहुत-से बोझ भी।19 और क़ियामत के दिन यक़ीनन उनसे इन झूठे इलज़ामों की पूछ-गछ होगी जो वे लगाते रहे हैं।20
19. यानी वे ख़ुदा के यहाँ हालाँकि दूसरों का बोझ तो न उठाएँगे, लेकिन दोहरा बोझ उठाने से बचेंगे भी नहीं। एक बोझ उनपर ख़ुद गुमराह होने का लदेगा और दूसरा बोझ दूसरों को गुमराह करने का भी उनपर लादा जाएगा। इस बात को यूँ समझिए कि एक शख़्स ख़ुद भी चोरी करता है और किसी दूसरे शख़्स से भी कहता है कि वह उसके साथ चोरी के काम में हिस्सा ले। अब अगर वह दूसरा शख़्स इसके कहने से चोरी करेगा तो कोई अदालत उसे इस वजह से न छोड़ देगी कि उसने दूसरे के कहने से जुर्म किया है। चोरी की सज़ा तो बहरहाल उसे मिलेगी और इनसाफ़ के किसी उसूल के मुताबिक़ भी यह दुरुस्त न होगा कि उसे छोड़कर उसके बदले की सज़ा उस पहले चोर को दे दी जाए जिसने उसे बहकाकर चोरी के रास्ते पर डाला था। लेकिन वह पहला चोर अपने जुर्म के साथ इस जुर्म की सज़ा भी पाएगा कि उसने ख़ुद चोरी की सो की, एक-दूसरे शख़्स को भी अपने साथ चोर बना डाला। क़ुरआन मजीद में एक दूसरी जगह इस उसूल को इन अलफ़ाज़़ में बयान किया गया है, “ताकि वे क़ियामत के दिन अपने बोझ भी पूरे-पूरे उठाएँ और उन लोगों के बोझों का भी एक हिस्सा उठाएँ जिनको वह इल्म के बिना गुमराह करते हैं।” (सूरा-16 नह्ल, आयत-25) और इसी उसूल को नबी (सल्ल०) ने इस हदीस में बयान किया है कि “जिस शख़्स ने सीधे रास्ते की तरफ़ दावत दी उसको उन सब लोगों के बदले के बराबर बदला मिलेगा जिन्होंने उसकी दावत पर सीधा रास्ता अपना लिया, बिना इसके कि उनके इनामों में कोई कमी हो। और जिसने गुमराही की तरफ़ दावत दी उसपर उन सब लोगों के गुनाहों के बराबर गुनाह होगा जिन्होंने उसकी पैरवी की बिना इसके कि उनके गुनाहों में कोई कमी हो।” (हदीस : मुस्लिम)
20. 'झूठे इलज़ामों' से मुराद वे झूठी बातें हैं जो मक्का के इस्लाम-मुख़ालिफ़ों की इस बात में छिपी हुई थीं कि “तुम हमारे तरीक़े की पैरवी करो और तुम्हारी ख़ताओं को हम अपने ऊपर ले लेंगे। अस्ल में वे लोग दो मनगढ़न्त बातों की बुनियाद पर यह बात कहते थे। एक यह कि जिस शिर्कवाले मज़हब की वे पैरवी कर रहे हैं वह सही है और मुहम्मद (सल्ल०) का तौहीदवाला (एकेश्वरवादी) मज़हब ग़लत है, इसलिए उससे कुफ़्र करने में (यानी उसके ख़िलाफ़ रवैया अपनाने में) कोई ग़लती की बात नहीं है। दूसरी मनगढ़न्त बात यह थी कि मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा होकर जमा नहीं होना है और यह आख़िरत की ज़िन्दगी का ख़याल, जिसकी वजह से एक मुसलमान कुफ़्र (ख़ुदा की नाफ़रमानी) करते हुए डरता है, बिलकुल बे-बुनियाद है। ये मनगढ़न्त बातें अपने दिल में रखने के बाद वे एक मुसलमान से कहते थे कि अच्छा अगर तुम्हारे नज़दीक कुफ़्र करना एक ख़ता ही है, और दोबारा ज़िन्दा होकर जमा भी होना है जिसमें इस ख़ता पर तुमसे पूछ-गछ होगी, तो चलो तुम्हारी इस ख़ता को हम अपने सर लेते हैं, तुम हमारी ज़िम्मेदारी पर मुहम्मद (सल्ल०) का दीन छोड़कर बाप-दादा के दीन में वापस आ जाओ। इस मामले में फिर दो और झूठी बातें भी शामिल थीं। एक उनका यह ख़याल कि जो शख़्स किसी के कहने पर जुर्म करे वह अपने जुर्म की ज़िम्मेदारी से बरी हो सकता है और उसकी पूरी ज़िम्मेदारी वह शख़्स उठा सकता है जिसके कहने पर उसने जुर्म किया है। दूसरा उनका यह झूठा वादा कि क़ियामत के दिन वे उन लोगों की ज़िम्मेदारी सचमुच उठा लेंगे जो उनके कहने पर ईमान से कुफ़्र की तरफ़ पलट गए होंगे। क्योंकि जब क़ियामत सचमुच क़ायम हो जाएगी और उनकी उम्मीदों के खिलाफ़ जहन्नम उनकी आँखों के सामने होगी उस वक़्त वे हरगिज़ इसके लिए तैयार न होंगे कि अपने कुफ़्र (इनकार) का ख़मियाज़ा भुगतने के साथ उन लोगों के गुनाह का बोझ भी पूरा-का-पूरा अपने ऊपर ले लें जिन्हें वे दुनिया में बहकाकर गुमराह करते थे।
وَلَقَدۡ أَرۡسَلۡنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوۡمِهِۦ فَلَبِثَ فِيهِمۡ أَلۡفَ سَنَةٍ إِلَّا خَمۡسِينَ عَامٗا فَأَخَذَهُمُ ٱلطُّوفَانُ وَهُمۡ ظَٰلِمُونَ ۝ 11
(14) हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा21 और वह पचास कम एक हज़ार साल उनके बीच रहा।22 आख़िरकार उन लोगों को तूफ़ान ने आ घेरा इस हाल में कि वे ज़ालिम थे।23
21. हज़रत नूह (अलैहि०) का क़िस्सा क़ुरआन में कुछ फ़र्क़ के साथ कई जगहों पर आया है। देखिए— सूरा-3 आले-इमरान, आयतें—33-34; सूरा-4 निसा, आयत-163; सूरा-6 अनआम, आयत-84; सूरा-7 आराफ़, आयतें—59-64; सूरा-10 यूनुस, आयतें—71-73; सूरा-11 हूद आयतें—25-48; सूरा-21 अम्बिया, आयतें—76-77; सूरा-23 मोमिनून, आयतें—23-30; सूरा-25 फुरक़ान, आयत-37; सूरा-26 शुअरा, आयतें—105-123; सूरा-87 साफ़्फ़ात, आयतें—75-82; सूरा-54 क़मर, आयतें—90-95; सूरा-69 हाक़्क़ा, आयतें—11-12; सूरा-71 नूह, आयतें—1-28। पैग़म्बरों के ये क़िस्से यहाँ जिस वजह से बयान कि जा रहे हैं उसको समझने के लिए सूरा की इबतिदाई आयतों को निगाह में रखना चाहिए। वहाँ एक तरफ़ ईमानवालों से कहा गया है कि हमने उन सब ईमानवालों को आज़माइश में डाला है जो तुमसे पहले गुज़र चुके हैं। दूसरी तरफ़ हक़ के इनकारियों से कहा गया है कि तुम इस ग़लतफ़हमी में न रहो कि तुम हमसे बाज़ी ले जाओगे और हमारी पकड़ से बच निकलोगे। इन्हीं दो बातों को ज़ेहन में बिठाने के लिए ये तारीख़ी वाक़िआत (ऐतिहासिक घटनाएँ) सुनाए जा रहे हैं।
22. इसका यह मतलब नहीं है कि हज़रत नूह (अलैहि०) की उम्र साढ़े नौ सौ साल थी, बल्कि इसका मतलब यह है कि पैग़म्बरी के मंसब पर बिठाए जाने के बाद से तूफ़ान तक पूरे साढ़े नौ सौ साल हज़रत नूह (अलैहि०) इस ज़ालिम और गुमराह क़ौम के सुधार के लिए कोशिश करते रहे, और इतनी लम्बी मुद्दत तक उनकी ज़्यादतियाँ बरदाश्त करने पर भी उन्होंने हिम्मत न हारी। मक़सद यही चीज़ यहाँ बयान करना है। ईमानवालों को बताया जा रहा है कि तुमको अभी पाँच-सात साल ही ज़ुल्मो-सितम सहते और एक गुमराह क़ौम की हठधर्मियाँ बरदाश्त करते गुज़रे हैं। ज़रा हमारे उस बन्दे के सब्र, जमाव और इरादे की मज़बूती और लगन को देखो जिसने लगातार साढ़े नौ सदियों तक उन सख़्तियों का मुक़ाबला किया। हज़रत नूह (अलैहि०) की उम्र के बारे में क़ुरआन मजीद और बाइबल के बयान एक-दूसरे से अलग हैं। बाइबल का बयान यह है कि उनकी उम्र साढ़े नौ सौ साल थी। वे छः सौ साल के थे जब तूफ़ान आया। और उसके बाद साढ़े तीन सौ साल और ज़िन्दा रहे (उत्पत्ति, अध्याय-7, आयत-6, अध्याय-9, आयतें—28-29) लेकिन क़ुरआन के बयान के मुताबिक़ उनकी उम्र कम-से-कम एक हज़ार साल होनी चाहिए, क्योंकि साढ़े नौ सौ साल तो सिर्फ़ वह मुद्दत है जो पैग़म्बरी को ज़िम्मेदारी सौंपे जाने के बाद से तूफ़ान आने तक उन्होंने दावत और तबलीग़ में लगाई। ज़ाहिर है कि पैग़म्बरी उन्हें पक्की उम्र को पहुँचने के बाद ही मिली होगी और तूफ़ान के बाद भी वे कुछ मुद्दत ज़िन्दा रहे होंगे। यह लम्बी उम्र कुछ लोगों के लिए नाक़ाबिले-यक़ीन है। लेकिन ख़ुदा की इस ख़ुदाई में अजूबों की कमी नहीं है। जिस तरफ़ भी आदमी निगाह डाले, उसकी क़ुदरत के करिश्मे ग़ैर-मामूली वाक़िआत की शक्ल में नज़र आ जाते हैं। कुछ वाक़िआत और हालात का पहले से एक ख़ास सूरत में सामने आते रहना इस बात के लिए कोई दलील नहीं है कि इस आम बात से हटकर किसी दूसरी ग़ैर-मामूली सूरत में कोई वाक़िआ हो ही नहीं सकता। इस तरह के मनगढ़न्त उसूलों को तोड़ने के लिए कायनात के हर कोने में और जानदारों की हर क़िस्म में आम उसूल से हटकर हालात और वाक़िआत की एक लम्बी लिस्ट मौजूद हैं। ख़ास तौर से जो शख़्स ख़ुदा के बारे में यह साफ़ सोच अपने ज़ेहन में रखता हो कि वह हर चीज़ की क़ुदरत रखता है तो वह कभी इस ग़लतफ़हमी में नहीं पड़ सकता कि किसी इनसान को एक हज़ार साल या उससे कम-ज़्यादा उम्र दे देना उस ख़ुदा के लिए भी मुमकिन नहीं है जो मौत और ज़िन्दगी का पैदा करनेवाला है। हक़ीक़त यह है कि आदमी अगर ख़ुद चाहे तो एक लम्हे के लिए भी ज़िन्दा नहीं रह सकता। लेकिन अगर ख़ुदा चाहे तो जब तक वह चाहे उसे ज़िन्दा रख सकता है।
23. यानी तूफ़ान उनपर इस हालत में आया कि वे अपने ज़ुल्म पर क़ायम थे। दूसरे अलफ़ाज़ में, अगर वे तूफ़ान आने से पहले ज़ुल्म करना छोड़ देते तो अल्लाह तआला उनपर यह अज़ाब न भेजता।
فَأَنجَيۡنَٰهُ وَأَصۡحَٰبَ ٱلسَّفِينَةِ وَجَعَلۡنَٰهَآ ءَايَةٗ لِّلۡعَٰلَمِينَ ۝ 12
(15) फिर नूह को और नाववालों24 को हमने बचा लिया और उसे दुनियावालों के लिए इबरत (शिक्षा) की एक निशानी बनाकर रख दिया।25
24. यानी उन लोगों को जो हज़रत नूह (अलैहि०) पर ईमान लाए थे और जिन्हें नाव में सवार होने की अल्लाह तआला ने इजाज़त दी थी। सूरा-11 हूद में इसको साफ़ तौर पर बयान किया गया है “यहाँ तक कि जब हमारा हुक्म आ गया और तन्दूर उबल पड़ा तो हमने कहा कि (ऐ नूह) इस नाव में सवार कर ले हर क़िस्म (के जानवरों) में से एक-एक जोड़ा, और अपने घरवालों को सिवाय उनके जिन्हें साथ न लेने का पहले हुक्म दे दिया गया है, और उन लोगों को जो ईमान लाए हैं, और उसके साथ बहुत ही कम लोग ईमान लाए थे।” (आयत-40)
25. इसका मतलब यह भी हो सकता है कि इस भयानक सज़ा को या इस अज़ीमुश्शान वाक़िए को बादवालों के लिए इबरत की निशानी बना दिया गया। लेकिन वहाँ और सूरा-54 क़मर में यह बात जिस तरीक़े से बयान की गई है उससे ज़ाहिर यही होता है कि वह इबरत की निशानी ख़ुद वह नाव थी जो पहाड़ की चोटी पर सदियों मौजूद रही और बाद की नस्लों को ख़बर देती रही कि इस सरज़मीन में कभी ऐसा तूफ़ान आया था जिसकी बदौलत यह नाव पहाड़ पर जा टिकी है। सूरा-54 क़मर में इसके बारे में कहा गया है— “और हमने नूह को सवार किया तख़्तों और कीलोंवाली (नाव) पर, वह चल रही थी हमारी निगरानी में उस शख़्स के लिए इनाम के तौर पर जिसका इनकार कर दिया गया था, और हमने उसे छोड़ दिया एक निशानी बनाकर, तो है कोई सबक़ लेनेवाला?” (आयतें—13-15) सूरा-54 क़मर की इस आयत की तफ़सीर में इब्ने-जरीर ने क़तादा की यह रिवायत नक़्ल की है कि सहाबा के दौर में जब मुसलमान अल-जज़ीरा के इलाक़े में गए हैं तो उन्होंने जूदी पहाड़ पर (और एक रिवायत के मुताबिक़ बाक़िरवा नाम की बस्ती के क़रीब) इस नाव को देखा है। मौजूदा ज़माने में भी समय-समय पर ये ख़बरें अख़बारों में आती रहती हैं कि नूह की नाव को तलाश करने के लिए मुहिमें भेजी जा रही हैं। और इसकी वजह यह बताई जाती है कि कई-बार हवाई जहाज़ जो अरारात के पहाड़ों पर से गुज़रे हैं तो एक चोटी पर उन्होंने ऐसी चीज़ देखी है जो एक नाव से मिलती-जुलती है। (और ज़्यादा तफ़सील के लिए देखिए— तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-7 आराफ़, हाशिया-47; सूरा-11 हूद, हाशिया-46)
وَإِبۡرَٰهِيمَ إِذۡ قَالَ لِقَوۡمِهِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱتَّقُوهُۖ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ۝ 13
(16) और इबराहीम को भेजा26 जबकि उसने अपनी क़ौम से कहा, “अल्लाह की बन्दगी करो और उससे डरो।27 यह तुम्हारे लिए बेहतर है अगर तुम जानो।
26. हज़रत इबराहीम (अलैहि०) का क़िस्सा क़ुरआन में कुछ फ़र्क़ के साथ कई जगहों पर आया है। देखें— सूरा-2 बक़रा, आयतें—113-141, 258-250; सूरा-3 आले-इमरान, आयतें—65-68; सूरा-6 अनआम, आयतें—74-90; सूरा-11 हूद, आयतें—69-76; सूरा-11 इबराहीम, आयतें—51-60; सूरा-15 हिज्र, आयतें—35-11; सूरा-19 मरयम, आयतें—41-50; सूरा-26 शुअरा, आयतें—69-87; सूरा-37 साफ़्फ़ात, आयतें—53-113; सूरा-13 ज़ुख़रुफ़, आयतें—26-29; सूरा-51 ज़ारियात, आयतें—24-34।
27. यानी ख़ुदा के साथ शिर्क (किसी को शरीक करने) और उसकी नाफ़रमानी करने से डरो।
إِنَّمَا تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوۡثَٰنٗا وَتَخۡلُقُونَ إِفۡكًاۚ إِنَّ ٱلَّذِينَ تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِ لَا يَمۡلِكُونَ لَكُمۡ رِزۡقٗا فَٱبۡتَغُواْ عِندَ ٱللَّهِ ٱلرِّزۡقَ وَٱعۡبُدُوهُ وَٱشۡكُرُواْ لَهُۥٓۖ إِلَيۡهِ تُرۡجَعُونَ ۝ 14
(17) तुम अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पूज रहे हो वे तो सिर्फ़ बुत हैं और तुम एक झूठ गढ़ रहे हों।28 हक़ीक़त में अल्लाह के सिवा जिनकी तुम पूजा करते हो वे तुम्हें कोई रोज़ी भी देने का अधिकार नहीं रखते। अल्लाह से रोज़ी माँगो और उसी की बन्दगी करो और उसका शुक्र अदा करो, उसी की तरफ़ तुम पलटाए जानेवाले हो।29
28. यानी तुम ये बुत नहीं गढ़ रहे हो, बल्कि एक झूठ गढ़ रहे हो। इन बुतों का वुजूद ख़ुद एक झूठ है। और फिर तुम्हारे ये अक़ीदे कि ये देवियाँ और देवता हैं, या ख़ुदा के अवतार या उसकी औलाद हैं, या ख़ुदा के क़रीबी और उसके यहाँ सिफ़ारिश करनेवाले हैं, या यह कि इनमें से कोई बीमारी दूर करनेवाला और कोई औलाद देनेवाला और कोई रोज़गार दिलवानेवाला है, ये सब झूठी बातें हैं जो तुम लोगों ने अपने अन्दाज़े और अटकल से गढ़ ली हैं। हक़ीक़त इससे ज़्यादा कुछ नहीं है कि ये सिर्फ़ बुत हैं बेजान, बेबस और बेअसर।
29. इन चन्द जुमलों में हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने बुतपरस्ती के ख़िलाफ़ तमाम मुनासिब दलीलें समेटकर रख दी हैं। किसी को माबूद बनाने के लिए लाज़िमी तौर पर कोई मुनासिब वजह होनी चाहिए। एक मुनासिब वजह यह हो सकती है कि वे अपने आपमें माबूद होने का कोई हक़ रखता हो। दूसरी वजह यह हो सकती है कि वह आदमी का (ख़ालिक़) पैदा करनेवाला हो और आदमी अपने वुजूद के लिए उसका मुहताज हो। तीसरी वजह यह हो सकती है कि वह आदमी की परवरिश का सामान करता हो और उसे रोज़ी यानी ज़िन्दगी गुज़ारने का सामान मुहैया कराता हो। चौथी वजह यह हो सकती है कि आदमी का मुस्तक़बिल (भविष्य) उसकी मेहरबानियों से जुड़ा हो और आदमी को डर हो कि उसकी नाराज़ी मोल लेकर वह अपना अंजाम ख़राब कर लेगा। हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने फ़रमाया कि इन चारों वजहों में से कोई वजह भी बुतपरस्ती के हक़ में नहीं है, बल्कि हर एक ख़ालिस ख़ुदा-परस्ती का तक़ाज़ा करती है। “ये सिर्फ़ बुत हैं” कहकर उन्होंने पहली वजह को ख़त्म कर दिया, क्योंकि जो निरा बुत हो उसको माबूद होने का आख़िर क्या निजी हक़ हासिल हो सकता है। फिर यह कहकर कि “तुम इनके बनानेवाले हो” दूसरी वजह भी ख़त्म कर दी। इसके बाद तीसरी वजह को यह कहकर ख़त्म किया कि वे तुम्हें किसी तरह की कुछ भी रोज़ी नहीं दे सकते। और आख़िरी बात यह कही कि तुम्हें पलटना तो ख़ुदा की तरफ़ है, न कि इन बुतों की तरफ़, इसलिए तुम्हारा अंजाम और तुम्हारी आख़िरत की ज़िन्दगी सँवारना या बिगाड़ना भी इनके बस में नहीं, सिर्फ़ ख़ुदा के बस में है। इस तरह शिर्क को पूरी तरह ग़लत साबित करके हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने यह बात उनपर खोल दी कि जितनी वजहों से भी इनसान किसी को माबूद क़रार दे सकता है वे सब-के-सब एक अल्लाह के सिवा, जिसका कोई शरीक नहीं, किसी की इबादत का तक़ाज़ा नहीं करतीं।
