(118) और उन तीनों को भी उसने माफ़ किया जिनके मामले को टाल दिया गया था।118 जब ज़मीन अपने सारे फैलाव के बावजूद उनपर तंग हो गई और उनकी जानें भी उनपर बोझ होने लगीं और उन्होंने जान लिया कि अल्लाह से बचने के लिए कोई पनाहगाह ख़ुद अल्लाह ही की रहमत के दामन के सिवा नहीं है, तो अल्लाह अपनी मेहरबानी से उनकी तरफ़ पलटा, ताकि वे उसकी तरफ़ पलट आएँ यक़ीनन वह बड़ा माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।119
118. नबी (सल्ल०) जब तबूक से मदीना वापस आए तो वे लोग मजबूरी बयान करने के लिए हाज़िर हुए जो पीछे रह गए थे। उनमें 80 से कुछ ज़्यादा मुनाफ़िक़ थे और तीन सच्चे ईमानवाले भी थे। मुनाफ़िक़ झूठे बहाने पेश करते गए और नबी (सल्ल०) उनकी मजबूरी क़ुबूल करते चले गए। फिर इन तीनों की बारी आई और इन्होंने साफ़-साफ़ अपनी ग़लतियों को मान लिया। नबी (सल्ल०) ने इन तीनों के मामले में फ़ैसले को आगे के लिए टाल दिया और आम मुसलमानों को हुक्म दे दिया कि जब तक अल्लाह का हुक्म न आए इनसे किसी तरह का समाजी ताल्लुक़ न रखा जाए। इसी मामले का फ़ैसला करने के लिए यह आयत नाज़िल हुई। जल (यहाँ यह बात सामने रहे कि इन तीन सहाबियों का मामला उन सात सहाबियों से अलग है, जिनका ज़िक्र हाशिया-99 में गुज़र चुका है। उन्होंने पूछताछ से पहले ख़ुद अपने आपको सज़ा दे ली थी।)
119. ये तीनों सहाबी कअब-बिन-मालिक, हिलाल-बिन-उमैया और मुरारह-बिन-रुबैअ थे। जैसा कि ऊपर हम बयान कर चुके हैं तीनों सच्चे मोमिन थे। इससे पहले अपने इख़लास का बहुत बार सुबूत दे चुके थे। क़ुरबानियाँ कर चुके थे। आख़िर के दो सहाबी तो बद्र की लड़ाई में शरीक होनेवालों में से थे, जिनका सच्चा ईमान हर शक और शुब्हे से परे था। और पहले सहाबी हालाँकि बद्र की लड़ाई में शरीक नहीं थे, लेकिन बद्र के सिवा हर लड़ाई में नबी (सल्ल०) के साथ रहे। इन ख़िदमात के बावजूद जो सुस्ती इस नाज़ुक मौक़े पर, जबकि तमाम जंग के क़ाबिल ईमानवालों को जंग के लिए निकल आने का हुक्म दिया गया था, इन लोगों ने दिखाई उसपर सख़्त पकड़ की गई। नबी (सल्ल०) ने तबूक से वापस आकर मुसलमानों को हुक्म दे दिया कि कोई इनसे सलाम-कलाम न करे। 40 दिन के बाद उनकी बीवियों को भी उनसे अलग रहने की ताकीद कर दी गई। सच तो यह है कि मदीना की बस्ती में उनकी वही हालत हो गई थी, जिसकी तस्वीर इस आयत में खींची गई है। आख़िरकार जब इनके बॉइकाट को पचास (50) दिन हो गए तब माफ़ी का यह हुक्म नाज़िल हुआ।
इन तीनों सहाबियों में से हज़रत कअब-बिन-मालिक ने अपना क़िस्सा बहुत तफ़सील के साथ बयान किया है जो बहुत ही सबक़आमोज़ (शिक्षाप्रद) है। अपने बुढ़ापे के ज़माने में जबकि वे नाबीना (नेत्रहीन) हो चुके थे, उन्होंने अपने बेटे अब्दुल्लाह से जो उनका हाथ पकड़कर उन्हें चलाया करते थे, यह क़िस्सा ख़ुद बयान किया—
