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سُورَةُ التَّوۡبَةِ

  1. अत-तौबा

(मदीना में उतरी – आयतें 129)

परिचय

नाम

यह सूरा दो नामों से मशहूर है। एक अत-तौबा, दूसरे अल-बराअत । तौबा इस दृष्टि से कि इसमें एक जगह कुछ ईमानवालों की ग़लतियों की माफ़ी का उल्लेख है और बराअत इस दृष्टि से कि इसके आरंभ में मुशरिकों (बहुदेववादियों) के प्रति उत्तरदायित्व से मुक्ति पाने का एलान है

'बिस्मिल्लाह' न लिखने का कारण

इस सूरा के आरंभ में 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' नहीं लिखी जाती है, क्योंकि नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने स्वयं नहीं लिखवाई थी।

उतरने का समय और सूरा के भाग

यह सूरा तीन व्याख्यानों पर सम्मिलित है-

पहला व्याख्यान सूरा के आरंभ से आयत 37 तक चलता है। इसके उतरने का समय ज़ी-क़ादा सन् 09 हि० या उसके लगभग है। नबी (सल्ल.) इस वर्ष हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) को 'अमीरुल-हाज्ज' (हाजियों का अमीर) नियुक्त करके मक्का भेज चुके थे कि यह व्याख्यान उतरा और नबी (सल्ल०) ने तुरन्त हज़रत अली (रज़ि०) को उनके पीछे भेजा ताकि हज के अवसर पर तमाम अरब के प्रतिनिधि सम्मेलन में उसे सुनाएँ और उसके मुताबिक़ जो कार्य-नीति तय की गई थी, उसका एलान कर दें।

दूसरा व्याख्यान आयत 38 से आयत 22 तक चलता है और यह रजब सन् 09 हि० या इससे कुछ पहले उतरा, जबकि नबी (सल्ल०) तबूक की लड़ाई की तैयारी कर रहे थे। इसमें ईमानवालों को जिहाद पर उकसाया गया है और मुनाफ़िक़ों और कमज़ोर ईमानवालों की कठोरता के साथ निन्दा की गई है।

तीसरा व्याख्यान आयत 73 से आरंभ होकर सूरा के साथ समाप्त होता है और यह तबूक की लड़ाई से वापसी पर उतरा। इसमें मुनाफ़िक़ों की हरकतों पर चेतावनी, तबूक की लड़ाई से पीछे रह जानेवालों पर डाँट-फटकार और उन सच्चे ईमानवालों पर निन्दा के साथ क्षमा करने का एलान है, जो अपने ईमान में सच्चे तो थे, परन्तु अल्लाह की राह के जिहाद में भाग लेने से रुके रह गए थे।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जिस घटनाक्रम से इस सूरा के विषयों का संबंध है, उसकी शुरुआत हुदैबिया के समझौते से होती है। हुदैबिया तक अरब के लगभग एक तिहाई भाग में इस्लाम एक संगठित समाज का दीन (धर्म) और एक पूर्ण सत्ताधिकार प्राप्त राज्य का धर्म बन गया था। हुदैबिया का जब समझौता हुआ तो इस धर्म को यह अवसर भी प्राप्त हो गया कि अपने प्रभावों को कुछ अधिक सुख-शान्ति के वातावरण में चारों ओर फैला सके। इसके बाद घटनाओं की गति ने दो बड़े रास्ते अपनाए जिसके आगे चलकर बड़े महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। इनमें से एक का सम्बन्ध अरब से था और दूसरे का रोमी साम्राज्य से।

अरब पर अधिकार प्राप्ति

अरब में हुदैबिया के बाद प्रचार-प्रसार और शक्ति को दृढ़ बनाने के जो उपाय किए गए उनके कारण दो साल के भीतर ही इस्लाम का प्रभावक्षेत्र इतना व्यापक हो गया कि क़ुरैश के अधिक उत्साही तत्त्वों से रहा न गया और उन्होंने हुदैबिया के समझौते को तोड़ डाला। वे इस बंधन से मुक्त होकर इस्लाम से एक अन्तिम निर्णायक मुक़ाबला करना चाहते थे, लेकिन नबी (सल्ल०) ने उनके इस समझौते को भंग करने के बाद उनको संभलने का कोई अवसर न दिया और अचानक मक्का पर हमला करके रमज़ान सन् 08 हि० में उसे जीत लिया। इसके बाद पुरानी अज्ञानतापूर्ण व्यवस्था की अन्तिम ख़ूनी चाल हुनैन के मैदान में ली गई, लेकिन यह चाल भी विफल रही और हुनैन की पराजय के साथ अरब के भाग का पूर्ण निर्णय हो गया कि उसे अब 'दारुल-इस्लाम' (इस्लामी राज्य) बनकर रहना है। इस घटना को हुए पूरा साल भी न हुआ कि अरब का बड़ा भाग इस्लाम के क्षेत्र में सम्मिलित हो गया।

तबूक की लड़ाई

रोमी साम्राज्य के साथ संघर्ष की शुरुआत मक्का-विजय से पहले ही हो चुकी थी। नबी (सल्ल०) ने हुदैबिया के बाद इस्लाम का सन्देश फैलाने के लिए जो प्रतिनिधिमंडल अरब के विभिन्न भागों में भेजे थे, उनमें से एक उत्तर की ओर शाम (सीरिया) की सीमा से मिले [ईसाई] क़बीलों में [और एक बुसरा के ईसाई सरदार के पास भी गया था, लेकिन इन प्रतिनिधिमंडलों के अधिकतर आदमियों को क़त्ल कर दिया गया।] इन कारणों से नबी (सल्ल.) ने जुमादल-ऊला सन् 08 हि० में तीन हज़ार मुजाहिदीन की एक सेना शाम की सीमा की ओर भेजी, ताकि आगे के लिए यह क्षेत्र मुसलमानों के लिए शान्तिपूर्ण बन जाए। यह छोटी-सी सेना मौता नामी जगह पर शुरहबील की एक लाख सेना से जा टकराई। एक और 33 के इस मुक़ाबले में भी शत्रु मुसलमानों पर विजयी न हो सके। यही चीज़ थी जिसने शाम और उससे मिले क्षेत्रों में रहनेवाले अर्धस्वतंत्र अरबी क़बीलों को, बल्कि इराक़ के क़रीब रहनेवाले नज्दी कबीलों को भी जो किसरा के प्रभाव में थे, इस्लाम की ओर आकर्षित कर दिया और वे हज़ारों की संख्या में मुसलमान हो गए। दूसरे ही साल क़ैसर ने मुसलमानों को मौता की लड़ाई की सजा देने के लिए शाम की सीमा पर सैनिक तैयारियाँ शुरू कर दीं। नबी (सल्ल०) [को इसकी सूचना मिली तो] रजब सन् 09 हि० में तीस हज़ार मुजाहिदों के साथ शाम की ओर रवाना हो गए। तबूक पहुँचकर मालूम हुआ कि क़ैसर ने मुक़ाबले पर आने के बजाय अपनी सेनाएँ सीमा से हटा ली हैं। क़ैसर के यों टाल जाने से जो नैतिक विजय प्राप्त हुई उसको नबी (सल्ल०) ने इस मरहले पर काफ़ी समझा और बजाय इसके कि तबूक से आगे बढ़कर शाम की सीमा में प्रवेश करते, आपने इस बात को प्रमुखता दी कि इस विजय से अति संभव राजनैतिक व सामरिक लाभ प्राप्त कर लें। चुनांँचे आपने तबूक में 20 दिन ठहरकर उन बहुत-से छोटे-छोटे राज्यों को, जो रूमी साम्राज्य और 'दारुल इस्लाम' के बीच स्थित थे और अब तक रोमवासियों के प्रभाव में रहे थे, सैनिक दबाव से इस्लामी राज्य को लगान देनेवाला और अधीन बना लिया। फिर इसका सबसे बड़ा लाभ यह हुआ कि रोमी साम्राज्य से एक लंबे संघर्ष में उलझ जाने से पहले इस्लाम को अरब पर अपनी पकड़ मज़बूत कर लेने का पूरा अवसर मिल गया।

समस्याएँ और वार्ताएँ

इस पृष्ठभूमि को दृष्टि में रखने के बाद हम आसानी से उन बड़ी-बड़ी समस्याओं को समझ सकते हैं जो उस समय सामने थीं और जिन्हें सूरा तौबा में लिया गया है :

(1) अब चूँकि अरब का प्रबंध पूर्ण रूप से ईमानवालों के हाथ में आ गया था इसलिए वह नीति खुलकर सामने आ जानी चाहिए थी जो अरब को पूर्ण 'दारुल इस्लाम' बनाने के लिए अपनानी ज़रूरी थी। चुनांँचे वह निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत की गई—

(अ) अरब से शिर्क (बहुदेववाद) को बिलकुल ही मिटा दिया जाए, ताकि इस्लाम का केन्द्र सदा के लिए विशुद्ध इस्लामी केन्द्र हो जाए। इसी उद्देश्य के लिए मुशरिकों (बहुदेववादियो) से छुटकारे और उनके साथ समझौतों के अन्त का एलान किया गया।

(ब) आदेश हुआ कि आगे काबा की देख-रेख भी तौहीद (एकेश्वरवाद) वालों के क़ब्ज़े में रहनी चाहिए और अल्लाह के घर की सीमाओं में शिर्क और अज्ञानता की तमाम रस्में भी बलपूर्वक बन्द कर देनी चाहिएँ, बल्कि अब मुशरिक इस घर के क़रीब फटकने भी न पाएँ ।

(इ) अरब के सांस्कृतिक जीवन में अज्ञानता की रस्मों की जो निशानियाँ अभी तक बाक़ी थीं, उनके उन्मूलन की ओर ध्यान आकृष्ट किया गया। 'नसी' का नियम उन रस्मों में सबसे अधिक भौंडा नियम था इसलिए उसपर सीधे-सीधे चोट लगाई गई।

(2) अरब में इस्लाम का मिशन पूरा होने के बाद दूसरा महत्त्वपूर्ण चरण जो सामने था, वह यह था कि अरब के बाहर सत्य-धर्म का प्रभाव क्षेत्र व्यापक बनाया जाए। इस सिलसिले में मुसलमानों को आदेश दिया गया कि अरब के बाहर जो लोग सत्य-धर्म का पालन करनेवाले नहीं हैं उनके स्वतंत्र प्रभुत्व को तलवार के बल पर समाप्त कर दो, यहाँ तक कि वह इस्लामी सत्ता के अधीन होकर रहना स्वीकार कर लें। जहाँ तक सत्य-धर्म पर ईमान लाने का संबंध है, उनको अधिकार है कि ईमान लाएँ या न लाएँ।

(3) तीसरी महत्त्वपूर्ण समस्या मुनाफ़िक़ों (कपटाचारियों) की थी जिनके साथ अब तक सामयिक निहितार्थ की दृष्टि से छोड़ देने और क्षमा कर देने का मामला किया जा रहा था अब आदेश दिया गया कि आगे उनके साथ कोई नर्मी न की जाए और वही कठोर बर्ताव इन छिपे हुए सत्य के इंकारियों के साथ भी हो जो खुले सत्य के इंकारियों के साथ होता है।

(4) सच्चे ईमानवालो में अब तक जो थोड़ी-बहुत इरादे की कमज़ोरी बाक़ी थी उसका इलाज भी अनिवार्य था। इसलिए जिन लोगों ने तबूक के अवसर पर सुस्ती और कमज़ोरी दिखाई थी उनकी घोर निन्दा की गई और आगे के लिए पूरी सफ़ाई के साथ यह बात स्पष्ट कर दी गई कि अल्लाह के कलिमे को बुलन्द करने की जिद्दोजुहद और कुफ़्र (अधर्म) और इस्लाम का संघर्ष ही वह असली कसौटी है, जिसपर ईमानवालों के ईमान का दावा परखा जाएगा।