وَإِن تُكَذِّبُواْ فَقَدۡ كَذَّبَ أُمَمٞ مِّن قَبۡلِكُمۡۖ وَمَا عَلَى ٱلرَّسُولِ إِلَّا ٱلۡبَلَٰغُ ٱلۡمُبِينُ ۝ 15
(18) और अगर तुम झुठलाते हो तो तुमसे पहले बहुत-सी क़ौमें झुठला चुकी हैं,30 और रसूल पर साफ़-साफ़ पैग़ाम पहुँचा देने के सिवा कोई ज़िम्मेदारी नहीं है।"
30. यानी अगर तुम तौहीद (एकेश्वरवाद) की मेरी दावत को और इस ख़बर को कि तुम्हें अपने रब की तरफ़ पलटना और अपने कामों का हिसाब देना है, झुठलाते हो तो यह कोई नई बात नहीं है। इतिहास में इससे पहले भी बहुत-से पैग़म्बर (जैसे नूह, हूद, सॉलेह अलैहि० वग़ैरा) यही तालीम लेकर आ चुके हैं और उनकी क़ौमों ने भी उनको इसी तरह झुठलाया है। अब तुम ख़ुद देख लो कि उन्होंने झुठलाकर उन पैग़म्बरों का कुछ बिगाड़ा या अपना अंजाम ख़राब किया।
أَوَلَمۡ يَرَوۡاْ كَيۡفَ يُبۡدِئُ ٱللَّهُ ٱلۡخَلۡقَ ثُمَّ يُعِيدُهُۥٓۚ إِنَّ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرٞ ۝ 16
(19) क्या31 इन लोगों ने कभी देखा ही नहीं है कि अल्लाह किस तरह पैदाइश की शुरुआत करता है, फिर उसे दोहराता है? यक़ीनन यह (दोहराना तो) अल्लाह के लिए बहुत आसान है।32
31. यहाँ से “लहुम अज़ाबुन अलीम” (उनके लिए दर्दनाक सज़ा है) तक बीच में अलग से आ गया एक जुमला है जो हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के क़िस्से का सिलसिला तोड़कर अल्लाह तआला ने मक्का के उन लोगों को ख़िताब (सम्बोधित) करके कहा है जो इस्लाम की तौहीद की तालीम को मानने से इनकार करते थे और कुफ़्र (अधर्म) पर अड़े हुए थे। ऊपर से चली आ रही इस बात से हटकर बीच में आ गया यह जुमला यहाँ इस तरह फ़िट होता है कि मक्का के इस्लाम-मुख़ालिफ़, जिन्हें सबक़ देने के लिए यह क़िस्सा सुनाया जा रहा है, दो बुनियादी गुमराहियों में मुब्तला थे। एक शिर्क और बुत-परस्ती, दूसरी आख़िरत का इनकार। इनमें से पहली गुमराही का रद्द हज़रत इबराहीम (अलैहि०) की उस तक़रीर में आ चुका है जो ऊपर नक़्ल की गई है। अब दूसरी गुमराही के रद्द में ये कुछ जुमले अल्लाह तआला अपनी तरफ़ से कह रहा है, ताकि दोनों का रद्द बात के एक ही सिलसिले में हो जाए।
32. यानी एक तरफ़ अनगिनत चीज़ें अदम (शून्य) से वुजूद में आती हैं, और दूसरी तरफ़ हर क़िस्म के लोगों के मिटने के साथ फिर वैसे ही लोग वुजूद में आते चले जाते हैं। मुशरिक लोग इस बात को मानते थे कि यह सब कुछ इसलिए हो रहा है; क्योंकि अल्लाह चीज़ों को बनाने और पैदा कर देने की सिफ़त और क़ुदरत रखता है। उन्हें इस बात से इनकार न था कि अल्लाह चीज़ों को पैदा करनेवाला है, जिस तरह आज के मुशरिकों को नहीं है। इसलिए उनकी अपनी मानी हुई बात पर यह दलील क़ायम की गई है कि जो ख़ुदा तुम्हारे नज़दीक चीज़ों को अदम से वुजूद में लाता है, और फिर एक ही बार पैदा करके नहीं रह जाता, बल्कि तुम्हारी आँखों के सामने मिट जानेवाली चीज़ों की जगह फिर वैसी ही चीज़ें लगातार वुजूद में लाता चला जाता है, उसके बारे में आख़िर तुमने यह क्यों समझ रखा है कि तुम्हारे मर जाने के बाद वह फिर तुम्हें दोबारा ज़िन्दा करके उठा खड़ा नहीं कर सकता। (और ज़्यादा तशरीह के लिए देखिए— सूरा-27 नम्ल, हाशिया-80)
قُلۡ سِيرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ فَٱنظُرُواْ كَيۡفَ بَدَأَ ٱلۡخَلۡقَۚ ثُمَّ ٱللَّهُ يُنشِئُ ٱلنَّشۡأَةَ ٱلۡأٓخِرَةَۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٞ ۝ 17
(20) इनसे कहो कि ज़मीन में चल-फिरकर देखो कि उसने किस तरह पैदाइश की शुरुआत की है, फिर अल्लाह दूसरी बार भी ज़िन्दगी देगा। यक़ीनन अल्लाह हर चीज़ पर क़ुदरत रखता है।33
33. यानी जब ख़ुदा की कारीगरी से पहली बार की पैदाइश तुम ख़ुद देख रहे हो तो तुम्हें समझना चाहिए कि इसी ख़ुदा की कारीगरी से दूसरी बार भी पैदाइश होगी ऐसा करना उसकी क़ुदरत से बाहर नहीं है और न हो सकता है।
يُعَذِّبُ مَن يَشَآءُ وَيَرۡحَمُ مَن يَشَآءُۖ وَإِلَيۡهِ تُقۡلَبُونَ ۝ 18
(21) जिसे चाहे सज़ा दे और जिसपर चाहे रहम करे, उसी की तरफ़ तुम फेरे जानेवाले हो।
وَمَآ أَنتُم بِمُعۡجِزِينَ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَلَا فِي ٱلسَّمَآءِۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٖ ۝ 19
(22) तुम न ज़मीन में बेबस करनेवाले हो न आसमान में,34 और अल्लाह से बचानेवाला कोई सरपरस्त और मददगार तुम्हारे लिए नहीं है35
34. यानी तुम किसी ऐसी जगह भागकर नहीं जा सकते जहाँ अल्लाह की पकड़ से बच निकलो। चाहे तुम ज़मीन की तहों में कहीं उतर जाओ या आसमान की बुलन्दियों में पहुँच जाओ, बहरहाल तुम्हें हर जगह से पकड़ लाया जाएगा और अपने रब के सामने तुम हाज़िर कर दिए जाओगे। यही बात सूरा-55 रहमान में जिन्नों और इनसानों को ख़िताब करते हुए चैलेंज के अन्दाज़ में कही गई है कि तुम ख़ुदा की ख़ुदाई से अगर निकल सकते हो तो ज़रा निकलकर दिखाओ, उससे निकलने के लिए ज़ोर चाहिए, और वह ज़ोर तुम्हें हासिल नहीं है, इसलिए तुम हरगिज़ नहीं निकल सकते। (आयत-33)
35. यानी न तुम्हारा अपना ज़ोर इतना है कि ख़ुदा की पकड़ से बच जाओ और न तुम्हारा कोई वली और सरपरस्त या मददगार ऐसा ज़ोरावर है कि ख़ुदा के मुक़ाबले में तुम्हें पनाह दे सके और उसकी पकड़ से तुम्हें बचा ले। सारी कायनात में किसी की यह मजाल नहीं है कि जिन लोगों ने कुफ़्र और शिर्क का जुर्म किया है, जिन्होंने ख़ुदा के हुक्मों के आगे झुकने से इनकार किया है, जिन्होंने जुरअत और जसारत (दुस्साहस) के साथ अल्लाह की नाफ़रमानियाँ की हैं। और उसकी ज़मीन में ज़ुल्म और फ़साद के तूफ़ान उठाए हैं, उनका हिमायती बनकर उठ सके और ख़ुदा के अज़ाब के फ़ैसले को उनपर लागू होने से रोक सके, या ख़ुदा की अदालत में यह कहने की हिम्मत कर सके कि ये मेरे हैं, इसलिए जो कुछ भी उन्होंने किया है उसे माफ़ कर दिया जाए।
وَٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ وَلِقَآئِهِۦٓ أُوْلَٰٓئِكَ يَئِسُواْ مِن رَّحۡمَتِي وَأُوْلَٰٓئِكَ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 20
(23) जिन लोगों ने अल्लाह की आयतों का और उससे मुलाक़ात का इनकार किया है वे मेरी रहमत से मायूस हो चुके हैं36 और उनके लिए दर्दनाक सज़ा है।
36. यानी उनका कोई हिस्सा मेरी रहमत में नहीं है। उनके लिए कोई गुंजाइश इस बात की नहीं है कि वे मेरी रहमत में से हिस्सा पाने की उम्मीद रख सकें। ज़ाहिर बात है कि जब उन्होंने अल्लाह की आयतों को मानने से इनकार किया तो ख़ुद-ब-ख़ुद उन वादों से फ़ायदा उठाने का हक़ भी उन्हें न रहा जो अल्लाह तआला ने ईमान लानेवालों से किए हैं। फिर जब उन्होंने आख़िरत का इनकार किया और यह माना ही नहीं कि उन्हें कभी अपने ख़ुदा के सामने पेश होना है तो इसका मतलब यह है कि उन्होंने ख़ुदा की तरफ़ से बख़्श दिए जाने और माफ़ कर दिए जाने के साथ उम्मीद का कोई रिश्ता सिरे से जोड़ा ही नहीं है। इसके बाद जब अपनी उम्मीदों के ख़िलाफ़ वे आख़िरत की दुनिया में आँखें खोलेंगे और अल्लाह की उन निशानियों को भी अपनी आँखों से सच्चा और बरहक़ देख लेंगे जिन्हें वे झुठला चुके थे, तो कोई वजह नहीं कि वहाँ वे अल्लाह की रहमत में से कोई हिस्सा पाने के उम्मीदवार हो सकें।
فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوۡمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُواْ ٱقۡتُلُوهُ أَوۡ حَرِّقُوهُ فَأَنجَىٰهُ ٱللَّهُ مِنَ ٱلنَّارِۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَٰتٖ لِّقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ ۝ 21
(24) फिर37 उसकी क़ौम का जवाब इसके सिवा कुछ न था कि उन्होंने कहा, “क़त्ल कर दो इसे या जला डालो इसको।"38 आख़िरकार अल्लाह ने उसे आग से बचा लिया,39 यक़ीनन इसमें निशानियाँ हैं उन लोगों के लिए जो ईमान लानेवाले हैं।40
37. यहाँ से फिर बात का सिलसिला हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के क़िस्से की तरफ़ मुड़ता है।
38. यानी हज़रत इबराहीम (अलैहि०) की अक़्ल में आनेवाली और मुनासिब दलीलों का कोई जवाब उनके पास न था। उनका जवाब अगर था तो यह कि काट दो उस ज़बान को जो सच बात कहती है और जीने न दो उस शख़्स को जो हमारी ग़लती हमपर खोलता है और हमें उससे बाज़ आने के लिए कहता है। “क़त्ल कर दो या जला डालो” के अलफ़ाज़ से यह बात ज़ाहिर होती है कि पूरी भीड़ इस बात पर तो एक राय थी कि हज़रत इबराहीम (अलैहि०) को मार डाला जाए, अलबत्ता हलाक करने के तरीक़े में इख़तिलाफ़ था। कुछ लोगों की राय यह थी कि क़त्ल किया जाए और कुछ की राय यह थी कि ज़िन्दा जला दिया जाए ताकि हर उस आदमी को सबक़ मिले जिसे आगे कभी हमारी सरज़मीन में सच बोलने का जुनून हो गया हो।
39. इस जुमले से ख़ुद-ब-ख़ुद यह बात निकलती है कि उन लोगों ने आख़िरकार हज़रत इबराहीम (अलैहि०) को जलाने का फ़ैसला किया था और वे आग में फेंक दिए गए थे। यहाँ बात सिर्फ़ इतनी कही गई है कि अल्लाह तआला ने उनको आग से बचा लिया। लेकिन सूरा-21 अम्बिया में साफ़ तौर से कहा गया है कि आग अल्लाह तआला के हुक्म से हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के लिए ठण्डी और नुक़सान न पहुँचानेवाली हो गई— “हमने कहा कि ऐ आग, ठण्डी हो जा और सलामती बन जा इबराहीम पर।” (आयत-69) ज़ाहिर है कि अगर उनको आग में फेंका ही न गया हो तो आग को यह हुक्म देने का कोई मतलब नहीं है कि ‘तू उनपर ठण्डी हो जा और उनके लिए सलामती बन जा’। इससे यह बात साफ़ तौर पर साबित होती है कि तमाम चीज़ों की ख़ासियतों का दारोमदार अल्लाह तआला के हुक्म पर है, और वह जिस वक़्त जिस चीज़ की ख़ासियत को चाहे बदल सकता है। आम क़ायदे के मुताबिक़ आग का अमल यही है कि वह जलाए और हर जल जानेवाली चीज़ उसमें पड़कर जल जाए। लेकिन आग का यह आम क़ायदा उसका अपना क़ायम किया हुआ नहीं है, बल्कि ख़ुदा का क़ायम किया हुआ है। और इस आम क़ायदे ने ख़ुदा को अपना पाबन्द नहीं कर दिया है कि वह उसके ख़िलाफ़ कोई हुक्म न दे सके। वह अपनी आग का मालिक है। किसी वक़्त भी वह उसे हुक्म दे सकता है कि वह जलाने का काम छोड़ दे। किसी वक़्त भी वह अपने एक इशारे से आतिश-कदे (अग्निकुण्ड) को हरे-भरे बाग़ में बदल सकता है। यह ग़ैर-मामूली आम क़ायदे से हटा हुआ वाक़िआ उसके यहाँ रोज़-रोज़ नहीं होता। किसी बड़ी हिकमत और मस्लहत की ख़ातिर ही होता है। लेकिन आम वाक़िआत और क़ायदों को, जिन्हें रोज़ाना देखने के हम आदी हैं, इस बात के लिए दलील हरगिज़ नहीं ठहराया जा सकता कि अल्लाह तआला की क़ुदरत उनसे बंध गई है और आम क़ायदे के ख़िलाफ़ कोई वाक़िआ अल्लाह के हुक्म से भी नहीं हो सकता।
40. यानी ईमानवालों के लिए निशानियाँ हैं इस बात में कि हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने ख़ानदान, क़ौम और देश के मज़हब की पैरवी करने के बजाय इस सच्चे इल्म की पैरवी की जिसके मुताबिक़ उन्हें मालूम हो गया था कि शिर्क झूठ है और तौहीद ही हक़ीक़त है। और इस बात में कि वह क़ौम की हठधर्मी और उसके सख़्त तास्सुब की परवाह किए बिना उसको बातिल (असत्य) से रुक जाने और सच को क़ुबूल कर लेने के लिए लगातार तबलीग़ करते रहे। और इस बात में कि वह आग की भयानक सज़ा बरदाश्त करने के लिए तैयार हो गए मगर हक़ और सच्चाई से मुँह मोड़ने के लिए तैयार न हुए। और इस बात में कि अल्लाह तआला ने अपने प्यारे दोस्त इबराहीम (अलैहि०) तक को आज़माइशों से गुज़ारे बिना न छोड़ा। और इस बात में जबकि हज़रत इबराहीम (अलैहि०) अल्लाह के डाले हुए इम्तिहान से कामयाबी के साथ गुज़र गए तब अल्लाह की मदद उनके लिए आई और ऐसे मोजिज़ाना (चामत्कारिक) तरीक़े से आई कि आग का अलाव उनके लिए ठण्डा कर दिया गया।
وَقَالَ إِنَّمَا ٱتَّخَذۡتُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ أَوۡثَٰنٗا مَّوَدَّةَ بَيۡنِكُمۡ فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَاۖ ثُمَّ يَوۡمَ ٱلۡقِيَٰمَةِ يَكۡفُرُ بَعۡضُكُم بِبَعۡضٖ وَيَلۡعَنُ بَعۡضُكُم بَعۡضٗا وَمَأۡوَىٰكُمُ ٱلنَّارُ وَمَا لَكُم مِّن نَّٰصِرِينَ ۝ 22
(25) और उसने कहा,41 “तुमने दुनिया की ज़िन्दगी में तो अल्लाह को छोड़कर बुतों को अपने बीच मुहब्बत का ज़रिआ बना लिया है42 मगर क़ियामत के दिन तुम एक-दूसरे का इनकार और एक-दूसरे पर लानत करोगे43 और आग तुम्हारा ठिकाना होगी और कोई तुम्हारा मददगार न होगा।”
41. सिलसिला-ए-कलाम से ज़ाहिर होता है कि यह बात आग से सही-सलामत निकल आने के बाद हज़रत इबराहीम (अलैहि०) ने लोगों से कही होगी।
42. यानी तुमने ख़ुदापरस्ती के बजाय बुतपरस्ती की बुनियाद पर अपनी इजतिमाई ज़िन्दगी बना डाली है जो दुनियावी ज़िन्दगी की हद तक तुम्हें एक क़ौमी बन्धन में बाँध सकती है। इसलिए कि यहाँ किसी अक़ीदे पर भी लोग इकट्ठे हो सकते हैं, चाहे सही हो या ग़लत। और एक राय होना और एक साथ हो जाना, चाहे वह कैसे ही ग़लत अक़ीदे पर हो, आपसी दोस्तियों, रिश्तेदारियों, बिरादरियों और सामाजिक, मआशी (आर्थिक) और सियासी ताल्लुक़ात के जुड़ने का ज़रिआ बन सकता है।