"तबूक की मुहिम की तैयारी ज़माने में नबी (सल्ल०) जब कभी मुसलमानों से जंग में शिरकत की अपील करते थे, मैं अपने दिल में इरादा कर लेता था कि चलने की तैयारी करूँगा, मगर फिर वापस आकर सुस्ती कर जाता था और कहता था कि अभी क्या है, जब चलने का वक़्त आएगा तो तैयार होते क्या देर लगती है। इसी तरह बात टलती रही, यहाँ तक कि लश्कर की रवानगी का वक़्त आ गया और मैं तैयार न था। मैंने दिल में कहा कि लश्कर को चलने दो, मैं एक-दो दिन बाद रास्ते ही में उससे जा मिलूँगा। मगर फिर वही सुस्ती रुकावट बनी, यहाँ तक कि वक़्त निकल गया।
उस ज़माने में जबकि मैं मदीना में रहा मेरा दिल यह देख-देखकर बेहद कुढ़ता था कि मैं पीछे जिन लोगों के साथ रह गया हूँ वे या तो मुनाफ़िक़ हैं या वे बूढ़े और मजबूर लोग जिनको अल्लाह ने कमज़ोर और बेबस रखा है।
जब नबी (सल्ल०) तबूक से वापस आ गए तो मामूल के मुताबिक़ आप (सल्ल०) ने पहले मस्जिद आकर दो रकअत नमाज़ पढ़ी, फिर लोगों से मुलाक़ात के लिए बैठे। इस मजलिस में मुनाफ़िक़ों ने आ-आकर झूठे बहाने लम्बी-चौड़ी क़समों के साथ पेश करने शुरू किए। ये 80 से ज़्यादा आदमी थे। नबी (सल्ल०) ने उनमें से एक-एक की बनावटी बातें सुनीं। उनके ज़ाहिरी बहानों को क़ुबूल कर लिया और उनके बातिन (अन्दरून) को ख़ुदा पर छोड़कर फ़रमाया, ख़ुदा तुम्हें माफ़ करे। फिर मेरी बारी आई। मैंने आगे बढ़कर सलाम किया। आप मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए और फ़रमाया, “तशरीफ़ लाइए! आपको किस चीज़ ने रोका था?” मैंने कहा कि “ख़ुदा की क़सम, अगर मैं दुनियावालों में से किसी के सामने हाज़िर हुआ होता तो ज़रूर कोई न कोई बात बनाकर उसको राज़ी करने की कोशिश करता, बातें बनानी मुझे भी आती हैं, मगर मैं आपके बारे में यक़ीन रखता हूँ कि अगर इस वक़्त कोई झूठा बहाना पेश करके मैंने आपको राज़ी कर भी लिया तो अल्लाह ज़रूर आपको मुझसे फिर नाराज़ कर देगा। अलबत्ता अगर सच कहूँ तो चाहे आप नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह मेरे लिए माफ़ी की कोई सूरत पैदा फ़रमा देगा। सच्ची बात यह है कि मेरे पास कोई बहाना नहीं है जिसे पेश कर सकूँ, मैं जाने पर पूरी क़ुदरत रखता था।” इसपर नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, “यह शख़्स है जिसने सच्ची बात कही। अच्छा, उठ जाओ और इन्तिज़ार करो यहाँ तक कि अल्लाह तुम्हारे मामले में कोई फ़ैसला करे।” मैं उठा और अपने क़बीले के लोगों में जा बैठा। यहाँ सब-के-सब मेरे पीछे पड़ गए और मुझे बहुत मलामत की कि तूने कोई बहाना क्यों न कर दिया। ये बातें सुनकर मेरा मन भी कुछ आमादा होने लगा कि फिर हाज़िर होकर कोई बात बना दूँ। मगर जब मुझे मालूम हुआ कि दो और नेक आदमियों (मुरारा-बिन-रुबैअ और हिलाल-बिन-उमैया) ने भी वही सच्ची बात कही है जो मैंने कही थी, तो मुझे तसल्ली हो गई और मैं अपनी सच्चाई पर जमा रहा।