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سُورَةُ التَّوۡبَةِ
9. अत-तौबा
بَرَآءَةٞ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦٓ إِلَى ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّم مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ
(1) बराअत (यानी समझौता खत्म करने) का एलान1 है, अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से उन मुशरिकों जिनसे तुमने समझौते किए थे।2
1. जैसा कि हम सूरा के परिचय में बयान कर चुके हैं, यह ख़ुतबा आयत-37 तक 9 हिजरी में उस वक़्त नाज़िल हुआ था जब नबी (सल्ल०) हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) को हज के लिए रवाना कर चुके थे। उनके पीछे जब ये आयतें नाज़िल हुईं तो सहाबा किराम ने नबी (सल्ल०) से कहा कि उसे अबू-बक्र के पास भेज दीजिए ताकि वे हज में इसको सुना दें। लेकिन आप (सल्ल०) ने फ़रमाया कि इस अहम मामले का एलान मेरी तरफ़ से मेरे ही घर के किसी आदमी को करना चाहिए। चुनाँचे आप (सल्ल०) ने हज़रत अली (रज़ि०) को इस काम पर लगाया और साथ ही हिदायत कर दी कि हाजियों के आम मजमे में इसे सुनाने के बाद नीचे लिखी चार बातों का एलान भी कर दें— (i) जन्नत में कोई ऐसा शख़्स दाख़िल नहीं होगा जो दीने-इस्लाम को क़ुबूल करने से इनकार करे। (ii) इस साल के बाद कोई मुशरिक हज के लिए न आए। (iii) बैतुल्लाह (काबा) के चारों तरफ़ नंगे होकर तवाफ़ करना मना है। (iv) जिन लोगों के साथ अल्लाह के रसूल (सल्ल०) का मुआहदा बाक़ी है, यानी जिन्होंने अह्द नहीं तोड़ा है उनके मुआहदे को मुद्दत पूरी होने तक बाक़ी रखा जाएगा। इस मक़ाम पर यह जान लेना भी फ़ायदे से ख़ाली न होगा कि मक्का की फ़तह के बाद दौरे-इस्लामी का पहला हज 8 हिजरी में पुराने तरीक़े पर हुआ। फिर 9 हिजरी में यह दूसरा हज मुसलमानों ने अपने तरीक़े पर किया और मुशरिकों ने अपने तरीक़े पर। इसके बाद तीसरा हज 10 हिजरी में ख़ालिस इस्लामी तरीक़े पर हुआ और यही वह मशहूर हज है जिसे हज्जतुल-वदाअ कहते हैं। नबी (सल्ल०) पहले दो साल हज के लिए नहीं गए। तीसरे साल जब बिलकुल शिर्क मिट गया तब आप (सल्ल०) ने हज अदा किया।
2. सूरा-8 अनफ़ाल की आयत-58 में गुज़र चुका है कि जब तुम्हें किसी क़ौम से ख़ियानत (अह्द के तोड़ने और ग़द्दारी) का अन्देशा हो तो खुल्लम-खुल्ला उसका मुआहदा उसकी तरफ़ फेंक दो और उसे ख़बरदार कर दो कि अब हमारा तुमसे कोई मुआहदा बाक़ी नहीं है। इस एलान के बग़ैर किसी ऐसी क़ौम के ख़िलाफ़ जिसके साथ मुआहदा हो चुका हो, जंगी कारवाई शुरू कर देना ख़ुद ख़ियानत करना है। इसी अख़लाक़ी ज़ाबिते के मुताबिक़ मुआहदे के तोड़े जाने का यह आम एलान उन तमाम क़बीलों के ख़िलाफ़ किया गया जो अह्दो-पैमान के बावजूद हमेशा इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िशें करते रहे थे और मौक़ा पाते ही अह्द की पाबन्दी को उठाकर रख देते और दुश्मनी पर उतर आते थे। यह कैफ़ियत बनी-किनाना और बनी-जमरा और शायद एक-आध और क़बीले के सिवा बाक़ी उन तमाम क़बीलों की थी जो उस वक़्त तक शिर्क पर क़ायम थे। बराअत (मुक्ति) के इस एलान से अरब में शिर्क और मुशरिकीन का वुजूद मानो अमली तौर पर क़ानून के ख़िलाफ़ हो गया और उनके लिए सारे मुल्क में पनाह लेने की कोई जगह न रही; क्योंकि मुल्क का ज़्यादातर हिस्सा इस्लामी हुकूमत के तहत आ चुका था। ये लोग तो अपनी जगह इस बात के इन्तिज़ार में थे कि रूम और फ़ारस की तरफ़ से इस्लामी सल्तनत को जब कोई ख़तरा पैदा हो, या नबी (सल्ल०) की वफ़ात हो जाए, तो यकायक अह्द तेड़कर मुल्क में ख़ाना-जंगी बरपा कर दें। लेकिन अल्लाह और उसके रसूल ने उनके लिए इन्तिज़ार की उस घड़ी के आने से पहले ही चाल उलट दी और बराअत (मुक्ति) का एलान करके उनके लिए इसके सिवा कोई रास्ता बाक़ी न रहने दिया कि या तो लड़ने पर तैयार हो जाएँ और इस्लामी ताक़त से टकराकर अपना वुजूद ही ख़त्म कर डालें या मुल्क छोड़कर निकल जाएँ, या फिर इस्लाम क़ुबूल करके अपने आपको और अपने इलाक़े को उस निज़ाम के हवाले कर दें जो मुल्क के ज़्यादातर हिस्से को पहले ही अपने इन्तिज़ाम में ले चुका था। इस अज़ीमुश्शान तदबीर की पूरी हिकमत उसी वक़्त समझ में आ सकती है जबकि हम इस्लाम से फिरने की उस साज़िश या फ़ितने को नज़र में रखें जो इस वाक़िए के डेढ़ साल बाद ही नबी (सल्ल०) की वफ़ात पर मुल्क के मुख़्तलिफ़ हिस्सों में बरपा हुआ और जिसने इस्लाम के नए तामीर हुए महल को एकदम हिलाकर रख दिया। अगर कहीं 9 हिजरी के इस एलाने-बराअत से शिर्क की मुनज़्ज़म (सुसंगठित) ताक़त ख़त्म न कर दी गई होती और पूरे मुल्क पर इस्लामी क़ानून की ताक़त का ग़लबा पहले ही मुकम्मल न हो चुका होता, तो इस्लाम से फिरने की शक्ल में जो फ़ितना हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) की ख़िलाफ़त (शासन) के शुरू में उठा था उससे कम-से-कम दस गुना ज़्यादा ताक़त के साथ बग़ावत और ख़ाना-जंगी का फ़ितना उठता और शायद इस्लामी तारीख़़ की शक्ल अपनी मौजूदा सूरत से बिलकुल ही अलग होती।
فَسِيحُواْ فِي ٱلۡأَرۡضِ أَرۡبَعَةَ أَشۡهُرٖ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّكُمۡ غَيۡرُ مُعۡجِزِي ٱللَّهِ وَأَنَّ ٱللَّهَ مُخۡزِي ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 1
(2) तो तुम लोग मुल्क में चार महीने और चल-फिर लो3 और जान रखो कि तुम अल्लाह को बेबस करनेवाले नहीं हो, और यह कि अल्लाह हक़ के इनकारियों को रुसवा करनेवाला है।
3. यह एलान 10 ज़िल-हिज्जा, 9 हिजरी को हुआ था। उस वक़्त से 10 रबीउस्सानी 10 हिजरी तक चार महीने की मुहलत उन लोगों को दी गई कि इस दौरान में अपनी पोज़ीशन पर अच्छी तरह ग़ौर कर लें। लड़ना हो तो लड़ाई के लिए तैयार हो जाएँ, मुल्क छोड़ना हो तो अपनी पनाहगाह तलाश कर लें, इस्लाम क़ुबूल करना हो तो सोच-समझकर क़ुबूल कर लें।
وَأَذَٰنٞ مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦٓ إِلَى ٱلنَّاسِ يَوۡمَ ٱلۡحَجِّ ٱلۡأَكۡبَرِ أَنَّ ٱللَّهَ بَرِيٓءٞ مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ وَرَسُولُهُۥۚ فَإِن تُبۡتُمۡ فَهُوَ خَيۡرٞ لَّكُمۡۖ وَإِن تَوَلَّيۡتُمۡ فَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّكُمۡ غَيۡرُ مُعۡجِزِي ٱللَّهِۗ وَبَشِّرِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ ۝ 2
(3) आम इत्तिला है अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ 'बड़े हज' के दिन 4 सब लोगों के लिए कि अल्लाह शिर्क करनेवालों से बरी है और उसका रसूल भी। अब अगर तुम लोग तौबा कर लो तो तुम्हारे ही लिए बेहतर है और जो मुँह फेरते हो तो ख़ूब समझ लो कि तुम अल्लाह को बेबस करनेवाले नहीं हो। और ऐ नबी! इनकार करनेवालों को सख़्त अज़ाब की ख़ुशख़बरी सुना दो,
4. यानी दस (10) ज़िल-हिज्जा, जिसे यौमुन-नहर कहते हैं। सहीह हदीस में आया है कि हज्जतुल-वदाअ में नबी (सल्ल०) ने ख़ुतबा देते हुए वहाँ मौजूद लोगों से पूछा कि यह कौन-सा दिन है? लोगों ने कहा कि यौमुन-नहर है। कहा, “यह हज्जे-अकबर का दिन है।” हज्जे-अकबर (बड़ा हज) का लफ़्ज़ असग़र (छोटा हज) के मुक़ाबले में है। अहले-अरब उमरे को छोटा हज कहते हैं। इसके मुक़ाबले में वह हज जो ज़िल-हिज्जा की मुक़र्ररा तारीख़़ों में किया जाता है, हज्जे-अकबर कहलाता है।
إِلَّا ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّم مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ثُمَّ لَمۡ يَنقُصُوكُمۡ شَيۡـٔٗا وَلَمۡ يُظَٰهِرُواْ عَلَيۡكُمۡ أَحَدٗا فَأَتِمُّوٓاْ إِلَيۡهِمۡ عَهۡدَهُمۡ إِلَىٰ مُدَّتِهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 3
(4) सिवाए उन मुशरिकों के जिनसे तुमने समझौते किए, फिर उन्होंने अपने अह्द को पूरा करने में तुम्हारे साथ कोई कमी नहीं की और न तुम्हारे ख़िलाफ़ किसी की मदद की, तो ऐसे लोगों के साथ तुम भी समझौते की मुद्दत तक वफ़ा करो; क्योंकि अल्लाह मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) ही को पसन्द करता है।5
5. यानी यह बात तक़वा (परहेज़गारी) के ख़िलाफ़ होगी कि जिन्होंने तुम्हारे साथ किया गया कोई अह्द नहीं तोड़ा है उनसे तुम अह्द तोड़ो। अल्लाह के नज़दीक पसन्दीदा सिर्फ़ वही लोग हैं जो हर हाल में तक़वा पर क़ायम रहें।
فَإِذَا ٱنسَلَخَ ٱلۡأَشۡهُرُ ٱلۡحُرُمُ فَٱقۡتُلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ حَيۡثُ وَجَدتُّمُوهُمۡ وَخُذُوهُمۡ وَٱحۡصُرُوهُمۡ وَٱقۡعُدُواْ لَهُمۡ كُلَّ مَرۡصَدٖۚ فَإِن تَابُواْ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُاْ ٱلزَّكَوٰةَ فَخَلُّواْ سَبِيلَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 4
(5) तो जब हराम (प्रतिष्ठत) महीने बीत जाएँ6 तो मुशरिकों को क़त्ल करो जहाँ पाओ और उन्हें पकड़ो और घेरो और हर घात में उनकी ख़बर लेने के लिए बैठो। फिर अगर वे तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो उन्हें छोड़ दो।7 अल्लाह माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।
6. यहाँ हराम महीनों से मुराद वे महीने नहीं हैं जो हज और उमरे के लिए हराम क़रार दिए गए हैं, बल्कि इस जगह वे चार महीने मुराद हैं जिनकी मुशरिकों को मुहलत दी गई थी। चूँकि इस मुहलत के ज़माने में मुसलमानों के लिए जाइज़ नहीं था कि मुशरिकों पर हमलावर हो जाते इसलिए इन्हें हराम महीने कहा गया है।
7. यानी कुफ़्र और शिर्क से सिर्फ़ तौबा कर लेने पर मामला ख़त्म नहीं होगा, बल्कि इन्हें अमली तौर पर नमाज़ क़ायम करनी और ज़कात देनी होगी। इसके बग़ैर यह नहीं माना जाएगा कि उन्होंने कुफ़ को छोड़कर इस्लाम इख़्तियार कर लिया है। इसी आयत को हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) ने उस ज़माने में दलील बनाया था जब इस्लाम से फिर जाने की साज़िश और फ़ितना बरपा हुआ था। नबी (सल्ल०) की वफ़ात के बाद जिन लोगों ने फ़ितना बरपा किया था उनमें से एक गरोह कहता था कि हम इस्लाम के इनकारी नहीं हैं, नमाज़ भी पढ़ने के लिए तैयार है, मगर ज़कात नहीं देंगे। सहाबा किराम को आम तौर से यह परेशानी थी कि आख़िर ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ तलवार कैसे उठाई जा सकती है? मगर हज़रत अबू-बक (रज़ि०) ने इसी आयत का हवाला देकर कहा कि हमें तो इन लोगों को छोड़ देने का हुक्म सिर्फ़ उस सूरत में दिया गया था, जबकि ये शिर्क से तौबा करें, नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें, मगर ये तीन शर्तो में से एक शर्त उड़ाए देते हैं तो फिर इन्हें हम कैसे छोड़ दें।
وَإِنۡ أَحَدٞ مِّنَ ٱلۡمُشۡرِكِينَ ٱسۡتَجَارَكَ فَأَجِرۡهُ حَتَّىٰ يَسۡمَعَ كَلَٰمَ ٱللَّهِ ثُمَّ أَبۡلِغۡهُ مَأۡمَنَهُۥۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ قَوۡمٞ لَّا يَعۡلَمُونَ ۝ 5
(6) और अगर मुशरिकों में से कोई आदमी पनाह माँगकर तुम्हारे पास आना चाहे (ताकि अल्लाह का कलाम सुने) तो उसे पनाह दे दो, यहाँ तक कि वह अल्लाह का कलाम सुन ले। फिर उसे उसकी महफ़ूज़ जगह तक पहुँचा दो। ऐसा इसलिए करना चाहिए कि ये लोग इल्म नहीं रखते।8
8. यानी जंग के दौरान अगर कोई दुश्मन तुमसे दरख़ास्त करे कि मैं इस्लाम को समझना चाहता हूँ।
كَيۡفَ يَكُونُ لِلۡمُشۡرِكِينَ عَهۡدٌ عِندَ ٱللَّهِ وَعِندَ رَسُولِهِۦٓ إِلَّا ٱلَّذِينَ عَٰهَدتُّمۡ عِندَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِۖ فَمَا ٱسۡتَقَٰمُواْ لَكُمۡ فَٱسۡتَقِيمُواْ لَهُمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 6
(7) इन मुशरिकों के लिए अल्लाह और उसके रसूल के नज़दीक कोई समझौता आख़िर कैसे हो सकता है? — सिवाय उन लोगों के जिनसे तुमने मस्जिदे-हराम (काबा) के पास समझौता किया था;9 तो जब तक वे तुम्हारे साथ सीधे रहें, तुम भी उनके साथ सीधे रहो; क्योंकि अल्लाह मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) को पसन्द करता है।
9. यानी बनी-कनाना, बनी-ख़ुज़ाआ और बनी-ज़मुरा।
كَيۡفَ وَإِن يَظۡهَرُواْ عَلَيۡكُمۡ لَا يَرۡقُبُواْ فِيكُمۡ إِلّٗا وَلَا ذِمَّةٗۚ يُرۡضُونَكُم بِأَفۡوَٰهِهِمۡ وَتَأۡبَىٰ قُلُوبُهُمۡ وَأَكۡثَرُهُمۡ فَٰسِقُونَ ۝ 7
(8) मगर इनके सिवा दूसरे मुशरिकों के साथ कोई समझौता कैसे हो सकता है, जबकि उनका हाल यह है कि तुमपर क़ाबू पा जाएँ तो न तुम्हारे मामले में किसी रिश्तेदारी का लिहाज़ करें, न किसी समझौते की ज़िम्मेदारी का? वे अपनी ज़बानों से तुमको राज़ी करने की कोशिश करते हैं, मगर दिल उनके इनकार करते हैं10 और उनमें से ज़्यादातर फ़ासिक़ हैं।"11
10. यानी बज़ाहिर तो वे सुलह की शर्तें तय करते हैं, मगर दिल में बद-अह्दी (समझौता तोड़ने) का इरादा होता है और इसका सुबूत तजरिबे से इस तरह मिलता है कि जब कभी उन्होंने मुआहदा किया, तोड़ने ही के लिए किया।
11. यानी ऐसे लोग हैं जिन्हें न अख़लाक़ी ज़िम्मेदारियों का एहसास है और न अख़लाक़ की पाबन्दियों के तोड़ने में कोई झिझक।
ٱشۡتَرَوۡاْ بِـَٔايَٰتِ ٱللَّهِ ثَمَنٗا قَلِيلٗا فَصَدُّواْ عَن سَبِيلِهِۦٓۚ إِنَّهُمۡ سَآءَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ۝ 8
(9) उन्होंने अल्लाह की आयतों के बदले थोड़ी-सी क़ीमत क़ुबूल कर ली?12 फिर अल्लाह के रास्ते में रुकावट बनकर खड़े हो गए,13 बहुत बुरे करतूत थे जो ये करते रहे।
12. यानी एक तरफ़ अल्लाह की आयतें उनको भलाई और सच्चाई और क़ानूने-हक़ की पाबन्दी का बुलावा दे रही हैं और दूसरी तरफ़ दुनियावी ज़िन्दगी के वे कुछ दिनों के फ़ायदे थे जो नफ़्स (मन) की ख़ाहिश की बे-लगाम पैरवी से हासिल होते थे। उन लोगों ने इन दोनों चीज़ों का मुवाज़ना (तुलना) न किया और फिर पहली को छोड़कर दूसरी चीज़ को अपने लिए चुन लिया।
13. यानी ज़ालिमों ने इतने पर ही बस न किया कि हिदायत के बजाय गुमराही को ख़ुद अपने लिए पसन्द कर लिया, बल्कि इससे आगे बढ़कर उन्होंने कोशिश यह की कि दावते-हक़ का काम किसी तरह चलने न पाए, ख़ैरो-सलाह की इस पुकार को कोई सुनने न पाए, बल्कि वे मुँह ही बन्द कर दिए जाएँ जिनसे यह पुकार बुलन्द होती है। जिस सॉलेह (सुधारवादी) निज़ामे-ज़िन्दगी (जीवन-व्यवस्था) को अल्लाह तआला ज़मीन में क़ायम करना चाहता था, उसके क़ियाम रोकने में उन्होंने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया और उन लोगों का जीना दूभर कर दिया जो इस निज़ाम को सही पाकर उसके पैरोकार बने थे।
لَا يَرۡقُبُونَ فِي مُؤۡمِنٍ إِلّٗا وَلَا ذِمَّةٗۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُعۡتَدُونَ ۝ 9
(10) किसी ईमानवाले के मामले में न ये नातेदारी की परवाह करते हैं और न किसी समझौते की ज़िम्मेदारी की, और ज़्यादती हमेशा इन्हीं की तरफ़ से हुई है।
فَإِن تَابُواْ وَأَقَامُواْ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَوُاْ ٱلزَّكَوٰةَ فَإِخۡوَٰنُكُمۡ فِي ٱلدِّينِۗ وَنُفَصِّلُ ٱلۡأٓيَٰتِ لِقَوۡمٖ يَعۡلَمُونَ ۝ 10
(11) तो अगर ये तौबा कर लें और नमाज़ क़ायम करें और ज़कात दें तो तुम्हारे दीनी-भाई हैं, और जाननेवालों के लिए हम अपने अहकाम वाज़ेह किए देत हैं।14
14. यहाँ फिर यह बात समझाई गई है कि नमाज़ और ज़कात के बिना सिर्फ़ तौबा कर लेने से वे तुम्हारे दीनी भाई नहीं बन जाएँगे। और यह जो कहा गया कि अगर ऐसा करें तो वे तुम्हारे दीनी भाई हैं तो इसका मतलब यह है कि ये शर्ते पूरी करने का नतीजा सिर्फ़ यही नहीं होगा कि तुम्हारे लिए इनपर हाथ उठाना और इनके जान और माल पर हाथ डालना हराम हो जाएगा, बल्कि इससे और आगे बढ़कर इसका फ़ायदा यह भी होगा कि इस्लामी सोसाइटी में इनको बराबर के हक़ हासिल हो जाएँगे। समाजी, तमद्दुनी (सांस्कृतिक) और क़ानूनी हैसियत से वे तमाम दूसरे मुसलमानों की तरह होंगे। कोई चीज़ उनकी तरक़्क़ी की राह में रुकावट न होगी।
وَإِن نَّكَثُوٓاْ أَيۡمَٰنَهُم مِّنۢ بَعۡدِ عَهۡدِهِمۡ وَطَعَنُواْ فِي دِينِكُمۡ فَقَٰتِلُوٓاْ أَئِمَّةَ ٱلۡكُفۡرِ إِنَّهُمۡ لَآ أَيۡمَٰنَ لَهُمۡ لَعَلَّهُمۡ يَنتَهُونَ ۝ 11
(12) और अगर समझौता करने के बाद ये फिर अपनी क़समों को तोड़ डालें और तुम्हारे दीन (धर्म) पर हमले करने शुरू कर दें तो कुफ़्र (अधर्म) के अलमबरदारों से जंग करो, क्योंकि उनकी क़समों का कोई एतिबार नहीं, शायद कि (फिर तलवार ही के ज़ोर से) वे बाज़ आएँगे।15
15. इस जगह मौक़ा-महल ख़ुद बता रहा है कि क़सम और अहदो-पैमान से मुराद कुफ़्र छोड़कर इस्लाम क़ुबूल कर लेने का अह्द है। इसलिए कि उन लोगों से अब कोई और मुआहदा करने का तो कोई सवाल बाक़ी ही नहीं रहा था। पिछले सारे मुआहदे वे तोड़ चुके थे। उनके अह्द को तोड़ने की बिना पर ही अल्लाह और उसके रसूल की तरफ़ से बराअत (मुक्ति) का एलान उन्हें साफ़-साफ़ सुनाया जा चुका था। यह भी फ़रमा दिया गया था कि आख़िर ऐसे लोगों के साथ कोई मुआहदा कैसे किया जा सकता है। और यह फ़रमान भी जारी हो चुका था कि अब इन्हें सिर्फ़ इसी सूरत में छोड़ा जा सकता है कि ये कुफ़्र और शिर्क से तौबा करके नमाज़ क़ायम करने और ज़कात अदा करने की पाबन्दी क़ुबूल कर लें। इसलिए यह आयत मुर्तदों (इस्लाम से फिर जानेवालों) से जंग के मामले में बिलकुल वाज़ेह है। अस्ल में इसमें इस्लाम से फिर जाने की उस साज़िश और फ़ितने की तरफ़ इशारा है जो डेढ़ साल बाद हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ि०) की ख़िलाफ़त के शुरू में बरपा हुआ। हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) ने इस मौक़े पर जो रवैया इख़्तियार किया वह ठीक उस हिदायत के मुताबिक़ था जो इस आयत में पहले ही दी जा चुकी थी। (और ज़्यादा तशरीह के लिए देखें मेरी किताब 'मुर्तद की सज़ा इस्लामी क़ानून में')।
أَلَا تُقَٰتِلُونَ قَوۡمٗا نَّكَثُوٓاْ أَيۡمَٰنَهُمۡ وَهَمُّواْ بِإِخۡرَاجِ ٱلرَّسُولِ وَهُم بَدَءُوكُمۡ أَوَّلَ مَرَّةٍۚ أَتَخۡشَوۡنَهُمۡۚ فَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخۡشَوۡهُ إِن كُنتُم مُّؤۡمِنِينَ ۝ 12
(13) क्या तुम16 न लड़ोगे ऐसे लोगों से जो अपनी क़समें तोड़ते रहे हैं और जिन्होंने रसूल को मुल्क से निकाल देने का इरादा किया था और ज़्यादती की शुरुआत करनेवाले वही थे? क्या तुम उनसे डरते हो? अगर तुम ईमानवाले हो तो अल्लाह इसका ज़्यादा हक़दार है कि उससे डरो।
16. अब तक़रीर का रुख़ मुसलमानों की तरफ़ फिरता है और उनको जंग पर उभारने और दीन के मामले में किसी रिश्ते-नाते और किसी दुनियावी मस्लहत का लिहाज़ न करने की ज़ोरदार नसीहत की जाती है। तक़रीर के इस हिस्से की पूरी रूह को समझने के लिए फिर एक बार उस सूरते-हाल को सामने रख लेना चाहिए जो उस वक़्त सामने थी। इसमें शक नहीं कि इस्लाम अब मुल्क के एक बड़े हिस्से पर छा गया था और अरब में कोई ऐसी बड़ी ताक़त न रही थी जो उसको मुक़ाबले की दावत दे सकती हो, लेकिन फिर भी जो फ़ैसलाकुन क़दम और बहुत ही इंक़िलाबी कदम इस मौक़े पर उठाया जा रहा था उसके अन्दर बहुत-से ख़तरनाक पहलू ज़ाहिरबीन निगाहों को नज़र आ रहे थे : एक तो यह कि तमाम मुशरिक क़बीलों को एक ही साथ मुआहदों को ख़त्म करने का चैलेंज दे देना, फिर मुशरिकीन के हज करने पर पाबन्दी, काबे के इन्तिज़ाम और ख़िदमत के मुबारक काम को मुशरिकों से छीनकर मुसलमानों के हवाले कर देना और जाहिलियत की रस्मों का पूरे तौर से ख़ातिमा यह मानी रखता था कि एक बार सारे मुल्क में आग सी लग जाए और मुशरिक और मुनाफ़िक लोग अपने ख़ून की आख़िरी बूंद तक अपने फ़ायदों और तास्सुबात (दुराग्रहों) की हिफ़ाज़त के लिए बहा देने पर आमादा हो जाएँ। दूसरे यह कि हज को सिर्फ़ अहले-तौहीद (एकेश्वरवादियों) के लिए ख़ास कर देने और उनपर काबा का रास्ता बन्द कर देने के मानी ये थे कि मुल्क की आबादी का एक अच्छा ख़ासा हिस्सा, जो अभी मुशरिक था, काबा की तरफ़ आने-जाने से बाज़ आ जाए जो सिर्फ़ मज़हबी हैसियत ही से नहीं, बल्कि मआशी (आर्थिक) हैसियत से भी अरब में ग़ैर-मामूली हैसियत रखता था और जिसपर उस ज़माने में अरब की मआशी ज़िन्दगी (आर्थिक जीवन) का बहुत बड़ा दारोमदार था। तीसरे यह कि जो लोग हुदैबिया की सुलह और मक्का की फ़तह के बाद ईमान लाए थे उनके लिए यह मामला सख़्त आज़माइश का था, क्योंकि उनके बहुत-से भाई-बन्धु, रिश्तेदार अभी तक मुशरिक थे और उनमें ऐसे लोग भी थे जिनके फ़ायदे पुराने जाहिल निज़ाम के मंसबों से जुड़े हुए थे। अब जो बज़ाहिर अरब के तमाम मुशरिकों के तहस-नहस कर डालने की तैयारी की जा रही थी तो इसके मानी ये थे कि ये नए मुसलमान ख़ुद अपने हाथों अपने ख़ानदानों और अपने जिगर-गोशों को ख़ाक में मिला दें और उनके मक़ाम और मंसब और सदियों से क़ायम चले आ रहे उनके इम्तियाज़ात का ख़ातिमा कर दें। हालाँकि अस्ल में इनमें से कोई ख़तरा भी अमली तौर पर सामने नहीं आया। एलाने-बराअत से मुल्क में बड़े पैमाने पर जंग की आग भड़कने के बजाय यह नतीजा सामने आया कि अरब के तमाम आस-पास से बचे-खुचे मुशरिक क़बीलों और अमीरों और बादशाहों के वुफ़ूद आने शुरू हो गए, जिन्होंने नबी (सल्ल०) के सामने इस्लाम और इताअत का अह्द किया और उनके इस्लाम क़ुबूल कर लेने पर नबी (सल्ल०) ने हर एक को उसकी पोज़ीशन पर बहाल रखा। लेकिन जिस वक़्त इस नई पॉलिसी का एलान किया जा रहा था उस वक़्त तो बहरहाल कोई भी इस नतीजे को पेशगी नहीं देख सकता था। फिर यह कि इस एलान के साथ ही अगर मुसलमान इसे ताक़त के बल पर लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार न हो जाते तो शायद यह नतीजा सामने भी न आता। इसलिए ज़रूरी था कि मुसलमानों को इस मौक़े पर अल्लाह के रास्ते में जिहाद की पुरजोश नसीहत की जाती और उनके ज़ेहन से उन तमाम अन्देशों को दूर किया जाता जो इस पॉलिसी पर अमल करने में उनको नज़र आ रहे थे और उनको हिदायत की जाती कि अल्लाह की मरज़ी को पूरा करने में उन्हें किसी चीज़ की परवाह नहीं करनी चाहिए। यही बात इस तक़रीर का मौज़ू (विषय) है।
قَٰتِلُوهُمۡ يُعَذِّبۡهُمُ ٱللَّهُ بِأَيۡدِيكُمۡ وَيُخۡزِهِمۡ وَيَنصُرۡكُمۡ عَلَيۡهِمۡ وَيَشۡفِ صُدُورَ قَوۡمٖ مُّؤۡمِنِينَ ۝ 13
(।4) उनसे लड़ो, अल्लाह तुम्हारे हाथों से उनको सज़ा दिलवाएगा और उन्हें बेइज़्ज़त और रुसवा करेगा और उनके मुक़ाबले में तुम्हारी मदद करेगा और बहुत-से ईमानवालों के दिल ठंडे करेगा
17. यह एक हल्का सा इशारा है उस इमकान की तरफ़ जो आगे चलकर वाक़िए की सूरत में सामने आया। मुसलमान जो यह समझ रहे थे कि बस इस एलान के साथ ही मुल्क में ख़ून की नदियाँ बह जाएँगी, उनकी इस ग़लतफ़हमी को दूर करने के लिए इशारे में उन्हें बताया गया है कि यह पॉलिसी इख़्तियार करने में जहाँ इसका इमकान है कि जंग का हंगामा बरपा होगा, वहाँ इसका भी इमकान है कि लोगों को तौबा की तौफ़ीक़ नसीब हो जाएगी। लेकिन इस इशारे को ज़्यादा नुमायाँ इसलिए नहीं किया गया कि ऐसा करने से एक तरफ़ तो मुसलमानों की जंग की तैयारी हल्की पड़ जाती और दूसरी तरफ़ मुशरिकों के लिए उस धमकी का पहलू भी हल्का हो जाता जिसने उन्हें पूरी संजीदगी के साथ अपनी पोज़ीशन की नज़ाकत पर ग़ौर करने और आख़िरकार इस्लामी निज़ाम में समा जाने पर आमादा किया।
وَيُذۡهِبۡ غَيۡظَ قُلُوبِهِمۡۗ وَيَتُوبُ ٱللَّهُ عَلَىٰ مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ۝ 14
(15) और उनके दिलों की जलन मिटा देगा और जिसे चाहेगा तौबा की तौफ़ीक़ (सुअवसर) भी देगा।17 अल्लाह सब कुछ जाननेवाला और हिकमतवाला है।
أَمۡ حَسِبۡتُمۡ أَن تُتۡرَكُواْ وَلَمَّا يَعۡلَمِ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ جَٰهَدُواْ مِنكُمۡ وَلَمۡ يَتَّخِذُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ وَلَا رَسُولِهِۦ وَلَا ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَلِيجَةٗۚ وَٱللَّهُ خَبِيرُۢ بِمَا تَعۡمَلُونَ ۝ 15
(16) क्या तुम लोगों ने यह समझ रखा है कि यूँ ही छोड़ दिए जाओगे, हालाँकि अभी अल्लाह ने यह तो देखा ही नहीं कि तुममें से कौन वे लोग हैं जिन्होंने (उसकी राह में) जान लगाई और अल्लाह और रसूल और ईमानवालों के सिवा किसी को जिगरी दोस्त न बनाया18, जो कुछ तुम करते हो अल्लाह उसकी ख़बर रखता है।
18. इस आयत में ख़िताब उन नए लोगों से है जो क़रीब के ज़माने में इस्लाम लाए थे। उनसे कहा जा रहा है कि जब तक तुम इस आज़माइश से गुज़रकर यह साबित न कर दोगे कि वाक़ई तुम ख़ुदा और उसके दीन को अपनी जान और माल और अपने भाई-बन्धुओं से बढ़कर प्यारा रखते हो, तुम सच्चे मोमिन नहीं कहलाए जा सकते। अब तक तो ज़ाहिर के लिहाज़ से तुम्हारी पोज़ीशन यह है कि इस्लाम चूँकि सच्चे मोमिन और पहले ईमान लानेवाले लोगों की जी जान से की गई कोशिशों से ग़ालिब आ गया और मुल्क पर छा गया, इसलिए तुम मुसलमान हो गए।
مَا كَانَ لِلۡمُشۡرِكِينَ أَن يَعۡمُرُواْ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ شَٰهِدِينَ عَلَىٰٓ أَنفُسِهِم بِٱلۡكُفۡرِۚ أُوْلَٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ وَفِي ٱلنَّارِ هُمۡ خَٰلِدُونَ ۝ 16
(17) मुशरिकों का यह काम नहीं है कि वे अल्लाह की मस्जिदों के इन्तिज़ाम करनेवाले और ख़ादिम बनें, जबकि अपने ऊपर वे ख़ुद कुफ़्र (इनकार) की गवाही दे रहे हैं।19 उनका तो सारा किया धरा अकारथ हो गया 20, और जहन्नम में उन्हें हमेशा रहना है।
19. यानी जो मस्जिदें एक ख़ुदा की इबादत के लिए बनी हों, उनके मुतवल्ली, मुजाविर, ख़ादिम और आबाद करनेवाले बनने के लिए वे लोग किसी तरह मुनासिब नहीं हो सकते जो ख़ुदा के साथ ख़ुदावन्दी की सिफ़ात, हुक़ूक़ और इख़्तियारात में दूसरों को शरीक करते हों। फिर जबकि वे ख़ुद भी तौहीद (एकेश्वरवाद) की दावत क़ुबूल करने से इनकार कर चुके हों और उन्होंने साफ़-साफ़ कह दिया हो कि हम अपनी बन्दगी और इबादत को एक ख़ुदा के लिए ख़ास कर देना क़ुबूल नहीं करेंगे, तो आख़िर इन्हें क्या हक़ है कि किसी ऐसी इबादतगाह के मुतवल्ली (ज़िम्मेदार) बने रहें जो सिर्फ़ ख़ुदा की इबादत के लिए बनाई गई थी। यहाँ हालाँकि बात आम कही गई है और अपनी हक़ीक़त के लिहाज़ से यह आम है भी, लेकिन ख़ास तौर पर यहाँ इसका ज़िक्र करने से मक़सद यह है कि ख़ाना-ए-काबा और मस्जिदे-हराम के इन्तिज़ाम और ख़िदमत का मुबारक काम मुशरिकों से छीन लिया जाए और उसे हमेशा के लिए अहले-तौहीद (एकेश्वरवादियों) के हवाले कर दिया जाए।