43. यानी ग़लत अक़ीदों पर तुम्हारा यह एक साथ जमा होना आख़िरत में बना नहीं रह सकता। वहाँ आपस की मुहब्बत, दोस्ती, मदद, रिश्तेदारी और अक़ीदतमन्दी (श्रद्धा) और मुरीदी के सिर्फ़ वही ताल्लुक़ात बाक़ी रह सकते हैं जो दुनिया में एक ख़ुदा की बन्दगी और नेकी और परहेज़गारी पर क़ायम हुए हों। कुफ़्र और शिर्क और गुमराही और बुराई के रास्ते पर जुड़े हुए सारे रिश्ते वहाँ कट जाएँगे, सारी मुहब्बतें दुश्मनी में बदल जाएँगी, सारी अक़ीदतें (श्रद्धाएँ) नफ़रत में बदल जाएँगी। बेटे और बाप, शौहर और बीवी, पीर और मुरीद तक एक-दूसरे पर लानत भेजेंगे और हर एक अपनी गुमराही की ज़िम्मेदारी दूसरे पर डालकर पुकारेगा कि इस ज़ालिम ने मुझे ख़राब किया। इसलिए इसे दोहरा अज़ाब दिया जाए यह बात क़ुरआन मजीद में कई जगहों पर कही गई है। मसलन सूरा-43 जुख़रुफ़ में फ़रमाया— "दोस्त उस दिन एक-दूसरे के दुश्मन हो जाएँगे, सिवाय परहेज़गारों के।” (आयत-67) सूरा-7 आराफ़ में फ़रमाया— “हर गरोह जब जहन्नम में दाख़िल होगा तो अपने पासवाले गरोह पर लानत करता हुआ दाख़िल होगा, यहाँ तक कि जब सब वहाँ इकट्ठे हो जाएँगे तो हर बादवाला गरोह पहलेवाले गरोह के हक़ में कहेगा कि ऐ हमारे रब, ये लोग थे जिन्होंने हमें गुमराह किया, इसलिए इन्हें आग का दोहरा अजाब दे।" (आयत-38) और सूरा-33 अहज़ाब में फ़रमाया— “और वे कहेंगे, ऐ हमारे रब, हमने अपने सरदारों और बड़ों का हुक्म माना और उन्होंने हमको राह से भटका दिया, हमारे रब, तू इन्हें दोहरी सज़ा दे और इनपर सख़्त लानत कर।” (आयतें—67-68)
۞فَـَٔامَنَ لَهُۥ لُوطٞۘ وَقَالَ إِنِّي مُهَاجِرٌ إِلَىٰ رَبِّيٓۖ إِنَّهُۥ هُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 23
(26) उस वक़्त लूत ने उसको माना।44 और इबराहीम ने कहा, “मैं अपने रब की तरफ़ हिजरत करता हूँ,45 वह ज़बरदस्त है और हिकमतवाला है।”46
44. बात के सिलसिले से ज़ाहिर होता है कि जब हज़रत इबराहीम (अलैहि०) आग से निकल आए और उन्होंने ऊपर के जुमले कहे, उस वक़्त सारी भीड़ में सिर्फ़ एक लूत (अलैहि०) थे जिन्होंने आगे बढ़कर उनको मानने और उनकी पैरवी करने का एलान किया। हो सकता है कि इस मौक़े पर दूसरे बहुत-से लोग भी अपने दिल में हज़रत इबराहीम (अलैहि०) की सच्चाई को मान गए हों। लेकिन पूरी क़ौम और हुकूमत की तरफ़ से इबराहीम (अलैहि०) के दीन के ख़िलाफ़ जिस ग़ज़बनाक जज़बे का इज़हार उस वक़्त सबकी आँखों के सामने हुआ था, उसे देखते हुए कोई दूसरा आदमी ऐसे ख़तरनाक हक़ (सत्य) को मानने और उसका साथ देने की जुरअत (साहस) न कर सका। यह ख़ुशनसीबी सिर्फ़ एक आदमी के हिस्से में आई और वे हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के भतीजे हज़रत लूत (अलैहि०) थे जिन्होंने आख़िरकार हिजरत में भी अपने चचा और चची (हज़रत सारा) का साथ दिया। यहाँ एक शक पैदा होता है जिसे दूर कर देना ज़रूरी है। एक शख़्स सवाल कर सकता है कि क्या इस घटना से पहले हज़रत लूत (अलैहि०) कुफ़्र और शिर्क करते थे और आग से हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के सही-सलामत निकल आने का मोजिज़ा देखने के बाद उन्हें ईमान की नेमत मिल पाई? अगर यह बात है तो क्या नुबूवत (पैग़म्बरी) का मंसब कोई ऐसा शख़्स भी पा सकता है जो पहले मुशरिक रह चुका हो? इसका जवाब यह है कि क़ुरआन ने यहाँ “फ़आ-म-न लहू लूतुन” (तो लूत ने उसको माना) के अलफ़ाज़ इस्तेमाल किए हैं जिनसे यह ज़रूरी नहीं हो जाता कि उससे पहले हज़रत लूत (अलैहि०) सारे जहान के ख़ुदा को न मानते हों, या उसके साथ दूसरे माबूदों को शरीक करते हों, बल्कि इनसे सिर्फ़ यह ज़ाहिर होता है कि इस वाक़िए के बाद उन्होंने हज़रत इबराहीम (अलैहि०) की रिसालत (पैग़म्बरी) को सच्चा मान लिया और उनकी पैरवी अपना ली। अरबी ज़बान में 'ईमान' के साथ जब हर्फ़ 'लाम' का सिला (जोड़) आता हो तो उसका मतलब किसी शख़्स की बात मानना और उसकी फ़रमाँबरदारी करना होता है। मुमकिन है कि हज़रत लूत (अलैहि०) उस वक़्त एक नई उम्र के लड़के ही हों और अपने होश में उनको पहली बार इस मौक़े पर ही अपने चचा की तालीम के बारे में जानने और उनकी पैग़म्बरी से आगाह होने का मौक़ा मिला हो।
45. यानी अपने रब की ख़ातिर देश छोड़कर निकलता हूँ। अब जहाँ मेरा रब ले जाएगा, वहाँ चला जाऊँगा।
46. यानी वह मेरी हिमायत और हिफ़ाज़त करने की क़ुदरत रखता है और मेरे हक़ में उसका जो फ़ैसला भी होगा उसमें ज़रूर कोई हिकमत होगी।
وَوَهَبۡنَا لَهُۥٓ إِسۡحَٰقَ وَيَعۡقُوبَ وَجَعَلۡنَا فِي ذُرِّيَّتِهِ ٱلنُّبُوَّةَ وَٱلۡكِتَٰبَ وَءَاتَيۡنَٰهُ أَجۡرَهُۥ فِي ٱلدُّنۡيَاۖ وَإِنَّهُۥ فِي ٱلۡأٓخِرَةِ لَمِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ ۝ 24
(27) और हमने उसे इसहाक़ और याक़ूब (जैसी औलाद) दी47 और उसकी नस्ल में नुबूवत और किताब रख दी,48 और उसे दुनिया में उसका बदला दिया और आख़िरत में वह यक़ीनन नेक लोगों में से होगा।49
47. हज़रत इसहाक़ (अलैहि०) बेटे थे और हज़रत याक़ूब (अलैहि०) पोते। यहाँ हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के दूसरे बेटों का ज़िक्र इसलिए नहीं किया गया है कि इबराहीम (अलैहि०) की औलाद की मदयानी शाख़ में सिर्फ़ हज़रत शुऐब (अलैहि०) नबी बनाए गए और इसमाईली शाख़ में हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) तक ढाई हज़ार साल की मुद्दत में कोई नबी नहीं आया। इसके बरख़िलाफ़ नुबूवत (पैग़म्बरी) और किताब की नेमत हज़रत ईसा (अलैहि०) तक लगातार उस शाख़ को दी जाती रही जो हज़रत इसहाक़ (अलैहि०) से चली थी।
48. इसमें वे तमाम पैग़म्बर आ गए जो इबराहीमी नस्ल की सब शाख़ों में भेजे गए हैं।
49. बयान करने का मक़सद यह है कि बाबिल के वे हुक्मराँ और मज़हबी गुरु और पुरोहित जिन्होंने इबराहीम (अलैहि०) की दावत को नीचा दिखाना चाहा था, और उसके वे मुशरिक निवासी जिन्होंने आँखें बन्द करके उन ज़ालिमों की पैरवी की थी, वे तो दुनिया से मिट गए और ऐसे मिटे कि आज दुनिया में कहीं उनका नामो-निशान तक बाक़ी नहीं। मगर वह शख़्स जिसे अल्लाह का कलिमा बुलन्द करने के जुर्म में उन लोगों ने जलाकर राख कर देना चाहा था, और जिसे आख़िरकार बे-सरो-सामानी के हाल में वतन से निकल जाना पड़ा था, उसको अल्लाह तआला ने यह कामयाबी दी कि चार हज़ार साल से दुनिया में उसका नाम रौशन है और क़ियामत तक रहेगा। दुनिया के तमाम मुसलमान, ईसाई और यहूदी सारे जहानों के उस दोस्त (हज़रत इबराहीम अलैहि०) को एकमत होकर अपना पेशवा मानते हैं। दुनिया को उन चालीस सदियों में जो कुछ भी हिदायत की रौशनी मिली है उसी एक इनसान और उसकी पाकीज़ा औलाद की बदौलत मिली है। आख़िरत में जो बड़ा इनाम उसको मिलेगा वह तो मिलेगा ही, इस दुनिया में भी उसने वह इज़्ज़त पाई जो दुनिया हासिल करने के पीछे जान खपानेवालों में से किसी को आज तक नसीब नहीं हुई।
وَلُوطًا إِذۡ قَالَ لِقَوۡمِهِۦٓ إِنَّكُمۡ لَتَأۡتُونَ ٱلۡفَٰحِشَةَ مَا سَبَقَكُم بِهَا مِنۡ أَحَدٖ مِّنَ ٱلۡعَٰلَمِينَ ۝ 25
(28) और हमने लूत को भेजा50 जबकि उसने अपनी क़ौम से कहा, “तुम तो वह गन्दा काम करते हो जो तुमसे पहले दुनियावालों में से किसी ने नहीं किया है।
50. लूत (अलैहि०) का क़िस्सा क़ुरआन में कुछ फ़र्क़ के साथ कई जगहों पर आया है। देखिए— सूरा-7 आराफ़, आयतें—80-84; सूरा-11 हूद, आयतें—69-83; सूरा-15 हिज्र, आयतें—5-79;सूरा-21 अम्बिया, आयतें—71-75; सूरा-26 शुअरा, आयतें—160-175;सूरा-27 नम्ल, आयतें—54-58; सूरा-37 साफ़्फ़ात, आयतें—133-138; सूरा-54 क़मर, आयतें—38-40।
أَئِنَّكُمۡ لَتَأۡتُونَ ٱلرِّجَالَ وَتَقۡطَعُونَ ٱلسَّبِيلَ وَتَأۡتُونَ فِي نَادِيكُمُ ٱلۡمُنكَرَۖ فَمَا كَانَ جَوَابَ قَوۡمِهِۦٓ إِلَّآ أَن قَالُواْ ٱئۡتِنَا بِعَذَابِ ٱللَّهِ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ ۝ 26
(29) क्या तुम्हारा हाल यह है कि मर्दों के पास जाते हो,51 और रहज़नी (बटमारी) करते हो और अपनी मजलिसों में बुरे काम करते हो?"52 फिर कोई जवाब उसकी क़ौम के पास इसके सिवा न था कि उन्होंने कहा, “ले आ अल्लाह का अज़ाब अगर तू सच्चा है।”
51. यानी उनसे जिंसी अमल (यौनाचार) करते हो, जैसा कि सूरा-7 आराफ़ में है— “तुम मन की ख़ाहिश पूरी करने के लिए औरतों को छोड़कर मर्दों के पास जाते हो।” (आयत-81)
52. यानी यह गन्दा (अश्लील) काम छिपकर भी नहीं करते, बल्कि खुल्लम-खुल्ला अपनी मजलिसों में एक-दूसरे के सामने करते हो। यही बात सूरा-27 नम्ल में कही गई है— “क्या तुम ऐसे बिगड़ गए हो कि देखनेवाली आँखों के सामने बेहूदा काम करते हो।” (आयत-54)
قَالَ رَبِّ ٱنصُرۡنِي عَلَى ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡمُفۡسِدِينَ ۝ 27
(30) लूत ने कहा, “ऐ मेरे रब, इन बिगाड़ फैलानेवाले लोगों के मुक़ाबले में मेरी मदद कर।"
وَلَمَّا جَآءَتۡ رُسُلُنَآ إِبۡرَٰهِيمَ بِٱلۡبُشۡرَىٰ قَالُوٓاْ إِنَّا مُهۡلِكُوٓاْ أَهۡلِ هَٰذِهِ ٱلۡقَرۡيَةِۖ إِنَّ أَهۡلَهَا كَانُواْ ظَٰلِمِينَ ۝ 28
(31) और जब हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) इबराहीम के पास ख़ुशख़बरी लेकर पहुँचे53 तो उन्होंने उससे कहा, “हम इस बस्ती के लोगों को हलाक करनेवाले हैं,54 इसके लोग सख़्त ज़ालिम हो चुके हैं।”
53. सूरा-11 हूद और सूरा-15 हिज्र में इसकी तफ़सील यह बयान हुई है कि जो फ़रिश्ते लूत (अलैहि०) की क़ौम पर अज़ाब नाज़िल करने के लिए भेजे गए थे वे पहले हज़रत इबराहीम (अलैहि०) के पास हाज़िर हुए और उन्होंने उनको हज़रत इसहाक़ (अलैहि०) की और उनके बाद हज़रत याक़ूब (अलैहि०) की पैदाइश की ख़ुशख़बरी दी, फिर यह बताया कि हमें लूत (अलैहि०) की क़ौम को तबाह करने के लिए भेजा गया है।
54. 'इस बस्ती' का इशारा लूत (अलैहि०) की क़ौम के इलाक़े की तरफ़ है। हज़रत इबराहीम (अलैहि०) उस वक़्त फ़िलस्तीन के शहर हबरून (मौजूदा 'अल-ख़लील') में रहते थे। इस शहर के दक्षिण-पूर्व में कुछ मील के फ़ासले पर मृतसागर (Dead Sea) का वह हिस्सा वाक़े (स्थित) है जहाँ पहले लूत (अलैहि०) की क़ौम आबाद थी और अब जिसपर सागर का पानी फैला हुआ है। यह इलाक़ा ढलान में क़ायम है और हबरून की ऊँची पहाड़ियों पर से साफ़ नज़र आता है। इसी लिए फ़रिश्तों ने इसकी तरफ़ इशारा करके हज़रत इबराहीम (अलैहि०) से कहा कि “हम इस बस्ती को हलाक करनेवाले हैं।” (देखिए— सूरा-26 शुअरा, हाशिया-114)
قَالَ إِنَّ فِيهَا لُوطٗاۚ قَالُواْ نَحۡنُ أَعۡلَمُ بِمَن فِيهَاۖ لَنُنَجِّيَنَّهُۥ وَأَهۡلَهُۥٓ إِلَّا ٱمۡرَأَتَهُۥ كَانَتۡ مِنَ ٱلۡغَٰبِرِينَ ۝ 29
(32) इबराहीम ने कहा, “वहाँ तो लूत मौजूद है।"55 उन्होने कहा, “हम ख़ूब जानते हैं कि वहाँ कौन-कौन है। हम उसे, उसकी बीवी के सिवा, उसके बाक़ी सब घरवालों को बचा लेंगे।” उसकी बीवी पीछे रह जानेवालों में से थी।56
55. सूरा-11 हूद में इस क़िस्से का शुरुआती हिस्सा यह बयान किया गया है कि सबसे पहले तो हज़रत इबराहीम (अलैहि०) फ़रिश्तों को इनसानी शक्ल में देखकर ही घबरा गए, क्योंकि इस शक्ल में फ़रिश्तों का आना किसी ख़तरनाक मुहिम की शुरुआत हुआ करती है। फिर जब उन्होंने आपको ख़ुशख़बरी दी और आपकी घबराहट दूर हो गई और आपको मालूम हुआ कि यह मुहिम लूत (अलैहि०) की क़ौम की तरफ़ जा रही है तो आप इस क़ौम के लिए बड़े इसरार (आग्रह) के साथ रहम की दरख़ास्त करने लगे। “फिर जब इबराहीम की घबराहट दूर हो गई और उसे ख़ुशख़बरी भी मिली तो वह लूत की क़ौम बारे में हमसे झगड़ने लगा। हक़ीक़त में इबराहीम बड़ा कुशादादिल (उदार) और नर्मदिल आदमी था और हर हाल में हमारी तरफ़ रुजू करता था।” (क़ुरआन, सूरा-11 हूद, आयतें—74-76) मगर यह दरख़ास्त क़ुबूल न हुई और फ़रमाया गया कि इस मामले में अब कुछ न कहो, तुम्हारे रब का फ़ैसला हो चुका है और यह अज़ाब अब टलनेवाला नहीं है— “ऐ इबराहीम, यह (ज़िद) छोड़ दो। तुम्हारे रब का हुक्म हो चुका है और अब उन लोगों पर वह अज़ाब आकर रहेगा जो किसी के फेरे नहीं फिर सकता।" (सूरा-11 हूद, आयत-76) इस जवाब से जब हज़रत इबराहीम (अलैहि०) को यह उम्मीद बाक़ी न रही कि लूत (अलैहि०) की क़ौम की मुहलत में कोई इज़ाफ़ा हो सकेगा, तब उन्हें हज़रत लूत (अलैहि०) की फ़िक्र हुई और उन्होंने वह बात कही कि जो यहाँ नक़्ल की गई है कि “वहाँ तो लूत मौजूद है।” यानी यह अज़ाब अगर लूत (अलैहि०) की मौजूदगी में आया तो वे और उनके घरवाले उससे कैसे महफ़ूज़ रहेंगे।
56. इस औरत के बारे में सूरा-66 तहरीम (आयत-10) में बताया गया है कि यह हज़रत लूत (अलैहि०) की वफ़ादार न थी, इसी वजह से इसके हक़ में यह फ़ैसला किया गया कि वह भी, एक नबी की बीवी होने के बावजूद, अज़ाब में मुब्तला कर दी जाए। ज़्यादा इमकान इस बात का है कि हज़रत लूत (अलैहि०) हिजरत के बाद जब उर्दुन (जॉर्डन) के इलाक़े में आकर आबाद हुए होंगे तो उन्होंने उसी क़ौम में शादी कर ली होगी। लेकिन उनके साथ में एक उम्र गुज़ार देने के बाद भी यह औरत ईमान न लाई और उसकी हमदर्दियाँ और दिलचस्पियाँ अपनी क़ौम ही के साथ जुड़ी रहीं। चूँकि अल्लाह तआला के यहाँ रिश्तेदारियाँ और बिरादरियाँ कोई चीज़ नहीं हैं, हर शख़्स के साथ मामला उसके अपने ईमान और अख़लाक़ की बुनियाद पर होता है, इसलिए पैग़म्बर की बीवी होना उसके लिए कुछ भी फ़ायदेमन्द न हो सका और उसका अंजाम अपने शौहर के साथ होने के बजाय अपनी उस क़ौम के साथ हुआ जिसके साथ उसने अपना दीन और अख़लाक़ जोड़ रखा था।
وَلَمَّآ أَن جَآءَتۡ رُسُلُنَا لُوطٗا سِيٓءَ بِهِمۡ وَضَاقَ بِهِمۡ ذَرۡعٗاۖ وَقَالُواْ لَا تَخَفۡ وَلَا تَحۡزَنۡ إِنَّا مُنَجُّوكَ وَأَهۡلَكَ إِلَّا ٱمۡرَأَتَكَ كَانَتۡ مِنَ ٱلۡغَٰبِرِينَ ۝ 30
(33) फिर जब हमारे भेजे हुए (फ़रिश्ते) लूत के पास पहुँचे तो उनके आने पर वह सख़्त परेशान और दिल-तंग हुआ।57 उन्होंने कहा, “न डरो और न रंज करो।58 हम तुम्हें और तुम्हारे घरवालों को बचा लेंगे, सिवाय तुम्हारी बीवी के जो पीछे रह जानेवालों में से है।