उसके बाद नबी (सल्ल०) ने आम हुक्म दे दिया कि हम तीनों आदमियों से कोई बात न करे। वे दोनों तो घर बैठ गए, मगर में निकलता था, जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ता था, बाज़ारों में चलता-फिरता था और कोई मुझसे बात न करता था। ऐसा मालूम होता था कि यह ज़मीन बिलकुल बदल गई है, मैं यहाँ अजनबी हूँ और इस बस्ती में कोई भी मेरा जानकार नहीं मस्जिद में नमाज़ के लिए जाता तो आम दिनों की तरह नबी (सल्ल०) को सलाम करता था, मगर बस इन्तिज़ार ही करता रह जाता था कि जवाब के लिए आप (सल्ल०) के होंठ हिलें। नमाज़ में नज़रें चुराकर नबी (सल्ल०) को देखता था कि आप (सल्ल०) की निगाहें मुझपर कैसी पड़ती हैं। मगर वहाँ हाल यह था कि जब तक मैं नमाज़ पढ़ता आप (सल्ल०) मेरी तरफ़ देखते रहते, और जहाँ मैंने सलाम फेरा कि आप (सल्ल०) ने मेरी तरफ़ से नज़र हटाई। एक दिन मैं घबराकर अपने चचेरे भाई और बचपन के दोस्त अबू-क़तादा के पास गया और उनके बाग़ की दीवार पर चढ़कर उन्हें सलाम किया। मगर उस अल्लाह के बन्दे ने सलाम का जवाब तक न दिया। मैंने कहा, “अबू-क़तादा! मैं तुमको ख़ुदा की क़सम देकर पूछता हूँ, क्या मैं उसके रसूल से मुहब्बत नहीं रखता?” वे ख़ामोश रहे। मैंने फिर पूछा। वे फिर ख़ामोश रहे। तीसरी बार जब मैंने क़सम देकर यही सवाल किया तो उन्होंने बस इतना कहा कि “अल्लाह और उसका रसूल ही बेहतर जानता है।” इसपर मेरी आँखों से आँसू निकल आए और मैं दीवार से उतर आया। उन्हीं दिनों एक बार मैं बाज़ार से गुज़र रहा था कि शाम के नबतियों में से एक शख़्स मुझे मिला और उसने ग़स्सान के बादशाह का ख़त रेशम में लिपटा हुआ मुझे दिया। मैंने खोल कर पढ़ा तो उसमें लिखा था कि “हमने सुना है तुम्हारे साहिब ने तुमपर सितम तोड़ रखा है, तुम कोई गिरे-पड़े आदमी नहीं हो, न इस लायक़ हो कि तुम्हें खो दिया जाए, हमारे पास आ जाओ, हम तुम्हारी क़द्र करेंगे। मैंने कहा, यह एक और बला नाज़िल हुई, और उसी वक़्त उस ख़त को चूल्हे में झोंक दिया।
चालीस दिन इस हालत पर गुज़र चुके थे कि नबी (सल्ल०) का आदमी हुक्म लेकर आया कि अपनी बीवी से भी अलग हो जाओ। मैंने पूछा, क्या तलाक़ दे दूँ? जवाब मिला, नहीं, बस अलग रहो। चुनाँचे मैंने अपनी बीवी से कह दिया कि तुम अपने मायके चली जाओ और इन्तिज़ार करो, यहाँ तक कि अल्लाह इस मामले का फ़ैसला कर दे।
पचासवें दिन सुबह की नमाज़ के बाद मैं अपने मकान की छत पर बैठा हुआ था और अपनी जान से बेज़ार हो रहा था कि अचानक किसी शख़्स ने पुकारकर कहा, “मुबारक हो कअब-बिन-मालिक!” मैं यह सुनते ही सजदे में गिर गया और मैंने जान लिया कि मेरी माफ़ी का हुक्म हो गया है। फिर तो फ़ौज-दर-फ़ौज लोग भागे चले आ रहे थे और हर एक-दूसरे से पहले पहुँचकर मुझको मुबारकबाद दे रहा था कि तेरी तौबा क़ुबूल हो गई। मैं उठा और सीधा मस्जिदे-नबवी