20. यानी जो थोड़ी-बहुत वाक़ई ख़िदमत इन्होंने बैतुल्लाह (काबा) की अंजाम दी तो वह भी इस वजह से ख़त्म हो गई कि ये लोग इसके साथ शिर्क और जाहिलाना तरीक़ों की मिलावट करते रहे। इनकी थोड़ी भलाई को इनकी बहुत बड़ी बुराई खा गई।
إِنَّمَا يَعۡمُرُ مَسَٰجِدَ ٱللَّهِ مَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَأَقَامَ ٱلصَّلَوٰةَ وَءَاتَى ٱلزَّكَوٰةَ وَلَمۡ يَخۡشَ إِلَّا ٱللَّهَۖ فَعَسَىٰٓ أُوْلَٰٓئِكَ أَن يَكُونُواْ مِنَ ٱلۡمُهۡتَدِينَ ۝ 17
(18) अल्लाह की मस्जिदों के आबादकार (मुजाविर व ख़ादिम) तो वही लोग हो सकते हैं जो अल्लाह और आख़िरत के दिन को मानें और नमाज़ क़ायम करें, ज़कात दें और अल्लाह के सिवा किसी से न डरें। इन्हीं से यह उम्मीद है कि सीधी राह चलेंगे।
۞أَجَعَلۡتُمۡ سِقَايَةَ ٱلۡحَآجِّ وَعِمَارَةَ ٱلۡمَسۡجِدِ ٱلۡحَرَامِ كَمَنۡ ءَامَنَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَجَٰهَدَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ لَا يَسۡتَوُۥنَ عِندَ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 18
(19) क्या तुम लोगों ने हाजियों को पानी पिलाने और मस्जिदे-हराम की मुजावरी करने को उस शख़्स के काम के बराबर ठहरा लिया है जो ईमान लाया अल्लाह पर और आख़िरत के दिन पर और जिसने जान खपाई अल्लाह की राह में?21 अल्लाह के नज़दीक तो ये दोनों बराबर नहीं हैं, और अल्लाह ज़ालिमों की रहनुमाई नहीं करता।
21. यानी किसी ज़ियारतगाह की सज्जादा-नशीनी, मुजाविरी और कुछ नुमाइशी मज़हबी आमाल को बजा लाना, जिसपर दुनिया को सिर्फ़ ऊपरी नज़र से देखनेवाले लोग आम तौर पर इज़्ज़त और बुज़ुर्गी की बुनियाद रखते हैं, ख़ुदा के नज़दीक कोई क़द्र व क़ीमत नहीं रखती। असली क़द्र व क़ीमत ईमान और ख़ुदा की राह में क़ुरबानी की है। यह सिफ़ात जिस आदमी के अन्दर पाई जाएँ वह क़ीमती है। चाहे वह किसी ऊँचे ख़ानदान से ताल्लुक़ न रखता हो, और किसी क़िस्म की ख़ास चीज़ें उसके साथ लगी हुई न हों। लेकिन जो लोग इन ख़ूबियों से ख़ाली हैं वे सिर्फ़ इसलिए कि बुज़ुर्गों की औलाद हैं, सज्जादा-नशीनी इनके ख़ानदान में मुद्दतों से चली आ रही है और ख़ास-ख़ास मौक़ों पर कुछ मज़हबी रस्मों की नुमाइश वे बड़ी शान के साथ कर दिया करते हैं, न किसी मर्तबे के हक़दार हो सकते हैं और न यह जाइज़ हो सकता है कि ऐसे बे-हक़ीक़त “विरासत में चले आ रहे” हुक़ूक़ को तसलीम करके मुक़द्दस मक़ामात और मज़हबी इदारे इन नालायक़ लोगों के हाथों में रहने दिए जाएँ।
ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ وَهَاجَرُواْ وَجَٰهَدُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ أَعۡظَمُ دَرَجَةً عِندَ ٱللَّهِۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡفَآئِزُونَ ۝ 19
(20) अल्लाह के यहाँ तो उन्हीं लोगों का दरजा बड़ा है जो ईमान लाए और जिन्होंने उसकी राह में घर-बार छोड़े और जान व माल से जिहाद किया, वही कामयाब हैं।
يُبَشِّرُهُمۡ رَبُّهُم بِرَحۡمَةٖ مِّنۡهُ وَرِضۡوَٰنٖ وَجَنَّٰتٖ لَّهُمۡ فِيهَا نَعِيمٞ مُّقِيمٌ ۝ 20
(21) उनका रब उन्हें अपनी रहमत और ख़ुशनूदी और ऐसी जन्नतों की ख़ुशख़बरी देता है जहाँ उनके लिए हमेशा रहनेवाले ऐश के सामान हैं।
خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدًاۚ إِنَّ ٱللَّهَ عِندَهُۥٓ أَجۡرٌ عَظِيمٞ ۝ 21
(22) इनमें वे हमेशा रहेंगे। यक़ीनन अल्लाह के पास ख़िदमतों का बदला देने को बहुत कुछ है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ لَا تَتَّخِذُوٓاْ ءَابَآءَكُمۡ وَإِخۡوَٰنَكُمۡ أَوۡلِيَآءَ إِنِ ٱسۡتَحَبُّواْ ٱلۡكُفۡرَ عَلَى ٱلۡإِيمَٰنِۚ وَمَن يَتَوَلَّهُم مِّنكُمۡ فَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلظَّٰلِمُونَ ۝ 22
(23) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! अपने बापों और भाइयों को भी अपना साथी न बनाओ अगर वे ईमान पर कुफ़्र को तरजीह दें। तुममें से जो उनको साथी बनाएँगे, वहीं ज़ालिम होंगे।
قُلۡ إِن كَانَ ءَابَآؤُكُمۡ وَأَبۡنَآؤُكُمۡ وَإِخۡوَٰنُكُمۡ وَأَزۡوَٰجُكُمۡ وَعَشِيرَتُكُمۡ وَأَمۡوَٰلٌ ٱقۡتَرَفۡتُمُوهَا وَتِجَٰرَةٞ تَخۡشَوۡنَ كَسَادَهَا وَمَسَٰكِنُ تَرۡضَوۡنَهَآ أَحَبَّ إِلَيۡكُم مِّنَ ٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَجِهَادٖ فِي سَبِيلِهِۦ فَتَرَبَّصُواْ حَتَّىٰ يَأۡتِيَ ٱللَّهُ بِأَمۡرِهِۦۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡفَٰسِقِينَ ۝ 23
(24) ऐ नबी! कह दी कि अगर तुम्हारे बाप और तुम्हारे बेटे और तुम्हारे भाई और तुम्हारी बीवियाँ और तुम्हारे रिश्ते-नातेदार और तुम्हारे वे माल जो तुमने कमाए और तुम्हारे कारोबार जिनके ठंडे पड़ जाने का तुमको डर है और तुम्हारे वे घर जो तुमको पसन्द हैं, तुमको अल्लाह और उसके रसूल और उसकी राह में जिहाद से ज़्यादा प्यारे हैं तो इन्तिज़ार करो, यहाँ तक कि अल्लाह अपना फ़ैसला तुम्हारे सामने ले आए22, और अल्लाह फ़ासिक लोगों (नाफ़रमानों) की रहनुमाई नहीं किया करता।
22. यानी तुम्हें हटाकर सच्ची दीनदारी की नेमत और उसकी अलम्बरदारी का शरफ़ (श्रेय) और रुश्दो-हिदायत (सन्मार्ग) की पेशवाई का मंसब किसी और गरोह को अता कर दे।
لَقَدۡ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ فِي مَوَاطِنَ كَثِيرَةٖ وَيَوۡمَ حُنَيۡنٍ إِذۡ أَعۡجَبَتۡكُمۡ كَثۡرَتُكُمۡ فَلَمۡ تُغۡنِ عَنكُمۡ شَيۡـٔٗا وَضَاقَتۡ عَلَيۡكُمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ ثُمَّ وَلَّيۡتُم مُّدۡبِرِينَ ۝ 24
(25) अल्लाह इससे पहले बहुत-से मौक़ों पर तुम्हारी मदद कर चुका है। अभी हुनैन की लड़ाई के दिन (उसकी मदद की शान तुम देख चुके हो) 23, उस दिन तुम्हें अपनी तादाद के ज़्यादा होने का घमण्ड था, लेकिन वह तुम्हारे कुछ काम न आई और ज़मीन अपने फैलाव के बावजूद तुमपर तंग हो गई और तुम पीठ फेरकर भाग निकले।
23. जो लोग इस बात से डरते थे कि एलाने-बराअत की ख़तरनाक पॉलिसी पर अमल करने से तमाम अरब के गोशे-गोशे में जंग की आग भड़क उठेगी और इसका मुक़ाबला करना मुश्किल होगा, उनसे कहा जा रहा है कि इन अन्देशों से क्यों डरे जाते हो, जो ख़ुदा इससे बहुत ज़्यादा सख़्त ख़तरों के मौक़ों पर तुम्हारी मदद कर चुका है वह अब भी तुम्हारी मदद को मौजूद है। अगर इस काम का दारोमदार तुम्हारी ताक़त पर होता तो मक्का ही से आगे न बढ़ता, वरना बद्र में तो ज़रूर ही ख़त्म हो जाता। मगर इसकी पीठ पर तो अल्लाह की ताक़त है और पिछले तजरिबे तुमपर साबित कर चुके हैं कि अल्लाह ही की ताक़त अब तक इसको तरक़्क़ी देती रही है। इसलिए यक़ीन रखो कि आज भी वही इसे तरक़्क़ी देगा।
ثُمَّ أَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَىٰ رَسُولِهِۦ وَعَلَى ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَأَنزَلَ جُنُودٗا لَّمۡ تَرَوۡهَا وَعَذَّبَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْۚ وَذَٰلِكَ جَزَآءُ ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 25
(26) फिर अल्लाह ने अपनी ‘सकीनत' (प्रशांति) अपने रसूल पर और ईमानवालों पर उतारी और वे सेनाएँ उतारीं जो तुमको नज़र न आती थीं, और हक़ के इनकारियों को सज़ा कि यही बदला है उन लोगों के लिए जो हक़ का इनकार करें।
ثُمَّ يَتُوبُ ٱللَّهُ مِنۢ بَعۡدِ ذَٰلِكَ عَلَىٰ مَن يَشَآءُۗ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 26
(27) फिर (तुम यह भी देख चुके हो कि) इस तरह सज़ा देने के बाद अल्लाह जिसको चाहता है, तौबा की तौफ़ीक़ भी बख़्श देता है24, अल्लाह माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।
24. जंगे-हुनैन में फ़तह हासिल करने के बाद नबी (सल्ल०) ने शिकस्त खाए हुए दुश्मनों के साथ जिस कुशादादिली और मेहरबानी का बरताव किया उसका नतीजा यह हुआ कि उनमें से ज़्यादातर आदमी मुसलमान हो गए। इस मिसाल से मुसलमानों को यह बताना मक़सद है कि तुमने यही क्यों समझ रखा है कि बस अब अरब के सारे मुशरिक तहस-नहस कर डाले जाएँगे। नहीं, पहले के तजरिबों को देखते हुए तो तुमको यह उम्मीद होनी चाहिए कि जब जाहिली निज़ाम को बढ़ावा देने और उसके बाक़ी रहने की कोई उम्मीद लोगों को बाक़ी न रहेगी और वे सहारे ख़त्म हो जाएँगे जिनकी वजह से ये अब तक जाहिलियत से चिमटे हुए हैं तो ख़ुद-ब-ख़ुद ये इस्लाम की रहमत के दामन में पनाह लेने के लिए आ जाएँगे।
قَٰتِلُواْ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَلَا بِٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَلَا يُحَرِّمُونَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَلَا يَدِينُونَ دِينَ ٱلۡحَقِّ مِنَ ٱلَّذِينَ أُوتُواْ ٱلۡكِتَٰبَ حَتَّىٰ يُعۡطُواْ ٱلۡجِزۡيَةَ عَن يَدٖ وَهُمۡ صَٰغِرُونَ ۝ 27
(29) जंग करो किताबवालों में से उन लोगों के ख़िलाफ़ जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान26 नहीं लाते और जो कुछ अल्लाह और उसके रसूल ने हराम क़रार दिया है उसे हराम नहीं करते27 और दीने-हक़ को अपना दीन नहीं बनाते। (इनसे लड़ो) यहाँ तक कि वे अपने हाथ से जिज़्‌या (रक्षा कर) दें और छोटे (अधीनस्थ) बनकर रहें।28
26. हालाँकि अहले-किताब ख़ुदा और आख़िरत पर ईमान रखने का दावा करते हैं लेकिन अस्ल में न वे ख़ुदा पर ईमान रखते हैं, न आख़िरत पर। ख़ुदा पर ईमान रखने के मानी ये नहीं कि आदमी बस इस बात को मान ले कि ख़ुदा है, बल्कि इसके मानी ये हैं कि आदमी ख़ुदा को एक अकेला इलाह (माबूद) और एक अकेला रब तस्लीम करे और उसकी ज़ात, उसकी सिफ़ात, और उसके इख़्तियारात में न ख़ुद साझीदार बने, न किसी को साझीदार ठहराए, लेकिन ईसाई और यहूदी दोनों इस जुर्म को करते हैं, जैसा कि बादवाली आयतों में साफ़-साफ़ बयान किया गया है। इसलिए उनका ख़ुदा को मानना कोई मानी नहीं रखता और उसे हरगिज़ अल्लाह पर ईमान नहीं कहा जा सकता। इसी तरह आख़िरत को मानने के मानी सिर्फ़ यही नहीं हैं कि आदमी यह बात मान ले कि हम मरने के बाद फिर उठाए जाएँगे, बल्कि इसके साथ यह मानना भी ज़रूरी है कि वहाँ कोई कोशिश, सिफ़ारिश, कोई फ़िदया और किसी बुज़ुर्ग से जुड़ा होना काम न आएगा और न कोई किसी का कफ़्फ़ारा बन सकेगा। ख़ुदा की अदालत में बेलाग इनसाफ़ होगा और आदमी के ईमान और अमल के सिवा किसी चीज़ का लिहाज़ न किया जाएगा। इस अक़ीदे के बग़ैर आख़िरत को मानने का कोई हासिल नहीं है। लेकिन यहूदियों और ईसाइयों ने इस पहलू से अपने अक़ीदे को ख़राब कर लिया है। इसलिए इनका आख़िरत पर ईमान भी क़ाबिले-क़ुबूल नहीं है।
27. यानी उस शरीअत को अपनी ज़िन्दगी का क़ानून नहीं बनाते जो अल्लाह ने अपने रसूल के ज़रिए से नाज़िल की है।
28. यानी लड़ाई का मक़सद यह नहीं है कि वे ईमान ले आएँ और दीने-हक़ की पैरवी करनेवाले बन जाएँ, बल्कि इसका मक़सद यह है कि उनकी ख़ुदमुख़्तारी और बालादस्ती ख़त्म हो जाए। वे ज़मीन में हाकिम और हुक्मराँ बनकर न रहें, बल्कि ज़मीन के निज़ामे-ज़िन्दगी की बागडोर और फ़रमाँरवाई और सरदारी के इख़्तियारात उन लोगों के हाथों में हों जो दीने-हक की पैरवी करनेवाले हों और वे उनके मातहत पैरवी करनेवाले और फ़रमाँबरदार बनकर रहें। जिज़्‌या बदल है उस अमान और उस हिफ़ाज़त का जो ज़िम्मियों (ग़ैर-मुस्लिमों) को इस्लामी हुकूमत में दी जाएगी। इसके आलावा वह इस बात की पहचान भी है कि ये लोग हुक्म के मानने पर राज़ी हैं। 'हाथ से जिज़्‌या देने का मतलब सीधी तरह फ़रमाँबरदारी की शान के साथ जिज़्‌या अदा करना है। और छोटे बनकर रहने का मतलब यह है कि ज़मीन में बड़े वे न हों, बल्कि वे ईमानवाले बड़े हों जो अल्लाह की तरफ़ से ख़िलाफ़त (प्रतिनिधि होने) का फ़र्ज़ अंजाम दे रहे हों। शुरू में यह हुक्म यहूदियों और ईसाइयों के बारे में दिया गया था, लेकिन आगे चलकर ख़ुद नयी (सल्ल०) ने मजूस (आग की पूजा करनेवालों) से जिज़्‌या लेकर उन्हें ज़िम्मी बनाया और उसके बाद सहाबा किराम ने मुत्तफ़िक़ होकर अरब से बाहर की तमाम क़ौमों पर इस हुक्म को आम कर दिया। यह जिज़्‌या वह चीज़ है जिसके लिए बड़ी-बड़ी माज़रतें (खेद) उन्नीसवीं सदी के ज़िल्लत भरे दौर में मुसलमानों की तरफ़ से पेश की गई हैं और उस दौर की यादगार कुछ लोग अब भी मौजूद हैं, जो सफ़ाई देने में लगे हुए हैं। लेकिन ख़ुदा का दीन इससे बहुत बाला व बरतर है कि उसे बाग़ियों के सामने माज़रत (खेद) पेश करने की कोई ज़रूरत हो। सीधी और साफ़ बात यह है कि जो लोग ख़ुदा के दीन को इख़्तियार नहीं करते और अपनी या दूसरों की निकाली हुई ग़लत राहों पर चलते हैं वे हद से हद बस इतनी ही आज़ादी के हक़दार हैं कि ख़ुद जो ग़लती करना चाहते हैं करें, लेकिन उन्हें इसका क़तई कोई हक़ नहीं है कि ख़ुदा की ज़मीन पर किसी जगह इक़तिदार व फ़रमाँरवाई की बागें उनके हाथों में हों, और वे इनसानों की इज्तिमाई ज़िन्दगी का निज़ाम अपनी गुमराहियों के मुताबिक़ क़ायम करें और चलाएँ। यह चीज़ जहाँ कहीं उनको हासिल होगी, फ़साद ज़ाहिर होगा और ईमानवालों का फ़र्ज़ होगा कि उनको इससे बेदख़ल करने और उन्हें निज़ामे-सॉलेह (सुधारवादी व्यवस्था) का फ़रमाँबरदार बनाने की कोशिश करें। अब रहा यह सवाल कि यह जिज़्‌या आख़िर किस चीज़ की क़ीमत है, तो इसका जवाब यह है कि यह उस आधी आज़ादी की क़ीमत है जो उन्हें इस्लामी इक़तिदार के तहत अपनी गुमराहियों पर क़ायम रहने के लिए दी जाती है, और इस क़ीमत को उस सॉलेह निज़ामे-हुकूमत के नज़्म न नस्क़ (प्रबन्धन) पर ख़र्च होना चाहिए जो उन्हें इस आज़ादी के इस्तेमाल की इजाज़त देता है और उनके हुक़ूक़ की हिफ़ाज़त करता है। और इसका बड़ा फ़ायदा यह है कि जिज़्‌या अदा करते वक़्त हर साल ज़िम्मियों में यह एहसास ताज़ा होता रहेगा कि ख़ुदा की राह में ज़कात देने के शरफ़ से महरूमी और उसके बजाय गुमराहियों पर क़ायम रहने की क़ीमत अदा करना कितनी बड़ी बदक़िस्मती है जिसमें वे मुब्तला हैं।
وَقَالَتِ ٱلۡيَهُودُ عُزَيۡرٌ ٱبۡنُ ٱللَّهِ وَقَالَتِ ٱلنَّصَٰرَى ٱلۡمَسِيحُ ٱبۡنُ ٱللَّهِۖ ذَٰلِكَ قَوۡلُهُم بِأَفۡوَٰهِهِمۡۖ يُضَٰهِـُٔونَ قَوۡلَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِن قَبۡلُۚ قَٰتَلَهُمُ ٱللَّهُۖ أَنَّىٰ يُؤۡفَكُونَ ۝ 28
(30) यहूदी कहते हैं कि उज़ैर अल्लाह का बेटा है29, और ईसाई कहते हैं कि मसीह अल्लाह का बेटा है। ये बेहक़ीक़त बातें हैं जो वे अपनी ज़बानों से निकालते हैं उन लोगों की देखा-देखी जो इनसे पहले कुफ़्र (अधर्म) में पड़े हुए थे।30 अल्लाह की मार इनपर, ये कहाँ से धोखा खा रहे हैं।
29. उज़ैर से मुराद अज़रा (Ezra) हैं, जिनको यहूदी अपने दीन का मुजद्दिद (धर्म को ज़िन्दा करनेवाला) मानते हैं। इनका ज़माना 450 ईसा पूर्व के लगभग बताया जाता है। इसराईली रिवायतों के मुताबिक़ हज़रत सुलैमान (अलैहि०) के बाद बनी-इसराईल पर आज़माइशों का ज़माना भी आया। उसमें न सिर्फ़ यह कि तौरात दुनिया से गुम हो गई थी, बल्कि बाबिल की ग़ुलामी ने इसराईली नस्लों को अपनी शरीअत, अपनी रिवायतों और अपनी क़ौमी ज़बान इबरानी तक से अनजान कर दिया था। आख़िरकार इन्ही उज़ैर या अज़रा ने बाइबल के पुराने नियम को मुरत्तब (संकलित) किया और शरीअत को ज़िन्दा किया। इसी वजह से बनी-इसराईल उनकी बहुत इज़्ज़त करते हैं और यह इज़्ज़त इस हद तक बढ़ गई कि कुछ यहूदी गरोहों ने इनको अल्लाह का बेटा तक बना दिया। यहाँ क़ुरआन के कहने का मक़सद यह नहीं है कि तमाम यहूदियों ने मिलकर अज़रा काहिन को ख़ुदा का बेटा बनाया है, बल्कि मक़सद यह बताना है कि ख़ुदा के बारे में यहूदियों के अक़ीदों में जो ख़राबी पैदा हुई, वह इस हद तक तरक़्क़ी कर गई कि अज़रा को ख़ुदा का बेटा कहनेवाले भी उनमें पैदा हुए।
30. यानी मिस्र, यूनान, रूम (रोम), ईरान और दूसरे मुल्कों में जो क़ौमें पहले गुमराह हो चुकी थीं उनके फ़लसफ़ों (दर्शनों), औहाम (अन्धविश्वासों) और तख़य्युलात (परिकल्पनाओं) से मुतास्सिर होकर इन लोगों ने भी वैसे ही गुमराही के अक़ीदे गढ़ लिए। (तशरीह के लिए देखें तफ़हीमुल-क़ुरआन, हिस्सा-1; सूरा-5 माइदा, हाशिया-101)
ٱتَّخَذُوٓاْ أَحۡبَارَهُمۡ وَرُهۡبَٰنَهُمۡ أَرۡبَابٗا مِّن دُونِ ٱللَّهِ وَٱلۡمَسِيحَ ٱبۡنَ مَرۡيَمَ وَمَآ أُمِرُوٓاْ إِلَّا لِيَعۡبُدُوٓاْ إِلَٰهٗا وَٰحِدٗاۖ لَّآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۚ سُبۡحَٰنَهُۥ عَمَّا يُشۡرِكُونَ ۝ 29
(31) इन्होंने अपने उलमा और दरवेशों को अल्लाह के सिवा अपना रब (प्रभु) बना लिया है31 और इसी तरह मरयम के बेटे मसीह को भी, हालाँकि उनको एक माबूद (उपास्य) के सिवा किसी की बन्दगी करने का हुक्म नहीं दिया गया था, वह जिसके सिवा कोई इबादत का हक़दार नहीं, पाक है वह उन शिर्क भरी बातों से जो ये लोग करते हैं।
31. हदीस में आता है कि हज़रत अदी-बिन-हातिम ने, जो पहले ईसाई थे, जब नबी (सल्ल०) के पास हाज़िर होकर इस्लाम क़ुबूल किया तो उन्होंने और बहुत-से सवालों के अलावा एक सवाल यह भी किया था कि इस आयत में हमपर अपने उलमा और दरवेशों को ख़ुदा बना लेने का जो इलज़ाम लगाया गया है उसकी असलियत क्या है? जवाब में नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया कि क्या यह हक़ीक़त नहीं है कि जो कुछ ये लोग हराम क़रार देते हैं उसे तुम हराम मान लेते हो और जो कुछ ये हलाल क़रार देते हैं उसे हलाल मान लेते हो? उन्होंने कहा कि यह तो ज़रूर हम करते रहे हैं। नबी (सल्ल०) ने कहा कि बस यही उनको ख़ुदा बना लेना है। इससे मालूम हुआ कि अल्लाह की किताब की सनद के बग़ैर जो लोग इनसानी ज़िन्दगी के लिए जाइज़ और नाजाइज़ की हदें मुक़र्रर करते हैं वे अस्ल में ख़ुद अपने तौर पर ख़ुदाई के मक़ाम पर जा बैठते हैं और जो क़ानून बनाने के उनके इस हक़ को तस्लीम करते हैं वे उन्हें ख़ुदा बनाते हैं। ये दोनों इलज़ाम, यानी किसी को ख़ुदा का बेटा क़रार देना और किसी को शरीअत बनाने का हक़ दे देना, इस बात के सुबूत में पेश किए गए हैं कि ये लोग अल्लाह पर ईमान के दावे में झूठे हैं। ख़ुदा की हस्ती को चाहे ये मानते हों, मगर उनका ख़ुदाई का तसव्वुर इतना ग़लत है कि इसकी वजह से इनका ख़ुदा को मानना न मानने के बराबर हो गया है।
يُرِيدُونَ أَن يُطۡفِـُٔواْ نُورَ ٱللَّهِ بِأَفۡوَٰهِهِمۡ وَيَأۡبَى ٱللَّهُ إِلَّآ أَن يُتِمَّ نُورَهُۥ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡكَٰفِرُونَ ۝ 30
(32) ये लोग चाहते हैं कि अल्लाह की रौशनी को अपनी फूँकों से बुझा दें। मगर अल्लाह अपनी रौशनी को मुकम्मल किए बग़ैर माननेवाला नहीं है, चाहे इनकार करनेवालों को कितना ही यह नापसंद हो।
هُوَ ٱلَّذِيٓ أَرۡسَلَ رَسُولَهُۥ بِٱلۡهُدَىٰ وَدِينِ ٱلۡحَقِّ لِيُظۡهِرَهُۥ عَلَى ٱلدِّينِ كُلِّهِۦ وَلَوۡ كَرِهَ ٱلۡمُشۡرِكُونَ ۝ 31
(33) वह अल्लाह ही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा है, ताकि उसे दीन की पूरी जिंस पर ग़ालिब32 कर दे चाहे मुशरिकों को यह कितना ही नागवार हो।
32. अस्ल अरबी में ‘अद्-दीन' का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है जिसका तर्जमा हमने 'जिंसे-दीन' किया है। दीन का लफ़्ज़ जैसा कि हम पहले भी बयान कर चुके हैं, अरबी ज़बान में ज़िन्दगी के उस निज़ाम या तरीक़े के लिए इस्तेमाल होता है जिसके क़ायम करनेवाले को सनद (प्रमाण) और इस बात को तस्लीम करके कि उसकी पैरवी और फ़रमाँबरदारी ज़रूरी है उसकी पैरवी की जाए। इसलिए रसूल (सल्ल०) को नबी बनाए जाने का मक़सद इस आयत में यह बताया गया है कि जिस हिदायत और दीने-हक़ को वह ख़ुदा की तरफ़ से लाया है उसे दीन की हैसियत रखनेवाले तमाम तरीक़ों और निज़ामों पर ग़ालिब कर दे। दूसरे अलफ़ाज़ में रसूल को दुनिया में इसलिए नहीं भेजा गया कि ज़िन्दगी का जो निज़ाम वह लेकर आया है वह किसी दूसरे निज़ामे-ज़िन्दगी का ताबे (अधीन) और उससे मग़लूब बनकर और न उसकी दी हुई रिआयतों और गुंजाइशों में सिमटकर रहे, बल्कि वह ज़मीन और आसमान के बादशाह का नुमाइन्दा (प्रतिनिधि) बनकर आता है और अपने बादशाह के निज़ामे-हक़ को ग़ालिब देखना चाहता है। अगर कोई दूसरा निज़ामे-ज़िन्दगी दुनिया में रहे भी तो उसे ख़ुदाई निज़ाम की बख़्शी हुई गुंजाइशों में सिमटकर रहना चाहिए जैसा कि जिज़्‌या अदा करने की सूरत में ज़िम्मियों की ज़िन्दगी का निज़ाम रहता है। (देखें,तफ़हीमुल-क़ुरआन; सूरा-39 ज़ुमर, हाशिया-3; सूरा-40 मोमिन, हाशिया-43; सूरा-42 शूरा, हाशिया-20)
۞يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّ كَثِيرٗا مِّنَ ٱلۡأَحۡبَارِ وَٱلرُّهۡبَانِ لَيَأۡكُلُونَ أَمۡوَٰلَ ٱلنَّاسِ بِٱلۡبَٰطِلِ وَيَصُدُّونَ عَن سَبِيلِ ٱللَّهِۗ وَٱلَّذِينَ يَكۡنِزُونَ ٱلذَّهَبَ وَٱلۡفِضَّةَ وَلَا يُنفِقُونَهَا فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَبَشِّرۡهُم بِعَذَابٍ أَلِيمٖ ۝ 32
(34) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, इन किताबवालों के ज़्यादातर विद्वानों और सन्तों का हाल यह है कि वे लोगों के माल ग़लत तरीक़ों से खाते हैं और उन्हें अल्लाह की राह से रोकते हैं।33 दर्दनाक सज़ा की ख़ुशख़बरी दो उनको जो सोने और चाँदी जमा करके रखते हैं और उन्हें अल्लाह की राह में ख़र्च नहीं करते।
33. यानी ज़ालिम सिर्फ़ यही सितम नहीं करते कि फ़तवे बेचते हैं, रिश्वतें खाते हैं, नज़राने लूटते हैं, ऐसे-ऐसे मज़हबी क़ानून और रस्में गढ़ते हैं जिनसे लोग अपनी नजात (मुक्ति) इनसे ख़रीदें और उनका मरना-जीना और शादी ब ग़म कुछ भी इनको खिलाए बग़ैर न हो सके और वे अपनी क़िस्मतें बनाने और बिगाड़ने का ठेकेदार इनको समझ लें; बल्कि इससे भी आगे बढ़कर अपने इन्ही मक़सदों की ख़ातिर ये लोग अल्लाह की मख़लूक़ को गुमराहियों के चक्कर में फँसाए रखते हैं और जब भी कोई हक़ की दावत सुधार और इस्लाह के लिए उठती है तो सबसे पहले यही अपनी आलिमाना धोखेबाज़ियों और मक्कारियों के हथियार ले-लेकर इसका रास्ता रोकने खड़े हो जाते है।
يَوۡمَ يُحۡمَىٰ عَلَيۡهَا فِي نَارِ جَهَنَّمَ فَتُكۡوَىٰ بِهَا جِبَاهُهُمۡ وَجُنُوبُهُمۡ وَظُهُورُهُمۡۖ هَٰذَا مَا كَنَزۡتُمۡ لِأَنفُسِكُمۡ فَذُوقُواْ مَا كُنتُمۡ تَكۡنِزُونَ ۝ 33
(35) एक दिन आएगा कि इसी सोने-चाँदी पर जहन्नम की आग दहकाई जाएगी और फिर इसी से उन लोगों की पेशानियों और पहलुओं और पीठों को दाग़ा जाएगा — यह है वह ख़ज़ाना जो तुमने अपने लिए जमा किया था, लो अब अपनी समेटी हुई दौलत का मज़ा चखो।
إِنَّ عِدَّةَ ٱلشُّهُورِ عِندَ ٱللَّهِ ٱثۡنَا عَشَرَ شَهۡرٗا فِي كِتَٰبِ ٱللَّهِ يَوۡمَ خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضَ مِنۡهَآ أَرۡبَعَةٌ حُرُمٞۚ ذَٰلِكَ ٱلدِّينُ ٱلۡقَيِّمُۚ فَلَا تَظۡلِمُواْ فِيهِنَّ أَنفُسَكُمۡۚ وَقَٰتِلُواْ ٱلۡمُشۡرِكِينَ كَآفَّةٗ كَمَا يُقَٰتِلُونَكُمۡ كَآفَّةٗۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 34
(36) हक़ीक़त यह है कि महीनों की तादाद जब से अल्लाह ने आसमानों और ज़मीन को पैदा किया है अल्लाह के रजिस्टर में 12 ही है।34 और उनमें से चार महीने हराम (आदर के) हैं। यही ठीक ज़ाबिता है, इसलिए इन चार महीनों में अपने ऊपर ज़ुल्म न करो।35 और मुशरिकों से सब मिलकर लड़ो जिस तरह वे सब मिलकर तुमसे लड़ते हैं,36 और जान रखो कि अल्लाह मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) ही के साथ है।
34. यानी जबसे अल्लाह ने चाँद, सूरज और ज़मीन को पैदा किया है उसी वक़्त से यह हिसाब भी चला आ रहा है कि महीने में एक ही बार चाँद 'हिलाल' (नया चाँद) बनकर निकलता है और इस हिसाब से साल के 12 ही महीने बनते हैं। यह बात इसलिए कही गई है कि अरब के लोग नसी की ख़ातिर महीनों की तादाद 13 या 14 बना लेते थे, ताकि जिस मुहतरम महीने को उन्होंने हलाल कर लिया हो उसे साल की जन्तरी में खपा सकें। इस सिलसिले में वज़ाहत आगे आ रही है।
35. यानी जिन फ़ायदों की वजह से इन महीनों में जंग करना हराम किया गया है उनको बरबाद न करो और उन दिनों में बद-अम्नी फैलाकर अपने ऊपर ज़ुल्म न करो। चार हराम (मुहतरम) महीनों से मुराद है— ‘ज़ीक़ादा', 'ज़िल-हिज्जा' और 'मुहर्रम' हज के लिए और 'रजब' उमरे के लिए।
36. यानी अगर मुशरिक इन महीनों में भी लड़ने से बाज़ न आएँ तो जिस तरह वे एक होकर तुमसे लड़ते हैं तुम भी एक होकर उनसे लड़ो। सूरा-2 बक़रा, आयत-194 इस आयत की तफ़सीर करती है।
إِنَّمَا ٱلنَّسِيٓءُ زِيَادَةٞ فِي ٱلۡكُفۡرِۖ يُضَلُّ بِهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ يُحِلُّونَهُۥ عَامٗا وَيُحَرِّمُونَهُۥ عَامٗا لِّيُوَاطِـُٔواْ عِدَّةَ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُ فَيُحِلُّواْ مَا حَرَّمَ ٱللَّهُۚ زُيِّنَ لَهُمۡ سُوٓءُ أَعۡمَٰلِهِمۡۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 35
(37) नसी तो कुफ़ (अधर्म) में एक और कुफ़्र भरी हरकत है जिससे ये कुफ़्र करनेवाले गुमराही में डाले जाते हैं। किसी साल एक महीने को हलाल कर लेते हैं और किसी साल उसको हराम कर देते हैं, ताकि अल्लाह के हराम किए हुए महीनों की तादाद पूरी भी कर दें और अल्लाह का हराम किया हुआ हलाल भी कर लें।37 उनके बुरे काम उनके लिए ख़ुशनुमा बना दिए गए हैं, और अल्लाह हक़ के इनकारियों को हिदायत नहीं दिया करता।