57. इस परेशानी और घबराहट की वजह यह थी कि फ़रिश्ते बहुत ख़ूबसूरत नई उम्र के लड़कों का शक्ल में आए थे। हज़रत लूत (अलैहि०) अपनी क़ौम के अख़लाक़ जानते थे, इसलिए उनके आते ही वे परेशान हो गए कि मैं अपने इन मेहमानों को ठहराऊँ तो इस बदकिरदार क़ौम से उनको बचाना मुश्किल है, और न ठहराऊँ तो यह बड़ी बेमुरव्वती (रूखापन) है जिसे शराफ़त गवारा नहीं करती। इसके अलावा यह अन्देशा भी है कि अगर मैं इन मुसाफ़िरों को अपनी पनाह में न लूँगा तो रात इन्हें कहीं और गुज़ारनी पड़ेगी और इसका मतलब यह होगा कि मानो मैंने ख़ुद उन्हें भेड़ियों के हवाले किया। इसके बाद का क़िस्सा यहाँ बयान नहीं किया गया है। इसकी तफ़सीलात सूरा-11 हूद; सूरा-15 हिज्र और सूरा-54 क़मर में बयान हुई हैं कि उन लड़कों के आने की ख़बर सुनकर शहर के बहुत-से लोग हज़रत लूत (अलैहि०) के मकान पर इकट्ठे होकर आ गए और ज़िद करने लगे कि वे अपने इन मेहमानों को बदकारी के लिए उनके हवाले कर दें।
58. यानी हमारे मामले में न इस बात से डरो कि ये लोग हमारा कुछ बिगाड़ सकेंगे और न इस बात के लिए फ़िक्रमन्द हो कि हमें उनसे कैसे बचाया जाए। यही मौक़ा था जब फ़रिश्तों ने हज़रत लूत (अलैहि०) पर यह राज़ खोला कि वे इनसान नहीं बल्कि फ़रिश्ते हैं जिन्हें इस क़ौम पर अज़ाब नाज़िल करने के लिए भेजा गया है। सूरा-11 हूद में यह बात बयान की गई है कि जब लोग हज़रत लूत (अलैहि०) के घर में घुसे चले आ रहे थे और उन्होंने महसूस किया कि अब वे किसी तरह भी अपने मेहमानों को उनसे नहीं बचा सकते तो वे परेशान होकर चीख़ उठे कि “काश, मेरे पास तुम्हें ठीक कर देने की ताक़त होती या किसी ज़ोरावर की हिमायत मैं पा सकता।” उस वक़्त फ़रिश्तों ने कहा, “ऐ लूत, हम तुम्हारे रब के भेजे हुए फ़रिश्ते हैं, ये तुम तक हरगिज़ नहीं पहुँच सकते।” (आयतें—80-81)
إِنَّا مُنزِلُونَ عَلَىٰٓ أَهۡلِ هَٰذِهِ ٱلۡقَرۡيَةِ رِجۡزٗا مِّنَ ٱلسَّمَآءِ بِمَا كَانُواْ يَفۡسُقُونَ ۝ 31
(34) हम इस बस्ती के लोगों पर आसमान से अज़ाब उतारनेवाले हैं उस फ़िस्क़ (नाफ़रमानी) की बदौलत जो ये करते रहे हैं।”
وَلَقَد تَّرَكۡنَا مِنۡهَآ ءَايَةَۢ بَيِّنَةٗ لِّقَوۡمٖ يَعۡقِلُونَ ۝ 32
(35) और हमने उस बस्ती की एक खुली निशानी छोड़ दी है59 उन लोगों के लिए जो अक़्ल से काम लेते हैं।60
59. इस खुली निशानी से मुराद है मृत-सागर जिसे लूत-सागर भी कहा जाता है। क़ुरआन मजीद में कई जगहों पर मक्का के ग़ैर-मुस्लिमों से कहा गया है कि उस ज़ालिम क़ौम पर उसके करतूतों की वजह से जो अज़ाब आया था, उसकी एक निशानी आज भी आम शाहराह (राजमार्ग) पर मौजूद है जिसे तुम शाम (सीरिया) की तरफ़ अपने तिजारती सफ़रों में जाते हुए रात-दिन देखते हो। (देखिए— सूरा-15 हिज्र, आयत-76; सूरा-37 साफ़्फ़ात, आयतें—137-138) मौजूदा ज़माने में यह बात लगभग यक़ीन के साथ मानी जा रही है कि मृत-सागर का दक्षिणी भाग एक भयानक भूकम्प की वजह से ज़मीन में धँस जाने की बदौलत वुजूद में आया है और इसी धँसे हुए हिस्से में लूत (अलैहि०) की क़ौम का शहर सदूम (Sadom) था। इस हिस्से में पानी के नीचे कुछ डूबी हुई बस्तियों के आसार भी पाए जाते हैं। हाल में गोताख़ोरी के नए औज़ारों (आधुनिक उपकरणों) की मदद से यह कोशिश शुरू हुई है कि कुछ लोग नीचे जाकर उन निशानियों की खोज करें। लेकिन अभी तक इन कोशिशों के नतीजे सामने नहीं आए हैं। (और ज़्यादा तशरीह के लिए देखिए— सूरा-26 शुअरा, हाशिया-114)
60. शरीअत के मुताबिक़ हमजिंसियत (समलैंगिकता) की सज़ा के लिए देखिए— तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-7 आराफ़, हाशिया-68।
وَإِلَىٰ مَدۡيَنَ أَخَاهُمۡ شُعَيۡبٗا فَقَالَ يَٰقَوۡمِ ٱعۡبُدُواْ ٱللَّهَ وَٱرۡجُواْ ٱلۡيَوۡمَ ٱلۡأٓخِرَ وَلَا تَعۡثَوۡاْ فِي ٱلۡأَرۡضِ مُفۡسِدِينَ ۝ 33
(36) और मदयन की तरफ़ हमने उनके भाई शुऐब को भेजा।61 उसने कहा, “ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की बन्दगी करो और आख़िरत के दिन के उम्मीदवार रहो।62
61. यह क़िस्सा क़ुरआन में कुछ फ़र्क़ के साथ कई जगहों पर आया है। देखिए— सूरा-7 आराफ़, आयतें—85-93; सूरा-11 हूद, आयतें—84-95; सूरा-26 शुअरा, आयतें—176-191।
62. इसके दो मतलब हो सकते हैं। एक यह कि आख़िरत के आने की उम्मीद रखो, यह न समझो कि जो कुछ है बस यही दुनियावी ज़िन्दगी है और कोई दूसरी ज़िन्दगी नहीं है जिसमें तुम्हें अपने कामों का हिसाब देना और इनाम और सज़ा पाना हो। दूसरा मतलब यह है कि वह काम करो जिससे तुम आख्रिरत में अंजाम बेहतर होने की उम्मीद कर सको।
فَكَذَّبُوهُ فَأَخَذَتۡهُمُ ٱلرَّجۡفَةُ فَأَصۡبَحُواْ فِي دَارِهِمۡ جَٰثِمِينَ ۝ 34
(37) मगर उन्होंने उसे झुठला दिया।63 आख़िरकार एक सख़्त ज़लज़ले (भूकम्प) ने उन्हें आ लिया और वे अपने घर64 में पड़े-के-पड़े रह गए।
63. यानी इस बात को न माना कि हज़रत शुऐब (अलैहि०) अल्लाह के रसूल हैं, और यह तालीम जो वे दे रहे हैं यह अल्लाह तआला की तरफ़ से है और इसको न मानने का नतीजा उन्हें अल्लाह के अज़ाब की शक्ल में भुगतना होगा।
64. घर से मुराद वह पूरा इलाक़ा है जिसमें यह क़ौम रहती थी। ज़ाहिर है कि जब एक पूरी क़ौम का ज़िक्र हो रहा हो तो उसका घर उसका देश ही हो सकता है।
وَعَادٗا وَثَمُودَاْ وَقَد تَّبَيَّنَ لَكُم مِّن مَّسَٰكِنِهِمۡۖ وَزَيَّنَ لَهُمُ ٱلشَّيۡطَٰنُ أَعۡمَٰلَهُمۡ فَصَدَّهُمۡ عَنِ ٱلسَّبِيلِ وَكَانُواْ مُسۡتَبۡصِرِينَ ۝ 35
(38) और आद और समूद को हमने हलाक किया, तुम वे जगहें देख चुके हो जहाँ वे रहते थे।65 उनके आमाल को शैतान ने उनके लिए लुभावना बना दिया और उन्हें सीधी राह से भटका दिया, हालाँकि वे समझ-बूझ रखते थे।66
65. अरब के जिन इलाक़ों में ये दोनों क़ौमें आबाद थीं उनसे अरब का बच्चा-बच्चा वाक़िफ़ था। दक्षिणी अरब का पूरा इलाक़ा जो अब अहक़ाफ़, यमन और हज़रेमौत के नाम से जाना जाता है, पुराने ज़माने में आद का ठिकाना था और अरबवाले उसको जानते थे। हिजाज़ के उत्तरी हिस्से में राबिग़ से अक़बा तक और मदीना और ख़ैबर से तैमा और तबूक तक का सारा इलाक़ा आज भी समूद की निशानियों से भरा हुआ है और क़ुरआन उतरने के ज़माने में ये निशानियाँ मौजूदा हालत से कुछ ज़्यादा ही नुमायाँ होंगी।
66. यानी जाहिल और नादान न थे। अपने-अपने वक़्त के बड़े तरक़्क़ी किए हुए लोग थे। और अपनी दुनिया के मामले निबटाने में पूरी होशियारी और समझदारी का सुबूत देते थे। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि शैतान उनकी आँखों पर पट्टी बाँधकर और उनकी मति मारकर उन्हें अपने रास्ते पर खींच ले गया। नहीं, उन्होंने ख़ूब सोच-समझकर आँखों देखते शैतान के पेश किए हुए उस रास्ते को अपनाया जिसमें उन्हें बड़ी लज़्ज़तें और फ़ायदे नज़र आते थे और पैग़म्बरों के पेश किए हुए उस रास्ते को छोड़ दिया जो उन्हें रूखा और बेमज़ा और अख़लाक़ी पाबन्दियों की वजह से तकलीफ़देह नज़र आता था।
وَقَٰرُونَ وَفِرۡعَوۡنَ وَهَٰمَٰنَۖ وَلَقَدۡ جَآءَهُم مُّوسَىٰ بِٱلۡبَيِّنَٰتِ فَٱسۡتَكۡبَرُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ وَمَا كَانُواْ سَٰبِقِينَ ۝ 36
(39) और क़ारून और फ़िरऔन और हामान को हमने हलाक किया। मूसा उनके पास खुली निशानियाँ लेकर आया, मगर उन्होंने ज़मीन में अपनी बड़ाई का घमण्ड किया, हालाँकि वे आगे निकल जानेवाले न थे।67
67. यानी भागकर अल्लाह की पकड़ से बच निकलनेवाले न थे। अल्लाह की तदबीरों को नाकाम कर देने की ताक़त न रखते थे।
فَكُلًّا أَخَذۡنَا بِذَنۢبِهِۦۖ فَمِنۡهُم مَّنۡ أَرۡسَلۡنَا عَلَيۡهِ حَاصِبٗا وَمِنۡهُم مَّنۡ أَخَذَتۡهُ ٱلصَّيۡحَةُ وَمِنۡهُم مَّنۡ خَسَفۡنَا بِهِ ٱلۡأَرۡضَ وَمِنۡهُم مَّنۡ أَغۡرَقۡنَاۚ وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظۡلِمَهُمۡ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ۝ 37
(40) आख़िरकार हर एक को हमने उसके गुनाह में पकड़ा, फिर उनम से किसी पर हमने पथराव करनेवाली हवा भेजी,68 और किसी को एक ज़बरदस्त धमाके ने आ लिया,69 और किसी को हमने ज़मीन में धँसा दिया,70 और किसी को डुबो दिया71 अल्लाह उनपर ज़ुल्म करनेवाला न था, मगर वे ख़ुद ही अपने ऊपर ज़ुल्म कर रहे थे।72
68. यानी आद, जिनपर लगातार सात रात और आठ दिन तक सख़्त हवा का तूफ़ान बरपा रहा। (सूरा-69 हाक़्क़ा, आयत-7)
69. यानी समूद।
70. यानी क़ारून।
71. फ़िरऔन और हामान।
72. ये तमाम क़िस्से जो यहाँ तक सुनाए गए हैं, उनका रुख़ दो तरफ़ है। एक तरफ़ ये ईमानवालों को सुनाए गए हैं ताकि वे हिम्मत न हारें और मायूस न हों और मुश्किलों और मुसीबतों के सख़्त-से-सख़्त तूफ़ान में भी सब्र और जमाव के साथ हक़ और सच्चाई का झण्डा बुलन्द किए रखें, और अल्लाह तआला पर भरोसा रखें कि आख़िरकार उसकी मदद ज़रूर आएगी और वह ज़ालिमों को नीचा दिखाएगा और हक़ के कलिमे को सरबुलन्द कर देगा। दूसरी तरफ़ ये उन ज़ालिमों को भी सुनाए गए हैं जो अपने नज़दीक तहरीके-इस्लामी (इस्लामी आन्दोलन) को बिलकुल ख़त्म कर देने पर तुले हुए थे। उनको ख़बरदार किया गया है कि तुम ख़ुदा की नरमी, बर्दाश्त और अनदेखा करने का ग़लत मतलब ले रहे हो। तुमने ख़ुदा की ख़ुदाई को अंधेर नगरी समझ लिया है। तुम्हें अगर बग़ावत और सरकशी और ज़ुल्मो-सितम और बुरे कामों पर अभी तक पकड़ा नहीं गया है और संभलने के लिए सिर्फ़ मेहरबानी के लिए लम्बी मुद्दत दी गई है तो तुम अपनी जगह यह समझ बैठे हो कि यहाँ कोई इनसाफ़ करनेवाली ताक़त सिरे से है ही नहीं और इस ज़मीन पर जिसका जो कुछ जी चाहे बे-रोक-टोक किए जा सकता है। यह ग़लतफ़हमी आख़िरकार तुम्हें जिस अंजाम तक पहुँचाकर रहेगी वह वही अंजाम है जो तुमसे पहले नूह (अलैहि०) की क़ौम, लूत (अलैहि०) को क़ौम और शुऐब (अलैहि०) की क़ौम देख चुकी है, जिसका आद और समूद सामना कर चुके हैं, और जिसे क़ारून और फ़िरऔन ने देखा है।
مَثَلُ ٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ أَوۡلِيَآءَ كَمَثَلِ ٱلۡعَنكَبُوتِ ٱتَّخَذَتۡ بَيۡتٗاۖ وَإِنَّ أَوۡهَنَ ٱلۡبُيُوتِ لَبَيۡتُ ٱلۡعَنكَبُوتِۚ لَوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ ۝ 38
(41) जिन लोगों ने अल्लाह को छोड़कर दूसरे सरपरस्त बना लिए हैं, उनकी मिसाल मकड़ी जैसी है जो अपना एक घर बनाती है और सब घरों से ज़्यादा कमज़ोर पर मकड़ी का घर ही होता है। काश, ये लोग इल्म रखते?73
73. ऊपर जितनी क़ौमों का ज़िक्र किया गया है वे सब शिर्क में मुल्तला थीं और अपने माबूदों के बारे में उनका अक़ीदा यह था कि ये हमारे तरफ़दार, मददगार और सरपरस्त (Guardians) हैं, हमारी क़िस्मतें बनाने और बिगाड़ने की क़ुदरत रखते हैं, इनको पूजा-पाठ करके और इन्हें भेंट-चढ़ावे देकर जब हम इनकी सरपरस्ती हासिल कर लेंगे तो ये हमारे काम बनाएँगे और हमको हर तरह की आफ़तों से बचाए रखेंगे, लेकिन जैसा कि ऊपर के तारीख़ी वाक़िआत (ऐतिहासिक घटनाओं) में दिखाया गया है, उनके ये तमाम अक़ीदे (धारणाएँ) और अंधविश्वास उस वक़्त बिलकुल बेबुनियाद साबित हुए जब अल्लाह तआला की तरफ़ से उनकी बरबादी का फ़ैसला कर दिया गया। उस वक़्त कोई देवता, कोई अवतार, कोई वली, कोई रूह और कोई जिन्न या फ़रिश्ता, जिसे वे पूजते थे, उनकी मदद को न आया और अपनी झूठी उम्मीदों की नाकामी पर पछतावे से हाथ मलते हुए वे सब मिट्टी में मिल गए। इन वाक़िआत को बयान करने के बाद अब अल्लाह तआला मुशरिकों को ख़बरदार कर रहा है कि कायनात के हक़ीक़ी मालिक और बादशाह को छोड़कर बिलकुल बेइख़्तियार-बेबस बन्दों और सरासर ख़याली माबूदों के भरोसे पर जो उम्मीदों का घरौंदा तुमने बना रखा है उसकी हक़ीक़त मकड़ी के जाले से ज़्यादा कुछ नहीं है। जिस तरह मकड़ी का जाला एक उँगली की चोट भी सहन नहीं कर सकता, उसी तरह तुम्हारी उम्मीदों का यह घरौंदा भी ख़ुदा की तदबीर से पहला टकराव होते ही टुकड़े-टुकड़े होकर रह जाएगा। यह सिर्फ़ जहालत का करिश्मा है कि तुम अंधविश्वास के इस चक्कर में पड़े हुए हो। हक़ीक़त का कुछ भी इल्म तुम्हें होता तो तुम इन बेबुनियाद सहारों पर अपना निज़ामे-हयात (जीवन-व्यवस्था) कभी न बनाते। हक़ीक़त बस यह है कि इख़्तियारात का मालिक इस कायनात में सारे जहान के एक रब के सिवा कोई नहीं है और उसी का सहारा वह सहारा है जिसपर भरोसा किया जा सकता है। “जो ताग़ूत से कुफ़्र करे और अल्लाह पर ईमान लाए, उसने वह मज़बूत सहारा थाम लिया जो कभी टूटनेवाला नहीं है, और अल्लाह सब कुछ सुनने और जाननेवाला है।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-256)
إِنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ مَا يَدۡعُونَ مِن دُونِهِۦ مِن شَيۡءٖۚ وَهُوَ ٱلۡعَزِيزُ ٱلۡحَكِيمُ ۝ 39
(42) ये लोग अल्लाह को छोड़कर जिस चीज़ को भी पुकारते हैं, अल्लाह उसे ख़ूब जानता है और वही ज़बरदस्त और हिकमतवाला है।74
74. यानी अल्लाह को उन सब चीज़ों की हक़ीक़त ख़ूब मालूम है, जिन्हें ये लोग माबूद बनाए बैठे हैं और मदद के लिए पुकारते हैं। उनके बस में कुछ भी नहीं है। ताक़त का मालिक सिर्फ़ अल्लाह ही है और उसी की तदबीर और हिकमत इस कायनात का निज़ाम (व्यवस्था) चला रही है। एक दूसरा तर्जमा इस आयत का यह भी हो सकता है- “अल्लाह ख़ूब जानता है कि उसे छोड़कर जिन्हें ये लोग पुकारते हैं वे कुछ भी नहीं है (यानी बे-हक़ीक़त हैं), और ज़बरदस्त और हिकमतवाला बस वही है।"
وَتِلۡكَ ٱلۡأَمۡثَٰلُ نَضۡرِبُهَا لِلنَّاسِۖ وَمَا يَعۡقِلُهَآ إِلَّا ٱلۡعَٰلِمُونَ ۝ 40
(43) ये मिसालें हम लोगों को समझाने के लिए देते हैं, मगर इनको वही लोग समझते हैं जो इल्म रखनेवाले हैं।
خَلَقَ ٱللَّهُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ بِٱلۡحَقِّۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَأٓيَةٗ لِّلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 41
(44) अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को हक़ (सत्य और मक़सद) के साथ पैदा किया है,75 हक़ीक़त में इसमें एक निशानी ईमानवालों के लिए।76