की तरफ़ चला। देखा कि नबी (सल्ल०) का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा है। मैंने सलाम किया तो फ़रमाया, “तुझे मुबारक हो, यह दिन तेरी ज़िन्दगी में सबसे बेहतर है।” मैंने पूछा, यह माफ़ी नबी (सल्ल०) की तरफ़ से है या अल्लाह की तरफ़ से? फ़रमाया, अल्लाह की तरफ़ से, और ये आयतें सुनाईं। मैंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी तौबा में यह भी शामिल है कि मैं अपना सारा माल अल्लाह के रास्ते में सदक़ा कर दूँ। फ़रमाया कि “कुछ रहने दो कि यह तुम्हारे लिए बेहतर है।” मैंने इस हिदायत के मुताबिक़ अपना ख़ैबर का हिस्सा रख लिया। बाक़ी सब सदक़ा कर दिया। फिर मैंने अल्लाह से अह्द किया कि जिस सच्ची बात के कहने के बदले में अल्लाह ने मुझे माफ़ी दी है उसपर तमाम उमर क़ायम रहूँगा, चुनाँचे आज तक मैंने कोई बात जान-बूझकर सच्चाई के ख़िलाफ़ नहीं कही और अल्लाह से उम्मीद रखता हूँ कि आगे भी मुझे इससे बचाएगा।"
यह क़िस्सा अपने अन्दर बहुत-से सबक़ रखता है जो हर ईमानवाले के दिल में नक़्श होने चाहिएँ—
सबसे पहली बात तो इससे यह मालूम हुई कि कुफ़्र और इस्लाम की कशमकश का मामला कितना अहम और कितना नाज़ुक है कि इस कशमकश में कुफ़्र का साथ देना तो बहुत दूर की बात, जो शख़्स इस्लाम का साथ देने में, बदनीयती से भी नहीं नेक नीयती से, तमाम उम्र भी नहीं किसी एक मौक़े ही पर, कोताही बरत जाता है उसकी भी ज़िन्दगी भर की इबादत गुज़ारियाँ और दीनदारियाँ ख़तरे में पड़ जाती हैं, यहाँ तक कि ऐसे बड़े-बड़े इज़्ज़तदार लोग भी गिरफ़्त से नहीं बचते जो बद्र व उहुद और अहज़ाब व हुनैन की सख़्त लड़ाइयों में जाँबाज़ी के जौहर दिखा चुके थे और जिनके इख़लास और ईमान में ज़र्रा बराबर भी शक नहीं था। दूसरी बात जो इससे कुछ कम अहम नहीं, यह है कि फ़र्ज़ के अदा करने में सुस्ती दिखाना कोई मामूली चीज़ नहीं है, बल्कि कई बार सिर्फ़ सुस्ती ही सुस्ती में आदमी कोई ऐसी ग़लती कर जाता है जिसकी गिनती बड़े गुनाहों में होती है, और उस वक़्त यह बात उसे पकड़ से नहीं बचा सकती कि उसने उस ग़लती को बदनीयती से नहीं किया था।
फिर यह क़िस्सा उस समाज की रूह को बड़ी ख़ूबी के साथ हमारे सामने बेनक़ाब करता है जो नबी (सल्ल०) की अगुवाई में बना था। एक तरफ़ मुनाफ़िक़ हैं जिनकी ग़द्दारियाँ सबपर खुली हुई हैं, मगर उनकी ज़ाहिरी बहानेबाज़ियाँ सुन ली जाती हैं और उनको माफ़ कर दिया जाता है; क्योंकि उनसे ख़ुलूस की उम्मीद ही कब थी कि अब उसके न होने की शिकायत की जाती। दूसरी तरफ़ एक आज़माया हुआ मोमिन है जिसकी जाँनिसारी पर शुब्हे तक की गुंजाइश नहीं, और वह झूठी बातें भी नहीं बनाता, साथ-साथ ग़लतियों को मान लेता है मगर उसपर ग़ज़ब की बारिश बरसा दी जाती है, न इस वजह से कि उसके मोमिन होने में कोई शुब्हा हो गया है, बल्कि इस वजह से कि मोमिन होकर उसने