37. अरब में नसी (महीने को हटाने की रस्म) दो तरह की थी। इसकी एक सूरत तो यह थी कि जंग, लड़ाई-झगड़े, लूटपाट करने और ख़ून का बदला लेने के लिए किसी हराम महीने को हलाल क़रार दे लेते थे और उसके बदले में किसी हलाल महीने को हराम करके हराम महीनों की तादाद पूरी कर देते थे। दूसरी सूरत यह थी कि क़मरी (चाँद के) साल को शम्सी (सूरज के) साल के मुताबिक़ करने के लिए उसमें कबीसा (लौंद) का एक महीना बढ़ा देते थे, ताकि हज हमेशा एक ही मौसम में आता रहे और वे उन परेशानियों से बच जाएँ जो चाँद के हिसाब के मुताबिक़ मुख़्तलिफ़ मौसमों में हज के घूमते रहने से पेश आती हैं। इस तरह 33 साल तक हज अपने असली वक़्त के ख़िलाफ़ दूसरी तारीख़ों में होता रहता था और सिर्फ़ चौंतीस साल एक बार अस्ल ज़िलहिज्जा की 9-10 तारीख़ को अदा होता था। यही बह बात है जो हज्जतुल-वदाअ के मौक़े पर नबी (सल्ल०) ने अपने ख़ुतबे (तक़रीर) में कही थी कि “यानी इस साल हज का वक़्त गर्दिश करता हुआ ठीक अपनी उस तारीख़ पर आ गया है जो क़ुदरती हिसाब से उसकी अस्ल तारीख़ है।" इस आयत में नसी को हराम और नाजाइज़ क़रार देकर अरब के जाहिलों के उन दोनों मक़सदों को बातिल कर दिया गया है। पहला मक़सद तो ज़ाहिर है कि साफ़ तौर पर एक गुनाह था। उसके तो मानी ही ये थे कि ख़ुदा के हराम किए हुए को हलाल भी कर लिया जाए और फिर बहाने बनाकर क़ानून की पाबन्दी की ज़ाहिरी शक्ल भी बनाकर रख दी जाए। रहा दूसरा मक़सद तो सरसरी निगाह में वह मासूम और मस्लहत से भरा नज़र आता है, लेकिन हक़ीक़त में वह भी ख़ुदा के क़ानून से बदतरीन बग़ावत थी। अल्लाह ने अपने लागू किए हुए फ़राइज़ के लिए सूरज के हिसाब के बजाय चाँद का हिसाब जिस अहम फ़ायदों की बिना पर इख़्तियार किया है उनमें से एक यह भी है कि उसके बन्दे ज़माने की तमाम गर्दिशों में, हर क़िस्म के हालात और कैफ़ियतों में उसके हुक्मों को पूरा करने के आदी हों। मिसाल के तौर पर रमज़ान है, तो वह कभी गर्मी में और कभी बरसात में और कभी सर्दियों में आता है और ईमानवाले इन सब बदलते हुए हालात में रोज़े रखकर फ़रमाँबरदारी का सुबूत भी देते हैं और बेहतरीन अख़लाक़ी तरबियत भी पाते हैं। इसी तरह हज भी चाँद की तारीख़ों के हिसाब से मुख़्तलिफ़ मौसमों में आता है और उन सब तरह के अच्छे और बुरे हालात में ख़ुदा की ख़ुशी के लिए सफ़र करके बन्दे अपने ख़ुदा की आज़माइश में पूरे भी उतरते हैं और बन्दगी में पुख़्तगी भी हासिल करते हैं। अब अगर कोई गरोह अपने सफ़र और अपनी तिजारत और अपने मेलों-ठेलों की सहूलत की ख़ातिर हज को किसी ख़ुशगवार मौसम में हमेशा के लिए क़ायम कर दे, तो यह ऐसा ही है जैसे मुसलमान कोई कॉन्फ़्रेंस करके तय कर लें कि आइन्दा से रमज़ान का महीना दिसम्बर या जनवरी के मुताबिक़ कर दिया जाएगा। इसके साफ़ मानी ये हैं कि बन्दों ने अपने ख़ुदा से बग़ावत की और ख़ुदमुख़्तार बन बैठे। इसी चीज़ का नाम कुफ़्र है। इसके आलावा एक आलमगीर दीन जो सब इनसानों के लिए है, आख़िर किस सूरज के महीने को रोज़े और हज के लिए मुक़र्रर करे? जो महीना भी मुक़र्रर किया जाएगा वह ज़मीन के तमाम बसनेवालों के लिए बराबर सहूलत का मौसम नहीं हो सकता। कहीं वह गर्मी का ज़माना होगा और कहीं सर्दी का, कहीं वह बारिशों का मौसम होगा और कहीं ख़ुश्की का। कहीं फ़सलें काटने का ज़माना होगा और कहीं बोने का। यह बात भी सामने रहे कि नसी को ख़त्म करने का यह एलान सन् 9 हिजरी के हज के मौक़े पर किया गया। और अगले साल 10 हिजरी का हज ठीक उन तारीख़ों में हुआ जो चाँद के हिसाब के मुताबिक़ थीं। उसके बाद से आज तक हज अपनी सही तारीख़ों में हो रहा है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَا لَكُمۡ إِذَا قِيلَ لَكُمُ ٱنفِرُواْ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ ٱثَّاقَلۡتُمۡ إِلَى ٱلۡأَرۡضِۚ أَرَضِيتُم بِٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا مِنَ ٱلۡأٓخِرَةِۚ فَمَا مَتَٰعُ ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا فِي ٱلۡأٓخِرَةِ إِلَّا قَلِيلٌ ۝ 36
(38) ऐ लोगो38 जो ईमान लाए हो! तुम्हें क्या हो गया कि जब तुमसे अल्लाह की राह में निकलने के लिए कहा गया तो तुम ज़मीन से चिमटकर रह गए? क्या तुमने आख़िरत के मुक़ाबले में दुनिया की ज़िन्दगी को पसन्द कर लिया? ऐसा है तो तुम्हें मालूम हो कि दुनिया की ज़िन्दगी का यह सब सरो-सामान आख़िरत में बहुत थोड़ा निकलेगा।39
38. यहाँ से वह ख़ुतबा शुरू होता है जो तबूक की जंग की तैयारी के ज़माने में नाज़िल हुआ था।
39. इसके दो मतलब हो सकते हैं। एक यह कि आख़िरत की कभी ख़त्म न होनेवाली ज़िन्दगी और वहाँ के बे-हद्दो-हिसाब साज़ो-सामान को जब तुम देखोगे तब तुम्हें मालूम होगा कि दुनिया की थोड़ी-सी मुहलत में लुत्फ़ और मज़े लेने के जो बड़े-से-बड़े इमकानात (सम्भावनाएँ) तुमको हासिल थे और ज़्यादा-से-ज़्यादा ऐश के जो साधन तुमको मिले हुए थे वे इन ग़ैर-महदूद (असीम) इमकानात और उस बड़ी और नेमतों भरी जन्नत के मुक़ाबले में कुछ भी हैसियत नहीं रखते। और उस वक़्त तुमको अपने इस अंजाम को न जानने और कम-निगाही पर अफ़सोस होगा कि तुमने क्यों हमारे समझाने के बावुजूद दुनिया के वक़्ती और थोड़े से फ़ायदे की खातिर अपने आपको उन हमेशा-हमेश की नेमतों और हमेशा रहनेवाले और ज़्यादा फ़ायदों से महरूम कर लिया। दूसरे यह कि ज़िन्दगी का सरमाया आख़िरत की दुनिया में काम आनेवाली चीज़ नहीं है। यहाँ तुम चाहे कितना ही सरो-सामान इकट्ठा कर लो, मौत की आख़िरी हिचकी के साथ हर चीज़ से तुम्हें हाथ धोना पड़ेगा, और मौत की सरहद की दूसरी तरफ़ जो दुनिया है वहाँ इनमें से कोई चीज़ भी तुम्हारे साथ न जाएगी। वहाँ इसका कोई हिस्सा अगर तुम पा सकते हो तो सिर्फ़ वही जिसे तुमने अल्लाह की ख़ुशी पर कुरबान किया हो और जिसकी मुहब्बत पर तुमने ख़ुदा और उसके दीन की मुहब्बत को तरजीह दी हो।
إِلَّا تَنفِرُواْ يُعَذِّبۡكُمۡ عَذَابًا أَلِيمٗا وَيَسۡتَبۡدِلۡ قَوۡمًا غَيۡرَكُمۡ وَلَا تَضُرُّوهُ شَيۡـٔٗاۗ وَٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيۡءٖ قَدِيرٌ ۝ 37
(39) तुम न उठोगे तो ख़ुदा तुम्हें दर्दनाक सज़ा देगा40, और तुम्हारी जगह किसी और गरोह को उठाएगा41 और तुम ख़ुदा का कुछ भी न बिगाड़ सकोगे, उसे हर चीज़ पर क़ुदरत हासिल है।
40. इसी से यह मसला निकला है कि जब तक जंगी ख़िदमत के लिए आम बुलावा न हो, या जब तक किसी इलाक़े की मुस्लिम आबादी या मुसलमानों के किसी गरोह को जिहाद के लिए निकलने का हुक्म न दिया जाए, उस वक़्त तक तो जिहाद फ़र्जे-किफ़ाया रहता है, यानी अगर कुछ लोग उसे अदा करते रहें तो बाक़ी लोगों पर से वह फ़र्ज़ टल जाता है, लेकिन जब मुसलमानों के सरदार की तरफ़ से मुसलमानों को जिहाद का आम बुलाया हो जाए, या किसी ख़ास गरोह या ख़ास इलाक़े की आबादी को बुलावा दे दिया जाए तो फिर जिन्हें बुलावा दिया गया हो उनपर जिहाद फ़र्ज़े-ऐन है (यानी हर शख़्स पर उसका करना फ़र्ज़ है), यहाँ तक कि जो शख़्स किसी हक़ीक़ी मजबूरी के बग़ैर न निकले उसका ईमान तक भरोसेमन्द नहीं है।
41. यानी ख़ुदा के काम का दारोमदार कुछ तुम्हारे ऊपर नहीं है कि तुम करोगे तो होगा वरना न होगा। हक़ीक़त में यह तो ख़ुदा का फ़ज़्ल और एहसान है कि वह तुम्हें अपने दीन की ख़िदमत का सुनहरा मौक़ा दे रहा है। अगर तुम अपनी नादानी से इस मौक़े को गँवा दोगे तो ख़ुदा किसी और क़ौमों को इसकी तीफ़ीक़ बख़्श देगा और तुम नामुराद रह जाओगे।
إِلَّا تَنصُرُوهُ فَقَدۡ نَصَرَهُ ٱللَّهُ إِذۡ أَخۡرَجَهُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ثَانِيَ ٱثۡنَيۡنِ إِذۡ هُمَا فِي ٱلۡغَارِ إِذۡ يَقُولُ لِصَٰحِبِهِۦ لَا تَحۡزَنۡ إِنَّ ٱللَّهَ مَعَنَاۖ فَأَنزَلَ ٱللَّهُ سَكِينَتَهُۥ عَلَيۡهِ وَأَيَّدَهُۥ بِجُنُودٖ لَّمۡ تَرَوۡهَا وَجَعَلَ كَلِمَةَ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ ٱلسُّفۡلَىٰۗ وَكَلِمَةُ ٱللَّهِ هِيَ ٱلۡعُلۡيَاۗ وَٱللَّهُ عَزِيزٌ حَكِيمٌ ۝ 38
(40) तुमने अगर नबी की मदद न की तो कुछ परवाह नहीं, अल्लाह उसकी मदद उस वक़्त कर चुका है जब इनकार करनेवालों ने उसे निकाल दिया था, जब वह सिर्फ़ दो में का दूसरा था, जब वे दोनों ग़ार (गुफा) में थे, जब वह अपने साथी से कह रहा था कि “ग़म न कर, अल्लाह हमारे साथ है।42‘’ उस वक़्त अल्लाह ने उसपर अपनी तरफ़ से दिल का सुकून उतारा और उसकी मदद ऐसी फ़ौजों से की जो तुमको दिखाई न पड़ती थीं और इनकार करनेवालों का बोल नीचा कर दिया, और अल्लाह का बोल तो ऊँचा ही है, अल्लाह ज़बरदस्त और गहरी सूझ-बूझवाला है।
42. यह उस मौक़े का ज़िक्र है मक्का के इस्लाम-दुश्मनों ने नबी (सल्ल०) के क़त्ल का पक्का इरादा कर लिया था और आप ठीक उस रात को, जो क़त्ल के लिए तय की गई थी, मक्का से निकलकर मदीना की तरफ़ हिजरत कर गए थे। मुसलमानों की बड़ी तादाद दो-दो, चार-चार करके पहले ही मदीना जा चुकी थी। मक्का में सिर्फ़ वही मुसलमान रह गए थे जो बिलकुल बेबस थे या मुनाफ़िकाना (कपटाचारपूर्ण) ईमान रखते थे और उनपर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता था। इस हालत में जब नबी (सल्ल०) को मालूम हुआ कि आपके क़त्ल का फ़ैसला हो चुका है तो आप (सल्ल०) सिर्फ़ एक साथी हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) को साथ लेकर मक्का से निकले, और इस ख़याल से कि आपका पीछा ज़रूर किया जाएगा, आप (सल्ल०) ने मदीना का रास्ता छोड़कर (जो शिमाल यानी उत्तर की तरफ़ था) जुनूब (दक्षिण) का रास्ता इख़्तियार किया यहाँ तीन दिन तक नबी (सल्ल०) सौर गुफा में छिपे रहे। ख़ून के प्यासे दुश्मन आपको हर तरफ़ ढूँढते फिर रहे थे। मक्का के चारों तरफ़ की घाटियों का कोई कोना उन्होंने ऐसा नहीं छोड़ा। जहाँ आप (सल्ल०) को तलाश न किया हो। इसी सिलसिले में एक बार उनमें से कुछ लोग ठीक गुफा के मुँह तक भी पहुँच गए जिसमें आप (सल्ल०) छिपे हुए थे। हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) को बहुत डर लगा कि अगर इन लोगों में से किसी ने ज़रा आगे बढ़कर गुफा में झाँक लिया तो वह हमें देख लेगा। लेकिन नबी (सल्ल०) के इत्मीनान में ज़रा फ़र्क़ नहीं आया और आप (सल्ल०) ने यह कहकर हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) को तसल्ली दी कि “ग़म न करो, अल्लाह हमारे साथ है।”
ٱنفِرُواْ خِفَافٗا وَثِقَالٗا وَجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِكُمۡ وَأَنفُسِكُمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِۚ ذَٰلِكُمۡ خَيۡرٞ لَّكُمۡ إِن كُنتُمۡ تَعۡلَمُونَ ۝ 39
(41) निकलो, चाहे हलके हो या बोझल43 और जिहाद करो अल्लाह की राह में अपने मालों और अपनी जानों के साथ, यह तुम्हारे लिए अच्छा है अगर तुम जानो।
43. हल्के और बोझिल के अलफ़ाज़ का मतलब बहुत फैला हुआ है। मतलब यह है कि जब निकलने का हुक्म हो चुका है तो हर हाल में तुमको निकलना चाहिए चाहे दिल चाहता हो या नहीं, चाहे तंगी में हो या ख़ुशहाली में, चाहे बहुत कुछ साज़ो-सामान के साथ हो, चाहे बेसरो-सामानी के साथ, चाहे हालात मुवाफ़िक़ हो या नामुवाफ़िक़, चाहे जवान और तन्दुरूस्त हो, चाहे ज़ईफ़ और कमज़ोर।
لَوۡ كَانَ عَرَضٗا قَرِيبٗا وَسَفَرٗا قَاصِدٗا لَّٱتَّبَعُوكَ وَلَٰكِنۢ بَعُدَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلشُّقَّةُۚ وَسَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَوِ ٱسۡتَطَعۡنَا لَخَرَجۡنَا مَعَكُمۡ يُهۡلِكُونَ أَنفُسَهُمۡ وَٱللَّهُ يَعۡلَمُ إِنَّهُمۡ لَكَٰذِبُونَ ۝ 40
(42) ऐ नबी! अगर फ़ायदा आसानी से हासिल हो जानेवाला होता और सफ़र हलका होता तो वे ज़रूर तुम्हारे पीछे चलने पर तैयार हो जाते, मगर उनपर तो यह रास्ता बहुत कठिन हो गया।44 अब वे अल्लाह की क़सम खा-खाकर कहेंगे कि अगर हम चल सकते तो यक़ीनन तुम्हारे साथ चलते। वे अपने आपको तबाही में डाल रहे हैं। अल्लाह ख़ूब जानता है कि वे झूठे हैं।
44. यानी यह देखकर कि मुक़ाबला रूम (रोम) जैसी ताक़त से है और ज़माना सख़्त गर्मी का है और मुल्क में सूखा पड़ा हुआ है और नए साल की फ़सलें, जिनसे आस लगी हुई थी, कटने के क़रीब हैं, उनको तबूक का सफ़र बहुत ही भारी महसूस होने लगा।
قُل لَّن يُصِيبَنَآ إِلَّا مَا كَتَبَ ٱللَّهُ لَنَا هُوَ مَوۡلَىٰنَاۚ وَعَلَى ٱللَّهِ فَلۡيَتَوَكَّلِ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ ۝ 41
(51) इनसे कहो, “हमें हरगिज़ कोई (बुराई या भलाई) नहीं पहुँचती, मगर वह जो अल्लाह ने हमारे लिए लिख दी है अल्लाह ही हमारा मौला (कारसाज़) है, और ईमानवालों को उसी पर भरोसा करना चाहिए।51
51. यहाँ दुनियापरस्त और ख़ुदापरस्त की सोच और ज़ेहनियत के फ़र्क़ को वाज़ेह (स्पष्ट) किया गया है। दुनियापरस्त जो कुछ करता है अपने नफ़्स (मन) की ख़ुशी के लिए करता है और उसके नफ़्स की ख़ुशी का दारोमदार कुछ दुनयावी फ़ायदों को हासिल करने पर होता है। ये मक़सद और फ़ायदे उसे हासिल हो जाएँ तो वह फूल जाता है और हासिल न हों तो उसपर मायूसी छा जाती है। फिर उसका सहारा मुकम्मल तौर पर माद्दी असबाब पर होता है। वे साज़गार हों तो उसका दिल बढ़ने लगता है और नासाज़गार होते नज़र आएँ तो उसकी हिम्मत टूट जाती है। इसके बरख़िलाफ़ ख़ुदापरस्त इनसान जो कुछ करता है, अल्लाह की ख़ुशी के लिए करता है और इस काम में उसका भरोसा अपनी क़ुव्वत या माद्दी असबाब पर नहीं, बल्कि अल्लाह की ज़ात पर होता है। हक़ की राह में काम करते हुए उसपर मुसीबतें आएँ या कामयाबियों की बारिश हो, दोनों सूरतों में वह यही समझता है कि जो कुछ अल्लाह की मरज़ी है वह पूरी हो रही है। मुसीबतें उसका दिल नहीं तोड़ सकतीं और कामयाबियाँ उसको इतराहट में नहीं डाल सकतीं; क्योंकि पहले तो दोनों को वह अपने हक़ में ख़ुदा की तरफ़ से समझता है। और उसे हर हाल में यह फ़िक्र होती है कि ख़ुदा की डाली हुई आज़माइश से ख़ैरियत के साथ गुज़र जाए। दूसरे उसके सामने दुनियावी मक़सद नहीं होते कि उनके लिहाज़ से वह अपनी कामयाबी या नाकामी का अन्दाज़ा करे। उसके सामने तो बस एक ही मक़सद अल्लाह की रज़ा और ख़ुशी होता है और इस मक़सद से उसके करीब या दूर होने का पैमाना किसी दुनियावी कामयाबी का हासिल होना या न होना नहीं है, बल्कि सिर्फ़ यह बात है कि ख़ुदा ने जान और माल की बाज़ी लगाने की जो ज़िम्मेदारी उसपर डाली थी वह उसने कहाँ तक पूरी की। अगर यह फ़र्ज़ उसने अदा कर दिया हो तो चाहे दुनिया में वह बाज़ी बिलकुल ही हार चुका हो, लेकिन उसे पूरा भरोसा रहता है कि जिस ख़ुदा के लिए उसने माल खपाया और जान दी है वह उसके बदले को बरबाद करनेवाला नहीं है। फिर दुनियावी सरो-सामान से यह आस ही नहीं लगाता कि उनकी साज़गारी या नासाज़गारी उसको ख़ुश या रंजीदा करे। उसका सारा भरोसा ख़ुदा पर होता है जिसके हाथ में असबाब और सरो-सामान की दुनिया है, वही हाकिम है और उसके भरोसे पर वह नासाज़गार हालात में भी उसी हिम्मत और हौसले के साथ काम किए जाता है जिसका इज़हार दुनियावालों से सिर्फ़ साज़गार हालात ही में हुआ करता है। इसलिए अल्लाह कहता है कि इन दुनियापरस्त मुनाफ़िक़ों से कह दो कि हमारा मामला तुम्हारे मामले से बुनियादी तौर पर अलग है। तुम्हारी ख़ुशी और रंज के क़ानून कुछ और हैं और हमारे कुछ और। तुम इत्मीनान और बेइत्मीनानी किसी और ज़रिए से हासिल करते हो और हम किसी और ज़रिए से।
قُلۡ هَلۡ تَرَبَّصُونَ بِنَآ إِلَّآ إِحۡدَى ٱلۡحُسۡنَيَيۡنِۖ وَنَحۡنُ نَتَرَبَّصُ بِكُمۡ أَن يُصِيبَكُمُ ٱللَّهُ بِعَذَابٖ مِّنۡ عِندِهِۦٓ أَوۡ بِأَيۡدِينَاۖ فَتَرَبَّصُوٓاْ إِنَّا مَعَكُم مُّتَرَبِّصُونَ ۝ 42
(52) उनसे कहो, “तुम हमारे मामले में जिस चीज़ का इंतिज़ार कर रहे हो वह इसके सिवा और क्या है कि दो भलाइयों में से एक भलाई है।52 और हम तुम्हारे मामले में जिस चीज़ का इंतिज़ार कर रहे हैं वह यह है कि अल्लाह ख़ुद तुमको सज़ा देता है या हमारे हाथों दिलवाता है। अच्छा तो अब तुम भी इंतिज़ार करो और हम भी तुम्हारे साथ इंतिज़ार करते हैं।”
52. मुनाफ़िक़ लोग अपनी आदत के मुताबिक़ इस मौक़े पर भी कुफ़्र और इस्लाम की इस कशमकश में हिस्सा लेने के बजाय अपनी समझ में बड़ी सूझ-बूझ के साथ दूर बैठे हुए वह देखना चाहते थे कि इस कशमकश का अंजाम क्या होता है, नबी (सल्ल०) और उनके साथी फ़तह हासिल करके आते हैं या रूमियों की फ़ौजी ताक़त से टकराकर चूर-चूर हो जाते हैं। इसका जवाब उन्हें यह दिया गया जिन दो नतीजों में से एक के ज़ाहिर होने का तुम्हें इन्तिज़ार है, ईमानवालों के लिए तो वे दोनों ही सरासर भलाई हैं। वे अगर कामयाब हों तो इसका भलाई। होना तो ज़ाहिर ही है, लेकिन अगर अपने मक़सद की राह में जानें लड़ाते हुए वे सब-के-सब मिट्टी में मिल जाएँ तब भी दुनिया की निगाह में चाहे यह इन्तिहाई नाकामी हो, मगर हक़ीक़त में यह भी एक दूसरी कामयाबी है। इसलिए कि मोमिन की कामयाबी और नाकामी का मेयार यह नहीं है कि उसने कोई मुल्क फ़तह किया या नहीं, या कोई हुकूमत क़ायम कर दी या नहीं, बल्कि उसका मेयार यह है कि उसने अपने ख़ुदा के कलिमे को बुलन्द करने के लिए अपने दिल और दिमाग़ और जिस्म और जान की सारी ताक़तें लड़ा दीं या नहीं। यह काम अगर उसने कर दिया तो हक़ीक़त में कामयाब है, चाहे दुनिया के एतिबार से उसकी कोशिश का नतीजा ज़ीरो ही क्यों न हो।
قُلۡ أَنفِقُواْ طَوۡعًا أَوۡ كَرۡهٗا لَّن يُتَقَبَّلَ مِنكُمۡ إِنَّكُمۡ كُنتُمۡ قَوۡمٗا فَٰسِقِينَ ۝ 43
(53) इनसे कहो, “तुम अपने माल चाहे राज़ी-ख़ुशी ख़र्च करो या नागवारी के साथ53 बहरहाल वे क़ुबूल न किए जाएँगे, क्योंकि तुम फ़ासिक़ (नाफ़रमान) लोग हो।"
53. कुछ मुनाफ़िक़ ऐसे भी थे कि अपने आपको ख़तरे में डालने के लिए तो तैयार न थे, मगर यह भी नहीं चाहते थे कि इस जिहाद और उसकी कोशिश से बिलकुल अलग-थलग रहकर मुसलमानों की निगाह में अपनी सारी साख खो दें और अपने निफ़ाक़ को अलानिया ज़ाहिर कर दें। इसलिए वे कहते थे कि हम जंगी ख़िदमात अंजाम देने से तो इस वक़्त छुट्टी चाहते हैं, लेकिन माल से मदद करने के लिए हाज़िर हैं।
وَمَا مَنَعَهُمۡ أَن تُقۡبَلَ مِنۡهُمۡ نَفَقَٰتُهُمۡ إِلَّآ أَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَبِرَسُولِهِۦ وَلَا يَأۡتُونَ ٱلصَّلَوٰةَ إِلَّا وَهُمۡ كُسَالَىٰ وَلَا يُنفِقُونَ إِلَّا وَهُمۡ كَٰرِهُونَ ۝ 44
(54) उनके दिए हुए माल क़ुबूल न होने की कोई वजह इसके सिवा नहीं है कि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल से कुफ़ किया है। नमाज़ के लिए आते हैं तो कसमसाते हुए आते हैं और ख़ुदा के रास्ते में ख़र्च करते हैं, तो न चाहते हुए ख़र्च करते हैं।
فَلَا تُعۡجِبۡكَ أَمۡوَٰلُهُمۡ وَلَآ أَوۡلَٰدُهُمۡۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ لِيُعَذِّبَهُم بِهَا فِي ٱلۡحَيَوٰةِ ٱلدُّنۡيَا وَتَزۡهَقَ أَنفُسُهُمۡ وَهُمۡ كَٰفِرُونَ ۝ 45
(55) इनके माल व दौलत और इनकी औलाद की ज़्यादती को देखकर धोखा न खाओ। अल्लाह तो यह चाहता है कि इन ही चीज़ों के ज़रिए से इनको दुनिया की ज़िन्दगी में भी अज़ाब में डाल दे54 और ये जान भी दें तो हक़ के इनकार ही की हालत में दें।55
54. यानी इस माल और औलाद की मुहब्बत में गिरफ़्तार होकर जो मुनाफ़िक़ाना रवैया इन्होंने अपनाया है, इसकी वजह से मुस्लिम समाज में ये बहुत ही रुसवा और बे-इज़्ज़त होकर रहेंगे और रियासत व हुकूमत की वह सारी शान और इज़्ज़त व नामवरी और बड़ाई और चौधराहट, जो अब तक अरबी समाज में उनको हासिल रही है, नए इस्लामी समाजी निज़ाम में वह मिट्टी में मिल जाएगी। मामूली-मामूली ग़ुलाम और ग़ुलामज़ादे और मामूली किसान और चरवाहे, जिन्होंने सच्चे ईमान का सुबूत दिया है, इस नए निज़ाम में इज़्ज़तदार होंगे और ख़ानदानी चौधरी अपनी दुनिया-परस्ती की वजह से बे इज़्ज़त होकर रह जाएँगे। इस कैफ़ियत का एक दिलचस्प नमूना वह वाक़िआ है जो एक बार हज़रत उमर (रज़ि०) की मजलिस में पेश आया। क़ुरैश के कुछ बड़े-बड़े शैख़, जिनमें सुहैल-बिन-अम्र और हारिस-बिन-हिशाम जैसे लोग भी थे, हज़रत उमर (रज़ि०) से मिलने गए। वहाँ यह सूरत पेश आई कि अनसार और मुहाजिरीन में से कोई मामूली आदमी भी आता तो हज़रत उमर (रज़ि०) उसे अपने पास बुलाकर बैठाते और इन शैख़ों से कहते कि इसके लिए जगह ख़ाली करो। थोड़ी देर में नौबत यह आई कि ये लोग सरकते-सरकते मजलिस के किनारे पहुँच गए। बाहर निकल, कर हारिस-बिन-हिशाम ने साथियों से कहा कि तुम लोगों ने देखा, आज हमारे साथ क्या सुलूक हुआ है? सुहैल-बिन-अम्र ने कहा, इसमें उमर का कुछ क़ुसूर नहीं, क़ुसूर हमारा है कि जब हमें इस दीन की तरफ़ दावत दी गई तो हमने मुँह मोड़ा और ये लोग इसकी तरफ़ दौड़कर आए। फिर ये दोनों साहिब दोबारा हज़रत उमर (रज़ि०) के पास हाज़िर हुए और कहा कि आज हमने आपका सुलूक देखा, और हम जानते हैं कि यह हमारी अपनी कोताहियों का नतीजा है, मगर अब इसकी भरपाई की भी कोई सूरत है? हज़रत उमर (रज़ि०) ने ज़बान से कुछ जवाब नहीं दिया और सिर्फ़ रूमी सरहद की तरफ़ इशारा कर दिया। मतलब यह था कि अब जिहाद के मैदान में जान-माल खपाओ तो शायद वह पोज़िशन फिर हासिल हो जाए जिसे खो चुके हो।
55. यानी इस ज़िल्लत और रुसवाई से बढ़कर मुसीबत उनके लिए यह होगी कि जिन मुनाफ़िक़ाना आदतों को ये अपने अन्दर पाल रहे हैं उनकी वजह से इन्हें मरते दम तक सच्चे ईमान की तौफ़ीक़ नसीब नहीं होगी और अपनी दुनिया ख़राब कर लेने के बाद ये इस हाल में दुनिया से रुख़सत होंगे कि आख़िरत भी ख़राब, बल्कि बहुत ख़राब होगी।
وَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ إِنَّهُمۡ لَمِنكُمۡ وَمَا هُم مِّنكُمۡ وَلَٰكِنَّهُمۡ قَوۡمٞ يَفۡرَقُونَ ۝ 46
(56) वे अल्लाह की क़सम खा-खाकर कहते हैं कि हम तुम्हीं में से हैं, हालाँकि वे हरगिज़ तुममें से नहीं हैं। अस्ल में तो वे ऐसे लोग हैं जो तुमसे डरे हुए हैं।
لَوۡ يَجِدُونَ مَلۡجَـًٔا أَوۡ مَغَٰرَٰتٍ أَوۡ مُدَّخَلٗا لَّوَلَّوۡاْ إِلَيۡهِ وَهُمۡ يَجۡمَحُونَ ۝ 47
(57) अगर वे कोई पनाहगाह पा लें, या कोई खोह या घुस बैठने की जगह, तो भागकर उसमें जा छिपें।56
56. मदीना के ये मुनाफ़िक़ ज़्यादातर, बल्कि तमामतर मालदार और ज़्यादा उम्रवाले लोग थे। इब्ने-कसीर ने 'अल-बिदाया वन्निहाया' में उनकी जो लिस्ट दी है उसमें सिर्फ़ एक नौजवान का ज़िक्र मिलता है और ग़रीब इनमें से कोई भी नहीं। ये लोग मदीना में जायदादें और फैले हुए कारोबार रखते थे और दुनिया देखे होने की वजह से वे मस्लहत-परस्त बन गए थे। इस्लाम जब मदीना में पहुँचा और आबादी के एक बड़े हिस्से ने पूरे दिल की सच्चाई और ईमानी जोश के साथ उसे क़ुबूल कर लिया, तो इन लोगों ने अपने आपको एक अजीब बेचैनी और उलझन में पड़ा हुआ पाया। उन्होंने देखा कि एक तरफ़ तो ख़ुद उनके अपने क़बीलों की भारी तादाद, बल्कि उनके बेटों और बेटियों तक को इस नए दीन ने ईमान के नशे में डुबा दिया है। उनके ख़िलाफ़ अगर वे कुफ़्र और इनकार पर क़ायम रहते हैं तो उनकी हुकूमत, इज़्ज़त, शोहरत सब ख़ाक में मिल जाती है। यहाँ तक कि उनके अपने घरों में उनके ख़िलाफ़ बग़ावत बरपा हो जाने का अन्देशा है। दूसरी तरफ़ इस दीन का साथ देने के मानी यह हैं कि ये सारे अरब से, बल्कि आस-पास की क़ौमों और सल्तनतों से भी लड़ाई मोल लेने के लिए तैयार हो जाएँ। अपने मन और ख़ाहिशों की बन्दगी ने मामले के इस पहलू पर नज़र करने की सलाहियत तो उनके अन्दर बाक़ी ही नहीं रहने दी थी कि हक़ और सच्चाई अपने आप में कोई क्रीमती चीज़ है जिसके इश्क़ में इनसान ख़तरे मोल ले सकता है और जान-माल की क़ुरबानियाँ बरदाश्त कर सकता है, दुनिया के सारे मामलों और मसलों पर सिर्फ़ फ़ायदों और मस्लहत ही के लिहाज़ से निगाह डालने के आदी हो चुके थे। इसलिए उनको अपने फ़ायदों कि हिफ़ाज़त की बेहतरीन सूरत यही नजर आई कि ईमान का दावा करें; ताकि अपनी क़ौम के दरमियान अपनी ज़ाहिरी इज़्ज़त और अपनी जायदादों और अपने कारोबार को बरक़रार रख सकें, मगर सच्चे दिल से ईमान न इख़्तियार करें ताकि उन ख़तरों और नुक़सान से दो-चार न हों जो सच्चाई की राह इख़्तियार करने से लाज़िमी तौर पर पेश आने थे। उनकी इसी ज़ेहनी कैफ़ियत को यहाँ इस तरह बयान किया गया है कि हक़ीक़त में ये लोग तुम्हारे साथ नहीं हैं, बल्कि नुक़सान के ख़ौफ़ ने इन्हें ज़बरदस्ती तुम्हारे साथ बाँध दिया है। जो चीज़ इन्हें इस बात पर मजबूर करती है कि अपने-आपको मुसलमानों में शुमार कराएँ वह सिर्फ़ यह डर है कि मदीना में रहते हुए अलानिया ग़ैर-मुस्लिम बनकर रहें तो इज़्ज़त और वक़ार ख़त्म होता है और बीवी-बच्चों तक से ताल्लुक़ात ख़त्म हो जाते हैं। मदीना को छोड़ दें तो अपनी जायदादों और तिजारतों से हाथ धोना पड़ता है। और उनके अन्दर कुफ़्र के लिए भी इतना इख़लास नहीं है कि उसकी ख़ातिर वे उन नुक़सानों को बरदाश्त करने पर तैयार हो जाएँ। इस उलझन ने उन्हें कुछ ऐसा फाँस रखा है कि मजबूर होकर मदीना में बैठे हुए हैं, न चाहते हुए नमाज़ें पढ़ रहे हैं और ज़कात का 'जुर्माना' भुगत रहे हैं। वरना आए दिन जिहाद और आए दिन किसी न किसी ख़ौफ़नाक दुश्मन के मुक़ाबले और आए दिन जान और माल की कुरबानियों की माँग की जो ‘मुसीबत’ इनपर पड़ी हुई है उससे बचने के लिए इतने बेचैन हैं कि अगर कोई सूराख़ या बिल भी ऐसा नज़र आ जाए जिसमें इन्हें अम्न (शान्ति) मिलने की उम्मीद हो तो ये भागकर उसमें घुस बैठें।
وَمِنۡهُم مَّن يَلۡمِزُكَ فِي ٱلصَّدَقَٰتِ فَإِنۡ أُعۡطُواْ مِنۡهَا رَضُواْ وَإِن لَّمۡ يُعۡطَوۡاْ مِنۡهَآ إِذَا هُمۡ يَسۡخَطُونَ ۝ 48
(58) ऐ नबी! इनमें से कुछ लोग सदक़ो के बँटवारे में तुमपर एतिराज़ करते हैं। अगर इस माल में से उन्हें कुछ दे दिया जाए तो ख़ुश हो जाएँ और न दिया जाए तो बिगड़ने लगते हैं।57
57. अरब में यह पहला मौक़ा था कि मुल्क के तमाम उन बाशिन्दों पर जो एक मुक़र्रर तादाद से ज़्यादा माल रखते थे, बाक़ायदा ज़कात लागू की गई थी और वे उनकी खेती की पैदावार से, उनके मवेशियों से, उनके तिजारत के मालों से उनके मादनियात (खनिजों) से, और उनके सोने-चाँदी के ज़ख़ीरों से ढाई फ़ीसद, पाँच फ़ीसद, दस फ़ीसद और 20 फ़ीसद की मुख़्तलिफ़ दरों के मुताबिक़ वुसूल की जाती थी। ज़कात के ये सब माल एक मुनज़्ज़म तरीक़े से वुसूल किए जाते। इस तरह नबी (सल्ल०) के पास मुल्क के आस-पास से इतनी दौलत सिमटकर आती और आप (सल्ल०) के हाथों ख़र्च होती थी जो अरब के लोगों ने कभी इससे पहले किसी एक शख़्स के हाथों जमा होते और तक़सीम होते नहीं देखी थी। दुनिया-परस्त मुनाफ़िक़ों के मुँह में इस दौलत को देखकर पानी भर-भर आता था। वे चाहते थे कि इस बहते हुए दरिया से उनको ख़ूब पेट भरकर पीने का मौक़ा मिले, मगर यहाँ पिलानेवाला ख़ुद अपने ऊपर और अपने ही रिश्तेदारों पर उस दरिया के एक-एक क़तरे को हराम कर चुका था और कोई यह उम्मीद नहीं कर सकता था कि उसके हाथों से हक़दार लोगों के सिवा किसी और के होंठों तक जाम पहुँच सकेगा। यही वजह है कि मुनाफ़िक़ नबी (सल्ल०) की सदक़ों के बँटवारे को देख-देखकर दिलों में घुटते थे और बँटवारे के मौक़े पर आप (सल्ल०) को तरह-तरह के इलज़ाम से ताने दिया करते थे। अस्ल शिकायत तो उन्हें यह थी कि इस माल पर हमें हाथ साफ़ करने का मौक़ा नहीं दिया जाता, मगर इस अस्ल शिकायत को छिपाकर वे इलज़ाम यह रखते थे कि माल का बँटवारा इनसाफ़ से नहीं किया जाता और इसमें तरफ़दारी से काम लिया जाता है।
وَلَوۡ أَنَّهُمۡ رَضُواْ مَآ ءَاتَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ وَقَالُواْ حَسۡبُنَا ٱللَّهُ سَيُؤۡتِينَا ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦ وَرَسُولُهُۥٓ إِنَّآ إِلَى ٱللَّهِ رَٰغِبُونَ ۝ 49