75. यानी कायनात का यह निज़ाम हक़ (सत्य) पर क़ायम है, न कि बातिल (असत्य) पर। इस निज़ाम पर जो शख़्स भी साफ़ ज़ेहन के साथ ग़ौर करेगा उसपर यह बात खुल जाएगी कि ये ज़मीन और आसमान अंधविश्वासों और ख़याली बातों पर नहीं, बल्कि हक़ीक़त की बुनियाद पर खड़े हैं। यहाँ इस बात का कोई इमकान नहीं है कि हर शख़्स अपनी जगह जो कुछ भी समझ बैठे और अपनी अटकलों से जो फ़ल्सफ़ा (दर्शन) भी गढ़े वह ठीक बैठ जाए। यहाँ तो सिर्फ़ वही चीज़ कामयाब हो सकती है और टिकी और ठहरी रह सकती है जो हक़ीक़त और सच्चाई के मुताबिक़ हो। हक़ीक़त के ख़िलाफ़ अन्दाज़ों और अटकलों पर जो इमारत भी खड़ी की जाएगी वह आख़िरकार हक़ीक़त से टकराकर चूर-चूर हो जाएगी। कायनात का यह निज़ाम साफ़ गवाही दे रहा है कि एक ख़ुदा इसका पैदा करनेवाला है और एक ही ख़ुदा इसका मालिक और चलानेवाला है। इस सच्चाई के ख़िलाफ़ अगर कोई शख़्स इस मनगढ़न्त तसव्वुर पर काम करता है कि इस दुनिया का कोई ख़ुदा नहीं है, या यह मानकर चलता है कि इसके बहुत-से ख़ुदा हैं जो मन्नतों और चढ़ावों का माल खाकर अपने अक़ीदतमन्दों (श्रद्धालुओं) को यहाँ सब कुछ करने की आज़ादी और ख़ैरियत से रहने की ज़मानत देते हैं, तो हक़ीक़त उसके इन मनगढ़न्त तसव्वुरात की वजह से ज़र्रा बराबर भी नहीं बदलेगी, बल्कि वह ख़ुद ही किसी वक़्त एक बहुत बड़े सदमे से दोचार होगा।
76. यानी ज़मीन और आसमान की पैदाइश में तौहीद (एकेश्वरवाद) की सच्चाई और शिर्क और नास्तिकता के ग़लत होने पर एक साफ़ गवाही मौजूद है, मगर इस गवाही को सिर्फ़ वही लोग पाते हैं जो पैग़म्बरों (अलैहि०) की पेश की हुई तालीमात को मानते हैं। उनका इनकार कर देनेवालों को सब कुछ देखने पर भी कुछ दिखाई नहीं देता।
ٱتۡلُ مَآ أُوحِيَ إِلَيۡكَ مِنَ ٱلۡكِتَٰبِ وَأَقِمِ ٱلصَّلَوٰةَۖ إِنَّ ٱلصَّلَوٰةَ تَنۡهَىٰ عَنِ ٱلۡفَحۡشَآءِ وَٱلۡمُنكَرِۗ وَلَذِكۡرُ ٱللَّهِ أَكۡبَرُۗ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ مَا تَصۡنَعُونَ ۝ 42
(45) (ऐ नबी) तिलावत करो उस किताब की जो तुम्हारी तरफ़ वह्य के ज़रिए से भेजी गई है और नमाज़ क़ायम करो,77 यक़ीनन नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से रोकती है78 और अल्लाह का ज़िक्र इससे भी ज़्यादा बड़ी चीज़ है।79 अल्लाह जानता है जो कुछ तुम करते हो।
77. बात बज़ाहिर नबी (सल्ल०) से कही जा रही है, मगर अस्ल में तमाम ईमानवालों से कहीं जा रही है। उनपर जो ज़ुल्मो-सितम उस वक़्त तोड़े जा रहे थे, और ईमान पर क़ायम रहने में जिन सख़्त हिम्मत तोड़नेवाली मुश्किलों से उनको जूझना पड़ रहा था, उनका मुक़ाबला करने के लिए शुरू से आयत-44 तक में सब्र और जमाव और अल्लाह पर भरोसा करने की लगातार नसीहत करने के बाद अब उन्हें अमली तदबीर यह बताई जा रही है कि क़ुरआन की तिलावत करें (क़ुरआन पढ़ें) और नमाज़ क़ायम करें, क्योंकि यही दो चीज़ें ऐसी हैं जो एक ईमानवाले में वह मज़बूत किरदार और वह ज़बरदस्त सलाहियत पैदा करती हैं जिनसे वह बातिल (असत्य) की बड़ी-से-बड़ी सरकशियों और बदी के सख़्त-से-सख़्त तूफ़ानों के मुक़ाबले में न सिर्फ़ खड़ा रह सकता है, बल्कि उनका मुँह फेर सकता है। लेकिन क़ुरआन की तिलावत और नमाज़ से यह ताक़त इनसान को उसी वक़्त हासिल हो सकती है जबकि वह क़ुरआन के सिर्फ़ अलफ़ाज़ को पढ़ने पर बस न करे बल्कि उसकी तालीम को ठीक-ठीक समझकर अपनी रूह में उतारता चला जाए, और उसकी नमाज़ सिर्फ़ बदन की हरकतों तक महदूद न रहे, बल्कि उसके दिल की घड़कन और उसके अख़लाक़ और किरदार को हरकत देनेवाली ताक़त (प्रेरणा-शक्ति) बन जाए। नमाज़ के ज़रिए से जो ख़ूबी पैदा करना मक़सद है उसको तो आगे के जुमले में क़ुरआन ख़ुद बयान कर रहा है, रही तिलावत तो उसके बारे में यह जान लेना चाहिए कि जो तिलावत आदमी के गले से उतरकर उसके दिल तक नहीं पहुँचती वह उसे कुफ़्र की सरकशियों के मुक़ाबले में ताक़त तो बहुत दूर की बात, ख़ुद ईमान पर क़ायम रहने की ताक़त भी नहीं दे सकती, जैसा कि हदीस में नबी (सल्ल०) ने एक गरोह के बारे में कहा है— “वे क़ुरआन पढ़ेंगे मगर क़ुरआन उनके गले से नीचे नहीं उतरेगा, वे दीन से इस तरह निकल जाएँगे जैसे तीर कमान से निकल जाता है।” (हदीस : बुख़ारी, मुस्लिम, मुवत्ता) हक़ीक़त में जिस तिलावत के बाद आदमी के ज़ेहन और सोच और अख़लाक़ और किरदार में कोई तब्दीली न हो, बल्कि क़ुरआन पढ़कर भी आदमी वह सब कुछ करता रहे जिससे क़ुरआन मना करता है, वह एक ईमानवाले की तिलावत है ही नहीं। उसके बारे में तो नबी (सल्ल०) साफ़ फ़रमाते हैं— "क़ुरआन पर ईमान नहीं लाया वह शख़्स जिसने उसकी हराम की हुई चीज़ों को हलाल कर लिया।” (हदीस : तिरमिज़ी) ऐसी तिलावत आदमी के मन को सुधारने और उसकी रूह को ताक़त देने के बजाय उसको अपने ख़ुदा के मुक़ाबले में और ज़्यादा ढीठ और अपने ज़मीर (अन्तरात्मा) के आगे और ज़्यादा बेहया बना देती है और उसके अन्दर कैरेक्टर (किरदार) नाम की कोई चीज़ बाक़ी नहीं रहने देती। क्योंकि जो शख़्स क़ुरआन को ख़ुदा की किताब माने और उसे पढ़कर यह मालूम भी करता रहे कि उसके ख़ुदा ने उसे क्या हिदायतें दी हैं और फिर उसकी हिदायतों की ख़िलाफ़वर्ज़ी करता चला जाए, उसका मामला तो उस मुजरिम का-सा है जो क़ानून न जानने की वजह से नहीं, बल्कि क़ानून की जानकारी अच्छी तरह हासिल कर लेने के बाद जुर्म करता है। इस पोज़ीशन को अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने एक छोटे-से जुमले में बेहतरीन तरीक़े पर यूँ बयान किया है— “क़ुरआन हुज्जत (दलील) है तेरे हक़ में या तेरे खिलाफ़।" (हदीस : मुस्लिम) यानी अगर तू क़ुरआन की ठीक-ठीक पैरवी करता है तो वह तेरे हक़ में हुज्जत है। दुनिया से आख़िरत तक जहाँ भी तुझसे पूछ-गछ हो, तू अपनी सफ़ाई में क़ुरआन को पेश कर सकता है कि मैंने जो कुछ किया है इस किताब के मुताबिक़ किया है। अगर तेरा अमल सचमुच उसके मुताबिक़ हुआ तो न दुनिया में कोई इस्लामी क़ाज़ी तुझे सज़ा दे सकता है और न आख़िरत में अल्लाह तआला ही के यहाँ तेरी पकड़ होगी। लेकिन अगर वह किताब तुझे पहुँच चुकी हो और तूने इसे पढ़कर यह मालूम कर लिया हो कि तेरा रब तुझसे क्या चाहता है, किस चीज़ का तुझे हुक्म देता है और किस चीज़ से तुझे मना करता है, और फिर तू उसके ख़िलाफ़ रवैया अपनाए तो यह किताब तेरे ख़िलाफ़ हुज्जत है। यह तेरे ख़ुदा की अदालत में तेरे ख़िलाफ़ फ़ौजदारी का मुक़द्दमा और ज़्यादा मज़बूत कर देगी। इसके बाद न जानने का बहाना पेश करके बच जाना या हलकी सज़ा पाना तेरे लिए मुमकिन न रहेगा।
78. यह नमाज़ की बहुत-सी ख़ूबियों में से एक अहम ख़ूबी है जिसे मौक़ा और महल के लिहाज़ से यहाँ नुमायाँ करके पेश किया गया है। मक्का के उस माहौल में जिन सख़्त रुकावटों से मुसलमानों को जूझना पड़ रहा था, उनका मुक़ाबला करने के लिए उन्हें माद्दी ताक़त से बढ़कर अख़लाक़ी ताक़त दरकार थी। इस अख़लाक़ी ताक़त की पैदाइश और उसके पलने-बढ़ने के लिए पहले दो तदबीरों की निशानदेही की गई। एक क़ुरआन की तिलावत यानी उसे पढ़ना, दूसरे नमाज़ क़ायम करना। इसके बाद अब यह बताया जा रहा है कि नमाज़ क़ायम करना वह ज़रिया है जिससे तुम लोग उन बुराइयों से पाक हो सकते हो जिनमें इस्लाम क़ुबूल करने से पहले तुम ख़ुद मुब्तला थे और जिनमें तुम्हारे आसपास अरबवालों की और अरब से बाहर की जाहिली सोसाइटी इस वक़्त मुब्तला है। ग़ौर किया जाए तो यह बात आसानी से समझ में आ सकती है कि इस मौक़े पर नमाज़ के इस ख़ास फ़ायदे का ज़िक्र क्यों किया गया है। ज़ाहिर है कि अख़लाक़ी बुराइयों से पाक होना अपने अन्दर सिर्फ़ इतना ही फ़ायदा नहीं रखता कि यह अपनी जगह ख़ुद उन लोगों के लिए दुनिया और आख़िरत में फ़ायदेमन्द है जिन्हें यह पाकीज़ा चीज़ हासिल हो, बल्कि इसका लाज़िमी फ़ायदा यह भी है कि इससे उनको उन सब लोगों पर ज़बरदस्त बड़ाई हासिल हो जाती है जो तरह-तरह की अख़लाक़ी बुराइयों में मुब्तला हों और जाहिलियत के उस नापाक निज़ाम (व्यवस्था) को, जो उन बुराइयों को पालता है, क़ायम रखने के लिए इन पाकीज़ा इनसानों के मुक़ाबले में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हों। 'गन्दे कामो’ (अश्लील कर्म) और 'बुरे कामों' (बुरे कर्म) के तहत वे बुराइयाँ आती हैं जिन्हें इनसान की फ़ितरत बुरा जानती है और हमेशा से हर क़ौम और हर समाज के लोग, चाहे वे अमली लिहाज़ से कैसे ही बिगड़े हुए हों, उसूली तौर पर उनको बुरा ही समझते रहे हैं। क़ुरआन के उतरने के वक़्त अरब का समाज भी इस आम उसूल से अलग न था। इस समाज के लोग भी अख़लाक़ की जानी-मानी ख़ूबियों और बुराइयों को जानते थे। बुराई के मुक़ाबले में नेकी की क़द्र पहचानते थे, और शायद ही उनके अन्दर कोई ऐसा शख़्स हो जो बुराई को भलाई समझता हो या भलाई को बुरी निगाह से देखता हो। इस हालत में उस बिगड़े हुए समाज के अन्दर किसी ऐसी तहरीक (आन्दोलन) का उठना जिससे जुड़ते ही ख़ुद उसी समाज के लोग अख़लाक़ी तौर पर बदल जाएँ और अपने किरदार और बर्ताव में अपने ज़माने के दूसरे लोगों से नुमायाँ तौर पर बुलन्द हो जाएँ, यक़ीनन अपना असर किए बिना नहीं रह सकता था। मुमकिन न था कि अरब के आम लोग बुराइयों को मिटानेवाली और नेक और पाकीज़ा इनसान बनानेवाली इस तहरीक (आन्दोलन) का अख़लाक़ी वज़न महसूस न करते और उसके मुक़ाबले में सिर्फ़ जाहिली तास्सुबात के खोखले नारों की वजह से उन लोगों का साथ दिए चले जाते जो ख़ुद अख़लाक़ी बुराइयों में मुब्तला थे और जाहिलियत के उस निज़ाम को क़ायम रखने के लिए लड़ रहे थे जो उन बुराइयों की सदियों से परवरिश कर रहा था। यही वजह है कि क़ुरआन ने इस मौक़े पर मुसलमानों को माद्दी वसाइल (भौतिक संसाधन) और ताक़तें देने के बजाय नमाज़ क़ायम करने की नसीहत की ताकि वे मुट्ठी भर इनसान अख़लाक़ की वह ताक़त अपने अन्दर पैदा कर लें जो लोगों के दिल जीत ले और तीर व तलवार के बिना दुश्मनों को हरा दें। नमाज़ की यह ख़ूबी जो इस आयत में बयान की गई है, इसके दो पहलू हैं। एक इसकी लाज़िमी ख़ूबी है, यानी यह कि वह 'फ़ुहशा' (बेहयाई) और 'मुनकर' (बुराई) से रोकती है और इसकी दूसरी ख़ूबी वह है जो हक़ीक़त में इसके ज़रिए से मतलूब है, यानी यह कि नमाज़ पढ़नेवाला सचमुच बेहयाई और बुराई से रुक जाए। जहाँ तक बुराई से रोकने का ताल्लुक़ है, नमाज़ लाज़िमी तौर पर यह काम करती है। जो शख़्स भी नमाज़ के बारे में ज़रा-सा ग़ौर करेगा वह मान लेगा कि इनसान को बुराइयों से रोकने के लिए जितने ब्रेक भी लगाने मुमकिन हैं उनमें सबसे ज़्यादा कारगर ब्रेक नमाज़ ही हो सकती है। आख़िर इससे बढ़कर असरदार रुकावट और क्या हो सकती है कि आदमी को हर दिन में पाँच बार अल्लाह की याद के लिए बुलाया जाए और उसके ज़ेहन में यह बात ताज़ा की जाए कि तू इस दुनिया में आज़ाद और अपनी मरज़ी का मालिक नहीं है, बल्कि एक ख़ुदा का बन्दा है, और तेरा ख़ुदा वह है जो तेरे खुले और छिपे तमाम कामों को, यहाँ तक कि तेरे दिल के इरादों और नीयतों तक को जानता है, और एक वक़्त ऐसा ज़रूर आना है जब तुझे उस ख़ुदा के सामने पेश होकर अपने आमाल की जवाबदेही करनी होगी। फिर इस याददिहानी पर भी बस न किया जाए, बल्कि आदमी को अमली तौर पर हर नमाज़ के वक़्त इस बात की प्रैक्टिस कराई जाती रहे कि वह छिपकर भी अपने ख़ुदा के किसी हुक्म को ख़िलाफ़वर्ज़ी न करे। नमाज़ के लिए उठने के वक़्त से लेकर नमाज़ खत्म करने तक लगातार आदमी को वे काम करने पड़ते हैं जिनमें उसके और ख़ुदा के सिवा कोई तीसरी हस्ती यह जाननेवाली नहीं होती कि इस शख़्स ने ख़ुदा के क़ानून की पाबन्दी की है या उसे तोड़ दिया है। मसलन अगर आदमी का वुज़ू टूट चुका हो और वह नमाज़ पढ़ने खड़ा हो जाए तो उसके और ख़ुदा के सिवा आख़िर किसे मालूम हो सकता है कि वह वुज़ू से नहीं है। अगर आदमी नमाज़ की नीयत ही न करे और बज़ाहिर रुकू और सजदे और उठते और बैठते हुए नमाज़ के अज़कार (दुआए और तसबीह वग़ैरा) पढ़ने के बजाय ख़ामोशी के साथ ग़ज़लें पढ़ता रहे तो उसके और ख़ुदा के सिवा किसपर यह राज़ खुल सकता है कि उसने अस्ल में नमाज़ नहीं पढ़ी है। इसके बावजूद जब आदमी जिस्म और लिबास की पाकी से लेकर नमाज़ के अरकान (क्रियाएँ) और अज़कार तक अल्लाह के क़ानून की तमाम शर्तों के मुताबिक़ हर दिन पाँच वक़्त नमाज़ अदा करता है तो इसका मतलब यह है कि इस नमाज़ के ज़रिए से रोजाना कई-कई बार उसके ज़मीर (अन्तरात्मा) में ज़िन्दगी पैदा की जा रही है, उसमें ज़िम्मेदारी का एहसास जगाया जा रहा है, उसे अपने फ़र्ज़ और ज़िम्मेदारी को पहचाननेवाला इनसान बनाया जा रहा है, और उसको अमली तौर से इस बात की प्रैक्टिस कराई जा रही है कि वह ख़ुद अपने फ़रमाँबरादारी के जज़बे के असर से छिपे और खुले हर हाल में उस क़ानून की पाबन्दी करे जिसपर वह ईमान लाया है, चाहे बाहरी रूप में उससे पाबन्दी करानेवाली कोई ताक़त मौजूद हो या न हो और चाहे दुनिया के लोगों को उसके अमल का हाल मालूम हो या न हो। इस लिहाज़ से देखा जाए तो यह मानने के सिवा चारा नहीं है कि नमाज़ सिर्फ़ यही नहीं कि आदमी को बेहयाई और बुराई से रोकती है, बल्कि हक़ीक़त में दुनिया में तरबियत का कोई दूसरा तरीक़ा ऐसा नहीं है जो इनसान को बुराइयों से रोकने के मामले में इस हद तक असरदार हो। अब रहा यह सवाल कि आदमी नमाज़ का पाबन्द बन जाने के बाद भी अमली तौर पर बुराइयों से रुकता है या नहीं, तो इसका दारोमदार ख़ुद उस आदमी पर है जो अपने ख़ुद के सुधार की यह तरबियत ले रहा हो। यह इससे फ़ायदा उठाने की नीयत रखता हो और उसकी कोशिश करे तो नमाज़ के इस्लाही (सुधारवादी) असरात उसपर पड़ेंगे, वरना ज़ाहिर है कि दुनिया की कोई भी इस्लाह करनेवाली तदबीर उस शख़्स पर कारगर नहीं हो सकती जो उसका असर क़ुबूल करने के लिए तैयार ही न हो, या जान-बूझकर उसके असर को मिटाता रहे। इसकी मिसाल ऐसी है जैसे खाने (भोजन) की लाज़िमी ख़ूबी बदन को ताक़त देना और उसका नशो-नमा (विकास) करना है, लेकिन यह फ़ायदा उसी सूरत में हासिल हो सकता है जबकि आदमी उसे हज़म होने दे। अगर कोई शख़्स हर खाने के बाद फ़ौरन ही उलटी करके सारा खाना बाहर निकालता चला जाए तो इस तरह का खाना उसके लिए कुछ भी फ़ायदेमन्द नहीं हो सकता। जिस तरह ऐसे शख़्स की मिसाल सामने लाकर आप यह नहीं कह सकते कि खाना बदन को ताक़त देने का सबब नहीं है, क्योंकि फ़ुलाँ शख़्स खाना खाने के बावजूद सूखता चला जा रहा है। इसी तरह बुरे काम करनेवाले नमाज़ी की मिसाल पेश करके आप यह नहीं कह सकते कि नमाज़ बुराइयों से रोकनेवाली नहीं है, क्योंकि फ़ुलाँ शख़्स नमाज़ पढ़ने के बावजूद बुरा काम करता है। ऐसे नमाज़ी के बारे में तो यह कहना ज़्यादा सही है कि वह हक़ीक़त में नमाज़ नहीं पढ़ता जैसे खाना खाकर उलटी कर देनेवाले के बारे में यह कहना ज़्यादा सही है कि वह हक़ीक़त में खाना नहीं खाता। ठीक यही बात है जो कई हदीसों में नबी (सल्ल०) और कुछ बड़े सहाबा (रज़ि०) और ताबिईन से रिवायत हुई है। इमरान-बिन-हुसैन की रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया, “जिसे उसकी नमाज़ ने बेहयाई और बुरे कामों से न रोका, उसकी नमाज़ नहीं है।” (इब्ने-अबी-हातिम) इब्ने-अब्बास (रज़ि०) नबी (सल्ल०) का यह फ़रमान नक़्ल करते हैं, “जिसकी नमाज़ ने उसे बेहयाई और बुरे कामों से न रोका, उसको उसकी नमाज़ ने अल्लाह से और ज़्यादा दूर कर दिया।” (इब्ने-अबी-हातिम, तबरानी) यही बात जनाब हसन बसरी (रह०) ने भी अल्लाह के रसूल (सल्ल०) से मुरसलन (यानी बग़ैर किसी सहाबी के वास्ते के सीधे तौर पर नबी सल्ल० से) रिवायत की है। (हदीस : इब्ने-जरीर, बैहक़ी) इब्ने-मसऊद (रज़ि०) से अल्लाह के रसूल (सल्ल०) का यह इरशाद भी रिवायत हुआ है, “उस शख़्स की कोई नमाज़ नहीं है जिसने नमाज़ का हुक्म न माना, और नमाज़ का हुक्म मानना यह है कि आदमी बेहयाई और बुराई के कामों से रुक जाए।” (हदीस : इब्ने-जरीर, इब्ने-अबी-हातिम) इसी मज़मून (विषय) के कई क़ौल (कथन) हज़रत अब्दुल्लाह-बिन-मसऊद (रज़ि०) अब्दुल्लाह-बिन- अब्बास (रज़ि०), हसन बसरी (रह०), क़तादा (रह०) और आमश (रह०) वग़ैरा से नक़्ल हुए हैं। इमाम जाफ़र सादिक़ (रज़ि०) फ़रमाते हैं, “जो शख़्स यह मालूम करना चाहे कि उसकी नमाज़ क़ुबूल हुई है या नहीं, उसे देखना चाहिए कि उसकी नमाज़ ने उसे बेहयाई और बुरे कामों से कहाँ तक रोके रखा। अगर नमाज़ के रोकने से वह बुराइयाँ करने से रुक गया है तो उसकी नमाज़ क़ुबूल हुई है। (रुहुल-मआनी)