वह काम क्यों किया जो मुनाफ़िक़ों के करने का था। मतलब यह था कि ज़मीन के नमक तो तुम हो, तुमसे भी अगर नमकीनी हासिल न हुई तो फिर और नमक कहाँ से आएगा। फिर मज़े की बात यह है कि इस सारे मामले में लीडर जिस शान से सज़ा देता है और लीडर की पैरवी करनेवाला जिस शान से इस सज़ा को भुगतता है, और पूरी जमाअत जिस शान से इस सज़ा को लागू करती है, उसका हर पहलू बेमिसाल है और यह फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि किसकी ज़्यादा तारीफ़ की जाए। लीडर बहुत ही सख़्त सज़ा दे रहा है मगर ग़ुस्से और नफ़रत के साथ नहीं, गहरी मुहब्बत के साथ दे रहा है। बाप की तरह ग़ुस्सैल निगाहों का एक गोशा हर वक्त यह ख़बर दिए जाता है कि तुझसे दुश्मनी नहीं है, बल्कि तेरी ग़लती पर तेरी ही वजह से दिल दुखा है। तू ठीक हो जाए तो यह सीना तुझे चिमटा लेने के लिए बेचैन है। पैरौ सज़ा की सख़्ती पर तड़प रहा है मगर सिर्फ़ यही नहीं कि उसका क़दम इताअत के रास्ते से एक पल के लिए भी नहीं डगमगाता, और सिर्फ़ यही नहीं कि उसपर गुरूरे-नफ़्स और हमीयते-जाहिलिया (अज्ञानपूर्ण पक्षपात) का कोई दौरा नहीं पड़ता और खुल्लम-खुल्ला तकब्बुर पर उतर आना तो दूर की बात, वह दिल में अपने महबूब लीडर के ख़िलाफ़ कोई शिकायत तक नहीं आने देता, बल्कि इसके बरख़िलाफ़ वह लीडर की मुहब्बत में और ज़्यादा डूब गया है। सज़ा के इन पूरे पचास दिनों में उसकी नज़रें सबसे ज़्यादा बेताबी के साथ जिस चीज़ की तलाश में रहीं वह यह थी कि सरदार की आँखों में थोड़ी-सी भी तवज्जोह बाक़ी है या नहीं जो उसकी उम्मीदों का आख़िरी सहारा है। मानो वह एक सूखे का मारा किसान था जिसकी उम्मीद का सारा सरमाया बस एक ज़रा-सी वह बदली थी जो आसमान के किनारे पर नज़र आती थी। फिर जमाअत को देखिए तो उसके डिसिप्लिन और उसकी नेक अख़लाक़ी स्प्रिट पर इनसान हैरान रह जाता है। डिसिप्लिन का यह हाल कि उधर लीडर की ज़बान से बायकॉट का हुक्म निकला, इधर पूरी जमाअत ने मुजरिम से निगाहें फेर लीं। सबके सामने तो बहुत दूर की बात, तनहाई तक में भी कोई क़रीब-से-क़रीब रिश्तेदार और कोई गहरे-से-गहरा दोस्त भी उससे बात नहीं करता। बीवी तक उससे अलग हो जाती है। ख़ुदा का वास्ता दे-देकर पूछता है कि मेरे ख़ुलूस में तो तुमको शक नहीं है, मगर वे लोग भी जो मुद्दत से इसको सच्चा और मुख़लिस जानते थे, साफ़ कह देते हैं कि हम से नहीं, अल्लाह और उसके रसूल से अपने ख़ुलूस की सनद हासिल करो। दूसरी तरफ़ अख़लाक़ी स्प्रिट इतनी बुलन्द और पाकीज़ा कि एक शख़्स की चढ़ी हुई कमान उतरते ही मुर्दार खानेवालों का कोई गरोह उसका गोश्त नोचने और उसे फाड़ खाने के लिए नहीं लपकता, बल्कि सज़ा के इस पूरे ज़माने में जमाअत का एक-एक आदमी अपने इस सज़ा में गिरफ़्तार भाई की मुसीबत पर रंजीदा और उसको फिर से उठाकर गले लगा लेने के लिए बेताब रहता है और माफ़ी का एलान होते ही लोग दौड़ पड़ते हैं कि जल्दी-से-जल्दी पहुँचकर उससे मिलें और उसे ख़ुशख़बरी पहुँचाएँ। यह नमूना है उस नेक समाज का जिसे क़ुरआन दुनिया में क़ायम करना चाहता है।