(59) क्या ही अच्छा होता कि अल्लाह और रसूल ने जो कुछ भी उन्हें दिया था उसपर वे राज़ी रहते58 और कहते कि “अल्लाह हमारे लिए काफ़ी है, वह अपनी मेहरबानी से हमें और बहुत कुछ देगा और उसका रसूल भी हमपर मेहरबानी करेगा59, हम अल्लाह ही की तरफ़ नज़र जमाए हुए हैं!"60
58. यानी ग़नीमत के माल में से जो हिस्सा नबी (सल्ल०) उनको देते हैं इसपर मुतमइन रहते, और ख़ुदा के फ़ज़्ल से जो कुछ ये ख़ुद कमाते हैं और ख़ुदा के दिए हुए आमदनी के ज़रिओं से जो ख़ुशहाली इन्हें मिली है उसको अपने लिए काफ़ी समझते।
59. यानी ज़कात के अलावा जो माल हुकूमत के ख़ज़ाने में आएँगे उनसे हक़ के मुताबिक़ हम लोगों को उसी तरह फ़ायदा उठाने का मौक़ा हासिल रहेगा जिस तरह अब तक रहा है।
60. यानी हमारी नज़र दुनिया और उसकी मामूली दौलत पर नहीं, बल्कि अल्लाह और उसके फ़ज़्त और करम पर है। उसी की ख़ुशी हम चाहते हैं। उसी से उम्मीद रखते हैं। जो कुछ वह दे उसपर ख़ुश हैं।
۞إِنَّمَا ٱلصَّدَقَٰتُ لِلۡفُقَرَآءِ وَٱلۡمَسَٰكِينِ وَٱلۡعَٰمِلِينَ عَلَيۡهَا وَٱلۡمُؤَلَّفَةِ قُلُوبُهُمۡ وَفِي ٱلرِّقَابِ وَٱلۡغَٰرِمِينَ وَفِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَٱبۡنِ ٱلسَّبِيلِۖ فَرِيضَةٗ مِّنَ ٱللَّهِۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٞ ۝ 50
(60) ये सदक़े तो अस्ल में फ़क़ीरों61 और मिस्कीनों62 के लिए हैं और उन लोगों के लिए जो सदक़ों के काम पर मुक़र्रर हो63, और उनके लिए जिनका मन मोहना हो64, साथ ही यह गरदनों के छुड़ाने65 और क़र्ज़दारों की मदद करने में66 और अल्लाह के रास्ते में67 और मुसाफ़िर की मदद में68 इस्तेमाल करने के लिए हैं। एक फ़रीज़ा है अल्लाह की तरफ़ से, और अल्लाह सब कुछ जाननेवाला और गहरी सूझ-बूझवाला है।
61. फ़क़ीर से मुराद हर वह शख़्स है जो अपनी मईशत (रोज़ी) के लिए दूसरों की मदद का मोहताज हो। यह लफ़्ज़ तमाम ज़रूरतमन्दों के लिए आम है चाहे वे जिस्मानी कमी या बुढ़ापे की वजह से मुस्तक़िल तौर पर मदद के मोहताज हो गए हों या किसी वक़्ती वजह से इस वक़्त मदद के मोहताज हों, और अगर उन्हें सहारा मिल जाए तो आगे चलकर ख़ुद अपने पाँव पर खड़े हो सकते हों, मिसाल के तौर पर यतीम बच्चे, बेवा औरतें, बेरोज़गार लोग और वे लोग जो वक़्ती हादिसों के शिकार हो गए हों।
62. मिसकीन लफ़्ज़ ‘मस्कनत’ से बना है और 'मस्कनत’ के लफ़्ज़ में आजिज़ी, मजबूरी, बेचारगी और नीचा होने के मानी शामिल हैं। इस लिहाज़ से ‘मिसकीन’ वे लोग हैं जो ज़रूरतमंदों के मुक़ाबले में ज़्यादा ख़स्ता हाल हों। नबी (सल्ल०) ने इस लफ़्ज़ की तशरीह करते हुए ख़ुसूसियत के साथ ऐसे लोगों को मदद का हक़दार ठहराया है जो अपनी ज़रूरतों के मुताबिक़ ज़रिए (साधन) न पा रहे हों और सख़्त तंग हाल हों, मगर न तो उनकी ख़ुद्दारी किसी के आगे हाथ फैलाने की इजाज़त देती हो और न उनकी ज़ाहिरी पोजीशन ऐसी हो कि कोई उन्हें ज़रूरतमन्द समझकर उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाए। चुनाँचे हदीस में इसकी तशरीह इस तरह की गई है कि “मिसकीन वह है जो अपनी ज़रूरत भर माल नहीं पाता, और न पहचाना जाता है कि उसकी मदद की जाए, और न खड़ा होकर लोगों से माँगता है।” मानो वह एक ऐसा शरीफ़ आदमी है जो ग़रीब हो।
63. यानी वे लोग जो सदक़ात वुसूल करने और वुसूल किए गए माल की हिफ़ाज़त करने और उनका हिसाब-किताब लिखने और उन्हें तक़सीम करने में हुकूमत की तरफ़ से इस्तेमाल किए जाएँ। ऐसे लोग चाहे फ़क़ीर और मिसकीन न हों, उनकी तनख़ाहें बहरहाल सदक़ात ही की मद से दी जाएँगी। ये अलफ़ाज़ और इसी सूरा की आयत-103 के अलफ़ाज़ “ऐ नबी, तुम इनके मालों में से सदक़ा लो” इस बात की दलील हैं कि ज़कात की वुसूलयाबी और तक़सीम इस्लामी हुकूमत की ज़िम्मेदारियों में से है। इस सिलसिले में यह बात काबिले-ज़िक्र है कि नबी (सल्ल०) ने अपनी ज़ात और अपने ख़ानदान (यानी बनी-हाशिम) पर ज़कात का माल लेना हराम क़रार दिया था, चुनाँचे आप (सल्ल०) ने ख़ुद भी सदक़ात की वुसूलयाबी और तक़सीम का काम हमेशा बिना मुआवज़े के किया और दूसरे बनी-हाशिम के लिए भी यह क़ायदा मुक़र्रर कर दिया कि अगर वे इस ख़िदमत को बिना मुआवज़ा अंजाम दें तो जाइज़ है, लेकिन मुआवज़ा लेकर इस शोबे (विभाग) की कोई ख़िदमत करना उनके लिए जाइज़ नहीं है। आप (सल्ल०) के ख़ानदान के लोग अगर साहिबे-निसाब हों तो ज़कात देना उनपर फ़र्ज़ है, लेकिन अगर वे ग़रीब और मोहताज या क़र्ज़दार या मुसाफ़िर हों तो ज़कात लेना उनके लिए हराम है। अलबत्ता इस बात में उलमा की राए अलग-अलग हैं कि ख़ुद बनी-हाशिम की ज़कात बनी-हाशिम ले सकते हैं या नहीं। इमाम अबू-यूसुफ़ की राय यह है कि ले सकते हैं। लेकिन ज़्यादातर फ़ुक़हा इसको भी जाइज़ नहीं मानते।
64. अस्ल अरबी में तालीफ़े-क़ल्ब इस्तेमाल हुआ है जिसके मानी दिल मोहना है। इस हुक्म से मक़सद यह है कि जो लोग इस्लाम की मुख़ालफ़त में सरगर्म हों और माल देकर उनकी दुश्मनी के जोश को ठण्डा किया जा सकता हो, या जो लोग इस्लाम दुश्मनों के कैम्प में ऐसे हों कि अगर माल से उन्हें तोड़ा जाए तो टूटकर मुसलमानों के मददगार बन सकते हों, या जो लोग नए-नए इस्लाम में दाख़िल हुए हों और उनकी पिछली दुश्मनियों या उनकी कमज़ोरियों को देखते हुए अन्देशा हो अगर माल से उनकी मदद न की गई तो फिर कुफ़्र की तरफ़ पलट जाएँगे, ऐसे लोगों को मुस्तक़िल वज़ीफ़े या वक़्ती तोहफ़े देकर इस्लाम का हिमायती और मददगार या फ़रमाँबरदार, या अगर दुश्मन भी रहें तो कम-से-कम ऐसा बना लिया जाए कि वे कोई नुक़सान न पहुँचाएँ। इस मद पर ग़नीमत के माल और आमदनी के दूसरे ज़रिओं से भी माल ख़र्च किया जा सकता है और अगर ज़रूरत हो तो ज़कात से भी उनकी मदद की जा सकती है। और ऐसे लोगों के लिए यह शर्त नहीं है कि वे फ़क़ीर और मिस्कीन या मुसाफ़िर हों तब ही उनकी मदद ज़कात से की जा सकती है, बल्कि वे मालदार और रईस होने पर भी ज़कात दिए जाने के हक़दार हैं। इस बात पर तो सभी उलमा और फ़ुक़हा का इत्तिफ़ाक़ है कि नबी (सल्ल०) के ज़माने में बहुत-से लोगों को 'तालीफ़े-क़ल्ब' (दिल मोहने) के लिए वज़ीफ़े और तोहफ़े दिए जाते थे, लेकिन इस बात में इख़्तिलाफ़ हो गया है कि क्या आप (सल्ल०) के बाद भी यह मद बाक़ी रही या नहीं। इमाम अबू-हनीफ़ा और उनके साथियों की राय यह है कि हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) और हज़रत उमर (रज़ि०) के ज़माने से यह मद ख़त्म हो गई है और अब 'तालीफ़े-क़ल्ब' के लिए कुछ देना जाइज़ नहीं है। इमाम शाफ़िई (रह०) की राय यह है कि फ़ासिक़ मुसलमानों को 'तालीफ़े-क़ल्ब' के लिए ज़कात की मद से दिया जा सकता है, मगर ग़ैर-मुस्लिमों को नहीं। और कुछ दूसरे फ़ुक़हा और आलिमों का कहना है कि 'मुअल्लफ़तिल-क़ुलूब' का हिस्सा अब भी बाक़ी है अगर उसकी ज़रूरत हो। इमाम अबू-हनीफ़ा और उनके माननेवाले अपनी बात की दलील में यह वाक़िआ पेश करते हैं कि नबी (सल्ल०) के इंतिक़ाल के बाद उयैना-बिन-हिस्न और अक़रअ-बिन-हाबिस हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) के पास आए और उन्होंने एक ज़मीन उनसे माँगी। हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) ने उनको तोहफ़े का फ़रमान लिख दिया। उन्होंने चाहा कि और ज़्यादा पुख़्तगी के लिए दूसरे सहाबा भी इस फ़रमान पर गवाही के लिए दस्तख़त कर दें। चुनाँचे गवाहियाँ भी हो गईं। मगर जब ये लोग हज़रत उमर (रज़ि०) के पास गवाही लेने गए तो उन्होंने फ़रमान को पढ़कर उसे उनकी आँखों के सामने ही फाड़ दिया और उनसे कहा कि बेशक नबी (सल्ल०) तुम लोगों की तालीफ़े-क़ल्ब के लिए तुम्हें दिया करते थे, मगर वह इस्लाम की कमज़ोरी का ज़माना था। अब अल्लाह ने इस्लाम को तुम जैसे लोगों से बेनियाज़ कर दिया है। इसपर वे हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) के पास शिकायत लेकर आए और आपको ताना भी दिया कि ख़लीफ़ा आप हैं या उमर? लेकिन न तो हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) ही ने उसपर कोई नोटिस लिया और न दूसरे सहाबा में से ही किसी ने हज़रत उमर (रज़ि०) की इस राय से इख़्तिलाफ़ किया। इससे हनफ़ी आलिम यह दलील लाते हैं कि जब मुसलमान ज़्यादा तादाद में हो गए और उनको यह ताक़त हासिल हो गई कि अपने बलबूते पर खड़े हो सकें तो वह सबब बाक़ी नहीं रहा जिसकी वजह से शुरू में 'तालीफ़े-क़ल्ब' का हिस्सा रखा गया था। इसलिए इसपर सभी सहाबा का इत्तिफ़ाक़ है कि यह हिस्सा हमेशा के लिए ख़त्म हो गया। इमाम शाफ़िई (रह०) की दलील यह है कि तालीफ़े-क़ल्ब के लिए ग़ैर-मुस्लिमों को ज़कात का माल देना नबी (सल्ल०) से साबित नहीं है। जितने वाक़िआत हदीस में हमको मिलते हैं उन सबसे यही मालूम होता है कि नबी (सल्ल०) ने ग़ैर-मुस्लिमों को तालीफ़े-क़ल्ब के लिए जो कुछ दिया ग़नीमत के माल में से दिया, न कि ज़कात के माल में से। हमारे नज़दीक हक़ यह है कि तालीफ़े-क़ल्ब की मद क़ियामत तक के लिए ख़त्म हो जाने की कोई दलील नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि हज़रत उमर (रज़ि०) ने जो कुछ कहा वह बिलकुल सही था। अगर इस्लामी हुकूमत तालीफ़े-क़ल्ब के लिए माल ख़र्च करने की ज़रूरत न समझती हो तो किसी ने उसपर फ़र्ज़ नहीं किया है कि ज़रूर ही इस मद में कुछ न कुछ ख़र्च करे। लेकिन अगर किसी वक़्त इसकी ज़रूरत महसूस हो तो अल्लाह ने उसके लिए जो गुंजाइश रखी है, उसे बाक़ी रहना चाहिए। हज़रत उमर (रज़ि०) और सहाबा किराम (रज़ि०) का जिस बात पर इत्तिफ़ाक़ हुआ था वह सिर्फ़ यह था कि उनके ज़माने में जो हालात थे, उनमें तालीफ़े-क़ल्ब के लिए किसी को कुछ देने की वे हज़रात ज़रूरत महसूस नहीं करते थे। इससे यह नतीजा निकालने की कोई माक़ूल वजह नहीं है कि सहाबा (रज़ि०) के इत्तिफ़ाक़ ने उस मद को क़ियामत तक के लिए ख़त्म कर दिया, जो क़ुरआन में कुछ अहम दीनी मस्लहतों के लिए रखी गई थी। रही इमाम शाफ़िई की राय तो वह इस हद तक तो सही मालूम होती है कि जब हुकूमत के पास दूसरी आमदनी की मदों से काफ़ी माल मौजूद हो तो उसे तालीफ़े-क़ल्ब की मद पर ज़कात का माल ख़र्च न करना चाहिए। लेकिन जब ज़कात के माल से इस काम में मदद लेने की ज़रूरत पेश आ जाए तो फिर यह फ़र्क़ करने की कोई वजह नहीं कि फ़ासिक़ मुसलमानों पर उसे ख़र्च किया जाए और ग़ैर-मुस्लिमों पर न किया जाए। इसलिए कि क़ुरआन में तालीफ़े-क़ल्ब का जो हिस्सा रखा गया है वह उनके ईमान के दावे की बुनियाद पर नहीं है, बल्कि इस बुनियाद पर है कि इस्लाम को अपने फ़ायदों के लिए उनकी तालीफ़े-क़ल्ब की ज़रूरत है और वे इस तरह के लोग हैं कि उनकी तालीफ़े-क़ल्ब सिर्फ़ माल ही के ज़रिए से हो सकती है। यह ज़रूरत और यह बात जहाँ भी पेश आए वहाँ मुसलमानों का ज़िम्मेदार ज़रूरत पड़ने पर ज़कात का माल ख़र्च करने का क़ुरआन की हिदायत के मुताबिक़ इख़्तियार रखता है। नबी (सल्ल०) ने अगर इस मद से ग़ैर-मुस्लिमों को कुछ नहीं दिया तो इसकी वजह यह थी कि आपके पास दूसरी मदों का माल मौजूद था। वरना अगर आपके नज़दीक ग़ैर-मुस्लिमों पर इस मद का माल ख़र्च करना जाइज़ न होता, तो आप इस बात को ज़रूर वाज़ेह करते।
65. गर्दनें छुड़ाने से मुराद यह है कि ग़ुलामों को आजाद कराने में ज़कात का माल ख़र्च किया जाए। इसकी दो सूरतें हैं। एक यह कि जिस ग़ुलाम ने अपने मालिक से यह मुआहदा किया हो कि अगर मैं इतनी रक़म तुम्हें अदा कर दूँ तो तुम मुझे आज़ाद कर दो, उसे आज़ादी की क़ीमत अदा करने में मदद की जाए। दूसरे यह कि ख़ुद ज़कात की मद से ग़ुलाम ख़रीदकर आज़ाद किए जाएँ। इनमें से पहली सूरत पर तो सभी फ़ुक़हा और आलिम एक राय हैं, लेकिन दूसरी सूरत को हज़रत अली (रज़ि०), सईद-बिन-जुबैर, लैस, सौरी, इबराहीम नख़ई, शअबी, मुहम्मद-बिन-सीरीन, हनफ़ी उलमा और शाफ़िई उलमा नाजाइज़ कहते हैं और इब्ने-अब्बास, हसन बसरी, मालिक, अहमद और अबू-सौर जाइज़ ठहराते हैं।
66. यानी ऐसे क़र्ज़दार जो अगर अपने माल से अपना पूरा क़र्ज़ चुका दें तो उनके पास निसाब (इतना माल जिससे ज़कात फ़र्ज़ हो जाती है) की मिक़दार से कम माल बच सकता हो। वे चाहे कमानेवाले हों या बेरोज़गार और चाहे समाज में उनको फ़क़ीर समझा जाता हो या मालदार, दोनों सूरतों में उनकी मदद ज़कात की मद से की जा सकती है। मगर बहुत-से फ़ुक़हा की राय यह है कि जिस आदमी ने बुरे कामों और फ़ुज़ूल ख़र्चियों में अपना माल उड़ाकर अपने आपको कर्ज़दारी में फँसा लिया हो उसकी मदद न की जाए, जब तक कि वह तौबा न कर ले।
67. 'अल्लाह के रास्ते का लफ़्ज़ आम है। तमाम वे नेकी के काम, जिनमें अल्लाह की ख़ुशी हो, इस लफ़्ज़ के मानी में शामिल हैं। इसी वजह से कुछ लोगों ने यह राय ज़ाहिर की है कि इस हुक्म के मुताबिक़ ज़कात का माल हर तरह के नेक कामों में ख़र्च किया जा सकता है। लेकिन सही बात यह है और पहले के ज़्यादातर बुज़ुर्ग उलमा इस बात को मानते हैं कि यहाँ 'अल्लाह के रास्ते में’ से मुराद 'अल्लाह के रास्ते में जिहाद' है। यानी वह जिद्दो-जुह्द जिसका मक़सद कुफ़्र के निज़ाम को मिटाना और उसकी जगह इस्लामी निज़ाम को क़ायम करना हो। इस जिद्दो-जुह्द में जो लोग काम करें, उनके सफ़र ख़र्च के लिए, सवारी के लिए, हथियार और सरो-सामान जुटाने के लिए ज़कात से मदद दी जा सकती है, चाहे वे अपने तौर पर खाते-पीते लोग हों और अपनी निजी ज़रूरतों के लिए उनको मदद की ज़रूरत न हो। इसी तरह जो लोग अपनी मरज़ी और ख़ुशी से अपनी तमाम ख़िदमतें और अपना तमाम वक़्त, वक़्ती तौर पर या मुस्तक़िल तौर पर, इस काम के लिए दे दें उनकी जरूरतें पूरी करने के लिए भी ज़कात से वक़्ती या मुस्तक़िल तौर पर मददें दी जा सकती हैं। यहाँ यह बात और समझ लेनी चाहिए कि शुरू के बुज़ुर्ग उलमा की किताबों में आम तौर से इस मौक़े पर ‘ग़जवा’ का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है जो ‘क़िताल' या ‘जंग’ का हममानी है, इसलिए लोग यह समझने लगते हैं कि ज़कात के ख़र्च करने की मदों में अल्लाह की राह में ख़र्च करने की जो मद रखी गई है वह सिर्फ़ क़िताल यानी जंग के लिए ख़ास है। लेकिन हक़ीक़त में अल्लाह की राह में जिहाद, क़िताल या जंग से कुशादा चीज़ का नाम है और इसको उन तमाम कोशिशों के लिए बोला जाता है जो कुफ़्र (अधर्म) के बोल को पस्त और ख़ुदा के बोल को बुलन्द करने और अल्लाह के दीन को एक निज़ामे-ज़िन्दगी की हैसियत से क़ायम करने के लिए की जाएँ, चाहे वे कोशिशें इस्लाम की तरफ़ बुलाने और उसको फैलाने के शुरुआती मरहले में हों किताल या जंग के आख़िरी मरहले में।
68. मुसाफ़िर भले ही अपने घर का ख़ुशहाल हो, लेकिन सफ़र की हालत में अगर वह मदद का मुहताज हो जाए तो उसकी मदद ज़कात की मद से की जाएगी। यहाँ कुछ फ़ुक़हा (धर्मशास्त्रियों) ने यह शर्त लगाई है कि जिस आदमी का सफ़र गुनाह के कामों के लिए न हो सिर्फ़ वही इस आयत के मुताबिक़ मदद का हक़दार है। मगर क़ुरआन और हदीस में ऐसी कोई शर्त मौजूद नहीं है, और दीन की उसूली तालीमात से हमको यह मालूम होता है कि आदमी मदद का मोहताज हो उसकी मदद करने में उसकी गुनाहगारी रुकावट नहीं होनी चाहिए, बल्कि सही मानी में गुनाहगारों और अख़लाक़ी पस्ती में गिरे हुए लोगों के सुधार का बहुत बड़ा ज़रिआ यह है कि मुसीबत के वक़्त उनको सहारा दिया जाए। और अच्छे सुलूक से उनके नफ़्स को पाक करने की कोशिश की जाए।
وَمِنۡهُمُ ٱلَّذِينَ يُؤۡذُونَ ٱلنَّبِيَّ وَيَقُولُونَ هُوَ أُذُنٞۚ قُلۡ أُذُنُ خَيۡرٖ لَّكُمۡ يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَيُؤۡمِنُ لِلۡمُؤۡمِنِينَ وَرَحۡمَةٞ لِّلَّذِينَ ءَامَنُواْ مِنكُمۡۚ وَٱلَّذِينَ يُؤۡذُونَ رَسُولَ ٱللَّهِ لَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 51
(61) इनमें से कुछ लोग हैं जो अपनी बातों से नबी को दुख देते हैं और कहते हैं कि यह आदमी कानों का कच्चा है।69 कहो, “वह तुम्हारी भलाई के लिए ऐसा है70,अल्लाह पर ईमान रखता है और ईमानवालों पर भरोसा करता है।71 और सरासर रहमत है उन लोगों के लिए जो तुममें से ईमानदार हैं, और जो लोग अल्लाह के रसूल को दुख देते हैं उनके लिए दर्दनाक सज़ा है।"
69. मुनाफ़िक़ लोग नबी (सल्ल०) पर जो झूठे ऐब लगाते थे उनमें से एक यह बात भी थी कि नबी (सल्ल०) हर आदमी की सुन लेते थे और हर एक को अपनी बात कहने का मौक़ा दिया करते थे। यह ख़ूबी उनकी नज़र में एक ऐब था। कहते थे कि आप कानों के कच्चे हैं, जिसका जी चाहता है आपके पास पहुँच जाता है, जिस तरह चाहता है आपके कान भरता है और आप उसकी बात मान लेते हैं। इस इलज़ाम की चर्चा ज़्यादातर इस वजह से की जाती थी कि सच्चे ईमानवाले इन मुनाफ़िक़ों की साज़िशों और उनकी शरारतों और उनकी मुख़ालिफ़ाना बातचीत का हाल नबी (सल्ल०) तक पहुँचा दिया करते थे और इसपर ये लोग जल-भुनकर कहते थे कि आप हम जैसे शरीफ़ों और इज़्ज़तदारों के ख़िलाफ़ हर कंगले और हर फ़क़ीर की दी हुई ख़बरों पर यक़ीन कर लेते हैं।
70. जवाब में एक जामे (व्यापक और सारगर्भित) बात कही गई है जो अपने अन्दर दो पहलू रखती है। एक यह कि वह फ़साद और बिगाड़ की बातें सुननेवाला शख़्स नहीं है, बल्कि सिर्फ़ उन्हीं बातों पर ध्यान देता है जिनमें भलाई और अच्छाई है और जिनकी तरफ़ ध्यान देना उम्मत की बेहतरी और दीन की मस्लहत के लिए मुफ़ीद होता है। दूसरे यह कि उसका ऐसा होना तुम्हारे ही लिए भलाई है। अगर वह हर एक की सुन लेनेवाला और सब्र और बरदाश्त से काम लेनेवाला आदमी न होता तो ईमान के वे झूठे दावे और मेल-मिलाप और भाइचारे की वे दिखावे की बातें और ख़ुदा की राह से भागने के लिए वे झूठे बहाने जो तुम किया करते हो उन्हें सब से सुनने के बजाय तुम्हारी ख़बर ले डालता और तुम्हारे लिए मदीना में जीना मुश्किल हो जाता। इसलिए इसकी यह ख़ूबी तो तुम्हारे हक़ में अच्छी है न कि बुरी।
71. यानी तुम्हारा यह ख़याल ग़लत है कि वह हर एक की बात पर यक़ीन कर लेता है, वह चाहे सुनता सबकी हो मगर भरोसा सिर्फ़ उन्हीं लोगों पर करता है जो सच्चे ईमानवाले हैं। तुम्हारी जिन शरारतों की ख़बरें उस तक पहुँचीं और उसने उनपर यक़ीन किया वह बदअख़लाक़ चुग़लख़ोरों की पहुँचाई हुई न थीं, बल्कि नेक ईमानवालों की पहुँचाई हुई थीं और इसी क़ाबिल थीं कि उनपर भरोसा किया जाता।
يَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمۡ لِيُرۡضُوكُمۡ وَٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥٓ أَحَقُّ أَن يُرۡضُوهُ إِن كَانُواْ مُؤۡمِنِينَ ۝ 52
(62) ये लोग तुम्हारे सामने क़समें खाते हैं ताकि तुम्हें राज़ी करें, हालाँकि अगर ये ईमानवाले हैं तो अल्लाह और रसूल इसके ज़्यादा हक़दार हैं कि ये उनको राज़ी करने की फ़िक्र करें।
أَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّهُۥ مَن يُحَادِدِ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ فَأَنَّ لَهُۥ نَارَ جَهَنَّمَ خَٰلِدٗا فِيهَاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡخِزۡيُ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 53
(63) क्या इन्हें मालूम नहीं है कि जो अल्लाह और उसके रसूल का मुक़ाबला करता है, उसके लिए दोज़ख़ की आग है जिसमें वह हमेशा रहेगा? यह बहुत बड़ी रुसवाई है।
يَحۡذَرُ ٱلۡمُنَٰفِقُونَ أَن تُنَزَّلَ عَلَيۡهِمۡ سُورَةٞ تُنَبِّئُهُم بِمَا فِي قُلُوبِهِمۡۚ قُلِ ٱسۡتَهۡزِءُوٓاْ إِنَّ ٱللَّهَ مُخۡرِجٞ مَّا تَحۡذَرُونَ ۝ 54
(64) ये मुनाफ़िक़ डर रहे हैं कि कहीं मुसलमानों पर कोई ऐसी सूरा न उतर आए जो उनके दिलों के भेद खोलकर रख दे।72 ऐ नबी! इनसे कहो, “और मज़ाक़ उड़ाओ! अल्लाह उस चीज़ को खोल देनेवाला है जिसके खुल जाने से तुम डरते हो।”
72. ये लोग नबी (सल्ल०) के रसूल होने पर सच्चा ईमान तो नहीं रखते थे, लेकिन जो तजरिबे उन्हें पिछले आठ-नौ सालों के दौरान हो चुके थे उनकी बिना पर उन्हें इस बात का यक़ीन हो चुका था कि आप (सल्ल०) के पास फ़ितरत से परे मालूमात का कोई न कोई ज़रिआ ज़रूर है, जिससे आपको उनके छिपे भेदों तक की ख़बर पहुँच जाती है, और कई बार क़ुरआन में (जिसे वे नबी सल्ल० की अपनी लिखी किताब समझते थे) आप उनके निफ़ाक़ और उनकी साज़िशों को बेनक़ाब करके रख देते हैं।
وَلَئِن سَأَلۡتَهُمۡ لَيَقُولُنَّ إِنَّمَا كُنَّا نَخُوضُ وَنَلۡعَبُۚ قُلۡ أَبِٱللَّهِ وَءَايَٰتِهِۦ وَرَسُولِهِۦ كُنتُمۡ تَسۡتَهۡزِءُونَ ۝ 55
(65) अगर इनसे पूछो कि तुम क्या बातें कर रहे थे, तो झट कह देंगे कि हम तो हँसी-मज़ाक़ और दिल्लगी कर रहे थे।73 इनसे कहो, “क्या तुम्हारी हँसी-दिल्लगी अल्लाह और उसकी आयतों और उसके रसूल ही के साथ थी?
73. तबूक की मुहिम के ज़माने में मुनाफ़िक़ लोग अकसर अपनी मजलिसों में बैठकर नबी (सल्ल०) और मुसलमानों का मज़ाक़ उड़ाते थे और अपने मज़ाक़ से उन लोगों की हिम्मतें तोड़ने की कोशिश करते थे, जिन्हें वे नेक-नीयती के साथ जिहाद पर तैयार पाते थे। चुनाँचे रिवायतों में इन लोगों की बहुत-सी बातें नक़्ल हुई हैं। मिसाल के तौर पर एक मजलिस में कुछ मुनाफ़िक़ बैठे गप्प लड़ा रहे थे। एक ने कहा, “अजी, क्या रूमियों को भी तुमने कुछ अरबों की तरह समझ रखा है? कल देख लेना कि ये सब सूरमा जो लड़ने के लिए आए हैं, रस्सियों में बँधे हुए होंगे।” दूसरा बोला, “मज़ा हो जो ऊपर से सौ-सौ कोड़े भी लगाने का हुक्म हो जाए।” एक और मुनाफ़िक़ ने नबी (सल्ल०) को लड़ाई की सरगर्म तैयारियाँ करते देखकर अपने यार-दोस्तों से कहा, “आपको देखिए— आप रूम व शाम के क़िले फ़तह करने चले हैं।"
لَا تَعۡتَذِرُواْ قَدۡ كَفَرۡتُم بَعۡدَ إِيمَٰنِكُمۡۚ إِن نَّعۡفُ عَن طَآئِفَةٖ مِّنكُمۡ نُعَذِّبۡ طَآئِفَةَۢ بِأَنَّهُمۡ كَانُواْ مُجۡرِمِينَ ۝ 56
(66) अब बहाने न बनाओ। तुमने ईमान लाने के बाद इनकार किया है। अगर हमने तुममें से एक गरोह को माफ़ कर भी दिया तो दूसरे गरोह को तो हम ज़रूर सज़ा देंगे, क्योंकि वह मुजरिम है।"74
74. यानी मज़ाक़ उड़ानेवाले वे कम अक़्ल लोग तो माफ़ भी किए जा सकते हैं, जो सिर्फ़ इसलिए ऐसी बातें करते और उनमें दिलचस्पी लेते हैं कि उनके नज़दीक दुनिया में कोई चीज़ संजीदा है ही नहीं, लेकिन जिन लोगों ने जान-बूझाकर ये बातें इसलिए की हैं कि वे रसूल और उसके लाए हुए दीन को अपने ईमान के दावे के बावजूद एक मज़ाक़ समझते हैं और जिनके इस मज़ाक़ का असली मक़सद यह है कि ईमानवालों की हिम्मतें टूटें और वे पूरी ताक़त के साथ जिहाद की तैयारी न कर सकें, उनको तो कभी माफ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे मज़ाक़ उड़ानेवाले नहीं, बल्कि मुजरिम हैं।
ٱلۡمُنَٰفِقُونَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتُ بَعۡضُهُم مِّنۢ بَعۡضٖۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمُنكَرِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَقۡبِضُونَ أَيۡدِيَهُمۡۚ نَسُواْ ٱللَّهَ فَنَسِيَهُمۡۚ إِنَّ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ هُمُ ٱلۡفَٰسِقُونَ ۝ 57
(67) मुनाफ़िक़ मर्द और मुनाफ़िक़ औरतें, सब एक-दूसरे के हमरंग हैं, बुराई का हुक्म देते हैं और भलाई से मना करते हैं और अपने हाथ भलाई से रोके रखते हैं।75 ये अल्लाह को भूल गए तो अल्लाह ने भी इन्हें भुला दिया। यकीनन ये मुनाफ़िक़ ही फ़ासिक़ (नाफ़रमान) हैं।
75. ये बातें उन मुनाफ़िक़ों के अन्दर पाई जाती हैं। इन सबको बुराई से दिलचस्पी और भलाई से दुश्मनी होती है। कोई आदमी बुरा काम करना चाहे तो उनकी हमदर्दियाँ, उनके मश्वरे, उनकी हौसला अफ़ज़ाइयाँ, उनकी मदद, उनकी सिफ़ारिशें, उनकी तारीफ़ें सब इसके लिए वक़्फ़ (समर्पित) होंगी। दिलो-जान से ख़ुद इस बुरे काम में शरीक होंगे, दूसरों को उसमें हिस्सा लेने पर उभारेंगे, करनेवाले की हिम्मत बढ़ाएँगे और उनकी हर अदा से यह ज़ाहिर होगा कि इस बुराई के परवान चढ़ने ही से कुछ उनके दिल को राहत और उनकी आँखों को ठंडक पहुँचती है। इसके बरख़िलाफ़ कोई भला काम हो रहा हो तो उसकी ख़बर से उनको सदमा होता है, उसे सोचकर उनका दिल दुखता है। उसकी तजवीज़ (प्रस्ताव) तक उन्हें गवारा नहीं होती, उसकी तरफ़ किसी को बढ़ते देखते हैं तो इनकी रूह बेचैन होने लगती है। हर मुमकिन तरीक़े से उसकी राह में रोड़े अटकाते हैं और हर तरीक़े से यह कोशिश करते हैं कि किसी तरह वह इस नेकी से बाज़ आ जाए, और बाज़ नहीं आता तो इस काम में कामयाब न हो सके। फिर यह भी इन सबकी मिली-जुली आदत है कि नेकी के काम में ख़र्च करने के लिए इनका हाथ कभी नहीं खुलता, चाहे वे कंजूस हों या बड़े ख़र्च करनेवाले, बहरहाल इनकी दौलत या तो तिजोरियों के लिए होती है या फिर हराम रास्तों से आती और हराम ही रास्तों में बह जाती है। बुराई के लिए चाहे वे अपने वक़्त के क़ारून हों, मगर नेकी के लिए इनसे ज़्यादा 'ग़रीब' कोई नहीं होता।
وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡمُنَٰفِقِينَ وَٱلۡمُنَٰفِقَٰتِ وَٱلۡكُفَّارَ نَارَ جَهَنَّمَ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ هِيَ حَسۡبُهُمۡۚ وَلَعَنَهُمُ ٱللَّهُۖ وَلَهُمۡ عَذَابٞ مُّقِيمٞ ۝ 58
(68) इन मुनाफ़िक मर्दो और औरतों और काफ़िरों (इनकार करनेवालों) के लिए अल्लाह ने जहन्नम की आग का वादा किया है, जिसमें वह हमेशा रहेंगे, वही इनके लिए मुनासिब है। उनपर अल्लाह की फिटकार है और उनके लिए क़ायम रहनेवाला अज़ाब है
كَٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُمۡ كَانُوٓاْ أَشَدَّ مِنكُمۡ قُوَّةٗ وَأَكۡثَرَ أَمۡوَٰلٗا وَأَوۡلَٰدٗا فَٱسۡتَمۡتَعُواْ بِخَلَٰقِهِمۡ فَٱسۡتَمۡتَعۡتُم بِخَلَٰقِكُمۡ كَمَا ٱسۡتَمۡتَعَ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِكُم بِخَلَٰقِهِمۡ وَخُضۡتُمۡ كَٱلَّذِي خَاضُوٓاْۚ أُوْلَٰٓئِكَ حَبِطَتۡ أَعۡمَٰلُهُمۡ فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡخَٰسِرُونَ ۝ 59
(69) तुम लोगों76 के रंग-ढंग वही हैं जो तुमसे पहले के लोगों के थे। वे तुमसे ज़्यादा ताक़तवर और तुमसे बढ़कर माल और औलादवाले थे। फिर उन्होंने दुनिया में अपने हिस्से के मज़े लूट लिए और तुमने भी अपने हिस्से के मज़े उसी तरह लूटे जैसे उन्होंने लूटे थे, और वैसी ही बहसों में तुम भी पड़े जैसी बहसों में वे पड़े थे। तो उनका अंजाम यह हुआ कि दुनिया और आख़िरत में उनका सब किया-धरा अकारथ गया और वही घाटे में हैं।
76. मुनाफ़िक़ों का ग़ायबाना ज़िक्र (परोक्ष वर्णन) करते-करते अचानक उनसे सीधे तौर पर ख़िताब शुरू हो गया है।