79. इसके कई मतलब हो सकते हैं। एक यह कि अल्लाह का ज़िक्र (यानी नमाज़) इससे बढ़कर है। उसका असर सिर्फ़ यही नहीं है कि बुराइयों से रोके, बल्कि इससे बढ़कर वह नेकियों पर उभारनेवाली और भलाइयों में दूसरों से आगे बढ़ने पर आमादा करनेवाली चीज़ भी है। दूसरा मतलब यह है कि अल्लाह की याद अपनी जगह ख़ुद बहुत बड़ी चीज है। सबसे बेहतर अमल है। इनसान का कोई अमल इससे बढ़कर नहीं है। तीसरा मतलब यह है कि अल्लाह का तुम्हें याद करना तुम्हारे उसको याद करने से ज़्यादा बड़ी चीज़ है। क़ुरआन में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है, “तुम मुझे याद करो, मैं तुम्हें याद करूँगा।” (सूरा-2 बक़रा, आयत-152) तो जब बन्दा नमाज़ में अल्लाह को याद करेगा तो ज़रूर ही अल्लाह भी उसको याद करेगा और यह ख़ुशनसीबी और बड़ाई कि अल्लाह किसी बन्दे को याद करें, इससे बढ़कर है कि बन्दा अल्लाह को याद करे। इन तीन मतलबों के अलावा एक और मतलब यह भी है जिसे हज़रत अबुद्दरदा (रज़ि०) की बीवी ने बयान किया है कि अल्लाह तआला की याद नमाज़ तक महदूद नहीं है, बल्कि इसका दायरा इससे बहुत ज़्यादा फैला हुआ है। जब आदमी रोज़ा रखता है, या ज़कात देता है या कोई नेक काम करता है तो यक़ीनन अल्लाह को याद ही करता है, तभी तो उससे वह नेक अमल होता है। इसी तरह जब आदमी किसी बुराई के मौक़े सामने आने पर उससे परहेज़ करता है तो यह भी अल्लाह की याद ही का नतीजा होता है इसलिए अल्लाह की याद एक ईमानवाले की पूरी ज़िन्दगी पर हावी होती है।
۞وَلَا تُجَٰدِلُوٓاْ أَهۡلَ ٱلۡكِتَٰبِ إِلَّا بِٱلَّتِي هِيَ أَحۡسَنُ إِلَّا ٱلَّذِينَ ظَلَمُواْ مِنۡهُمۡۖ وَقُولُوٓاْ ءَامَنَّا بِٱلَّذِيٓ أُنزِلَ إِلَيۡنَا وَأُنزِلَ إِلَيۡكُمۡ وَإِلَٰهُنَا وَإِلَٰهُكُمۡ وَٰحِدٞ وَنَحۡنُ لَهُۥ مُسۡلِمُونَ ۝ 43
(46) और अहले-किताब80 से बहस न करो मगर उम्दा तरीक़े से81— सिवाय उन लोगों के जो उनमें से ज़ालिम हों82—और उनसे कहो कि “हम ईमान लाए हैं उस चीज़ पर भी जो हमारी तरफ़ भेजी गई है और उस चीज़ पर भी जो तुम्हारी तरफ़ भेजी गई थी, हमारा ख़ुदा और तुम्हारा ख़ुदा एक ही है और हम उसी के मुस्लिम (फ़रमाँबरदार) हैं।"83
80. वाज़ेह रहे कि आगे चलकर इसी सूरा में हिजरत की नसीहत की जा रही है। उस वक़्त हबशा ही एक ऐसी पनाहगाह और अम्न का मक़ाम था जहाँ मुसलमान हिजरत करके जा सकते थे। और हबशा पर उस ज़माने में ईसाइयों का ग़लबा (प्रभुत्त्व) था। इसलिए इन आयतों में मुसलमानों को हिदायतें दी जा रही हैं कि अहले-किताब से जब वास्ता पड़े तो उनसे दीन के मामले में बहस-मुबाहसे (वार्ता) का क्या अन्दाज़ अपनाएँ।
81. यानी बहस-मुबाहसा अक़्ली दलीलों के साथ, मुहज़्ज़ब और शाइस्ता (सभ्य और शालीन) ज़बान में, और समझने-समझाने की स्प्रिट में होना चाहिए, ताकि जिस शख़्स से बहस की जा रही हो उसके ख़यालात को सुधारा जा सके। तबलीग़ करनेवाले को फ़िक्र इस बात की होनी चाहिए कि वह जिससे बात कर रहा है। उसके दिल का दरवाज़ा खोलकर हक़ बात उसमें उतार दे और उसे सीधे रास्ते पर लाए। उसको एक पहलवान की तरह नहीं लड़ना चाहिए जिसका मक़सद अपने सामनेवाले को नीचा दिखाना होता है, बल्कि उसको एक हकीम की तरह काम करना चाहिए जो रोगी का इलाज करते हुए हर वक़्त इस बात का ख़याल रखता है कि उसकी अपनी किसी ग़लती से रोगी का रोग और ज़्यादा बढ़ न जाए, और इस बात की पूरी कोशिश करता है कि कम-से-कम तकलीफ़ के साथ रोगी ठीक हो जाए। यह हिदायत इस जगह पर तो मौक़े के हिसाब से अहले-किताब के साथ मुबाहसा करने के मामले में दी गई है, मगर यह अहले-किताब के लिए ख़ास नहीं है, बल्कि दीन की तबलीग़ के सिलसिले में एक आम हिदायत है जो क़ुरआन मजीद में जगह-जगह दी गई है। मिसाल के तौर पर देखें— “दावत दो अपने रब के रास्ते की तरफ़ हिकमत और उम्दा नसीहत (सदुपदेश) के साथ और लोगों से मुबाहसा (बाद-विवाद) करो ऐसे तरीक़े पर जो बेहतरीन हो।” (सूरा-16 नहल, आयत-125) “भलाई और बुराई बराबर नहीं हैं (मुख़ालिफ़ों के हमलों का) मुक़ाबला ऐसे तरीक़े से करो जो बेहतरीन हो, तुम देखोगे कि वही शख़्स जिसके और तुम्हारे बीच दुश्मनी थी वह ऐसा हो गया है जैसे गर्मजोश दोस्त है।” (सूरा-41 हा-मीम सजदा, आयत-34) “तुम बुराई को अच्छे ही तरीक़े से दूर करो, हमें मालूम है जो बातें वे (तुम्हारे ख़िलाफ़) बनाते हैं।” (सूरा-28 मोमिनून, आयत-96) “अनदेखा कर देने का रवैया अपनाओ, भलाई की नसीहत करो, और जाहिलों के मुँह न लगो, और अगर (जैसे को तैसा जवाब देने के लिए) शैतान तुम्हें उकसाए तो अल्लाह की पनाह माँगो।” (सूरा-7 आराफ़, आयतें—199-200)
82. यानी जो लोग ज़ुल्म का रवैया अपनाएँ उनके साथ उनके ज़ुल्म की क़िस्म के लिहाज़ से अलग-अलग रवैया भी अपनाया जा सकता है। मतलब यह है कि हर वक़्त हर हाल में और हर तरह के लोगों के मुक़ाबले में नर्म और मीठे ही न बने रहना चाहिए कि दुनिया हक़ की दावत देनेवाले की शराफ़त को कमज़ोरी और बेबसी समझ बैठे। इस्लाम अपने माननेवालों को शाइस्तगी (शालीनता), शराफ़त और सही रवैया अपनाना तो ज़रूर सिखाता है, मगर बेबसी और बेचारगी नहीं सिखाता कि वह हर ज़ालिम के लिए नर्म चारा बनकर रहें।
83. इन जुमलों में अल्लाह तआला ने ख़ुद बहस के उस उम्दा तरीक़े की तरफ़ रहनुमाई की है जिसे हक़ की तबलीग़ का काम करनेवालों को अपनाना चाहिए। इसमें यह सिखाया गया है कि जिस शख़्स से तुम्हें बहस करनी हो उसकी गुमराही को लेकर बहस शुरू मत करो, बल्कि बात इससे शुरू करो कि हक़ और सच्चाई की वे कौन-सी बातें हैं जो तुम्हारे और उसके बीच एक जैसी हैं। यानी बात की शुरुआत इख़्तिलाफ़वाली बातों से नहीं, बल्कि उन बातों से होनी चाहिए जो उनके और तुम्हारे बीच एक हैं। फिर इन्हीं बातों से जो तुम्हारे बीच एक हैं दलील लेकर सामनेवाले को यह समझाने की कोशिश करनी चाहिए कि जिन मामलों में तुम्हारे और उसके बीच इख़्तिलाफ़ है उनमें तुम्हारी राय उन बुनियादों से मेल खाती है जिनमें सभी लोग एक राय हैं और उसकी राय उनसे टकराती है। इस सिलसिले में यह समझ लेना चाहिए कि अहले-किताब अरब के मुशरिकों की तरह वह्य, रिसालत (पैग़म्बरी) और तौहीद (एकेश्वरवाद) का इनकार न करते थे, बल्कि मुसलमानों की तरह इन सब हक़ीक़तों को मानते थे। इन बुनियादी बातों में एकराय होने के बाद अगर कोई बड़ी चीज़ इख़्तिलाफ़ की बुनियाद हो सकती थी तो यह कि मुसलमान उनके यहाँ आई हुई आसमानी किताबों को न मानते और अपने यहाँ आई हुई किताब पर ईमान लाने की उन्हें दावत देते और उसके न मानने पर उन्हें हक़ का इनकारी ठहराते। यह झगड़े की बड़ी मज़बूत वजह होती, लेकिन मुसलमानों का रवैया इससे अलग था। वे उन तमाम किताबों को सही मानते थे जो अहले-किताब के पास मौजूद थीं और फिर उस वह्य पर ईमान लाए थे जो मुहम्मद (सल्ल०) पर उतरी थी। इसके बाद यह बताना अहले-किताब का काम था कि किस सही वजह से वे ख़ुदा ही की उतारी हुई एक किताब को मानते और दूसरी किताब का इनकार करते हैं। इसी लिए अल्लाह तआला ने यहाँ मुसलमानों को नसीहत की है कि अहले-किताब से जब मामला पड़े तो सबसे पहले मुसबत (सकारात्मक) तौर पर अपनी यही राय उनके सामने पेश करो। उनसे कहो कि जिस ख़ुदा को तुम मानते हो उसी को हम मानते हैं और हम उसके फ़रमाँबरदार हैं। उसकी तरफ़ से जो हुक्म और हिदायतें और तालीमात भी आई हैं उन सबको हम मानते हैं, चाहे तुम्हारे यहाँ आई हों या हमारे यहाँ। हम तो हुक्म के बन्दे हैं। देश और क़ौम और नस्ल के बन्दे नहीं हैं कि एक जगह ख़ुदा का हुक्म आए तो हम मानें और उसी ख़ुदा का हुक्म दूसरी जगह आए तो हम उसको न मानें। क़ुरआन मजीद में यह बात जगह-जगह दोहराई गई है और ख़ास तौर से अहले-किताब से जहाँ मामला पेश आया है, वहाँ तो इसे ज़ोर देकर बयान किया गया है। मिसाल के तौर पर देखिए— सूरा-2 बक़रा, आयतें—4, 136, 177, 285; सूरा-3 आले-इमरान, आयत-84; सूरा-4 निसा, आयतें—136, 150-152, 162-164; सूरा-42 शूरा, आयत-13।
وَكَذَٰلِكَ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَۚ فَٱلَّذِينَ ءَاتَيۡنَٰهُمُ ٱلۡكِتَٰبَ يُؤۡمِنُونَ بِهِۦۖ وَمِنۡ هَٰٓؤُلَآءِ مَن يُؤۡمِنُ بِهِۦۚ وَمَا يَجۡحَدُ بِـَٔايَٰتِنَآ إِلَّا ٱلۡكَٰفِرُونَ ۝ 44
(47) (ऐ नबी) हमने इसी तरह तुम्हारी तरफ़ किताब उतारी है,84 इसलिए वे लोग जिनको हमने पहले किताब दी थी, वे इसपर ईमान लाते हैं,85 और इन लोगों में से भी बहुत-से इसपर ईमान ला रहे हैं,86 और हमारी आयतों का इनकार सिर्फ़ कुफ़्र करनेवाले (विधर्मी) ही करते हैं।87
84. इसके दो मतलब हो सकते हैं। एक यह कि जिस तरह पहले नबियों (पैग़म्बरों) पर हमने किताबें उतारी थीं उसी तरह अब यह किताब तुमपर उतारी है। दूसरा मतलब यह है कि हमने इसी तालीम के साथ यह किताब उतारी है कि हमारी पिछली किताबों का इनकार करके नहीं बल्कि उन सबका इक़रार करते हुए इसे माना जाए।
85. मौक़ा-महल ख़ुद बता रहा है कि इससे मुराद तमाम अहले-किताब नहीं हैं, बल्कि वे अहले-किताब हैं जिनको अल्लाह की किताबों का सही इल्म और सही समझ हासिल थी जो “किसी चौपाए पर कुछ किताबें लाद दी जाएँ” की तरह सिर्फ़ किताब ढोनेवाले क़िस्म के अहले-किताब नहीं थे, बल्कि सही मानी में अहले-किताब थे। उनके सामने जब अल्लाह की तरफ़ से उसकी पिछली किताबों की तसदीक़ (पुष्टि) करती हुई यह आख़िरी किताब आई तो उन्होंने किसी ज़िद और हठधर्मी और तास्सुब से काम न लिया और उसे भी वैसे ही सच्चे दिल के साथ मान लिया जिस तरह पिछली किताबों को मानते थे।
86. 'इन लोगों' का इशारा अरबवालों को तरफ़ है। मतलब यह है कि हक़पसन्द लोग हर जगह इसपर ईमान ला रहे हैं, चाहे वे अहले-किताब में से हों या दूसरे लोगों में से।
87. यहाँ कुफ़्र करनेवालों से मुराद वे लोग हैं जो अपने तास्सुबात (दुराग्रहों) को छोड़कर हक़ बात मानने के लिए तैयार नहीं हैं, या वे जो अपनी मन की ख़ाहिशों और अपनी बे-लगाम आज़ादियों पर पाबन्दियाँ क़ुबूल करने से जी चुराते हैं और इस वजह से हक़ का इनकार करते हैं।
وَمَا كُنتَ تَتۡلُواْ مِن قَبۡلِهِۦ مِن كِتَٰبٖ وَلَا تَخُطُّهُۥ بِيَمِينِكَۖ إِذٗا لَّٱرۡتَابَ ٱلۡمُبۡطِلُونَ ۝ 45
(48) (ऐ नबी) तुम इससे पहले कोई किताब नहीं पढ़ते थे और न अपने हाथ से लिखते थे, अगर ऐसा होता तो बातिल-परस्त (असत्यवादी) लोग शक में पड़ सकते थे।88
88. यह नबी (सल्ल०) की नुबूवत के सुबूत में वही दलील है जो इससे पहले सूरा-10 यूनुस और सूरा-28 क़सस में गुज़र चुकी है (देखिए— तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-10 यूनुस, हाशिया-21; सूरा-28 क़सस, हाशिया-64, 109। इस मज़मून (विषय) को और ज़्यादा तफ़सील से जानने के लिए तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-16 नह्ल, हाशिया-107; सूरा-17 बनी-इसराईल, हाशिया-105; सूरा-23 मोमिनून, हाशिया-66; सूरा-25 फुरक़ान, और सूरा-42 शूरा, हाशिया-84 का मुताला भी फ़ायदेमन्द होगा।) इस आयत में दलील की बुनियाद यह है कि नबी (सल्ल०) अनपढ़ थे। आप (सल्ल०) के वतन के लोग और रिश्ते और बिरादरी के लोग जिनके बीच जन्म के दिन से अधेड़ उम्र को पहुँचने तक आप (सल्ल०) की सारी ज़िन्दगी गुज़री थी, इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि आप (सल्ल०) ने उम्र भर न कभी कोई किताब पढ़ी, न क़लम हाथ में लिया। इस हक़ीक़त को पेश करके अल्लाह तआला फ़रमाता है कि यह इस बात का खुला हुआ सुबूत है कि आसमानी किताबों की तालीमात, पिछले नबियों के हालात, दूसरे मज़हबों के अक़ीदों, पुरानी क़ौमों के इतिहास, और रहन-सहन, अख़लाक़ और मईशत (अर्थशास्त्र) के अहम मसलों पर जिस फैले हुए और गहरे इल्म का इज़हार इस उम्मी (अनपढ़) की ज़बान से हो रहा है, यह उसको वह्य के सिवा किसी दूसरे ज़रिए से हासिल नहीं हो सकता था। अगर इसको लिखना-पढ़ना आता होता और लागों ने कभी इसे किताबें पढ़ते, मुताला और तहकीक़ करते देखा होता तो बातिल-परस्तों (असत्यवादियों) के लिए शक करने की कुछ बुनियाद हो भी सकती थी कि यह इल्म वह्य से नहीं, बल्कि अपनी मेहनत से या कहीं और से हासिल किया गया है। लेकिन उसके उम्मी होने ने तो ऐसे किसी शक के लिए की भी कोई बुनियाद बाक़ी नहीं छोड़ी है। अब ख़ालिस हठधर्मी के सिवा उसकी पैग़म्बरी का इनकार करने की और कोई वजह नहीं है जिसे किसी दरजे में भी मुनासिब और अक़्ल के मुताबिक़ कहा जा सकता हो।
بَلۡ هُوَ ءَايَٰتُۢ بَيِّنَٰتٞ فِي صُدُورِ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡعِلۡمَۚ وَمَا يَجۡحَدُ بِـَٔايَٰتِنَآ إِلَّا ٱلظَّٰلِمُونَ ۝ 46