इस पसमंज़र (पृष्ठभूमि) में जब हम इस आयत को देखते हैं तो हमपर यह बात वाज़ेह हो जाती है कि इन सहाबियों को अल्लाह के दरबार से जो माफ़ी मिली है और इस माफ़ी के अन्दाज़े-बयान में जो रहमत व शफ़क़त टपकी पड़ रही है, इसकी वजह उनका वह इख़्लास है जिसका सुबूत उन्होंने पचास दिन की सख़्त सज़ा के दौरान में दिया था। अगर क़ुसूर करके वे अकड़ते और अपने लीडर की नाराज़ी का जवाब ग़ुस्से और दुश्मनी से देते और सज़ा मिलने पर इस तरह बिफरते जिस तरह किसी ख़ुदपरस्त इनसान का ग़ुरूरे-नफ़्स ज़ख़्म खाकर बिफरा करता है, और बायकॉट के दौरान में उनका तर्ज़े-अमल यह होता कि हमें जमाअत से कट जाना गवारा है, मगर अपनी ख़ुदी के बुत पर चोट खाना गवारा नहीं है, और अगर यह सज़ा का पूरा ज़माना वे इस दौड़-धूप में गुज़ारते कि जमाअत के अन्दर बददिली न फैलाएँ और बददिल लोगों को ढूँढ़-ढूँढ़कर अपने साथ मिलाएँ ताकि एक जत्था तैयार हो, तो माफ़ी कैसी, उन्हें तो बिल-यक़ीन (निश्चित रूप से) जमाअत से काटकर फेंका जाता और इस सज़ा के बाद उनकी अपनी मुँह माँगी सज़ा उनको दी जाती कि जाओ अब अपनी ख़ुदी के बुत ही को पूजते रहो, हक़ का कलिमा बुलन्द करने की जिद्दो-जुह्द में हिस्सा लेने की नेकी अब तुम्हारे नसीब में कभी न आएगी। लेकिन इन तीनों साहबों ने इस कड़ी आज़माइश के मौक़े पर यह रास्ता इख़्तियार नहीं किया, अगरचे यह भी उनके लिए खुला हुआ था। इसके बरअक्स उन्होंने वह रवैया अपनाया जो आप अभी देख आए हैं। इस रवैये को इख़्तियार करके उन्होंने साबित कर दिया कि ख़ुदा-परस्ती ने उनके सीने में कोई बुत बाक़ी नहीं छोड़ा है जिसे वे पूजें, और अपनी पूरी शख़्सियत को उन्होंने ख़ुदा की राह की जिद्दो-जुह्द में झोंक दिया है और वे अपनी वापसी की कश्तियाँ इस तरह जलाकर इस्लामी जमाअत में आए हैं कि अब यहाँ से पलटकर कहीं और नहीं जा सकते। यहाँ की ठोकरें खाएँगे, मगर यहीँ मरेंगे और खपेंगे। किसी दूसरी जगह बड़ी-से-बड़ी इज़्ज़त भी मिलती हो तो यहाँ की ज़िल्लत छोड़कर उसे लेने न जाएँगे। इसके बाद अगर उन्हें उठाकर सीने से न लगा लिया जाता तो और क्या किया जा सकता था। यही वजह है कि अल्लाह तआला ने उनकी माफ़ी का ज़िक्र ऐसे शफ़क़त भरे अन्दाज़ में किया था कि “हम उनकी तरफ़ पलटे ताकि वे हमारी तरफ़ पलट आएँ।” इन कुछ लफ़्ज़ों में इस हालत की तस्वीर खींच दी गई है कि आक़ा ने पहले तो इन बन्दों से नज़र फेर ली थी, मगर जब वे भागे नहीं, बल्कि उदास होकर उसी दर पर बैठ गए तो उनकी वफ़ादारी की शान देखकर आक़ा से ख़ुद रहा न गया। मुहब्बत के जोश से बेक़रार होकर वह आप निकल आया ताकि उन्हें दरवाज़े से उठा लाए।