أَلَمۡ يَأۡتِهِمۡ نَبَأُ ٱلَّذِينَ مِن قَبۡلِهِمۡ قَوۡمِ نُوحٖ وَعَادٖ وَثَمُودَ وَقَوۡمِ إِبۡرَٰهِيمَ وَأَصۡحَٰبِ مَدۡيَنَ وَٱلۡمُؤۡتَفِكَٰتِۚ أَتَتۡهُمۡ رُسُلُهُم بِٱلۡبَيِّنَٰتِۖ فَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيَظۡلِمَهُمۡ وَلَٰكِن كَانُوٓاْ أَنفُسَهُمۡ يَظۡلِمُونَ ۝ 60
(70) क्या77 इन लोगों को अपने अगलों का इतिहास नहीं पहुँचा? नूह की क़ौम, आद, समूद और इबराहीम (अलैहि०) की, क़ौम मदयन के लोग और वे बस्तियाँ जिन्हें उलट दिया गया78, उनके रसूल उनके पास खुली- खुली निशानियाँ लेकर आए, फिर यह अल्लाह का काम न था कि उनपर ज़ुल्म करता, मगर वे आप ही अपने ऊपर ज़ुल्म करनेवाले थे।79
77. यहाँ से फिर इनका ग़ायबाना ज़िक्र (परोक्ष वर्णन) शुरू हो गया।
78. इशारा है लूत की क़ौम की बस्तियों की तरफ़।
79. यानी उनकी तबाही और बरबादी इस वजह से नहीं हुई कि अल्लाह को उनके साथ कोई दुश्मनी थी और वह चाहता था कि उन्हें तबाह करे, बल्कि अस्ल में उन्होंने ख़ुद ही अपने लिए ज़िन्दगी का वह तरीक़ा पसन्द किया जो उन्हें बरबादी की तरफ़ ले जानेवाला था। अल्लाह ने तो उन्हें सोचने और समझने और संभलने का पूरा मौक़ा दिया, उन्हें समझाने-बुझाने के लिए रसूल भेजे, रसूलों के ज़रिए से उनको ग़लत रास्ते पर चलने के बुरे नतीजों से डराया और उन्हें खोल-खोलकर निहायत वाज़ेह तरीक़े से बता दिया कि उनके लिए कामयाबी का रास्ता कौन-सा है और हलाकत और बरबादी का कौन-सा? मगर जब उन्होंने हालत के सुधार के किसी मौक़े से फ़ायदा न उठाया और हलाकत और तबाही की राह पर चलने ही पर अड़े रहे, तो यक़ीनन उनका वह अंजाम होना था जो आख़िरकार होकर रहा और यह ज़ुल्म उनपर अल्लाह ने नहीं किया, बल्कि उन्होंने ख़ुद अपने ऊपर किया।
وَٱلۡمُؤۡمِنُونَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتُ بَعۡضُهُمۡ أَوۡلِيَآءُ بَعۡضٖۚ يَأۡمُرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَيَنۡهَوۡنَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَيُقِيمُونَ ٱلصَّلَوٰةَ وَيُؤۡتُونَ ٱلزَّكَوٰةَ وَيُطِيعُونَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥٓۚ أُوْلَٰٓئِكَ سَيَرۡحَمُهُمُ ٱللَّهُۗ إِنَّ ٱللَّهَ عَزِيزٌ حَكِيمٞ ۝ 61
(71) ईमानवाले मर्द और ईमानवाली औरतें, ये सब सब एक-दूसरे के साथी हैं, भलाई का हुक्म देते और बुराई से रोकते हैं, नमाज़ क़ायम करते हैं, ज़कात देते हैं और अल्लाह और उसके रसूल की इताअत करते हैं।80 ये वे लोग हैं जिनपर अल्लाह की रहमत उतरकर रहेगी, यक़ीनन अल्लाह सबपर ग़ालिब और हिकमतवाला व बड़ी सूझ-बूझबाला है।
80. जिस तरह मुनाफ़िक़ एक अलग उम्मत हैं, उसी तरह ईमानवाले भी एक अलग उम्मत हैं। हालाँकि ईमान का ज़ाहिरी इक़रार और इस्लाम की पैरवी का बाहरी इज़हार दोनों गरोहों में पाया जाता है, लेकिन दोनों के मिज़ाज, अख़लाक़, आदत और सोच-विचार और अमल का तरीक़ा एक-दूसरे से बिलकुल अलग है। जहाँ ज़बान पर ईमान का दावा है, लेकिन दिल सच्चे ईमान से ख़ाली हैं, वहाँ ज़िन्दगी का सारा रंग-ढंग ऐसा है जो अपनी एक-एक अदा से ईमान के दावे को झुठला रहा है। ऊपर के लेबल पर तो लिखा है कि यह मुश्क (कस्तूरी) है, मगर लेबल के नीचे जो कुछ है वह अपने पूरे वुजूद से साबित कर रहा है कि ये गोबर के सिवा कुछ नहीं। इसके बरख़िलाफ़ जहाँ ईमान अपनी अस्ल हक़ीक़त के साथ मौजूद है वहाँ मुश्क अपनी सूरत से, अपनी ख़ुशबू से, अपनी ख़ासियतों से हर आज़माइश और मामले में अपना मुश्क होना खोले दे रहा है। इस्लाम और ईमान का जो नाम लागों में मशहूर है उसने बज़ाहिर दोनों गरोहों को एक उम्मत बना रखा है, मगर हक़ीक़त में मुनाफ़िक़ मुसलमानों का अख़लाक़ी मिज़ाज और उनकी तबीयत का रंग-ढंग कुछ और है और सच्चे मुसलमानों का कुछ और। इसी वजह से मुनाफ़िक़ाना आदतें रखनेवाले मर्द और औरतें एक अलग जत्था बन गए हैं जिनको अल्लाह से ग़फ़लत, बुराई से दिलचस्पी, नेकी से दूरी और भलाई के कामों में शामिल न होने की इन ख़ुसूसियतों ने, जो इन सबके अन्दर पाई जाती हैं, एक-दूसरे से जोड़ रखा है और ईमानवालों से अमली तौर पर अलग कर दिया है। और दूसरी तरफ़ सच्चे मोमिन मर्द और औरतें एक दूसरा गरोह बन गए हैं जिसके सारे लोगों में ये ख़ुसूसियतें हैं कि नेकी से वे दिलचस्पी रखते हैं, बुराई से नफ़रत करते हैं और ख़ुदा की याद उनके लिए ग़िज़ा की तरह ज़िन्दगी की लाज़िमी जरूरतों में शामिल है। अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करने के लिए उनके दिल और हाथ खुले हुए हैं और अल्लाह और रसूल की फ़रमाँबरदारी करना उनकी ज़िन्दगी का तरीक़ा और पहचान है। उन सभी के अन्दर पाए जानेवाले इस अख़लाक़ी मिज़ाज और ज़िन्दगी के तरीक़े ने उन्हें आपस में एक-दूसरे से जोड़ दिया है और मुनाफ़िक़ों के गरोह से तोड़ दिया है।
وَعَدَ ٱللَّهُ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَٱلۡمُؤۡمِنَٰتِ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَا وَمَسَٰكِنَ طَيِّبَةٗ فِي جَنَّٰتِ عَدۡنٖۚ وَرِضۡوَٰنٞ مِّنَ ٱللَّهِ أَكۡبَرُۚ ذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 62
(72) इन ईमानवाले मर्दो और औरतों से अल्लाह का वादा है कि उन्हें ऐसे बाग़ देगा जिनके नीचे नहरें बहती होंगी और वे उनमें हमेशा रहेंगे। इन सदाबहार बाग़ों में उनके लिए पाकीज़ा रहने की जगहें होंगी, और सबसे बढ़कर यह कि अल्लाह की ख़ुशनूदी उन्हें हासिल होगी। यही बड़ी कामयाबी है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلنَّبِيُّ جَٰهِدِ ٱلۡكُفَّارَ وَٱلۡمُنَٰفِقِينَ وَٱغۡلُظۡ عَلَيۡهِمۡۚ وَمَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُۖ وَبِئۡسَ ٱلۡمَصِيرُ ۝ 63
(73) ऐ नबी!81 इनकार करनेवालों और मुनाफ़िक़ों दोनों का पूरी ताक़त से मुक़ाबला करो और उनके साथ सख़्ती से पेश आओ।82 आख़िरकार उनका ठिकाना जहन्नम है, और वह सबसे बुरी ठहरने की जगह।
81. यहाँ से वह तीसरी तक़रीर शुरू होती है जो तबूक की मुहिम के बाद उतरी थी।
82. उस वक़्त तक मुनाफ़िक़ों के साथ ज़्यादातर दरगुज़र का मामला हो रहा था, और उसकी दो वजहें थीं। एक यह कि मुसलमानों की ताक़त अभी इतनी मज़बूत न हुई थी कि बाहर के दुश्मनों से लड़ने के साथ-साथ घर के दुश्मनों से भी लड़ाई मोल ले लेते। दूसरे यह कि उनमें से जो लोग शको-शुब्हाात में मुब्तला थे उनको ईमान और यक़ीन हासिल करने के लिए काफ़ी मौक़ा देना मक़सद था। ये दोनों वजहें अब बाक़ी नहीं रही थीं। मुसलमानों की ताक़त अब तमाम अरब को अपनी गिरफ़्त में ले चुकी थी और अरब से बाहर की ताक़तों से कशमकश का सिलसिला शुरू हो रहा था, इसलिए इन आस्तीन के साँपों का सर कुचलना अब मुमकिन भी था और ज़रूरी भी हो गया था, ताकि ये लोग बाहरी ताक़तों से साँठ-गाँठ करके मुल्क में कोई अनदरूनी ख़तरा न खड़ा कर सकें। फिर उन लोगों को पूरे 9 साल तक सोचने, समझने और दीने-हक़ (इस्लाम) को परखने का मौक़ा भी दिया जा चुका था जिससे वे फ़ायदा उठा सकते थे, अगर उनमें वाक़ई किसी अच्छाई की कोई तलब होती। इसके बाद उनके साथ और ज़्यादा रिआयत करने की कोई वजह न थी। इसलिए हुक्म हुआ कि काफ़िरों के साथ-साथ अब इन मुनाफ़क़ों के ख़िलाफ़ भी जिहाद शुरू कर दिया जाए, और जो नर्म रवैया अब तक उनके मामले में इख़्तियार किया जाता रहा है, उसे ख़त्म करके अब उनके साथ कैसा बरताव किया जाए। मुनाफ़क़ों के ख़िलाफ़ जिहाद और सख़्त बरताव से मुराद यह नहीं है कि उनसे जंग की जाए। दरअस्ल इससे मुराद यह है कि उनकी मुनाफ़िक़ाना रविश (रवैया) को अब तक नज़रअन्दाज़ किया गया है, जिसकी वजह से ये मुसलमानों में मिले-जुले रहे और आम मुसलमान इनको अपनी ही सोसाइटी का एक जुज़ (अंग) समझते रहे, और उनको जमाअत के मामलों में दख़ल देने और सोसाइटी में अपने निफ़ाक़ का ज़हर फैलाने का मौक़ा मिलता रहा, उसको आइन्दा के लिए ख़त्म कर दिया जाए। अब जो शख़्स भी मुसलमानों में शामिल रहकर मुनाफ़िक़ाना रवैया इख़्तियार करे और जिसके तर्ज़े-अमल से भी यह ज़ाहिर हो कि वह ख़ुदा और रसूल और ईमानवालों का मुख़लिस साथी नहीं है, उसे खुल्लम-खुल्ला बेनक़ाब किया जाए, अलानिया उसकी मलामत की जाए, सोसाइटी में उसके लिए इज़्ज़त व एतिबार का कोई मक़ाम बाक़ी न रहने दिया जाए, मुआशरत में उससे ताल्लुक़ तोड़ लिया जाए, जमाअती मश्वरों से वह अलग रखा जाए, अदालतों में उसकी गवाही ग़ैर-मोतबर (अविश्वसनीय) हो, ओहदों और मंसबों का दरवाज़ा उसके लिए बन्द रहे, महफ़िलों में उसे कोई मुँह न लगाए, हर मुसलमान उससे ऐसा बरताव करे जिससे उसको ख़ुद मालूम हो जाए कि मुसलमानों की पूरी आबादी में कहीं भी उसका कोई वक़ार नहीं और किसी दिल में भी उसके लिए एहतिराम का कोई गोशा नहीं। फिर अगर उनमें से कोई शख़्स खुली ग़द्दारी कर बैठे तो उसके उसके जुर्म के मुताबिक़ सज़ा दी जाए। यह एक निहायत अह्म हिदायत थी जो इस मरहले पर मुसलमानों को दी जानी ज़रूरी थी। इसके बग़ैर इस्लामी सोसाइटी को गिरावट की अन्दरूनी वजहों से महफ़ूज़ नहीं रखा जा सकता था। कोई जमाअत जो अपने अन्दर मुनाफ़िक़ों और ग़द्दारों को परवरिश करती हो और जिस घर में साँप इज़्ज़त और हिफ़ाज़त के साथ आस्तीनों में बिठाए जाते हों, अख़लाक़ी गिरावट और आख़िरकार पूरी तबाही से दोचार हुए बग़ैर नहीं रह सकती। निफ़ाक़ का हाल ताऊन (प्लेग) का-सा है और मुनाफ़िक़ वह चूहा है जो इस वबा (महामारी) के जरासीम (कीटाणु) लिए फिरता है। उसको आबादी में आज़ादी के साथ चलने-फिरने का मौक़ा देना गोया पूरी आबादी को मौत के ख़तरे में डालना है। एक मुनाफ़िक़ को मुसलमानों की सोसाइटी में इज़्ज़त व एहतिराम का मर्तबा हासिल होने के मानी ये हैं कि हज़ारों आदमी ग़द्दारी व मुनाफ़क़त पर दिलेर हो जाएँ और यह ख़याल आम हो जाए कि इस सोसाइटी में इज़्ज़त पाने के लिए इख़लास, ख़ैरख़ाही और ईमान की सच्चाई कुछ ज़रूरी नहीं है, बल्कि ईमान के झूठे इज़हार के साथ ख़ियानत और बेवफ़ाई का रवैया इख़्तियार करके भी यहाँ आदमी फल-फूल सकता है। यही बात है जिसे नबी (सल्ल०) ने इस मुख़्तसर से हकीमाना (तत्त्वदर्शितापूर्ण) जुमले में बयान किया है कि “जिस शख़्स ने किसी साहिबे-बिदअत की ताज़ीम व तौक़ीर (मान-सम्मान) की वह दरअस्ल इस्लाम की इमारत को ढाने में मददगार हुआ।”
يَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ مَا قَالُواْ وَلَقَدۡ قَالُواْ كَلِمَةَ ٱلۡكُفۡرِ وَكَفَرُواْ بَعۡدَ إِسۡلَٰمِهِمۡ وَهَمُّواْ بِمَا لَمۡ يَنَالُواْۚ وَمَا نَقَمُوٓاْ إِلَّآ أَنۡ أَغۡنَىٰهُمُ ٱللَّهُ وَرَسُولُهُۥ مِن فَضۡلِهِۦۚ فَإِن يَتُوبُواْ يَكُ خَيۡرٗا لَّهُمۡۖ وَإِن يَتَوَلَّوۡاْ يُعَذِّبۡهُمُ ٱللَّهُ عَذَابًا أَلِيمٗا فِي ٱلدُّنۡيَا وَٱلۡأٓخِرَةِۚ وَمَا لَهُمۡ فِي ٱلۡأَرۡضِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٖ ۝ 64
(74) ये लोग लोग अल्लाह की क़सम खा-खाकर कहते हैं कि हमने वह बात नहीं कही, हालाँकि उन्होंने ज़रूर वह कुफ़्र (अधर्म) की बात कही है।83 उन्होंने इस्लाम लाने के बाद कुफ़ किया और उन्होंने वह कुफ़्र करने का इरादा किया जिसे कर न सके।84 यह उनका सारा ग़ुस्सा इसी बात पर है कि अल्लाह और उसके रसूल ने अपनी मेहरबानी से उनको धनी कर दिया है!85 अब अगर ये अपने इस रवैये से बाज़ आ जाएँ तो इन्हीं के लिए बेहतर है, और अगर ये बाज़ न आए तो अल्लाह इनको बड़ी दर्दनाक सज़ा देगा। दुनिया में भी और आख़िरत में भी, और ज़मीन में कोई नहीं जो इनका हिमायती और मददगार हो।
83. वह बात क्या थी जिसकी तरफ़ यहाँ इशारा किया गया है? उसके बारे में कोई यक़ीनी मालूमात हम तक नहीं पहुँची हैं। अलबत्ता रिवायतों में बहुत-सी ऐसी काफ़िराना बातों का ज़िक्र आया है जो उस ज़माने में मुनाफ़िक़ों ने की थीं। मिसाल के तौर पर एक मुनाफ़िक़ के बारे में आता है कि उसने अपने रिश्तेदारों में से एक मुसलमान नौजवान के साथ बात करते हुए कहा कि “अगर वाक़ई वह सब कुछ सच है जो यह शख़्स (यानी नबी सल्ल०) पेश करता है तो हम सब गधों से भी बदतर हैं।” एक और रिवायत में है कि तबूक के सफ़र में एक जगह नबी (सल्ल०) की ऊँटनी गुम हो गई। मुसलमान उसको तलाश करते फिर रहे थे। इसपर मुनाफ़िक़ों के एक गरोह ने अपनी मजलिस में बैठकर ख़ूब मज़ाक़ उड़ाया और आपस में कहा कि “ये हज़रत आसमान की ख़बरें तो ख़ूब सुनाते हैं, मगर इनको अपनी उँटनी की कुछ ख़बर नहीं कि वह इस वक़्त कहाँ है।"
84 यह इशारा है उन साज़िशों की तरफ़ जो मुनाफ़िक़ों ने तबूक की मुहिम के सिललिसे में की थीं। उनमें से पहली साज़िश का वाक़िआ मुहद्दिसों ने इस तरह बयान किया है कि तबूक से वापसी पर जब मुसलमानों का लश्कर एक ऐसी जगह के करीब पहुँचा जहाँ से पहाड़ों के बीच रास्ता गुज़रता था तो कुछ मुनाफ़िक़ों ने आपस में तय किया कि रात के वक़्त किसी घाटी में से गुज़रते हुए नबी (सल्ल०) को खडु में फेंक देंगे। नबी (सल्ल०) को इसकी ख़बर मिल गई। आप (सल्ल०) ने तमाम लश्करवालों को हुक्म दिया कि वादी के रास्ते से निकल जाएँ और आप (सल्ल०) ख़ुद सिर्फ़ अम्मार-बिन-यासिर (रज़ि०) और हुजैफ़ा-बिन-यमान (रज़ि०) को लेकर घाटी के अन्दर से होकर चले। बीच रास्ते में अचानक मालूम हुआ कि दस-बारह मुनाफ़िक़ ढाटे बाँधे हुए पीछे-पीछे आ रहे हैं। यह देखकर हज़रत हुज़ैफ़ा (रज़ि०) उनकी तरफ़ लपके, ताकि उनके उँटों को मार-मारकर उनके मुँह फेर दें। मगर वे दूर ही से हज़रत हुज़ैफ़ा (रज़ि०) को आते देखकर डर गए और इस ख़ौफ़ से कि कहीं हम पहचान न लिए जाएँ फ़ौरन भाग निकले। दूसरी साज़िश जिसका इस सिलसिले में ज़िक्र किया गया है, यह है कि मुनाफ़िक़ों को रूमियों (रोम वासियों) के मुक़ाबले से नबी (सल्ल०) और आप के वफ़ादार साथियों के ख़ैरियत से बचकर वापस आ जाने की उम्मीद न थी, इसलिए उन्होंने आपस में तय कर लिया था कि ज्यों ही उधर कोई हादिसा पेश आए, इधर मदीना में अब्दुल्लाह-बिन-उबई के सर पर शाही ताज रख दिया जाए।
85. नबी (सल्ल०) की हिजरत से पहले मदीना अरब के क़स्बों में से एक मामूली क़स्बा था और औस और ख़ज़रज के क़बीले माल या इज़्ज़त के लिहाज़ से कोई ऊँचा दरजा नहीं रखते थे। मगर जब नबी (सल्ल०) वहाँ पहुँचे और अनसार ने आप (सल्ल०) का साथ देकर अपने आपको ख़तरे में डाल दिया तो आठ-नौ साल के अन्दर-अन्दर यही बीच के दरजे का क़सबा तमाम अरब की राजधानी बन गया। वहीं औस और ख़ज़रज के किसान हुकूमत के मंसबदार (पदाधिकारी) बन गए और हर तरफ़ से फ़तह, ग़नीमतें और तिजारत की बरकतें इस मर्कज़ी शहर पर बारिश की तरह बरसने लगीं। अल्लाह इसी पर इन्हें शर्म दिला रहा है कि हमारे नबी पर तुम्हारा यह ग़ुस्सा क्या इसी क़ुसूर के बदले में है कि इसकी बदौलत ये नेमतें तुम्हें दी गईं!
۞وَمِنۡهُم مَّنۡ عَٰهَدَ ٱللَّهَ لَئِنۡ ءَاتَىٰنَا مِن فَضۡلِهِۦ لَنَصَّدَّقَنَّ وَلَنَكُونَنَّ مِنَ ٱلصَّٰلِحِينَ ۝ 65
(75) इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अल्लाह से अह्द किया था कि अगर उसने अपनी मेहरबानी से हमको नवाज़ा तो हम ख़ैरात (दान) देंगे और अच्छे बनकर रहेंगे।
فَلَمَّآ ءَاتَىٰهُم مِّن فَضۡلِهِۦ بَخِلُواْ بِهِۦ وَتَوَلَّواْ وَّهُم مُّعۡرِضُونَ ۝ 66
(76) मगर जब अल्लाह ने अपनी मेहरबानी से उनको दौलतमन्द बना दिया तो वे कंजूसी पर उतर आए और अपने अह्द से ऐसे फिरे कि उन्हें इसकी परवाह तक नहीं है।86
86. ऊपर की आयत में इन मुनाफ़िक़ों की नेमतों की जिस नाशुक्री और एहसान करनेवाले की जिस नाक़द्री पर मलामत की गई थी उसका एक और सुबूत ख़ुद उन्हीं की ज़िन्दगियों से पेश करके यहाँ वाज़ेह किया गया है कि अस्ल में ये लोग आदी मुजरिम हैं, इनके अख़लाक़ी ज़ाबिते में शुक्र, नेमतों को तसलीम करने और वादे का लिहाज़ रखने जैसी ख़ूबियों का कहीं नामो-निशान तक नहीं पाया जाता।
فَأَعۡقَبَهُمۡ نِفَاقٗا فِي قُلُوبِهِمۡ إِلَىٰ يَوۡمِ يَلۡقَوۡنَهُۥ بِمَآ أَخۡلَفُواْ ٱللَّهَ مَا وَعَدُوهُ وَبِمَا كَانُواْ يَكۡذِبُونَ ۝ 67
(77) नतीजा यह निकला कि उनकी इस बद-अहदी की वजह से जो उन्होंने अल्लाह के साथ की और उस झूठ की वजह से जो वे बोलते रहे, अल्लाह ने उनके दिलों में निफ़ाक़ बिठा दिया जो उसके सामने उनकी पेशी के दिन तक उनका पीछा न छोड़ेगा।
أَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ يَعۡلَمُ سِرَّهُمۡ وَنَجۡوَىٰهُمۡ وَأَنَّ ٱللَّهَ عَلَّٰمُ ٱلۡغُيُوبِ ۝ 68
(78) क्या ये लोग जानते नहीं हैं कि अल्लाह को उनके छिपे भेद और उनकी छिपी कानाफूसियाँ तक मालूम हैं, और वह तमाम ग़ैब की बातों से पूरी तरह बाख़बर है?
ٱلَّذِينَ يَلۡمِزُونَ ٱلۡمُطَّوِّعِينَ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ فِي ٱلصَّدَقَٰتِ وَٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ إِلَّا جُهۡدَهُمۡ فَيَسۡخَرُونَ مِنۡهُمۡ سَخِرَ ٱللَّهُ مِنۡهُمۡ وَلَهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٌ ۝ 69
(79) (वह ख़ूब जानता है उन कंजूस दौलतमन्दों को) जो राज़ी — ख़ुशी से देनेवाले ईमानवालों की माली कुरबानियों पर बातें छाँटते हैं और उन लोगों का मज़ाक़ उड़ते हैं जिनके पास (अल्लाह की राह में देने के लिए) उसके सिवा कुछ नहीं है जो वे अपने ऊपर मशक़्क़त बरदाश्त करके देते हैं।87 अल्लाह इन मज़ाक़ उड़ानेवालों का मज़ाक़ उड़ाता है और इनके लिए दर्दनाक सज़ा है।
87. तबूक की मुहिम के मौक़े पर जब नबी (सल्ल०) ने चन्दे की अपील की तो बड़े-बड़े मालदार मुनाफ़िक़ हाथ रोककर बैठे रहे। मगर जब सच्चे ईमानवाले बढ़-चढ़कर चन्दा देने लगे तो इन लोगों ने उनपर बातें छाँटनी शुरू कीं। कोई हैसियतवाला मुसलमान अपनी हैसियत के मुताबिक़ या उससे बढ़कर कोई बड़ी रकम पेश करता तो ये उसपर दिखावे का इलज़ाम लगाते, और अगर कोई ग़रीब मुसलमान अपना और अपने बाल-बच्चों का पेट काटकर कोई छोटी-सी रक़म हाज़िर करता, या रात भर मेहनत-मजदूरी करके कुछ खजूरें हासिल करता और वही लाकर पेश कर देता, तो ये उसपर आवाज़े कसते कि लो, यह टिड्डी की टाँग भी आ गई है, ताकि इससे रूम (रोम) के क़िले फ़तह किए जाएँ।
ٱسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ أَوۡ لَا تَسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ إِن تَسۡتَغۡفِرۡ لَهُمۡ سَبۡعِينَ مَرَّةٗ فَلَن يَغۡفِرَ ٱللَّهُ لَهُمۡۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلۡفَٰسِقِينَ ۝ 70
(80) ऐ नबी! तुम चाहे ऐसे लोगों के लिए माफ़ी की दरख़ास्त करो या न करो, अगर तुम सत्तर बार भी इन्हें माफ़ कर देने की दरख़ास्त करोगे तो अल्लाह इन्हें हरगिज़ माफ़ न करेगा, इसलिए कि इन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया है, और अल्लाह फ़ासिक़ (नाफ़रमान) को नजात का रास्ता नहीं दिखाता।
فَرِحَ ٱلۡمُخَلَّفُونَ بِمَقۡعَدِهِمۡ خِلَٰفَ رَسُولِ ٱللَّهِ وَكَرِهُوٓاْ أَن يُجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَقَالُواْ لَا تَنفِرُواْ فِي ٱلۡحَرِّۗ قُلۡ نَارُ جَهَنَّمَ أَشَدُّ حَرّٗاۚ لَّوۡ كَانُواْ يَفۡقَهُونَ ۝ 71
(81) जिन लोगों को पीछे रह जाने की इजाज़त दे दी गई थी वे अल्लाह के रसूल का साथ न देने और घर बैठे रहने पर ख़ुश हुए और उन्हें गवारा न हुआ कि अल्लाह की राह में जान व माल से जिहाद करें। उन्होंने लोगों से कहा कि “इस सख़्त गर्मी में न निकलो।” उनसे कहो कि जहन्नम की आग इससे ज़्यादा गर्म है, काश उन्हें इसकी समझ होती!
فَلۡيَضۡحَكُواْ قَلِيلٗا وَلۡيَبۡكُواْ كَثِيرٗا جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ ۝ 72
(82) अब चाहिए कि ये लोग हँसना कम करें और रोएँ ज़्यादा, इसलिए कि जो बुराई ये कमाते रहे हैं उसका बदला ऐसा ही है (कि इन्हें इसपर रोना चाहिए)।
فَإِن رَّجَعَكَ ٱللَّهُ إِلَىٰ طَآئِفَةٖ مِّنۡهُمۡ فَٱسۡتَـٔۡذَنُوكَ لِلۡخُرُوجِ فَقُل لَّن تَخۡرُجُواْ مَعِيَ أَبَدٗا وَلَن تُقَٰتِلُواْ مَعِيَ عَدُوًّاۖ إِنَّكُمۡ رَضِيتُم بِٱلۡقُعُودِ أَوَّلَ مَرَّةٖ فَٱقۡعُدُواْ مَعَ ٱلۡخَٰلِفِينَ ۝ 73
(83) अगर अल्लाह इनके बीच तुम्हें वापस ले जाए और आगे इनमें से कोई गरोह जिहाद के लिए निकलने की तुमसे इजाज़त माँगे तो साफ़ कह देना, “अब तुम मेरे साथ हरगिज़ नहीं चल सकते और न मेरे साथ किसी दुश्मन से लड़ सकते हो, तुमने पहले बैठ रहने को पसन्द किया था, तो अब घर बैठनेवालों ही के साथ बैठे रहो।"
وَلَا تُصَلِّ عَلَىٰٓ أَحَدٖ مِّنۡهُم مَّاتَ أَبَدٗا وَلَا تَقُمۡ عَلَىٰ قَبۡرِهِۦٓۖ إِنَّهُمۡ كَفَرُواْ بِٱللَّهِ وَرَسُولِهِۦ وَمَاتُواْ وَهُمۡ فَٰسِقُونَ ۝ 74
(84) और आगे इनमें से जो कोई मरे उसकी जनाज़े की नमाज़ भी तुम हरगिज़ न पढ़ना और न कभी उसकी क़ब्र पर खड़े होना, क्योंकि उन्होंने अल्लाह और उसके रसूल के साथ कुफ़्र किया है और वे मरे हैं इस हाल में कि वे फ़ासिक़ (नाफ़रमान) थे।88
88. तबूक से वापसी पर कुछ ज़्यादा मुद्दत न गुज़री थी कि अब्दुल्लाह-बिन-उबई, मुनाफ़िक़ों का सरदार, मर गया। उसके बेटे अब्दुल्लाह, जो सच्चे मुसलमानों में से थे, नबी (सल्ल०) की ख़िदमत में आए और अपने बाप के कफ़न में लगाने के लिए आपका कुर्ता माँगा। नबी (सल्ल०) ने दिल की पूरी कुशादगी के साथ कुर्ता दे दिया। फिर उन्होंने दरख़ास्त की कि आप ही इसकी जनाज़े की नमाज़ पढ़ाएँ। आप (सल्ल०) इसके लिए भी तैयार हो गए। हज़रत उमर (रज़ि०) ने ज़ोर देकर कहा कि “ऐ अल्लाह के रसूल, क्या आप उस शख़्स पर जनाज़े की नमाज़ पढ़ेंगे जो ये और ये हरकतें कर चुका है?” मगर नबी (सल्ल०) उनकी ये सब बातें सुनकर मुस्कराते रहे और अपनी उस रहमत की बिना पर जो दोस्त-दुश्मन सबके लिए आम थी, आप ने उस बदतरीन दुश्मन के हक़ में भी मग़फ़िरत की दुआ करने में झिझक नहीं दिखाई। आख़िर जब आप नमाज़ पढ़ाने खड़े ही हो गए तो यह आयत नाज़िल हुई और सीधे तौर पर अल्लाह के हुक्म से आपको रोक दिया गया; क्योंकि अब यह हमेशा के लिए पॉलिसी तय की जा चुकी थी कि मुसलमानों की जमाअत में मुनाफ़िक़ों को किसी तरह पनपने न दिया जाए और कोई ऐसा काम न किया जाए जिससे इस गरोह की हिम्मत और हौसला बढ़े। इसी से यह मसला निकला है कि फ़ासिक़ों, फ़ाजिरों और फ़िस्क़ में मशहूर लोगों की जनाज़े की नमाज़ मुसलमानों के इमाम और ज़िम्मेदार लोगों को न पढ़ानी चाहिए, न पढ़नी चाहिए। इन आयतों के बाद नबी (सल्ल०) का तरीक़ा यह हो गया था कि जब आपको किसी जनाज़े पर जाने के लिए कहा जाता तो आप पहले मरनेवाले के बारे में मालूमात कर लेते थे कि किस क़िस्म का आदमी था, और अगर मालूम होता कि बुरे चलन का आदमी था तो आप उसके घरवालों से कह देते थे कि तुम्हें इख़्तियार है, जिस तरह चाहो इसे दफ़न कर दो।
عَفَا ٱللَّهُ عَنكَ لِمَ أَذِنتَ لَهُمۡ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَكَ ٱلَّذِينَ صَدَقُواْ وَتَعۡلَمَ ٱلۡكَٰذِبِينَ ۝ 75
(43) ऐ नबी! अल्लाह तुम्हें माफ़ करे, तुमने क्यों उन्हें छूट दे दी? (तुम्हें चाहिए था कि ख़ुद छूट न देते) ताकि तुमपर खुल जाता कि कौन लोग सच्चे हैं, और झूठों को भी तुम जान लेते।45
45. कुछ मुनाफ़िक़ों ने बनावटी बहाने और मजबूरियाँ पेश करके नबी (सल्ल०) से मुहलत माँगी थी और नबी (सल्ल०) ने भी अपनी नर्म-मिज़ाजी की वजह से यह जानने के बावजूद कि वे सिर्फ़ बहाने कर रहे हैं उनको छूट दे दी थी। इसको अल्लाह ने पसन्द नहीं किया और आप (सल्ल०) को तंबीह की कि ऐसी नरमी मुनासिब नहीं है। छूट दे देने की वजह से इन मुनाफ़िक़ों को अपने निफ़ाक़ पर परदा डालने का मौक़ा मिल गया। अगर उन्हें छूट न दी जाती और फिर ये घर बैठे रहते तो इनका ईमान का दावा बे-नक़ाब हो जाता।
لَا يَسۡتَـٔۡذِنُكَ ٱلَّذِينَ يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ أَن يُجَٰهِدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 76
(44) जो लोग अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं वे तो तुमसे कभी यह दरख़ास्त न करेंगे कि उन्हें अपनी जान व माल के साथ जिहाद करने से माफ़ रखा जाए। अल्लाह मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) को ख़ूब जानता है।
إِنَّمَا يَسۡتَـٔۡذِنُكَ ٱلَّذِينَ لَا يُؤۡمِنُونَ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَٱرۡتَابَتۡ قُلُوبُهُمۡ فَهُمۡ فِي رَيۡبِهِمۡ يَتَرَدَّدُونَ ۝ 77
(45) ऐसी दरख़ास्त तो सिर्फ़ वही लोग करते हैं जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान नहीं रखते, जिनके दिलों में शक है और वे अपने शक ही में आगे-पीछे (दुविधाग्रस्त) हो रहे हैं।46
46. इससे मालूम हुआ कि कुफ़्र और इस्लाम की कशमकश एक कसौटी है जो खरे ईमानवाले और खोटे ईमान के दावेदार के फ़र्क़ को साफ़ खोलकर रख देती है। जो शख़्स इस कशमकश में दिल और जान से इस्लाम की हिमायत करे और अपनी सारी ताक़त और तमाम ज़रिओं को इसको ऊँचा करने की कोशिश में खपा दे और किसी क़ुरबानी से वह पीछे न हटे वही सच्चा ईमानवाला है। इसके बरख़िलाफ़ जो इस कशमकश में इस्लाम का साथ देने से जी चुराए और कुफ़्र की सरबुलन्दी का ख़तरा सामने देखते हुए भी इस्लाम की सरबुलन्दी के लिए जान और माल की बाज़ी खेलने से बचे उसकी यह रविश ख़ुद उस हक़ीक़त को साफ़ कर देती है कि उसके दिल में ईमान नहीं है।
۞وَلَوۡ أَرَادُواْ ٱلۡخُرُوجَ لَأَعَدُّواْ لَهُۥ عُدَّةٗ وَلَٰكِن كَرِهَ ٱللَّهُ ٱنۢبِعَاثَهُمۡ فَثَبَّطَهُمۡ وَقِيلَ ٱقۡعُدُواْ مَعَ ٱلۡقَٰعِدِينَ ۝ 78
(46) अगर वाक़ई में उनका इरादा निकलने का होता तो वे इसके लिए कुछ तैयारी करते, लेकिन अल्लाह को उनका उठना पसन्द ही न था47, इसलिए उसने उन्हें सुस्त कर दिया और कह दिया गया कि बैठ रहो बैठनेवालों के साथ।
47. यानी बददिली के साथ उठना अल्लाह को पसन्द न था, क्योंकि जब वे जिहाद में शरीक होने के जज़्बे और नीयत से ख़ाली थे और उनके अन्दर दीन की सरबुलन्दी के लिए जान लड़ाने की कोई ख़ाहिश नहीं थी, तो वे सिर्फ़ मुसलमानों की शर्मा-शर्मी से बददिली के साथ या किसी शरारत की नीयत से मुस्तैदी के साथ उठते और ये चीज़ हज़ार ख़राबियों की वजह होती जैसा कि बादवाली आयत में साफ़ तौर से कह दिया गया है।
لَوۡ خَرَجُواْ فِيكُم مَّا زَادُوكُمۡ إِلَّا خَبَالٗا وَلَأَوۡضَعُواْ خِلَٰلَكُمۡ يَبۡغُونَكُمُ ٱلۡفِتۡنَةَ وَفِيكُمۡ سَمَّٰعُونَ لَهُمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمُۢ بِٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 79
(47) अगर वे तुम्हारे साथ निकलते तो तुम्हारे अन्दर ख़राबी के सिवा किसी चीज़ को न बढ़ाते, वे तुम्हारे बीच फ़ितना पैदा करने के लिए दौड़-धूप करते और तुम्हारे गरोह का हाल यह है कि अभी उसमें बहुत-से ऐसे लोग मौजूद हैं जो उनकी बातें कान लगाकर सुनते हैं, अल्लाह इन ज़ालिमों को ख़ूब जानता है।