(49) अस्ल में ये रौशन निशानियाँ हैं उन लोगों के दिलों में जिन्हें इल्म दिया गया है,89 और हमारी आयतों का इनकार नहीं करते मगर वे जो ज़ालिम हैं।
89. यानी एक उम्मी (अनपढ़) का क़ुरआन जैसी किताब पेश करना और अचानक उन ग़ैर-मामूली और इन्तिहाई ख़ूबियों को ज़ाहिर करना जिनके लिए किसी पहले से की गई तैयारी के आसार कभी किसी के देखने में नहीं आए, यही समझ-बूझ रखनेवालों की निगाह में उसकी पैग़म्बरी की दलील देनेवाली सबसे रौशन निशानियाँ हैं। दुनिया की तारीख़़ी (ऐतिहासिक) हस्तियों में से जिसके हालात का भी जाइज़ा लिया जाए, आदमी उसके अपने माहौल में उन असबाब (साधनों) का पता चला सकता है जो उसकी शख़्सियत बनाने और उससे ज़ाहिर होनेवाले कमालात के लिए उसको तैयार करने में लगे हुए थे। उसके माहौल में और इस बात में कि उसकी शख़्सियत किन-किन चीज़ों से वुजूद में आई है खुली मुनासबत (अनुकूलता) पाई जाती है। लेकिन मुहम्मद (सल्ल०) की शख़्सियत से जो हैरतअंगेज़ कमालात ज़ाहिर हो रहे थे, आप (सल्ल) के माहौल में इस बात को तलाश नहीं किया जा सकता कि वे कमालात और ख़ूबियाँ उन्हें कैसे हासिल हुईं। यहाँ न उस वक़्त के अरब समाज में, और न आसपास के जिन देशों से अरब के ताल्लुक़ात थे उनके समाज में, कहीं दूर-दराज़ से भी ये चीज़ें ढूँढ़कर नहीं निकाली जा सकतीं जो मुहम्मद (सल्ल०) की शख़्सियत के अन्दर पाई जानेवाली बातों से किसी तरह मेल खाती हों। यही हक़ीक़त है जिसकी बुनियाद पर यहाँ कहा गया है कि मुहम्मद (सल्ल०) का वुजूद एक निशानी नहीं, बल्कि बहुत-सी रौशन निशानियों का ख़ज़ाना है। जाहिल आदमी को इसमें कोई निशानी नज़र न आती हो तो न आए, मगर जो लोग इल्म रखनेवाले हैं वे इन निशानियों को देखकर अपने दिलों में कहने लगे हैं कि यह शान एक पैग़म्बर ही की हो सकती है।
وَقَالُواْ لَوۡلَآ أُنزِلَ عَلَيۡهِ ءَايَٰتٞ مِّن رَّبِّهِۦۚ قُلۡ إِنَّمَا ٱلۡأٓيَٰتُ عِندَ ٱللَّهِ وَإِنَّمَآ أَنَا۠ نَذِيرٞ مُّبِينٌ ۝ 47
(50) लोग कहते हैं कि “क्यों न उतारी गई इस शख़्स पर निशानियाँ90 इसके रब की तरफ़ से?” कहो, “निशानियाँ तो अल्लाह के पास हैं और मैं सिर्फ़ ख़बरदार करनेवाला हूँ खोल-खोलकर।”
90. यानी मोजिज़े (चमत्कार) जिन्हें देखकर यक़ीन आए कि सचमुच मुहम्मद (सल्ल०) अल्लाह के पैग़म्बर हैं।
أَوَلَمۡ يَكۡفِهِمۡ أَنَّآ أَنزَلۡنَا عَلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ يُتۡلَىٰ عَلَيۡهِمۡۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَرَحۡمَةٗ وَذِكۡرَىٰ لِقَوۡمٖ يُؤۡمِنُونَ ۝ 48
(51) और क्या इन लोगों के लिए यह (निशानी) काफ़ी नहीं है कि हमने तुमपर किताब उतारी जो इन्हें पढ़कर सुनाई जाती है?91 हक़ीक़त में इसमें रहमत (दयालुता) है और नसीहत (उपदेश) उन लोगों के लिए जो ईमान लाते हैं।92
91. यानी उम्मी होने के बावजूद तुमपर क़ुरआन जैसी किताब का उतरना, क्या यह अपनी जगह ख़ुद इतना बड़ा मोजिज़ा (चमत्कार) नहीं है कि तुम्हारे पैग़म्बर होने पर यक़ीन लाने के लिए यह काफ़ी हो? इसके बाद भी किसी और मोजिज़े की ज़रूरत बाक़ी रह जाती है? दूसरे मोजिज़े तो जिन्होंने देखे उनके लिए वे मोजिज़े थे। मगर यह मोजिज़ा तो हर वक़्त तुम्हारे सामने है। तुम्हें आए दिन पढ़कर सुनाया जाता है। तुम हर वक़्त उसे देख सकते हो। क़ुरआन मजीद के इस बयान और दलील देने के बाद उन लोगों की जसारत (दुस्साहस) हैरतअंगेज़ है जो नबी (सल्ल०) को पढ़ा-लिखा साबित करने की कोशिश करते हैं। हालाँकि यहाँ क़ुरआन साफ़ अलफ़ाज़ में नबी (सल्ल०) के अनपढ़ होने को आप (सल्ल०) की पैग़म्बरी के हक़ में एक ताक़तवर सुबूत के तौर पर पेश कर रहा है। जिन रिवायतों का सहारा लेकर यह दावा किया जाता है कि नबी (सल्ल०) पढ़े-लिखे थे, या बाद में आप (सल्ल०) ने लिखना-पढ़ना सीख लिया था, वे अव्वल तो पहली ही नज़र में रद्द कर देने के लायक़ हैं; क्योंकि क़ुरआन के ख़िलाफ़ कोई रिवायत भी क़ुबूल करने लायक़ नहीं हो सकती। फिर वह अपनी जगह ख़ुद भी इतनी कमज़ोर हैं कि उनपर किसी दलील की बुनियाद क़ायम नहीं हो सकती। इनमें से एक बुख़ारी की यह रिवायत है कि हुदैबिया की सुलह (सन्धि) का मुआहदा (समझौता पत्र) जब लिखा जा रहा था तो मक्का के इस्लाम-दुश्मनों के नुमाइन्दे ने अल्लाह के रसूल (सल्ल०) के नाम के साथ 'रसूलुल्लाह’ (अल्लाह का रसूल) लिखे जाने पर एतिराज़ किया। इसपर नबी (सल्ल०) ने लिखनेवाले (हज़रत अली रज़ि०) को हुक्म दिया कि अच्छा ‘रसूलुल्लाह' का लफ़्ज़ काटकर 'मुहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह’ लिख दो। हज़रत अली (रज़ि०) ने लफ़्ज़ 'रसूलुल्लाह’ काटने से इनकार कर दिया। इसपर नबी (सल्ल०) ने उनके हाथ से क़लम लेकर वे अलफ़ाज़़ ख़ुद काट दिए और ‘मुहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह’ लिख दिया। लेकिन यह रिवायत बरा-बिन-आज़िब (रज़ि०) से (हदीस) बुख़ारी में चार जगह और (हदीस) मुस्लिम में दो जगह आई है और हर जगह अलफ़ाज़ अलग-अलग हैं— (1) बुख़ारी किताबुस्सुलह में एक रिवायत के अलफ़ाज़़ ये हैं, “नबी (सल्ल०) ने हज़रत अली (रज़ि०) से फ़रमाया, “ये अलफ़ाज़ काट दो” उन्होंने अर्ज़ किया, “मैं तो नहीं काट सकता।” आख़िरकार नबी (सल्ल०) ने अपने हाथ से उन्हें काट दिया।” (2) इसी किताब की दूसरी रिवायत के अलफ़ाज़़ ये हैं, “फिर अली (रज़ि०) से कहा, “रसूलुल्लाह' काट दो। उन्होंने कहा, “ख़ुदा की क़सम! मैं आपका नाम कभी न काटूँगा” आख़िर नबी (सल्ल०) ने तहरीर लेकर लिखा, “यह वह मुआहदा (समझौता) है जो मुहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह ने तय किया।” (3) तीसरी रिवायत इन्हीं बरा-बिन-आज़िब (रज़ि०) से बुख़ारी किताबुल-जिज़या में यह है— “नबी (सल्ल०) ख़ुद न लिख सकते थे। आप (सल्ल०) ने हज़रत अली (रज़ि०) से कहा, “रसूलल्लाह काट दो। उन्होंने अर्ज़ किया, “ख़ुदा की क़सम! मैं ये अलफ़ाज़ हरगिज़ न काटूँगा।” इसपर आप (सल्ल०) ने फ़रमाया, “मुझे वह जगह बताओ जहाँ ये अलफ़ाज़ लिखे हैं।” उन्होंने आप (सल्ल०) को जगह बताई और आप (सल्ल०) ने अपने हाथ से वे अलफ़ाज़़ काट दिए।” (4) चौथी रिवायत बुख़ारी किताबुल-मग़ाज़ी में यह है— “तो अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने वह तहरीर (लेख) ले ली, हालाँकि आप (सल्ल०) लिखना न जानते थे और आप (सल्ल०) ने लिखा यह वह मुआहदा है जो मुहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह ने तय किया।” (5) इन्हीं बरा-बिन-आज़िब (रज़ि०) से मुस्लिम किताबुल-जिहाद में एक रिवायत यह है कि हज़रत अली (रज़ि०) के इनकार करने पर अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने अपने हाथ से 'रसूलुल्लाह' के अलफ़ाज़ मिटा दिए। (6) दूसरी रिवायत इसी किताब में उनसे यह नक़्ल हुई है कि नबी (सल्ल०) ने हज़रत अली (रज़ि०) से फ़रमाया, “मुझे बताओ रसूलुल्लाह लफ़्ज़ कहाँ लिखा है?” हज़रत अली (रज़ि०) ने आप (सल्ल०) को जगह बताई, और आप (सल्ल०) ने उसे मिटाकर 'इब्ने-अब्दुल्लाह’ लिख दिया। रियायतों का यूँ अलग-अलग होना साफ़ बता रहा है कि बीच के रावियों ने हज़रत बरा-बिन-आज़िब (रज़ि०) के अलफ़ाज़ ज्यों-के-त्यों नक़्ल नहीं किए हैं, इसलिए उनमें से किसी एक की नक़्ल पर भी ऐसा मुकम्मल भरोसा नहीं किया जा सकता कि यक़ीनी तौर पर यह कहा जा सके कि नबी (सल्ल०) ने 'मुहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह' के अलफ़ाज़ अपने मुबारक हाथ ही से लिखे थे। हो सकता है कि सही सूरतेहाल यह हो कि जब हज़रत अली (रज़ि०) ने ‘रसूलुल्लाह’ का लफ़्ज़ मिटाने से इनकार कर दिया तो आप (सल्ल०) ने उसकी जगह उनसे पूछकर यह लफ़्ज़ अपने हाथ से मिटा दिया हो और फिर उनसे या किसी दूसरे लिखनेवाले से ‘इब्ने-अब्दुल्लाह’ के अलफ़ाज़ लिखवा दिए हों। दूसरी रिवायतों से मालूम होता है कि इस मौक़े पर सुलहनामा दो कातिब (लिखनेवाले) लिख रहे थे। एक हज़रत अली (रज़ि०) और दूसरे मुहम्मद-बिन-मसलमा (फ़तहुल-बारी, हिस्सा-5, पेज-217) इसलिए यह बात नामुमकिन नहीं कि जो काम एक कातिब ने न किया था वह दूसरे कातिब से ले लिया गया हो। फिर भी अगर सच्चाई यही हो कि नबी (सल्ल०) ने अपना नाम अपने ही मुबारक हाथ से लिखा हो तो ऐसी मिसालें दुनिया में बहुत पाई जाती हैं कि अनपढ़ लोग सिर्फ़ अपना नाम लिखना सीख लेते हैं, बाक़ी कोई चीज़ न पढ़ सकते हैं न लिख सकते हैं। दूसरी रिवायत जिसकी बुनियाद पर नबी (सल्ल०) के पढ़े-लिखे होने का दावा किया गया है मुजाहिद से इब्ने-अबी-शैबा और उमर-बिन-शुब्ह ने नक़्ल की है। उसके अलफ़ाज़़ ये है, “अल्लाह के रसूल (सल्ल०) अपने इन्तिक़ाल से पहले लिखना-पढ़ना सीख चुके थे।” लेकिन अव्वल तो यह सनद के एतिबार से बहुत कमज़ोर रिवायत है, जैसा कि हाफ़िज़ इब्ने-कसीर फ़रमाते हैं, “यह (रिवायत) कमज़ोर है और इसकी कोई अस्ल नहीं है।” दूसरे इसकी कमज़ोरी यूँ भी सामने आ जाती है कि अगर नबी (सल्ल०) ने सचमुच बाद में लिखना-पढ़ना सीखा होता तो यह बात मशहूर हो जाती, बहुत-से सहाबा उसको रिवायत करते और यह भी मालूम हो जाता कि नबी (सल्ल०) ने किस आदमी या किन आदमियों से यह तालीम हासिल की थी। लेकिन सिवाय एक औन-बिन-अब्दुल्लाह के, जिनसे मुजाहिद ने यह बात सुनी, और कोई शख़्स इसे रिवायत नहीं करता। और यह औन भी सहाबी नहीं, बल्कि ताबिई हैं जिन्होंने यह बिलकुल नहीं बताया कि उन्हें किस सहाबी या किन सहाबियों से इस बात की जानकारी हुई। ज़ाहिर है कि ऐसी कमज़ोर रिवायतों की बुनियाद पर कोई ऐसी बात मानने के लायक़ नहीं हो सकती जो मशहूर और जाने-माने वाक़िआत का रद्द करती हो।
92. यानी बेशक इस किताब का उतरना अल्लाह तआला की बहुत बड़ी मेहरबानी हैं और इसमें बन्दों के लिए बड़ी नसीहतें हैं, मगर इसका फ़ायदा सिर्फ़ वही लोग उठा सकते हैं जो इसपर ईमान लाएँ।
قُلۡ كَفَىٰ بِٱللَّهِ بَيۡنِي وَبَيۡنَكُمۡ شَهِيدٗاۖ يَعۡلَمُ مَا فِي ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۗ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ بِٱلۡبَٰطِلِ وَكَفَرُواْ بِٱللَّهِ أُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ۝ 49
(52) (ऐ नबी) कहो कि “मेरे और तुम्हारे बीच अल्लाह गवाही के लिए काफ़ी है। वह आसमानों और ज़मीन में सब कुछ जानता है। जो लोग बातिल (असत्य) को मानते हैं और अल्लाह से कुफ़्र करते हैं वही घाटे में रहनेवाले हैं।
وَيَسۡتَعۡجِلُونَكَ بِٱلۡعَذَابِ وَلَوۡلَآ أَجَلٞ مُّسَمّٗى لَّجَآءَهُمُ ٱلۡعَذَابُۚ وَلَيَأۡتِيَنَّهُم بَغۡتَةٗ وَهُمۡ لَا يَشۡعُرُونَ ۝ 50
(53) ये लोग तुमसे अज़ाब जल्दी लाने की माँग करते हैं।93 अगर एक वक़्त मुक़र्रर न कर दिया गया होता तो उनपर अज़ाब आ चुका होता। और यक़ीनन (अपने वक़्त पर) वह आकर रहेगा अचानक, इस हाल में कि इन्हें ख़बर भी न होगी।
93. यानी बार-बार चैलेंज के अन्दाज़ में माँग कर रहे हैं कि अगर तुम रसूल (पैग़म्बर) हो और हम सचमुच हक़ को झुठला रहे हैं तो हमपर वह अज़ाब क्यों नहीं ले आते जिसके डरावे तुम हमें दिया करते हो।
يَسۡتَعۡجِلُونَكَ بِٱلۡعَذَابِ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةُۢ بِٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 51
(54) ये तुमसे अज़ाब जल्दी लाने की माँग करते हैं, हालाँकि जहन्नम इन इनकारियों को घेरे में ले चुकी है।
يَوۡمَ يَغۡشَىٰهُمُ ٱلۡعَذَابُ مِن فَوۡقِهِمۡ وَمِن تَحۡتِ أَرۡجُلِهِمۡ وَيَقُولُ ذُوقُواْ مَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ۝ 52
(55) (और इन्हें पता चलेगा) उस दिन जबकि अज़ाब इन्हें ऊपर से भी ढाँक लेगा और पाँव के नीचे से भी और कहेगा कि अब चखो मज़ा उन करतूती का जो तुम करते थे।
يَٰعِبَادِيَ ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ أَرۡضِي وَٰسِعَةٞ فَإِيَّٰيَ فَٱعۡبُدُونِ ۝ 53
(56) ऐ मेरे बन्दो जो ईमान लाए हो, मेरी ज़मीन बहुत फैली हुई है, तो तुम मेरी ही बन्दगी करो।94
94. यह इशारा है हिजरत की तरफ़। मतलब यह है कि अगर मक्का में ख़ुदा की बन्दगी मुश्किल हो रही है तो देश छोड़कर निकल जाओ, ख़ुदा की ज़मीन तंग नहीं है। जहाँ भी तुम ख़ुदा के बन्दे बनकर रह सकते हो वहाँ चले जाओ। तुमको क़सम और वतन की नहीं, बल्कि अपने ख़ुदा की बन्दगी करनी चाहिए। इससे मालूम हुआ कि अस्ल चीज़ क़ौम, वतन और देश नहीं है, बल्कि अल्लाह की बन्दगी है। अगर किसी वक़्त क़ौम और वतन और देश की मुहब्बत के तक़ाज़े अल्लाह की बन्दगी के तक़ाज़ों से टकरा जाएँ तो वही वक़्त ईमानवाले के ईमान की आज़माइश का होता है। जो सच्चा ईमानवाला है वह अल्लाह की बन्दगी करेगा और क़ौम, वतन और देश को लात मार देगा। जो ईमान का झूठा दावेदार है वह ईमान को छोड़ देगा और अपनी क़ौम और अपने देश और वतन से चिमटा रहेगा। यह आयत इस सिलसिले में बिलकुल साफ़ है कि एक सच्चा ख़ुदा-परस्त इनसान क़ौम और वतन से मुहब्बत करनेवाला तो हो सकता है मगर क़ौम-परस्त और वतन-परस्त नहीं हो सकता। उसके लिए ख़ुदा की बन्दगी हर चीज़ से प्यारी है जिसपर दुनिया की हर चीज़ वह क़ुरबान कर देगा मगर उसे दुनिया की किसी चीज़ पर भी क़ुरबान न करेगा।
كُلُّ نَفۡسٖ ذَآئِقَةُ ٱلۡمَوۡتِۖ ثُمَّ إِلَيۡنَا تُرۡجَعُونَ ۝ 54
(57) हर जानदार को मौत का मज़ा चखना है, फिर तुम सब हमारी तरफ़ ही पलटाकर लाए जाओगे।95
95. यानी जान की फ़िक्र न करो। यह तो कभी-न-कभी जानी ही है। हमेशा रहने के लिए तो कोई भी दुनिया में नहीं आया है। लिहाज़ा तुम्हारे लिए फ़िक्र के लायक़ मसला यह नहीं है कि इस दुनिया में जान कैसे बचाई जाए, बल्कि अस्ल फ़िक्र के लायक़ मसला यह है कि ईमान कैसे बचाया जाए और ख़ुदा-परस्ती के तक़ाज़े कैसे पूरे किए जाएँ। आख़िरकार तुम्हें पलटकर हमारी तरफ़ ही आना है। अगर दुनिया में जान बचाने के लिए ईमान खोकर आए तो इसका नतीजा कुछ और होगा, और ईमान बचाने के लिए जान खो आए तो इसका अंजाम कुछ दूसरा होगा। इसलिए फ़िक्र जो कुछ भी करनी है इस बात की करो कि हमारी तरफ़ जब पलटोगे तो क्या लेकर पलटोगे, जान पर क़ुरबान किया हुआ ईमान? या ईमान पर क़ुरबान की हुई जान?
وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَعَمِلُواْ ٱلصَّٰلِحَٰتِ لَنُبَوِّئَنَّهُم مِّنَ ٱلۡجَنَّةِ غُرَفٗا تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ نِعۡمَ أَجۡرُ ٱلۡعَٰمِلِينَ ۝ 55
(58) जो लोग ईमान लाए हैं और जिन्होंने भले काम किए हैं उनको हम जन्नत की ऊँची-ऊँची इमारतों में रखेंगे जिनके नीचे नहरें बहती होंगी,यहाँ वे हमेशा रहेंगे, क्या ही अच्छा बदला है अमल करनेवालों के लिए।96
96. यानी अगर ईमान और नेकी के रास्ते पर चलकर मान लो तुम दुनिया की सारी नेमतों से महरूम (वंचित) भी रह गए और दुनियावी नज़रिए से सरासर नाकाम भी मरे तो यक़ीन रखो कि इसकी भरपाई बहरहाल होगी और निरी भरपाई हो न होगी, बल्कि बेहतरीन इनाम मिलेगा।
ٱلَّذِينَ صَبَرُواْ وَعَلَىٰ رَبِّهِمۡ يَتَوَكَّلُونَ ۝ 56
(59) उन लोगों के लिए जिन्होंने सब्र किया है97 और जो अपने रब पर भरोसा करते हैं।98
97. यानी जो हर तरह की मुश्किलों और मुसीबतों और नुक़सानों और तकलीफ़ों के मुक़ाबले में ईमान पर क़ायम रहे हैं, जिन्होंने ईमान लाने के ख़तरों को अपनी जान पर झेला है और मुँह नहीं मोड़ा है, ईमान छोड़ने के फ़ायदों और लाभों को अपनी आँखों से देखा है और उनकी तरफ़ ज़र्रा बराबर भी नहीं झुके हैं। अल्लाह का इनकार करनेवालों और उसके नाफ़रमानों को अपने सामने फलते-फूलते देखा है और उनको दौलत और शानो-शौकत पर एक निगाह भी ग़लत अन्दाज़ में नहीं डाली है।
98. यानी जिन्होंने भरोसा अपनी जायदादों और अपने कारोबारों और अपने ख़ानदान और क़बीले पर नहीं, बल्कि अपने रब पर किया। जो दुनिया के असबाब (संसाधनों) को नज़र-अन्दाज़ करके सिर्फ़ अपने रब के भरोसे पर ईमान की ख़ातिर हर ख़तरा सहने और हर ताक़त से टकरा जाने के लिए तैयार हो गए, और वक़्त आया तो घर-द्वार छोड़कर निकल खड़े हुए। जिन्होंने अपने रब पर यह भरोसा किया कि ईमान और नेकी पर क़ायम रहने का बदला उसके यहाँ कभी बरबाद न होगा और यक़ीन रखा कि वह अपने ईमानवाले और नेक बन्दों की इस दुनिया में भी मदद करेगा और आख़िरत में भी उनके अमल का बेहतरीन बदला देगा।
وَكَأَيِّن مِّن دَآبَّةٖ لَّا تَحۡمِلُ رِزۡقَهَا ٱللَّهُ يَرۡزُقُهَا وَإِيَّاكُمۡۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ ۝ 57
(60) कितने ही जानवर हैं जो अपनी रोज़ी उठाए नहीं फिरते, अल्लाह उनको रोज़ी देता है और तुम्हें रोज़ी देनेवाला भी वही है, वह सब कुछ सुनता और जानता है।99
99. यानी हिजरत करने में तुम्हें जान की फ़िक्र की तरह रोज़गार की फ़िक्र से भी परेशान न होना चाहिए। आख़िर ये अनगिनत जानवर और परिन्दे और पानी के जानवर जो तुम्हारी आँखों के सामने हवा और ख़ुश्की और पानी में फिर रहे हैं, इनमें से कौन अपना रिज़्क़ (खाना) उठाए फिरता है? अल्लाह ही तो इन सबको पाल रहा है। जहाँ जाते हैं अल्लाह की मेहरबानी से इनको किसी-न-किसी तरह रिज़्क़ मिल ही जाता है। लिहाज़ा तुम यह सोच-सोचकर हिम्मत न हारो कि अगर ईमान की ख़ातिर घर-द्वार छोड़कर निकल गए तो खाएँगे कहाँ से। अल्लाह जहाँ से अपने अनगिनत पैदा किए हुओं को रिज़्क़ (रोज़ी) दे रहा है, तुम्हें भी देगा। ठीक यही बात है जो हज़रत मसीह (अलैहि०) ने अपने हवारियों (साथियों) से कही थी उन्होंने कहा— “कोई आदमी दो मालिकों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से दुश्मनी और दूसरे से प्रेम रखेगा, या एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ समझेगा। तुम ख़ुदा और दौलत दोनों की सेवा नहीं कर सकते। इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि अपनी जान की फ़िक्र न करना कि हम क्या खाएँगे, क्या पिएँगे, और न अपने बदन की कि क्या पहनेंगे। क्या प्राण खाने से और बदन कपड़ों से बढ़कर नहीं? आकाश के परिन्दों को देखो कि न बोते हैं, न काटते हैं, न कोठियों में जमा करते हैं। फिर भी तुम्हारा आसमानी बाप उनको खिलाता है। क्या तुम उनसे ज़्यादा मूल्य नहीं रखते। तुममें से ऐसा कौन है जो फ़िक्र करके अपनी उम्र में एक घड़ी भी बढ़ा सके? और पोशाक (कपड़ों) के लिए क्यों फ़िक्र करते हो? जंगली सूसन के पेड़ों को ग़ौर से देखी कि वे किस तरह बढ़ते हैं। वे न मेहनत करते हैं, न कातते हैं, फिर भी में तुमसे कहता हैं कि सुलैमान भी बावजूद अपनी सारी शानो-शौकत के उनमें से किसी की तरह पोशाकवाला न था। तो जब ख़ुदा मैदान की घास को जो आज है और कल तन्दूर में झोंकी जाएगी, ऐसा लिबास पहनाता है तो ऐ कम यक़ीन करनेवालो, तुमको क्यों न वह पहनाएगा। इसलिए फ़िक्रमन्द न हो कि हम क्या खाएँगे या क्या पिएँगे या क्या पहनेंगे। इन सब चीज़ों की तलाश में तो ग़ैर-क़ौमें रहती हैं। तुम्हारा आसमानी बाप जानता है कि तुम इन सब चीज़ों के मुहताज हो। अतः तुम पहले उसकी बादशाही और उसकी सच्चाई को खोजो। ये सब चीज़ें भी तुम्हें मिल जाएँगी। कल के लिए फ़िक्र न करो। कल का दिन अपनी फ़िक्र आप कर लेगा आज के लिए आज ही का दुख काफ़ी है।” (मत्ती, अध्याय-6, आयतें—24-34) क़ुरआन और इंजील की इन बातों का पसमंज़र (पृष्ठभूमि) एक ही है। सच्चाई की तरफ़ बुलाने की राह में एक मरहला ऐसा आ जाता है जिसमें एक हक़परस्त (सत्यवादी) आदमी के लिए इसके सिवा चारा नहीं रहता कि आलमे-असबाब (कारणों और संसाधनों की दुनिया) के तमाम सहारों से बेपरवाह होकर सिर्फ़ अल्लाह के भरोसे पर जान जोखिम में डाल दे। इन हालात में वे लोग कुछ नहीं कर सकते जो हिसाब लगा-लगाकर आनेवाले दिनों के इमकानात का जाइज़ा लेते हैं और क़दम उठाने से पहले जान की हिफ़ाज़त और रोज़ी के हासिल होने की ज़मानतें तलाश करते हैं। हक़ीक़त में इस तरह के हालात बदलते ही उन लोगों की ताक़त से हैं जो सर हथेली पर लेकर उठ खड़े हों और हर ख़तरे का सामना करने के लिए बेधड़क तैयार हो जाएँ। उन्हीं की क़ुरबानियाँ आख़िरकार वह वक़्त लाती हैं जब अल्लाह का कलिमा बुलन्द होता है और उसके मुक़ाबले में सारी आवाज़ें दबकर रह जाती हैं।
وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّنۡ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ وَسَخَّرَ ٱلشَّمۡسَ وَٱلۡقَمَرَ لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُۖ فَأَنَّىٰ يُؤۡفَكُونَ ۝ 58
(61) अगर तुम100 इन लोगों से पूछो कि ज़मीन और आसमानों को किसने पैदा किया है और चाँद और सूरज को किसने ख़िदमत में लगा रखा है तो ज़रूर कहेंगे कि अल्लाह ने, फिर ये किधर से धोखा खा रहे हैं?
100. यहाँ से फिर बात का रुख़ मक्का के इस्लाम-दुश्मनों की तरफ़ मुड़ता है।
ٱللَّهُ يَبۡسُطُ ٱلرِّزۡقَ لِمَن يَشَآءُ مِنۡ عِبَادِهِۦ وَيَقۡدِرُ لَهُۥٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٞ ۝ 59
(62) अल्लाह ही है जो अपने बन्दों में से जिसकी चाहता है रोज़ी कुशादा करता है और जिसकी चाहता है तंग करता है, यक़ीनन अल्लाह हर चीज़ का जाननेवाला है।
وَلَئِن سَأَلۡتَهُم مَّن نَّزَّلَ مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءٗ فَأَحۡيَا بِهِ ٱلۡأَرۡضَ مِنۢ بَعۡدِ مَوۡتِهَا لَيَقُولُنَّ ٱللَّهُۚ قُلِ ٱلۡحَمۡدُ لِلَّهِۚ بَلۡ أَكۡثَرُهُمۡ لَا يَعۡقِلُونَ ۝ 60
(63) और अगर तुम इनसे पूछो कि किसने आसमान से पानी बरसाया और उसके ज़रिए से मुर्दा पड़ी हुई ज़मीन की जिला उठाया तो वे ज़रूर कहेंगे अल्लाह ने। कहो, “अल-हम्दुलिल्लाह"101 मगर अकसर लोग समझते नहीं हैं।
101. अस्ल अरबी में लफ़्ज़ 'अल-हम्दुलिल्लाह' इस्तेमाल हुआ है। इस जगह यह लफ़्ज़ दो मतलब दे रहा है। एक यह कि जब ये सारे काम अल्लाह के हैं तो फिर हम्द (तारीफ़ व शुक्र) का हक़दार भी सिर्फ़ वही है, दूसरों को हम्द का हक़ कहाँ से पहुँच गया? दूसरा यह कि ख़ुदा का शुक्र है, इस बात को तुम ख़ुद भी मानते हो।
وَمَا هَٰذِهِ ٱلۡحَيَوٰةُ ٱلدُّنۡيَآ إِلَّا لَهۡوٞ وَلَعِبٞۚ وَإِنَّ ٱلدَّارَ ٱلۡأٓخِرَةَ لَهِيَ ٱلۡحَيَوَانُۚ لَوۡ كَانُواْ يَعۡلَمُونَ ۝ 61
(64) और यह दुनिया की ज़िन्दगी कुछ नहीं है, मगर एक खेल और दिल का बहलावा।102 अस्ल ज़िन्दगी का घर तो आख़िरत का घर है, काश ये लोग जानते।103
102. यानी इसकी हक़ीक़त बस इतनी ही है जैसे बच्चे थोड़ी देर के लिए खेल-कूद लें और फिर अपने-अपने घर को सिधारें। यहाँ जो बादशाह बन गया है वह हक़ीक़त में बादशाह नहीं बन गया है, बल्कि सिर्फ़ बादशाही का ड्रामा कर रहा है। एक वक़्त आता है जब उसका यह खेल ख़त्म हो जाता है और उसी बे-सरो-सामानी के साथ वह दुनिया से रुख़सत हो जाता है जिसके साथ वह दुनिया में आया था। इसी तरह ज़िन्दगी की कोई शक्ल भी यहाँ हमेशा रहनेवाली और टिकाऊ नहीं है। जो जिस हाल में भी है आरज़ी (अस्थायी) तौर पर एक (तय) महदूद वक़्त के लिए है। इस कुछ दिनों की ज़िन्दगी की कामयाबियों पर जो लोग मरे-मिटते हैं और उन्हीं के लिए ज़मीर (अन्तरात्मा) और ईमान की बाज़ी लगाकर कुछ ऐशो-आराम का सामान और कुछ दिनों की शानो-शौकत के ठाठ हासिल कर लेते हैं। उनकी ये सारी हरकतें दिल के बहलावे से ज़्यादा कुछ नहीं है, इन खिलौनों से अगर वे दस-बीस या साठ-सत्तर साल दिल बहला लें और फिर मौत के दरवाज़े से ख़ाली हाथ गुज़रकर उस दुनिया में पहुँचे जहाँ की हमेशा रहनेवाली ज़िन्दगी में उनका यही खेल न टलनेवाली आफ़त साबित हो तो आख़िर इस बचकाना झूठी तसल्ली का फ़ायदा क्या है?
103. यानी अगर ये लोग इस सच्चाई को जानते कि दुनिया की मौजूदा ज़िन्दगी सिर्फ़ इम्तिहान की एक मुहलत है, और इनसान के लिए अस्ल ज़िन्दगी जो हमेशा-हमेशा बाक़ी रहनेवाली है, आख़िरत की ज़िन्दगी है, तो वे यहाँ इम्तिहान की मुद्दत को इस खेल-तमाशे में बरबाद करने के बजाय इसका एक-एक पल उन कामों में इस्तेमाल करते जो उस हमेशा की ज़िन्दगी में बेहतर नतीजे पैदा करनेवाले हों।
فَإِذَا رَكِبُواْ فِي ٱلۡفُلۡكِ دَعَوُاْ ٱللَّهَ مُخۡلِصِينَ لَهُ ٱلدِّينَ فَلَمَّا نَجَّىٰهُمۡ إِلَى ٱلۡبَرِّ إِذَا هُمۡ يُشۡرِكُونَ ۝ 62
(65) जब ये लोग नाव पर सवार होते हैं तो अपने दीन को अल्लाह के लिए खालिस करके दुआ माँगते हैं, फिर जब वह इन्हें बचाकर ख़ुश्की (सूखे) पर ले आता है तो यकायक यह शिर्क करने लगते हैं
لِيَكۡفُرُواْ بِمَآ ءَاتَيۡنَٰهُمۡ وَلِيَتَمَتَّعُواْۚ فَسَوۡفَ يَعۡلَمُونَ ۝ 63
(66) ताकि अल्लाह की दी हुई नजात पर उसकी नाशुक्री करें और (दुनिया की ज़िन्दगी के) मज़े लूटें।104 अच्छा, जल्द ही इन्हें मालूम हो जाएगा।
104. तशरीह के लिए देखिए तफ़हीमुल-क़ुरआन, सूरा-6 अनआम, हाशिया-29,41; सूरा-10 यूनुस, हाशिया-29, 31; सूरा-17 बनी-इसराईल, हाशिया-84।
أَمۡ حَسِبَ ٱلَّذِينَ يَعۡمَلُونَ ٱلسَّيِّـَٔاتِ أَن يَسۡبِقُونَاۚ سَآءَ مَا يَحۡكُمُونَ ۝ 64
(4) और क्या वे लोग जो बुरी हरकतें कर रहे4 हैं यह समझे बैठे हैं कि वे हमसे बाज़ी ले जाएँगे?5 बड़ा ग़लत हुक्म है जो वे लगा रहे हैं।
4. इससे मुराद हालाँकि तमाम वे लोग हो सकते हैं जो अल्लाह तआला की नाफ़रमानियाँ करते हैं, लेकिन यहाँ ख़ास तौर पर बात का रुख़ क़ुरैश के उन ज़ालिम सरदारों की तरफ़ है जो इस्लाम की मुख़ालफ़त में और इस्लाम क़ुबूल करनेवालों को तकलीफ़ें देने में उस वक़्त आगे-आगे थे। मिसाल के तौर पर वलीद-बिन-मुग़ीरा, अबू-जह्ल, उतबा, शैबा, उक़बा-बिन-अबी-मुऐेत और हंज़ला-बिन-वाइल वग़ैरा। मौक़ा-महल ख़ुद यहाँ तक़ाज़ा कर रहा है कि मुसलमानों को आज़माइशों के मुक़ाबले में सब्र और जमाव की नसीहत करने के बाद डाँट-फटकार की एक बात उन लोगों से भी कही जाए जो इन हक़परस्तों पर ज़ुल्म ढा रहे थे।
5. यह मतलब भी हो सकता है कि “हमारी पकड़ से बचकर कहीं भाग सकेंगे” अस्ल अरबी अलफ़ाज़ है 'यसबिक़ूना' यानी हमसे आगे निकल जाएँगे। इसके दो मतलब हो सकते हैं। एक यह कि जो कुछ हम करना चाहते हैं (यानी अपने रसूल के मिशन की कामयाबी) वह तो न हो सके और जो कुछ ये चाहते हैं (यानी हमारे रसूल को नीचा दिखाना) वह हो जाए दूसरा यह कि हम इनकी ज़्यादतियों पर इन्हें पकड़ना चाहते हों और ये भागकर हमारी पहुँच से दूर निकल जाएँ।
مَن كَانَ يَرۡجُواْ لِقَآءَ ٱللَّهِ فَإِنَّ أَجَلَ ٱللَّهِ لَأٓتٖۚ وَهُوَ ٱلسَّمِيعُ ٱلۡعَلِيمُ ۝ 65
(5) जो कोई अल्लाह से मिलने की उम्मीद रखता हो (उसे मालूम होना चाहिए कि) अल्लाह का मुक़र्रर किया हुआ वक़्त आने ही वाला है,6 और अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।7
6. यानी जो शख़्स आख़िरत की ज़िन्दगी को मानता ही न हो और यह समझता हो कि कोई नहीं है जिसके सामने हमें अपने कामों का हिसाब देना हो और कोई वक़्त ऐसा नहीं आना है जब हमसे हमारी ज़िन्दगी के कामों का हिसाब लिया जाए, उसका मामला तो दूसरा है। वह अपनी ग़फ़लत में पड़ा रहे और बेफ़िक्री के साथ जो कुछ चाहे करता रहे। अपना नतीजा अपने अन्दाज़ों के ख़िलाफ़ वह ख़ुद देख लेगा। लेकिन जो लोग यह उम्मीद रखते हैं कि एक वक़्त हमें अपने ख़ुदा के सामने हाज़िर होना है और अपने आमाल के मुताबिक़ इनाम और सज़ा भी पानी है, उन्हें इस ग़लतफ़हमी में न रहना चाहिए कि मौत का वक़्त कुछ बहुत दूर है। उनको तो यह समझना चाहिए कि वह बस क़रीब ही आ लगा है और अमल की मुहलत ख़त्म होने ही वाली है। इसलिए जो कुछ भी वे अपनी आख़िरत की ज़िन्दगी की भलाई के लिए कर सकते हों, कर लें। लम्बी उम्र के बेबुनियाद भरोसे पर अपने सुधार में देर न लगाएँ।
7. यानी उनको इस ग़लतफ़हमी में भी न रहना चाहिए कि उनका वास्ता किसी बेख़बर चीज़ से है। जिस ख़ुदा के सामने उन्हें जवाबदेही के लिए हाज़िर होना है वह बेख़बर नहीं, बल्कि सब कुछ सुनने और सब कुछ जाननेवाला ख़ुदा है, उनकी कोई बात भी उससे छिपी हुई नहीं है।
أَوَلَمۡ يَرَوۡاْ أَنَّا جَعَلۡنَا حَرَمًا ءَامِنٗا وَيُتَخَطَّفُ ٱلنَّاسُ مِنۡ حَوۡلِهِمۡۚ أَفَبِٱلۡبَٰطِلِ يُؤۡمِنُونَ وَبِنِعۡمَةِ ٱللَّهِ يَكۡفُرُونَ ۝ 66
(67) क्या ये देखते नहीं हैं कि हमने एक पुर-अम्न (शान्तिपूर्ण) हरम (प्रतिष्ठित स्थान) बना दिया है, हालाँकि इनके आसपास ही लोग उचक लिए जाते हैं?105 क्या फिर भी ये लोग बातिल (असत्य) को मानते हैं और अल्लाह की नेमतों (अनुकम्पाओं) की नाशुक्री करते हैं?
105. यानी क्या इनके शहर मक्का को, जिसके दामन में इन्हें कमाल दरजे का अम्न हासिल है, किसी लात या हुबल (नामी देवता) ने हरम (प्रतिष्ठित स्थान) बनाया है? क्या किसी देवी या देवता की यह क़ुदरत थी कि ढाई हज़ार साल से अरब की इन्तिहाई बदअम्नी के माहौल में इस जगह को तमाम फ़ितनों और फ़सादों से महफ़ूज़ रखता? इसकी हुरमत (प्रतिष्ठा) को बनाए रखनेवाले हम न थे तो और कौन था?
وَمَنۡ أَظۡلَمُ مِمَّنِ ٱفۡتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًا أَوۡ كَذَّبَ بِٱلۡحَقِّ لَمَّا جَآءَهُۥٓۚ أَلَيۡسَ فِي جَهَنَّمَ مَثۡوٗى لِّلۡكَٰفِرِينَ ۝ 67
(68) उस शख़्स से बढ़कर ज़ालिम कौन होगा जो अल्लाह पर झूठ बाँधे या हक़ को झुठलाए, जबकि वह उसके सामने आ चुका हो?106 क्या ऐसे इनकारियों का ठिकाना जहन्नम ही नहीं है?
106. यानी पैग़म्बर ने पैग़म्बरी का दावा किया है कि वह ख़ुदा का भेजा हुआ है और तुमने उसे झुठला दिया है। अब मामला दो हाल से ख़ाली नहीं। अगर पैग़म्बर ने अल्लाह का नाम लेकर झूठा दावा किया है तो उससे बड़ा ज़ालिम कोई नहीं। और अगर तुमने सच्चे पैग़म्बर को झुठलाया है तो फिर तुमसे बड़ा ज़ालिम कोई नहीं।
وَٱلَّذِينَ جَٰهَدُواْ فِينَا لَنَهۡدِيَنَّهُمۡ سُبُلَنَاۚ وَإِنَّ ٱللَّهَ لَمَعَ ٱلۡمُحۡسِنِينَ ۝ 68
(69) जो लोग हमारी ख़ातिर जिद्दो-जुह्द करेंगे उन्हें हम अपने रास्ते दिखाएँगे107 और यक़ीनन अल्लाह भले काम करनेवालों ही के साथ है।
107. अस्ल अरबी में लफ़ज़ 'मुजाहदा' इस्तेमाल हुआ है, इसकी तशरीह (व्याख्या) इसी सूरा-29 अन्‌कबूत के हाशिया-8 में गुज़र चुकी है। वहाँ यह कहा गया था कि जो शख़्स मुजाहदा (अनथक प्रयास) करेगा वह अपनी ही भलाई के लिए करेगा। (आयत-6)। यहाँ यह इत्मीनान दिलाया जा रहा है कि जो लोग अल्लाह की राह में सच्चे दिल से दुनिया भर से कशमकश का ख़तरा मोल ले लेते हैं, उन्हें अल्लाह तआला उनके हाल पर नहीं छोड़ देता, बल्कि वह उनकी मदद और रहनुमाई करता है और अपनी तरफ़ आने की राहें उनके लिए खोल देता है। वह क़दम-क़दम पर उन्हें बताता है कि हमारी ख़ुशनूदी तुम किस तरह हासिल कर सकते हो। हर-हर मोड़ पर उन्हें रौशनी दिखाता है कि सीधा रास्ता किधर है और ग़लत रास्ते कौन-से हैं। जितनी नेक नीयती और भलाई की तलब उनमें होती है, उतनी ही अल्लाह की मदद, तौफ़ीक़ और हिदायत भी उनके साथ रहती है।