لَقَدِ ٱبۡتَغَوُاْ ٱلۡفِتۡنَةَ مِن قَبۡلُ وَقَلَّبُواْ لَكَ ٱلۡأُمُورَ حَتَّىٰ جَآءَ ٱلۡحَقُّ وَظَهَرَ أَمۡرُ ٱللَّهِ وَهُمۡ كَٰرِهُونَ ۝ 80
(48) इससे पहले भी इन लोगों ने फ़ितना पैदा करने की कोशिशें की हैं और तुम्हें नाकाम करने के लिए यह हर तरह की तदबीरों का उलट-फेर कर चुके हैं, यहाँ तक कि उनकी मरज़ी के ख़िलाफ़ हक़ आ गया और अल्लाह का काम होकर रहा।
وَمِنۡهُم مَّن يَقُولُ ٱئۡذَن لِّي وَلَا تَفۡتِنِّيٓۚ أَلَا فِي ٱلۡفِتۡنَةِ سَقَطُواْۗ وَإِنَّ جَهَنَّمَ لَمُحِيطَةُۢ بِٱلۡكَٰفِرِينَ ۝ 81
(49) इनमें से कोई है जो कहता है कि “मुझे छूट दे दीजिए और मुझको फ़ितने में न डालिए48 — सुन रखो! फ़ितने ही में तो ये लोग पड़े हुए है।49 और जहन्नम ने इन काफ़िरों को घेर रखा है।50
48. इससे पहले भी इन लोगों ने फ़ितना पैदा करने की कोशिशें की हैं और तुम्हें नाकाम करने के लिए यह हर तरह की तदबीरों का उलट-फेर कर चुके हैं, यहाँ तक कि उनकी मरज़ी के ख़िलाफ़ हक़ आ गया और अल्लाह का काम होकर रहा।
49. यानी नाम तो फ़ितने से बचने का लेते हैं मगर अस्ल में निफ़ाक़ और झूठ और दिखावे का फ़ितना इनपर बुरी तरह मुसल्लत है। अपने नज़दीक ये समझते हैं कि छोटे-छोटे फ़ितनों के इमकान से परेशानी और ख़ौफ़ का इजहार करके ये बड़े मुत्तक़ी (परहेज़गार) साबित हुए जा रहे हैं। हालाँकि अस्ल में कुफ़्र और इस्लाम की फ़ैसलाकुन कशमकश के मौक़े पर इस्लाम की हिमायत से पहलू बचाकर ये इतने बड़े फ़ितने में पड़ रहे हैं जिससे बढ़कर किसी फ़ितने का तसव्वुर नहीं किया जा सकता।
50. यानी तक़वा (परहेज़गारी) की इस नुमाइश ने इनको जहन्नम से दूर नहीं किया, बल्कि निफ़ाक़ की इस लानत ने इन्हें जहन्नम के चंगुल में उलटा फँसा दिया।
إِن تُصِبۡكَ حَسَنَةٞ تَسُؤۡهُمۡۖ وَإِن تُصِبۡكَ مُصِيبَةٞ يَقُولُواْ قَدۡ أَخَذۡنَآ أَمۡرَنَا مِن قَبۡلُ وَيَتَوَلَّواْ وَّهُمۡ فَرِحُونَ ۝ 82
(50) तुम्हारा भला होता है तो इनको रंज होता है और तुमपर कोई मुसीबत आती है तो ये मुँह फेरकर ख़ुश-ख़ुश पलटते हैं और कहते जाते हैं कि अच्छा हुआ हमने पहले ही अपना मामला ठीक कर लिया था।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ إِنَّمَا ٱلۡمُشۡرِكُونَ نَجَسٞ فَلَا يَقۡرَبُواْ ٱلۡمَسۡجِدَ ٱلۡحَرَامَ بَعۡدَ عَامِهِمۡ هَٰذَاۚ وَإِنۡ خِفۡتُمۡ عَيۡلَةٗ فَسَوۡفَ يُغۡنِيكُمُ ٱللَّهُ مِن فَضۡلِهِۦٓ إِن شَآءَۚ إِنَّ ٱللَّهَ عَلِيمٌ حَكِيمٞ ۝ 83
(28) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो, मुशरिकीन नापाक हैं, इसलिए इस साल के बाद ये मस्जिदे-हराम के क़रीब न फटकने पाएँ,25 और अगर तुम्हें तंगदस्ती का डर है तो नामुमकिन नहीं कि अल्लाह चाहे तो तुम्हें अपनी मेहरबानी से मालामाल कर दे। अल्लाह जाननेवाला और हिकमतवाला है।
25. यानी आइन्दा के लिए उनका हज और उनकी ज़ियारत ही बन्द नहीं, बल्कि मस्जिदे-हराम (ख़ाना-ए-काबा) की हदों में उनका दाख़िल होना भी बन्द है, ताकि शिर्क और जाहिलियत को फिर से पैर फैलाने का कोई इमकान बाक़ी न रहे। 'नापाक' होने से मुराद यह नहीं है कि वे अपनी ज़ात में नापाक हैं, बल्कि इसका मतलब यह है कि उनके एतिक़ाद (धारणाएँ), उनके अख़लाक़़, उनके आमाल और उनकी ज़िन्दगी के जाहिलाना तरीक़े नापाक हैं और इसी गन्दगी की बिना पर हरम की हदों में इनका दाख़िला बन्द किया गया है। इमाम अबू-हनीफ़ा के नज़दीक इससे मुराद सिर्फ़ यह है कि वे हज और उमरा और जाहिलियत की रस्मों को अदा करने के लिए हरम की हदों में नहीं जा सकते। इमाम शाफ़िई (रह०) के नज़दीक इस हुक्म का मंशा यह है कि वे मस्जिदे-हराम में जा ही नहीं सकते। और इमाम मालिक (रह०) यह राय रखते हैं कि सिर्फ़ मस्जिदे-हराम ही नहीं, बल्कि किसी मस्जिद में भी उनका दाख़िल होना दुरुस्त नहीं। लेकिन यह आख़िरी राय दुरुस्त नहीं है, क्योंकि नबी (सल्ल०) ने ख़ुद मस्जिदे-नबवी में उन लोगों को आने की इजाज़त दी थी।
لَّيۡسَ عَلَى ٱلضُّعَفَآءِ وَلَا عَلَى ٱلۡمَرۡضَىٰ وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ لَا يَجِدُونَ مَا يُنفِقُونَ حَرَجٌ إِذَا نَصَحُواْ لِلَّهِ وَرَسُولِهِۦۚ مَا عَلَى ٱلۡمُحۡسِنِينَ مِن سَبِيلٖۚ وَٱللَّهُ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 84
(91) कमज़ोर, बूढ़े और बीमार लोग और वे लोग जो जिहाद में शरीक होने के लिए रास्ते का ख़र्च नहीं पाते, अगर पीछे रह जाएँ तो कोई हरज नहीं, जबकि वे सच्चे दिल के साथ अल्लाह और उसके रसूल के वफ़ादार हौं।92 ऐसे बेहतरीन काम करनेवालों पर एतिराज़ की कोई गुंजाइश नहीं है और अल्लाह माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।
92. इससे मालूम हुआ कि जो लोग ज़ाहिर में माज़ूर और मजबूर हों उनके लिए भी सिर्फ़ कमज़ोरी और बीमारी या सिर्फ़ नादारी माफ़ी के लिए काफ़ी नहीं है, बल्कि उनकी ये मजबूरियाँ सिर्फ़ ऐसी सूरत में उनके लिए माफ़ी की वजह हो सकती हैं जबकि वे अल्लाह और उसके रसूल के सगे वफ़ादार हों, वरना अगर वफ़ादारी मौजूद न हो तो कोई शख़्स सिर्फ़ इसलिए माफ नहीं किया जा सकता कि वह फ़र्ज़ के अदा करने के मौक़े पर बीमार या नादार था। अल्लाह सिर्फ़ ज़ाहिर को नहीं देखता है कि ऐसे सब लोग जो बीमारी का मेडिकल सर्टिफ़िकेट या बुढ़ापे और जिस्मानी कमी की मजबूरी पेश कर दें, उसके यहाँ बराबर मजबूर क़रार दिए जाएँ और उनपर से पूछ-गछ ख़त्म हो जाए। वह तो उनमें से एक-एक शख़्स के दिल का जाइज़ा लेगा, उसके पूरे छिपे और ज़ाहिर के बरताव को देखेगा, और यह जाँचेगा कि उसकी मजबूरी और माज़ूरी एक वफ़ादार बन्दे की-सी मजबूरी थी या एक ग़द्दार और बाग़ी की-सी। एक शख़्स है कि जब उसने फ़र्ज़ की पुकार सुनी तो दिल में लाख-लाख शुक्र अदा कया कि “बड़े अच्छे मौक़े पर मैं बीमार हो गया वरना यह बला किसी तरह टाले न टलती और ख़ाह-मख़ाह मुसीबत भुगतनी पड़ती।” दूसरे शख़्स ने यही पुकार सुनी तो तिलमिला उठा कि “हाय! कैसे मौक़े पर इस कमबख़्त बीमारी ने आ दबोचा, जो वक़्त मैदान में निकलकर ख़िदमत अंजाम देने का था वह किस बुरी तरह यहाँ बिस्तर पर बरबाद हो रहा है।” एक ने अपने लिए तो ख़िदमत से बचने का बहाना पाया ही था, मगर उसके साथ उसने दूसरों को भी उससे रोकने की कोशिश की दूसरा हालाँकि ख़ुद बीमारी के बिस्तर पर मजबूर पड़ा हुआ था, मगर वह बराबर अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और भाइयों को जिहाद का जोश दिलता रहा और अपने तीमारदारों से भी कहता रहा कि “मेरा अल्लाह मालिक है, दवा-दारू का इन्तिज़ाम किसी न किसी तरह हो ही जाएगा, मुझ अकेले इनसान के लिए तुम इस क़ीमती वक़्त को बरबाद न करो जिसे दीन-हक़ की ख़िदमत में ख़र्च होना चाहिए।” एक ने बीमारी के बहाने से घर बैठकर जंग का सारा ज़माना बददिली फैलाने, बुरी ख़बरें उड़ाने, जंगी कोशिशों को ख़राब करने और मुजाहिदों के पीछे उनके घर बिगाड़ने में लगाया। दूसरे ने यह देखकर कि मैदान में जाने के मुबारक मौक़े से वह महरूम रह गया अपनी हद तक पूरी कोशिश की कि घर के मोर्चे (Home-front) को मज़बूत रखने में जो ज़्यादा-से-ज़्यादा ख़िदमत उससे बन आए उसे अंजाम दे। ज़ाहिर के एतिबार से तो ये दोनों ही मजबूर हैं। मगर अल्लाह की निगाह में ये दो अलग-अलग तरह के मजबूर किसी तरह बराबर नहीं हो सकते। अल्लाह के यहाँ माफ़ी अगर है, तो सिर्फ़ दूसरे शख़्स के लिए। रहा पहला शख़्स तो वह अपनी मजबूरी के बावजूद ग़द्दारी और बेवफ़ाई का मुजरिम है।
وَلَا عَلَى ٱلَّذِينَ إِذَا مَآ أَتَوۡكَ لِتَحۡمِلَهُمۡ قُلۡتَ لَآ أَجِدُ مَآ أَحۡمِلُكُمۡ عَلَيۡهِ تَوَلَّواْ وَّأَعۡيُنُهُمۡ تَفِيضُ مِنَ ٱلدَّمۡعِ حَزَنًا أَلَّا يَجِدُواْ مَا يُنفِقُونَ ۝ 85
(92) इसी तरह उन लोगों पर भी कोई एतिराज़ का मौक़ा नहीं है जिन्होंने ख़ुद आकर तुमसे दरख़ास्त की थी कि हमारे लिए सवारियाँ जुटाई जाएँ और जब तुमने कहा कि मैं तुम्हारे लिए सवारियों का इंतिजाम नहीं कर सकता तो वे मजबूर होकर वापस गए, और हाल यह था कि उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे और उन्हें इस बात का बड़ा दुख था कि वे अपने ख़र्च पर जिहाद में शरीक होने की ताक़त नहीं रखते।93
93. ऐसे लोग जो दीन की ख़िदमत के लिए बेताब हों और अगर किसी हक़ीक़ी मजबूरी की वजह से या ज़राए और साधन न पाने की वजह से अमली तौर पर ख़िदमत न कर सकें तो उनके दिल को इतना ही सख़्त सदमा हो जितना किसी दुनिया-परस्त को रोज़गार छूट जाने या किसी बड़े नफ़े के मौक़े से महरूम रह जाने पर हुआ करता है, उनकी गिनती अल्लाह के यहाँ ख़िदमत अंजाम देनेवालों ही में होगी, हालाँकि उन्होंने अमली तौर पर कोई ख़िदमत अंजाम न दी हो इसलिए कि वे चाहे हाथ-पाँव से काम न कर सके हों, लेकिन दिल से तो वे ख़िदमत में लगे ही रहे हैं। यही बात है जो तबूक की जंग से वापसी पर सफ़र के बीच में नबी (सल्ल०) ने अपने साथियों को ख़िताब करते हुए कही थी कि “मदीना में कुछ लोग ऐसे हैं कि तुमने कोई वादी तय नहीं की और कोई कूच नहीं किया जिसमें वे तुम्हारे साथ-साथ न रहे हों।” सहाबा (रज़ि०) ने ताज्जुब से कहा, “क्या मदीना ही में रहते हुए?” नबी (सल्ल०) ने कहा, “हाँ, मदीने ही में रहते हुए; क्योंकि मजबूरी ने उन्हें रोक लिया था वरना वे ख़ुद रुकनेवाले न थे।”
۞إِنَّمَا ٱلسَّبِيلُ عَلَى ٱلَّذِينَ يَسۡتَـٔۡذِنُونَكَ وَهُمۡ أَغۡنِيَآءُۚ رَضُواْ بِأَن يَكُونُواْ مَعَ ٱلۡخَوَالِفِ وَطَبَعَ ٱللَّهُ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَهُمۡ لَا يَعۡلَمُونَ ۝ 86
(93) अलबत्ता एतिराज़ उन लोगों पर है जो मालदार हैं और फिर भी तुमसे दरख़ास्ते करते हैं कि उन्हें जिहाद में शरीक होने से माफ़ रखा जाए। उन्होंने घर बैठनेवालियों में शामिल होना पसन्द किया और अल्लाह ने उनके दिलों पर ठप्पा लगा दिया, इसलिए अब ये कुछ नहीं जानते (कि अल्लाह के यहाँ उनके इस रवैये का क्या नतीजा निकलनेवाला है)
يَعۡتَذِرُونَ إِلَيۡكُمۡ إِذَا رَجَعۡتُمۡ إِلَيۡهِمۡۚ قُل لَّا تَعۡتَذِرُواْ لَن نُّؤۡمِنَ لَكُمۡ قَدۡ نَبَّأَنَا ٱللَّهُ مِنۡ أَخۡبَارِكُمۡۚ وَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمۡ وَرَسُولُهُۥ ثُمَّ تُرَدُّونَ إِلَىٰ عَٰلِمِ ٱلۡغَيۡبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ۝ 87
(94) तुम जब पलटकर उनके पास पहुँचोगे तो ये तरह-तरह के बहाने पेश करेंगे, मगर तुम साफ़ कह देना कि “बहाने न करो, हम तुम्हारी किसी बात पर भरोसा न करेंगे। अल्लाह ने हमको तुम्हारे हालात बता दिए हैं। अब अल्लाह और उसका रसूल तुम्हारे रवैए को देखेगा, फिर तुम उसकी तरफ़ पलटाए जाओगे जो खुले और छिपे सबका जाननेवाला है, और वह तुम्हें बता देगा कि तुम क्या कुछ करते रहे हो।”
سَيَحۡلِفُونَ بِٱللَّهِ لَكُمۡ إِذَا ٱنقَلَبۡتُمۡ إِلَيۡهِمۡ لِتُعۡرِضُواْ عَنۡهُمۡۖ فَأَعۡرِضُواْ عَنۡهُمۡۖ إِنَّهُمۡ رِجۡسٞۖ وَمَأۡوَىٰهُمۡ جَهَنَّمُ جَزَآءَۢ بِمَا كَانُواْ يَكۡسِبُونَ ۝ 88
(95), तुम्हारी वापसी पर ये तुम्हारे सामने क़समें खाएँगे, ताकि तुम उन्हें अनदेखा कर जाओ। तो बेशक तुम उन्हें अनदेखा ही कर लो94, क्योंकि ये गन्दगी हैं और इनकी अस्ली जगह जहन्नम है जो इनकी कमाई के बदले में उन्हें मिलेगी।
94. पहले जुमले में सर्फ़े-नज़र (अनदेखी करने) से मुराद माफ़ कर देना है और दूसरे जुमले में ताल्लुक़ ख़त्म करना। यानी वे तो चाहते हैं कि तुम उनसे पूछ-गछ न करो, मगर बेहतर यह है कि तुम उनसे कोई वास्ता ही न रखो और समझ लो कि तुम उनसे कट गए और वे तुमसे।
يَحۡلِفُونَ لَكُمۡ لِتَرۡضَوۡاْ عَنۡهُمۡۖ فَإِن تَرۡضَوۡاْ عَنۡهُمۡ فَإِنَّ ٱللَّهَ لَا يَرۡضَىٰ عَنِ ٱلۡقَوۡمِ ٱلۡفَٰسِقِينَ ۝ 89
(96) ये तुम्हारे सामने क़समे खाएँगे ताकि तुम इनसे राज़ी हो जाओ, हालाँकि अगर तुम इनसे राज़ी हो भी गए तो अल्लाह हरगिज़ ऐसे नाफ़रमान लोगों से राज़ी न होगा।
ٱلۡأَعۡرَابُ أَشَدُّ كُفۡرٗا وَنِفَاقٗا وَأَجۡدَرُ أَلَّا يَعۡلَمُواْ حُدُودَ مَآ أَنزَلَ ٱللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِۦۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٞ ۝ 90
(97) ये अरब बद्दू कुफ़्र (इनकार) व निफ़ाक़ (कपटाचार) में ज़्यादा सख़्त हैं और इनके मामले में इस बात के इमकान ज़्यादा हैं कि उस दीन की हदों से नावाक़िफ़ रहें जो अल्लाह ने अपने रसूल पर उतारा है। अल्लाह सब कुछ जानता है और हिकमतवाला और सूझ-बूझवाला है।95
95. जैसा कि हम पहले बयान कर चुके हैं यहाँ बदवी अरबों से मुराद वे देहाती और रेगिस्तानी अरब लोग हैं जो मदीना के आस-पास आबाद थे। ये लोग मदीना में एक मज़बूत और मुनज़्ज़म (सुसंगठित) ताक़त को उठते देखकर पहले तो मरऊब (घबराए) हुए। फिर इस्लाम और कुफ़्र की लड़ाइयों के दौरान में एक मुद्दत तक मौक़े को देखने और इब्नुल-वक़्ती (अवसरवादिता) की रविश पर चलते रहे। फिर जब इस्लामी हुकूमत का ग़लबा हिजाज़ और नजद के एक बड़े हिस्से पर हो गया और मुख़ालिफ़ क़बीलों का ज़ोर उसके मुक़ाबले में टूटने लगा तो इन लोगों ने वक़्त की मस्लहत इसी में देखी कि इस्लाम के दायरे में दाख़िल हो जाएँ। लेकिन इनमें कम लोग ऐसे थे जो इस दीन को दीने-हक़ समझकर सच्चे दिल से ईमान लाए हों और सच्चे तरीक़े से उसके तक़ाज़ों को पूरा करने पर आमादा हों। ज़्यादातर बदवियों के लिए इस्लाम क़ुबूल करने की हैसियत ईमान और अक़ीदे की नहीं, बल्कि सिर्फ़ मस्लहत और पॉलिसी की थी। उनकी ख़ाहिश यह थी कि उनके हिस्से में सिर्फ़ वे फ़ायदे आ जाएँ जो बरसरे-इक़तिदार (सत्ताधारी) जमाअत की मिम्बरशिप इख़्तियार करने से हासिल हुआ करते हैं। मगर वे अख़लाक़ी बन्दिशें जो इस्लाम उनपर लगाता था, वे नमाज़-रोज़े की पाबन्दियाँ जो इस दीन को क़ुबूल करते ही उनपर लग जाती थीं, वे ज़कात जो बाक़ायदा तहसीलदारों के ज़रिए से उनके नख़लिसतानों और उनके ग़ल्लों से वुसूल की जाती थी, वह नज़्मो-ज़ब्त (Discipline) जिसके शिकंजे में वे अपनी तारीख़़ में पहली बार कसे गए थे, वे जान-माल की क़ुरबानियाँ जो लूट-मार की लड़ाइयों में नहीं, बल्कि ख़ालिस अल्लाह की राह के जिहाद में आए दिन उनसे तलब की जा रही थीं, ये सारी चीज़ें उनको शिद्दत के साथ नागवार थीं और वे उनसे पीछा छुड़ाने के लिए हर तरह की चालबाज़ियाँ और बहानेबाज़ियाँ करते रहते थे। उनको इससे कुछ बहस नहीं थी कि हक़ क्या है और उनकी और तमाम इनसानों की हक़ीक़ी फ़लाह और कामयाबी किस चीज़ में है। उन्हें जो कुछ भी दिलचस्पी थी वह अपने मआशी मफ़ाद (आर्थिक हित), अपने आराम, अपनी ज़मीनों, अपने ऊँटों और बकरियों और अपने ख़ेमे के आस-पास की महदूद दुनिया से थी। उससे हटकर किसी चीज़ के साथ वे उस तरह की अक़ीदत तो रख सकते थे जैसी पीरों और फ़क़ीरों से रखी जाती है कि ये उनके आगे नज़्रो-नियाज़ पेश करें और वे उसके बदले रोज़गार की तरक़्क़ी और आफ़तों से महफ़ूज़ रहने और ऐसे ही दूसरे मक़सदों के लिए उनको तावीज़-गण्डे दें और उनके लिए दुआएँ करें। लेकिन ऐसे ईमान और अक़ीदे के लिए वे तैयार न थे जो उनकी पूरी (सांस्कृतिक), मआशी (आर्थिक) और समाजी ज़िन्दगी को अख़लाक़ और क़ानून के ज़ाबिते में कस दे और इससे भी बढ़कर एक आलमगीर (Universal) सुधारवादी मिशन के लिए उनसे जान और माल की क़ुरबानियों की भी माँग करे। उनकी इसी हालत को यहाँ इस तरह बयान किया गया है कि शहरियों के मुक़ाबले ये देहाती और रेगिस्तानी लोग ज़्यादा मुनाफ़िक़ाना रवैया रखते हैं और हक़ से इनकार की कैफियत उनके अन्दर ज़्यादा पाई जाती है। फिर उसकी वजह भी बता दी है कि शहरी लोग तो इल्मवालों और सच्चे लोगों की सोहबत से फ़ायदा उठाकर कुछ दीन को और उसकी हदों को जान भी लेते हैं, मगर ये बदवी चूँकि सारी-सारी उम्र बिलकुल एक मआशी हैवान की तरह दिन-रात रोज़ी-रोटी के फेर ही में पड़े रहते हैं और हैवानी ज़िन्दगी की ज़रूरतों से ऊपर उठकर किसी चीज़ की तरफ़ तवज्जोह करने का इन्हें मौक़ा ही नहीं मिलता। इसलिए दीन और उसकी हदों से उनके अनजान रहने के इमकानात (सम्भावनाएँ) ज़्यादा हैं। यहाँ इस हक़ीक़त की तरफ़ भी इशारा कर देना नामुनासिब न होगा कि इन आयतों के उतरने से लगभग दो साल बाद हज़रत अबू-बक्र (रज़ि०) की ख़िलाफ़त (शासन) के शुरुआती दौर में इस्लाम से फिर जाने और ज़कात न देने का जो तूफ़ान बरपा हुआ था उसकी वजहों में एक बड़ी वजह यही थी जिसका ज़िक्र इन आयतों में किया गया है।
وَمِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مَن يَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ مَغۡرَمٗا وَيَتَرَبَّصُ بِكُمُ ٱلدَّوَآئِرَۚ عَلَيۡهِمۡ دَآئِرَةُ ٱلسَّوۡءِۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٞ ۝ 91
(98) इन बद्दुओं में ऐसे-ऐसे लोग मौजूद हैं जो अल्लाह के रास्ते में कुछ ख़र्च करते हैं तो उसे अपने ऊपर ज़बरदस्ती की चट्टी (जुर्माना) समझते हैं96 और तुम्हारे हक़ में ज़माने की गरदिशों (कालचक्र) का इंतिज़ार कर रहे हैं (कि तुम किसी चक्कर में फँसो तो वे अपनी गरदन से इस निज़ाम की पैरवी का पट्टा उतार फेंकें जिसमें तुमने उन्हें कस दिया है) । हालाँकि बुराई के चक्कर ने ख़ुद उनको अपनी लपेट में ले लिया है और अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।
96. मतलब यह है कि जो ज़कात इनसे वुसूल की जाती है उसे ये एक जुर्माना समझते हैं। मुसाफ़िरों की मेहमान नवाज़ी और मेहमानदारी का जो हक़ इनके ज़िम्मे किया गया है वह इनको बुरी तरह खलता है। और अगर किसी जंग के मौक़े पर ये कोई चन्दा देते हैं तो अपने दिली जज़्बे से अल्लाह को ख़ुश करने की ख़ातिर नहीं देते, बल्कि न चाहते हुए अपनी वफ़ादारी का यक़ीन दिलाने के लिए देते हैं।
وَمِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مَن يُؤۡمِنُ بِٱللَّهِ وَٱلۡيَوۡمِ ٱلۡأٓخِرِ وَيَتَّخِذُ مَا يُنفِقُ قُرُبَٰتٍ عِندَ ٱللَّهِ وَصَلَوَٰتِ ٱلرَّسُولِۚ أَلَآ إِنَّهَا قُرۡبَةٞ لَّهُمۡۚ سَيُدۡخِلُهُمُ ٱللَّهُ فِي رَحۡمَتِهِۦٓۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٞ ۝ 92
(99) और इन्हीं बद्दुओं में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अल्लाह और आख़िरत के दिन पर ईमान रखते हैं और जो कुछ ख़र्च करते हैं उसे अल्लाह के यहाँ क़रीब होने का और रसूल की तरफ़ से रहमत की दुआएँ लेने का ज़रिआ बनाते हैं। हाँ, वह ज़रूर उनके लिए क़रीब होने का ज़रिआ है और अल्लाह ज़रूर उनको अपनी रहमत में दाख़िल करेगा, यक़ीनन अल्लाह माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।
وَٱلسَّٰبِقُونَ ٱلۡأَوَّلُونَ مِنَ ٱلۡمُهَٰجِرِينَ وَٱلۡأَنصَارِ وَٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُم بِإِحۡسَٰنٖ رَّضِيَ ٱللَّهُ عَنۡهُمۡ وَرَضُواْ عَنۡهُ وَأَعَدَّ لَهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي تَحۡتَهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَآ أَبَدٗاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 93
(100) वे मुहाजिर और अनसार जिन्होंने सबसे पहले ईमान की दावत को क़ुबूल करने में पहल की, साथ ही वे जो बाद में सच्चाई के साथ उनके पीछे आए, अल्लाह उनसे राजी हुआ और वे अल्लाह से राज़ी हुए, अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके नीचे नहरें बहती होंगी और वे उनमें हमेशा रहेंगे। यही अज़ीमुश्शान कामयाबी है।
وَمِمَّنۡ حَوۡلَكُم مِّنَ ٱلۡأَعۡرَابِ مُنَٰفِقُونَۖ وَمِنۡ أَهۡلِ ٱلۡمَدِينَةِ مَرَدُواْ عَلَى ٱلنِّفَاقِ لَا تَعۡلَمُهُمۡۖ نَحۡنُ نَعۡلَمُهُمۡۚ سَنُعَذِّبُهُم مَّرَّتَيۡنِ ثُمَّ يُرَدُّونَ إِلَىٰ عَذَابٍ عَظِيمٖ ۝ 94
(101) तुम्हारे आस-पास में जो बद्दू रहते हैं उनमें बहुत-से मुनाफ़िक़ (कपटाचारी) हैं और इसी तरह ख़ुद मदीना के बाशिन्दों में भी मुनाफ़िक़ मौजूद हैं जो निफ़ाक़ में पक्के हो गए हैं। तुम उन्हें नहीं जानते, हम उन्हें जानते हैं।97 क़रीब है वह वक़्त जब हम उनको दोहरी सज़ा देंगे,98 फिर वे और ज़्यादा बड़ी सज़ा के लिए वापस लाए जाएँगे।
97. यानी अपने निफ़ाक़ को छिपाने में वे इतने माहिर हो गए हैं कि ख़ुद नबी (सल्ल०) भी अपनी कमाल दरजे की फ़िरासत और सूझ-बूझ के बावजूद इनको नहीं पहचान सकते थे।
98. दोहरी सज़ा से मुराद यह है कि एक तरफ़ तो वह दुनिया जिसकी मुहब्बत में पड़कर उन्होंने ईमान और इख़लास के बजाय मुनाफ़क़त और ग़द्दारी का रवैया इख़्तियार किया है, इनके हाथ से जाएगी और यह माल और इज़्ज़त हासिल करने के बजाय उलटी रुसवाई व नाकामी पाएँगे। दूसरी तरफ़ जिस मिशन को ये नाकाम देखना और अपनी चालबाज़ियों से नाकाम करना चाहते हैं वह इनकी ख़ाहिशों और कोशिशों के बरख़िलाफ़ इनकी आँखों के सामने परवान चढ़ेगा।
وَءَاخَرُونَ ٱعۡتَرَفُواْ بِذُنُوبِهِمۡ خَلَطُواْ عَمَلٗا صَٰلِحٗا وَءَاخَرَ سَيِّئًا عَسَى ٱللَّهُ أَن يَتُوبَ عَلَيۡهِمۡۚ إِنَّ ٱللَّهَ غَفُورٞ رَّحِيمٌ ۝ 95
(102) कुछ और लोग हैं जिन्होंने अपनी ग़लतियों को मान लिया है। उनका अमल मिला-जुला है, कुछ भला है और कुछ बुरा। नामुमकिन नहीं कि अल्लाह उनपर फिर मेहरबान हो जाए, क्योंकि करनेवाला और रहम करनेवाला है।
خُذۡ مِنۡ أَمۡوَٰلِهِمۡ صَدَقَةٗ تُطَهِّرُهُمۡ وَتُزَكِّيهِم بِهَا وَصَلِّ عَلَيۡهِمۡۖ إِنَّ صَلَوٰتَكَ سَكَنٞ لَّهُمۡۗ وَٱللَّهُ سَمِيعٌ عَلِيمٌ ۝ 96
(103) ऐ नबी! तुम इनके मालों में से सदक़ा लेकर इन्हें पाक करो और (नेकी की राह में) इन्हें बढ़ाओ और इनके हक़ में रहमत की दुआ करो, क्योंकि तुम्हारी दुआ इनके लिए सुकून की वजह होगी, अल्लाह सब कुछ सुनता और जानता है।
أَلَمۡ يَعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ هُوَ يَقۡبَلُ ٱلتَّوۡبَةَ عَنۡ عِبَادِهِۦ وَيَأۡخُذُ ٱلصَّدَقَٰتِ وَأَنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 97
(104) क्या इन लोगों को मालूम नहीं है कि वह अल्लाह ही है जो अपने बन्दों की तौबा क़ुबूल करता है और इनकी ख़ैरात (सदक़े) को क़ुबूल करता है, और यह कि अल्लाह बहुत माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है?
وَقُلِ ٱعۡمَلُواْ فَسَيَرَى ٱللَّهُ عَمَلَكُمۡ وَرَسُولُهُۥ وَٱلۡمُؤۡمِنُونَۖ وَسَتُرَدُّونَ إِلَىٰ عَٰلِمِ ٱلۡغَيۡبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمۡ تَعۡمَلُونَ ۝ 98
(105) और ऐ नबी! इन लोगों से कह दो कि तुम अमल करो, अल्लाह और उसका रसूल और ईमानवाले सब देखेंगे कि तुम्हारा रवैया अब क्या रहता है।99 तुम उसकी तरफ़ पलटाए जाओगे जो खुले और छिपे सबको जानता है और वह बता देगा कि तुम क्या करते रहे हो।100
99. यहाँ ईमान के झूठे दावेदारों और गुनहगार ईमानवालों का फ़र्क़ साफ़-साफ़ वाज़ेह कर दिया गया है। जो शख़्स ईमान का दावा करता है, मगर हक़ीक़त में ख़ुदा और उसके दीन और ईमानवालों की जमाअत के साथ कोई ख़ुलूस नहीं रखता उसके इख़लास न होने का सुबूत अगर उसके रवैये से मिल जाए तो उसके साथ सख़्ती का बरताव किया जाएगा। ख़ुदा की राह में ख़र्च करने के लिए वह कोई माल पेश करे तो उसे रद्द कर दिया जाएगा। मर जाए तो न मुसलमान उसके जनाज़े की नमाज़ पढ़ेंगे और न कोई मोमिन उसके लिए मग़फ़िरत की दुआ करेगा चाहे, वह उसका बाप या भाई ही क्यों न हो। बरख़िलाफ़ इसके जो शख़्स ईमानवाला हो और वह कोई ग़ैर-मुख़लिसाना रवैया इख़्तियार कर ले, वह अगर अपनी ग़लती को मान ले तो उसको माफ़ भी किया जाएगा, उसके सदक़ात भी क़ुबूल किए जाएँगे और उसके लिए रहमत की दुआ भी की जाएगी। अब रही यह बात कि किस शख़्स को ग़ैर-मुख़लिसाना रवैया अपनाने के बावजूद मुनाफ़िक़ के बजाय सिर्फ़ गुनाहगार मोमिन समझा जाएगा तो यह तीन मेयारों से परखी जाएगी जिनकी तरफ़ इन आयतों में इशारा किया गया है— (1) वह अपने क़ुसूर के लिए झूठे बहाने और हील हवाले और ग़लत वजहें पेश नहीं करेगा, बल्कि जो क़ुसूर हुआ है उसे सीधी तरह साफ़-साफ़ मान लेगा। (2) उसके पिछले रवैये पर निगाह डालकर देखा जाएगा कि यह इख़लास के न होने का आदी मुजरिम तो नहीं है। अगर पहले वह जमाअत का एक नेक आदमी रहा है और उसकी ज़िन्दगी के कारनामों में मुख़लिसाना ख़िदमात, ईसार और क़ुरबानी और नेकियों में बाज़ी ले जाने का रिकार्ड मौजूद है तो मान लिया जाएगा कि इस वक़्त जो ग़लती उससे हुई है वह ईमान और इख़लास के न होने का नतीजा नहीं है, बल्कि सिर्फ़ एक कमज़ोरी है जो वक़्ती तौर पर सामने आ गई है। (3) उसके आइन्दा रवैये पर निगाह रखी जाएगी कि क्या उसका ग़लती को मान लेना सिर्फ़ ज़बानी है या हक़ीक़त में उसके अन्दर शर्मिन्दगी का कोई गहरा एहसास मौजूद है। अगर वह अपने क़ुसूर की तलाफ़ी और भरपाई के लिए बेताब नज़र आए और उसकी बात-बात से ज़ाहिर हो कि ईमान की जिस कमी का निशान उसकी ज़िन्दगी में उभर आया था उसे मिटाने और उसकी भरपाई करने की वह सख़्त कोशिश कर रहा है, तो समझा जाएगा कि वह हक़ीक़त में शर्मिन्दा है और यह शर्मिन्दगी ही उसके ईमान और इख़लास की दलील होगी। मुहद्दिसीन (हदीस के आलिमों) ने इन आयतों के उतरने की वजहों में जो वाक़िआ बयान किया है उससे यह मज़मून आईने की तरह रौशन हो जाता है। वे कहते हैं कि ये आयतें अबू-लुबाबा-बिन-अब्दुल-मुंज़िर और उनके छः साथियों के मामले में नाज़िल हुई थीं। अबू-लुबाबा उन लोगों में से थे जो बैअते-उक़बा के मौक़े पर हिजरत से पहले इस्लाम लाए थे। फिर बद्र की जंग, उहुद की जंग और दूसरी जंगों में बराबर शरीक रहे। मगर तबूक के मौक़े पर नफ़्स की कमज़ोरी ने ग़ल्बा किया और ये किसी जाइज़ और शरई मजबूरी के बग़ैर ही बैठे रह गए। ऐसे ही सच्चे और मुख़लिस इनके दूसरे साथी भी थे और उनसे भी वह कमज़ोरी ज़ाहिर हो गई। जब नबी (सल्ल०) तबूक की मुहिम से वापस आए और उन लोगों को मालूम हुआ कि पीछे रह जानेवालों के बारे में अल्लाह और रसूल की क्या राय है तो उन्हें सख़्त शर्मिन्दगी हुई। इससे पहले कि कोई पूछ-गछ होती उन्होंने ख़ुद ही अपने आपको एक सुतून से बाँध लिया और कहा कि हमपर सोना और खाना हराम है जब तक हम माफ़ न कर दिए जाएँ, या फिर हम मर जाएँ। चुनाँचे कई रोज़ वे इसी तरह बिना कुछ खाए-पिए और बिना सोए बँधे रहे, यहाँ तक कि बेहोश होकर गिर पड़े। आख़िरकार जब उन्हें बताया गया कि अल्लाह और रसूल ने तुम्हें माफ़ कर दिया तो उन्होंने नबी (सल्ल०) से कहा कि हमारी तौबा में यह भी शामिल है कि जिस घर के ऐशो-आराम ने हमें फ़र्ज से ग़ाफ़िल किया उसे और अपने तमाम माल को अल्लाह की राह में दे दें। मगर नबी (सल्ल०) ने कहा कि सारा माल देने की ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ एक तिहाई काफ़ी है। चुनाँचे वह उन्होंने उसी वक़्त अल्लाह के रास्ते में वक़्फ़ कर दिया। इस क़िस्से पर ग़ौर करने से साफ़ मालूम हो जाता है कि अल्लाह के यहाँ माफ़ी किस क़िस्म की कमज़ोरियों के लिए है। ये सब हज़रात आदी ग़ैर-मुख़लिस न थे, बल्कि इनकी ज़िन्दगी का पिछला कारनामा उनके ईमान पर दलील था। इनमें से किसी ने बहाने नहीं गढ़े, बल्कि अपनी ग़लतियों को ख़ुद ही ग़लती मान लिया। उन्होंने ग़लती को तस्लीम करने के साथ अपने रवैये से यह साबित कर दिया कि वे वाक़ई बहुत शर्मिन्दा और अपने इस गुनाह की भरपाई के लिए सख़्ज़ बेचैन हैं। इस सिलसिले में एक और मुफ़ीद नुक्ते (Point) पर भी निगाह रहनी चाहिए जो इन आयतों में बयान हुआ है। वह यह कि गुनाहों की भरपाई के लिए ज़बान और दिल की तौबा के साथ-साथ अमली तौबा भी होनी चाहिए, और अमली तौबा की एक शक्ल यह है कि आदमी अल्लाह की राह में माल ख़ैरात करे। इस तरह वह गन्दगी जो नफ़्स में परवरिश पा रही थी और जिसकी बदौलत आदमी से गुनाह हुआ था, दूर हो जाती है और भलाई और नेकी की तरफ़ पलटने की ताक़त बढ़ती है। गुनाह करने के बाद इसको मान लेना ऐसा है जैसे एक आदमी जो गढ़े में गिर गया था, अपने गिरने को ख़ुद महसूस कर ले। फिर उसका अपने गुनाह पर शर्मिन्दा होना यह मानी रखता है कि वह इस गढ़े को अपने लिए बहुत ही बुरी जगह समझता है और अपनी इस हालत से सख़्त तकलीफ़ में है। फिर उसका सदक़ा और ख़ैरात और दूसरी नेकियों से इसकी भरपाई की कोशिश करना मानो गढ़े से निकलने के लिए हाथ-पाँव मारना है।
100. मतलब यह है कि आख़िरकार मामला उस अल्लाह के साथ है जिससे कोई चीज़ छिप नहीं सकती। इसलिए मान लीजिए कि अगर कोई आदमी दुनिया में अपने निफ़ाक़ को छिपाने में कामयाब हो जाए और इनसान जिन-जिन मेयारों पर किसी के ईमान और इख़लास को परख सकते हैं उन सबपर भी पूरा उतर जाए तो यह न समझना चाहिए कि वह निफ़ाक़ (कपट) की सज़ा पाने से बच निकला है।
وَءَاخَرُونَ مُرۡجَوۡنَ لِأَمۡرِ ٱللَّهِ إِمَّا يُعَذِّبُهُمۡ وَإِمَّا يَتُوبُ عَلَيۡهِمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٞ ۝ 99
(106) कुछ दूसरे लोग हैं जिनका मामला अभी ख़ुदा के हुक्म पर ठहरा हुआ है, चाहे उन्हें सज़ा दे और चाहे उनपर नए सिरे से मेहरबान हो जाए। अल्लाह सब कुछ जानता है और हिकमतवाला और सूझ-बूझवाला है।101
101. ये लोग ऐसे थे जिनका मामला शक में पड़ा हुआ था। न इनके मुनाफ़िक़ होने का फ़ैसला किया जा सकता था, न गुनाहगार मोमिन होने का। इन दोनों चीज़ों की निशानियाँ अभी पूरी तरह नहीं उभरी थीं। इसलिए अल्लाह ने इनके मामले को मुल्तवी रखा। न इस मानी में कि हक़ीक़त में ख़ुदा के सामने मामला शक में पड़ा हुआ था, बल्कि इस मानी में कि मुसलमानों को किसी शख़्स या गरोह के मामले में अपना रवैया उस वक़्त तक तय नहीं करना चाहिए जब तक उसकी पोज़ीशन ऐसी निशानियों से साफ़ न हो जाए जो ग़ैबी इल्म से नहीं, बल्कि अक़्ल और समझ से जाँची जा सकती हों।
وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مَسۡجِدٗا ضِرَارٗا وَكُفۡرٗا وَتَفۡرِيقَۢا بَيۡنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ وَإِرۡصَادٗا لِّمَنۡ حَارَبَ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥ مِن قَبۡلُۚ وَلَيَحۡلِفُنَّ إِنۡ أَرَدۡنَآ إِلَّا ٱلۡحُسۡنَىٰۖ وَٱللَّهُ يَشۡهَدُ إِنَّهُمۡ لَكَٰذِبُونَ ۝ 100
(107) कुछ और लोग हैं जिन्होंने एक मस्जिद बनाई इस मक़सद के लिए कि (हक के पैग़ाम को) नुक़सान पहुँचाएँ और (अल्लाह की बन्दगी करने के बजाए) कुफ़्र (नाफ़रमानी) करें और ईमानवालों में फूट डालें और (इस दिखावे की इबादतगाह को) उस आदमी के लिए घात लगाने की जगह बनाएँ, जो इससे पहले अल्लाह और उसके रसूल के ख़िलाफ़ जंग कर चुका है। वे ज़रूर क़समें खा-खाकर कहेंगे कि हमारा इरादा तो भलाई के सिवा किसी दूसरी चीज़ का न था, मगर अल्लाह गवाह है कि वे बिलकुल झूठे हैं।
لَا تَقُمۡ فِيهِ أَبَدٗاۚ لَّمَسۡجِدٌ أُسِّسَ عَلَى ٱلتَّقۡوَىٰ مِنۡ أَوَّلِ يَوۡمٍ أَحَقُّ أَن تَقُومَ فِيهِۚ فِيهِ رِجَالٞ يُحِبُّونَ أَن يَتَطَهَّرُواْۚ وَٱللَّهُ يُحِبُّ ٱلۡمُطَّهِّرِينَ ۝ 101
(108) तुम हरगिज़ उस इमारत में खड़े न होना। जो मस्जिद पहले दिन से तक़वा परहेज़गारी पर क़ायम की गई थी वही इसके लिए ज़्यादा मुनासिब है कि तुम उसमें (इबादत के लिए) खड़े हो, उसमें ऐसे लोग हैं जो पाक रहना पसन्द करते हैं और अल्लाह को पाकी अपनानेवाले ही पसन्द हैं।102
102. नबी (सल्ल०) के मदीना पहुँचने से पहले ख़ज़रज क़बीले में अबू-आमिर नाम का एक शख़्स था, जो जाहिलियत के ज़माने में ईसाई राहिब (संन्यासी) बन गया था। उसकी गिनती आहले-किताब के आलिमों में होती थी और रहबानियत की वजह से उसके इल्मी वक़ार के साथ-साथ उसकी दरवेशी का सिक्का भी मदीने और आस-पास के जाहिल अरबों में बैठा हुआ था। जब नबी (सल्ल०) मदीना पहुँचे तो उसकी बुज़ुर्गी वहाँ ख़ूब चल रही थी। मगर यह इल्म और दरवेशी उसके अन्दर हक़ को पहचानने और हक़ पर उभारने के बजाय उलटी उसके लिए एक ज़बरदस्त परदा बन गई और इस परदे का नतीजा यह हुआ कि नबी (सल्ल०) के आने के बाद वह ईमान की नेमत से ही महरूम न रहा, बल्कि आप (सल्ल०) को अपनी बुज़ुर्गी का मुख़ालिफ़ और अपने दरवेशी कारोबार का दुश्मन समझकर आपकी और आपके काम की मुख़ालफ़त पर आमादा हो गया। पहले दो साल तक तो उसे यह उम्मीद रही कि क़ुरैश के इस्लाम-दुश्मनों की ताक़त ही इस्लाम को मिटाने के लिए काफ़ी साबित होगी। लेकिन बद्र की जंग में जब क़ुरैश ने बुरी तरह मात खाई तो उससे बरदाश्त न हो सका। उसी साल वह मदीना से निकल खड़ा हुआ और उसने क़ुरैश और दूसरे अरब क़बीलों में इस्लाम के ख़िलाफ़ प्रोपगेंडा शुरू कर दिया। उहुद की जंग जिन लोगों की कोशिशों से बरपा हुई उनमें यह भी शामिल था। और कहा जाता है कि उहुद के मैदाने-जंग में उसी ने वे गढ़े ख़ुदवाए थे जिनमें से एक में नबी (सल्ल०) गिरकर ज़ख़्मी हुए। फिर अहज़ाब की जंग में जो लश्कर हर तरफ़ से मदीना पर चढ़ आए थे उनको चढ़ा लाने में भी उसका हिस्सा नुमायाँ था। उसके बाद हुनैन की जंग तक जितनी लड़ाइयाँ अरब के मुशरिकों और मुसलमानों के बीच हुईं उन सबमें ये ईसाई दरवेश इस्लाम के ख़िलाफ़ शिर्क का सरगर्म हिमायती रहा। आख़िरकार उसे इस बात से मायूसी हो गई कि अरब की कोई ताक़त इस्लाम के सैलाब को रोक सकेगी। इसलिए अरब को छोड़कर उसने रूम (रोम) का रुख़ किया, ताकि रूमी बादशाह (क़ैसर) को इस 'ख़तरे' से आगाह करे जो अरब से सर उठा रहा था। यह वही मौक़ा था जब मदीना में ये ख़बरें पहुँचीं कि क़ैसर अरब पर चढ़ाई की तैयारियाँ कर रहा है और उसी की रोक-थाम के लिए नबी (सल्ल०) को तबूक की मुहिम पर जाना पड़ा। अबू-आमिर राहिब की इन तमाम सरगर्मियों में मदीना के मुनाफ़िक़ों का एक गरोह उसके साथ साज़िश में शरीक था और उस आख़िरी राय में भी ये लोग उसके साथ थे कि वह अपने मज़हबी असर को इस्तेमाल करके इस्लाम के ख़िलाफ़ रूम के बादशाह और उत्तरी अरब के ईसाई मुल्कों से फ़ौजी मदद हासिल करे। जब वह रूम की तरफ़ रवाना होने लगा तो उसके और उन मुनाफ़िक़ों के बीच यह क़रारदाद हुई कि मदीना में ये लोग अपनी एक अलग मस्जिद बना लेंगे, ताकि आम मुसलमानों से बचकर मुनाफ़िक़ मुसलमानों की अलग जत्थाबन्दी इस तरह की जा सके कि उसपर मज़हब का परदा पड़ा रहे और आसानी से उसपर कोई शक न किया जा सके, और वहाँ न सिर्फ़ यह कि मुनाफ़िक़ लोग मुनज़्ज़म (संगठित) हो सकें और आइन्दा कार्रवाइयों के लिए मश्वरे कर सकें, बल्कि अबू-आमिर के पास से जो एजेंट ख़बरें और हिदायतें लेकर आएँ वे भी भरोसेमन्द फ़क़ीरों और मुसाफ़िरों की हैसियत से इस मस्जिद में ठहर सकें। यह थी वह नापाक साज़िश जिसके तहत वह मस्जिद तैयार की गई थी जिसका इन आयतों में ज़िक्र किया गया है। मस्जिदे-नबवी जो शहर के अन्दर थी। इन दो मस्जिदों की मौजूदगी में एक तीसरी मस्जिद बनाने की कोई ज़रूरत नहीं थी, और वह ज़माना ऐसी बेवक़ूफ़ी भरी मज़हबियत का न था कि मस्जिद के नाम से एक इमारत बना देना अपने आप में नेकी और सवाब का काम हो, यह देखे बग़ैर कि इसकी ज़रूरत है या नहीं, बल्कि इसके बरख़िलाफ़ एक नई मस्जिद बनने के मानी ये थे कि मुसलमानों की जमाअत में ख़ाह-मख़ाह तफ़रीक़ और अलगाव पैदा हो जिसे एक सॉलेह इस्लामी निज़ाम किसी तरह गवारा नहीं कर सकता। इसी लिए ये लोग मजबूर हुए कि अपनी अलग मस्जिद बनाने से पहले उसकी ज़रूरत साबित करें। चुनाँचे उन्होंने नबी (सल्ल०) के सामने इस नई तामीर के लिए ज़रूरत पेश की कि बारिश में और जाड़े की रातों में आम लोगों को और ख़ास तौर से कमज़ोरों और मजबूरों को, जो इन दोनों मस्जिदों से दूर रहते हैं, पाँचों वक़्त हाज़िरी देनी मुश्किल होती है। इसलिए हम सिर्फ़ नमाज़ियों की आसानी के लिए यह एक नई मस्जिद बनाना चाहते हैं। इन पाकीज़ा इरादों की नुमाइश के साथ जब यह मस्जिदे-ज़िरार बनकर तैयार हुई तो ये शरारती लोग नबी (सल्ल०) की ख़िदमत में हाज़िर हुए और आप (सल्ल०) से दरख़ास्त की कि आप एक बार ख़ुद नमाज़ पढ़ाकर हमारी मस्जिद का इफ़्तिताह (उद्घाटन) कर दें। मगर आप (सल्ल०) ने यह कहकर टाल दिया कि “इस वक़्त मैं जंग की तैयारी में लगा हुआ हूँ और एक बड़ी मुहिम सामने है। इस मुहिम से वापस आकर देखूँगा।” उसके बाद नबी (सल्ल०) तबूक की तरफ़ रवाना हो गए और आपके पीछे ये लोग इस मस्जिद में अपनी जत्थेबन्दी और साज़िश करते रहे, यहाँ तक कि उन्होंने यहाँ तक तय कर लिया कि उधर रूमियों के हाथों मुसलमानों का ख़ातिमा हो और इधर ये फ़ौरन ही अब्दुल्लाह-बिन-उबई के सर पर शाही ताज रख दें। लेकिन तबूक में जो मामला पेश आया उसने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। वापसी पर जब नबी (सल्ल०) मदीना के क़रीब ज़ी-अदान के मक़ाम पर पहुँचे तो ये आयतें नाज़िल हुईं और आप (सल्ल०) ने उसी वक़्त कुछ आदमियों को मदीना की तरफ़ भेज दिया, ताकि आपके शहर में दाख़िल होने से पहले-पहले वे मस्जिदे-ज़िरार को ढा दें।
أَفَمَنۡ أَسَّسَ بُنۡيَٰنَهُۥ عَلَىٰ تَقۡوَىٰ مِنَ ٱللَّهِ وَرِضۡوَٰنٍ خَيۡرٌ أَم مَّنۡ أَسَّسَ بُنۡيَٰنَهُۥ عَلَىٰ شَفَا جُرُفٍ هَارٖ فَٱنۡهَارَ بِهِۦ فِي نَارِ جَهَنَّمَۗ وَٱللَّهُ لَا يَهۡدِي ٱلۡقَوۡمَ ٱلظَّٰلِمِينَ ۝ 102
(109) फिर तुम्हारा क्या ख़याल है कि अच्छा इनसान वह है जिसने अपनी इमारत की बुनियाद अल्लाह के डर और उसकी ख़ुशनूदी चाहने पर रखी हो या वह जिसने अपनी इमारत एक वादी की खोखली कमज़ोर कगार पर103 उठाई और वह उसे लेकर सीधी जहन्नम की आग में जा गिरी? ऐसे ज़ालिम लोगों को अल्लाह कभी सीधी राह नहीं दिखाता।104
103. अस्ल अरबी में लफ़्ज़ 'ज़ुरुफ़' इस्तेमाल हुआ है जिसको अरबी ज़बान में किसी नदी या दरिया के उस किनारे के नाम से जाना जाता है जिसके नीचे की मिट्टी को पानी ने काट-काट कर बहा दिया हो और ऊपर का हिस्सा बेसहारा खड़ा हो। जो लोग अपने अमल की बुनियाद ख़ुदा से बेख़ौफ़ी और उसकी ख़ुशी से बेनियाज़ी पर रखते हैं उनकी ज़िन्दगी की तामीर की मिसाल यहाँ उस इमारत से दी गई है जिसकी बुनियाद ऐसे ही किसी खोखले और बेसहारा दरिया के किनारे पर उठाई गई हो। यह एक ऐसी बेनज़ीर मिसाल है जिससे ज़्यादा बेहतर तरीक़े से इस सूरते-हाल का नक़्शा नहीं खींचा जा सकता। इसके पूरे मानी और मतलब ज़ेहन में बिठाने के लिए यूँ समझिए कि दुनियवी ज़िन्दगी की वह ज़ाहिरी सतह जिसपर मोमिन, मुनाफ़िक़, काफ़िर, नेक, गुनाहगार, यानी तमाम इनसान काम करते हैं, मिट्टी की उस ऊपरी तह के जैसी है जिसपर दुनिया में सारी इमारतें बनाई जाती हैं। यह तह अपने अन्दर ख़ुद कोई पायदारी और मज़बूती नहीं रखती, बल्कि उसकी पायदारी और मज़बूती का दारोमदार इसपर है कि उसके नीचे ठोस ज़मीन मौजूद हो। अगर कोई तह ऐसी हो जिसके नीचे की ज़मीन किसी चीज़, जैसे दरिया के पानी से कट चुकी हो तो जो अनजान इनसान उसकी ज़ाहिरी हालत से धोखा खाकर उसपर अपना मकान बनाएगा उसे वह उसके मकान समेत ले बैठेगी और वह न सिर्फ़ ख़ुद हलाक होगा, बल्कि उस नापायदार बुनियाद पर भरोसा करके अपना जो कुछ ज़िन्दगी का सरमाया वह इस इमारत में जमा करेगा वह भी बरबाद हो जाएगा। बिलकुल इसी मिसाल के मुताबिक़ दुनिया की ज़िन्दगी की वह ज़ाहिरी सतह भी जिसपर हम सब अपनी ज़िन्दगी के कारनामों की इमारत उठाते हैं, बजाय ख़ुद कोई मज़बूती और ठहराव नहीं रखती, बल्कि उसकी मज़बूती और पायदारी का दारोमदार इस बात पर है कि उसके नीचे ख़ुदा के ख़ैफ़, उसके सामने जवाबदेही के एहसास और उसकी मरज़ी की फ़रमाँबरदारी की ठोस चट्टान मौजूद हो। जो नादान आदमी सिर्फ़ दुनिया के ज़ाहिरी पहलू पर भरोसा कर लेता है और दुनिया में अल्लाह से बेख़ौफ़ और उसकी रज़ा से बेपरवा होकर काम करता है वह अस्ल में ख़ुद अपनी तामीर ज़िन्दगी के नीचे से उसकी बुनियादों को खोखला कर देता है और उसका आख़िरी अंजाम इसके सिवा कुछ नहीं कि यह बेबुनियाद सतह, जिस पर उसने अपनी उम्र भर का अमली सरमाया जमा किया है एक दिन अचानक गिर जाए और उसे उसके पूरे सरमाए समेत ले बैठे।
104. 'सीधी राह' यानी वह राह जिससे इनसान बामुराद होता और हक़ीक़ी कामयाबी की मंज़िल पर पहुँचता है।
لَا يَزَالُ بُنۡيَٰنُهُمُ ٱلَّذِي بَنَوۡاْ رِيبَةٗ فِي قُلُوبِهِمۡ إِلَّآ أَن تَقَطَّعَ قُلُوبُهُمۡۗ وَٱللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ ۝ 103
(110) यह इमारत जो उन्होंने बनाई है, हमेशा उनके दिलों में बेयक़ीनी की जड़ बनी रहेगी (जिसके निकलने की अब कोई शक्ल नहीं) सिवाय इसके कि उनके दिल ही टुकड़े-टुकड़े हो जाएँ।105 अल्लाह बहुत ख़बर रखनेवाला और हिकमत व सूझ-बूझवाला है।
105. यानी उन लोगों ने मुनाफ़िक़ाना मक्कारी और दग़ाबाज़ी के इतने बड़े जुर्म करके अपने दिलों को हमेशा-हमेशा के लिए ईमान की सलाहियत से महरूम कर लिया है और बेईमानी का रोग इस तरह उनके दिलों के रेशे-रेशे में पेवस्त हो गया है कि जब तक उनके दिल बाक़ी हैं यह रोग भी उनमें मौजूद रहेगा। ख़ुदा से कुफ़्र और नाफ़रमानी करने के लिए जो शख़्स अलानिया बुतख़ाना बनाए या उसके दीन से लड़ने के लिए खुल्लम-खुल्ला मोर्चे और दमदमे तैयार करे, उसकी हिदायत किसी-न-किसी वक़्त मुमकिन है, क्योंकि उसके अन्दर सच्चाई, इख़लास और अख़लाक़ी जुरअत और हिम्मत का वह जौहर तो बुनियादी तौर पर महफ़ूज़ रहता है, जो हक़-परस्ती के लिए भी उसी तरह काम आ सकता है जिस तरह बातिल-परस्ती के काम आता है। लेकिन जो बुज़दिल, झूठा और मक्कार इनसान कुफ़्र के लिए मस्जिद बनाए और ख़ुदा के दीन से लड़ने के लिए ख़ुदा-परस्ती का फ़रेब से भरा लबादा ओढ़े उसकी सीरत को तो निफ़ाक़ की दीमक खा चुकी होती है। उसमें यह ताक़त ही कहाँ बाक़ी रह सकती है कि सच्चे ईमान का बोझ सहार सके।
۞إِنَّ ٱللَّهَ ٱشۡتَرَىٰ مِنَ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ أَنفُسَهُمۡ وَأَمۡوَٰلَهُم بِأَنَّ لَهُمُ ٱلۡجَنَّةَۚ يُقَٰتِلُونَ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ فَيَقۡتُلُونَ وَيُقۡتَلُونَۖ وَعۡدًا عَلَيۡهِ حَقّٗا فِي ٱلتَّوۡرَىٰةِ وَٱلۡإِنجِيلِ وَٱلۡقُرۡءَانِۚ وَمَنۡ أَوۡفَىٰ بِعَهۡدِهِۦ مِنَ ٱللَّهِۚ فَٱسۡتَبۡشِرُواْ بِبَيۡعِكُمُ ٱلَّذِي بَايَعۡتُم بِهِۦۚ وَذَٰلِكَ هُوَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 104
(111) हक़ीक़त यह है कि अल्लाह ने ईमानवालों से उनके जान और उनके माल जन्नत के बदले में ख़रीद लिए हैं।106 वे अल्लाह की राह में लड़ते और मारते और मरते हैं। उनसे (जन्नत का वादा) अल्लाह के ज़िम्मे एक पक्का वादा है, तौरात और इंजील और क़ुरआन में।107 और कौन है जो अल्लाह से बढ़कर अपने वादे का पूरा करनेवाला हो? तो ख़ुशियाँ मनाओ अपने इस सौदे पर जो तुमने अल्लाह से चुका लिया है, यही सबसे बड़ी कामयाबी है।
106. यहाँ ईमान के उस मामले को जो ख़ुदा और बन्दे के बीच तय होता है, बैअ (ख़रीदना) कहा गया है। इसके मानी ये हैं कि ईमान सिर्फ़ एक ऐसा अक़ीदा नहीं है जिसका ताल्लुक़ क़ुदरत और फ़ितरत से परे की बातों से हो, बल्कि हक़ीक़त में वह एक मुआहदा (अनुबन्ध) है जिसके मुताबिक़ बन्दा अपना नफ़्स और अपना माल अल्लाह के हाथ बेच देता है और उसके बदले में अल्लाह की तरफ़ से इस वादे को क़ुबूल कर लेता है कि मरने के बाद दूसरी ज़िन्दगी में वह उसे जन्नत देगा। इस अहम मज़मून में शामिल बातों को समझने के लिए ज़रूरी है कि सबसे पहले इस ख़रीदने-बेचने के मामले की हक़ीक़त को अच्छी तरह ज़ेहन में बिठा लिया जाए। जहाँ तक अस्ल हक़ीक़त का ताल्लुक़ है, उसके लिहाज़ से तो इनसान की जान और माल का मालिक अल्लाह ही है, क्योंकि वही उसका और उन सारी चीज़ों का पैदा करनेवाला है जो उसके पास हैं और उसी ने वह सब कुछ उसे बख़्शा है जिसको वह इस्तेमाल कर रहा है। इसलिए इस हैसियत से तो ख़रीदने और बेचने का कोई सवाल पैदा ही नहीं होता। न इनसान का अपना कुछ है कि वह उसे बेचे, न कोई चीज़ ख़ुदा की मिल्कियत से बाहर है कि वह उसे ख़रीदे। लेकिन एक चीज़ इनसान के अन्दर ऐसी भी है जिसे अल्लाह ने पूरे तौर पर उसके हवाले कर दिया है, और वह है उसका इख़्तियार, यानी उसका अपने इन्तिख़ाब और इरादे में आज़ाद होना (Free will and Freedom of choice)। इस इख़्तियार की बिना पर अस्ल हक़ीक़त तो नहीं बदलती, मगर इनसान को इस बात की ख़ुदमुख़्तारी हासिल हो जाती है कि चाहे तो हक़ीक़त को तस्लीम करे वरना इनकार कर दे। दूसरे लफ़्ज़ों में इस इख़्तियार के मानी ये नहीं हैं कि इनसान हक़ीक़त में अपने नफ़्स का और अपने ज़ेहन और जिस्म की क़ुव्वतों का और उन इक़तिदारों का जो उसे दुनिया में हासिल हैं, मालिक हो गया है और उसे यह हक़ मिल गया है कि इन चीज़ों को जिस तरह चाहे इस्तेमाल करे। बल्कि उसके मानी सिर्फ़ ये है कि उसे इस बात की आज़ादी दे दी गई है कि ख़ुदा की तरफ़ से किसी ज़ोर-ज़बरदस्ती के बग़ैर वह ख़ुद ही अपने आप पर और अपनी हर चीज़ पर अल्लाह के मालिकाना हक़ों को मानना चाहे तो माने वरना आप ही अपना मालिक बन बैठे और अपने आप में यह ख़याल कर ले कि वह अल्लाह से बेनियाज़ होकर अपने इख़्तियार की हदों में अपनी मंशा के मुताबिक़ इस्तेमाल करने का हक़ रखता है। यही वह मक़ाम है जहाँ से बैअ (ख़रीदने-बेचने) का सवाल पैदा होता है। अस्ल में यह ख़रीदना-बेचना इस मानी में नहीं है कि जो चीज़ इनसान की है अल्लाह उसे ख़रीदना चाहता है, बल्कि इस मामले की सही नौइयत यह है कि जो चीज़ ख़ुदा की है, और जिसे उसने अमानत के तौर पर इनसान के हवाले किया है और जिसमें अमानतदार रहने या ख़ियानत करनेवाला बन जाने की आज़ादी उसने इनसान को दे रखी है, उसके बारे में वह इनसान से माँग करता है कि तू ख़ुशी के साथ (न कि मजबूरी में) मेरी चीज़ को मेरी ही चीज़ मान ले, और ज़िन्दगी भर इसमें ख़ुदमुख़्तार मालिक की हैसियत से नहीं, बल्कि अमानतदार होने की हैसियत से इस्तेमाल करना क़ुबूल कर ले, और ख़ियानत की जो आज़ादी तुझे मैं ने दी है, ख़ुद-ब-ख़ुद छोड़ दे। इस तरह अगर तू दुनिया की मौजूदा वक़्ती ज़िन्दगी में अपनी ख़ुदमुख़्तारी को (जो तेरी हासिल की हुई नहीं है बल्कि मेरी दी हुई है) मेरे हाथ बेच देगा तो मैं तुझे बाद की हमेशा-हमेशा की ज़िन्दगी में उसकी क़ीमत जन्नत की सूरत में अदा करूँगा। जो इनसान अल्लाह के साथ ख़रीदने-बेचने का यह मामला तय कर ले वह ईमानवाला है, और ईमान अस्ल में इसी ख़रीदने-बेचने का दूसरा नाम है। और जो शख़्स इससे इनकार कर दे, या इक़रार करने के बावजूद ऐसा रवैया अपनाए जो ख़रीदने-बेचने का मामला न करने की सूरत ही में इख़्तियार किया जा सकता है, वह काफ़िर है और इस ख़रीदने-बेचने ही से बचने का इस्तिलाही (पारिभाषिक) नाम कुफ़्र है। ख़रीदने-बेचने की इस हक़ीक़त को समझ लेने के बाद इसमें शामिल दूसरी बातों पर ग़ौर कीजिए— (1) इस मामले में अल्लाह ने इनसान को दो बहुत बड़ी आज़माइशों में डाला है। पहली आज़माइश इस बात की कि आज़ाद छोड़ दिए जाने पर यह इतनी शराफ़त दिखाता है या नहीं कि मालिक ही को मालिक समझे और नमकहरामी और बग़ावत पर न उतर आए। दूसरी आज़माइश इस बात की कि यह अपने अल्लाह पर इतना भरोसा करता है या नहीं कि जो क़ीमत आज नक़्द नहीं मिल रही है, बल्कि मरने के बाद दूसरी ज़िन्दगी में जिसके अदा करने का ख़ुदा की तरफ़ से वादा है, उसके बदले अपनी आज की ख़ुदमुख़्तारी और उसके मज़े बेच देने पर ख़ुशी के साथ राज़ी हो जाए। (2) दुनिया में जिस फ़िक़ही क़ानून (शरीअत के क़ानून) पर इस्लामी सोसाइटी बनती है उसके मुताबिक़ तो ईमान बस चन्द अक़ीदों के इक़रार का नाम है जिसके बाद शरीअत का कोई क़ाज़ी किसी के ग़ैर-मोमिन या मिल्लत से ख़ारिज होने का हुक्म नहीं लगा सकता, जब तक इस बात का कोई साफ़ और वाज़ेह सुबूत उसे न मिल जाए कि वह अपने इक़रार में झूठा है। लेकिन अल्लाह के यहाँ जो ईमान भरोसेमन्द है उसकी हक़ीक़त यह है कि बन्दा ख़याल और अमल दोनों में अपनी आज़ादी और ख़ुदमुख़्तारी को ख़ुदा के हाथ बेच दे और उसके हक़ में अपने मिल्कियत के दावे को पूरे तौर से छोड़ दे। इसलिए अगर कोई शख़्स इस्लाम के कलिमे का इक़रार करता हो और नमाज़ और रोज़े वग़ैरा अहकाम का भी पाबन्द हो, लेकिन अपने जिस्म और जान का, अपने दिल और दिमाग़ और बदन की क़ुव्वतों का, अपने माल और वसाइल और ज़रिओं (संसाधनों) का, और अपने क़ब्ज़े और इख़्तियार की सारी चीज़ों का मालिक अपने आप ही को समझता हो और उनको अपनी मंशा के मुताबिक़ इस्तेमाल करने की आज़ादी अपने लिए महफ़ूज़ रखता हो, तो हो सकता है कि दुनिया में वह मोमिन समझा जाता रहे, मगर अल्लाह के यहाँ यक़ीनन वह ग़ैर-मोमिन ही क़रार पाएगा, क्योंकि उसने ख़ुदा के साथ वह बैअ (खरीदने-बेचने) का मामला सिरे से किया ही नहीं जो क़ुरआन के मुताबिक़ ईमान की अस्ल हक़ीक़त है। जहाँ ख़ुदा की मरज़ी हो वहाँ जान और माल खपाने से बचना और जहाँ उसकी मरज़ी न हो वहाँ जान और माल खपाना, ये दोनों रवैये ऐसे हैं जो इस बात का आख़िरी फ़ैसला कर देते हैं कि ईमान का दावा करनेवाले ने या तो जान और माल को ख़ुदा के हाथ बेचा नहीं है, या ख़रीदने-बेचने का मुआहदा कर लेने के बाद भी वह बेची हुई चीज़ को बदस्तूर अपनी समझ रहा है। (3) ईमान की यह हक़ीक़त ज़िन्दगी के इस्लामी रवैये और ग़ैर-इस्लामी रवैये को शुरू से आख़िर तक बिलकुल एक-दूसरे से जुदा कर देती है। मुस्लिम जो सही मानी में ख़ुदा पर ईमान लाया हो, अपनी ज़िन्दगी के हर हिस्से में ख़ुदा की मरज़ी का फ़रमाँबरदार बनकर काम करता है। और उसके रवैये में किसी जगह भी ख़ुदमुख़्तारी का रंग नहीं आने पाता। सिवाए इसके कि वक़्ती तौर पर किसी वक़्त उसपर ग़फ़लत छा जाए और वह ख़ुदा के साथ अपने ख़रीदने-बेचने के मुआहदे को भूलकर कोई ख़ुद-मुख़्ताराना हरकत कर बैठे। इसी तरह जो गरोह ईमानवालों से मिलकर बना हो वह इज्तिमाई तौर पर भी कोई पॉलिसी, कोई सियासत, कोई तहज़ीब व तमुद्दन (संस्कृति और सभ्यता) का तरीक़ा, कोई मआशी (आर्थिक) व समाजी तरीक़ा और कोई बैनल-अक़वामी (अन्तर्राष्ट्रीय) रवैया अल्लाह की मरज़ी और उसके क़ानून और शरीअत की पाबन्दी से आज़ाद होकर इख़्तियार नहीं कर सकता। और अगर किसी वक़्ती ग़फ़लत की वजह से इख़्तियार कर भी जाए तो जिस वक़्त ख़बरदार होगा उसी वक़्त वह आज़ादी का रवैया छोड़कर बन्दगी के रवैये की तरफ़ पलट आएगा। अल्लाह से आज़ाद होकर काम करना और अपने मन और मन से ताल्लुक़ रखनेवाली बातों के बारे में ख़ुद यह फ़ैसला करना कि हम क्या करें और क्या न करें बहरहाल ज़िन्दगी का एक ग़ैर-इस्लामी रवैया है चाहे उसपर चलनेवाले लोग 'मुसलमान' के नाम से पुकारे जाएँ य 'ग़ैर-मुस्लिम' के नाम से। (4) इस ख़रीदने-बेचने के मुताबिक़ ख़ुदा की जिस मरज़ी की पैरवी आदमी पर ज़रूरी हो जाती है वह आदमी की अपनी तय की गई मरज़ी नहीं, बल्कि वह मरज़ी है जो अल्लाह ख़ुद बताए। अपने आप किसी चीज़ को ख़ुदा की मरज़ी ठहरा लेना और उसकी पैरवी करना अल्लाह की मरज़ी की नहीं, बल्कि अपनी ही मरज़ी की पैरवी है और यह ख़रीदने-बेचने के मुआहदे के बिलकुल ख़िलाफ़ है। अल्लाह के साथ अपने ख़रीदने-बेचने के मुआहदे पर सिर्फ़ वही शख़्स और वही गरोह क़ायम समझा जाएगा जो अपनी पूरी ज़िन्दगी का रवैया अल्लाह की किताब और उसके पैग़म्बर की हिदायत से हासिल करता हो। ये इस ख़रीदने-बेचने के तहत आनेवाली बातें हैं और इनको समझ लेने के बाद यह बात भी ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ जाती है कि इस ख़रीदने-बेचने के मामले में क़ीमत (यानी जन्नत) को मौजूदा दुनियावी ज़िन्दगी के ख़ातिमे तक क्यों टाला गया है। ज़ाहिर है कि जन्नत सिर्फ़ इस इक़रार का मुआवज़ा नहीं है कि “बेचनेवाले ने अपनी जान और माल को अल्लाह के हाथ बेच दिया” बल्कि वह इस अमल का मुआवज़ा है कि “बेचनेवाला अपनी दुनियावी ज़िन्दगी में इस बेची हुई चीज़ पर ख़ुद-मुख़्ताराना अमल-दख़ल छोड़ दे और अल्लाह का अमीन बनकर उसकी मरज़ी के मुताबिक़ अमल-दख़ल करे।” इसलिए यह बिक्री मुकम्मल ही उस वक़्त होगी जबकि बेचनेवाले की दुनियावी ज़िन्दगी ख़त्म हो जाए और हक़ीक़त में यह साबित हो कि उसने ख़रीदने-बेचने का मुआहदा करने के बाद से अपनी दुनियावी ज़िन्दगी के आख़िरी लम्हे तक ख़रीदने-बेचने की शर्तें पूरी की हैं। इससे पहले वह इनसाफ़ के मुताबिक़ क़ीमत पाने का हक़दार नहीं हो सकता। इन बातों के वाज़ेह हो जाने के साथ यह भी जान लेना चाहिए कि बयान के इस सिलसिले में यह मज़मून किस मुनासबत से आया है। ऊपर से तक़रीर का जो सिलसिला चल रहा था उसमें उन लोगों का ज़िक्र था जिन्होंने ईमान लाने का इक़रार किया था, मगर जब इम्तिहान का नाज़ुक मौक़ा आया तो उनमें से कुछ सुस्ती की बिना पर, कुछ इख़लास की कमी की वजह से और कुछ ख़ालिस मुनाफ़क़त की राह से अल्लाह और उसके दीन की ख़ातिर अपने वक़्त, अपने माल, अपने फ़ायदों और अपनी जान को क़ुरबान करने से बचे रहे। इसलिए इन अलग-अलग तरीक़े के लोगों और तबक़ों के रवैये पर तंकीद करने के बाद अब उनको साफ़-साफ़ बताया जा रहा है कि वह ईमान, जिसे क़ुबूल करने का तुमने इक़रार किया है, सिर्फ़ यह मान लेने का नाम नहीं है कि अल्लाह है और वह एक है, बल्कि सच्ची बात यह है कि वह इस बात का इक़रार है कि अल्लाह ही तुम्हारी जान और माल का मालिक है। इसलिए यह इक़रार करने के बाद अगर तुम इस जान और माल को अल्लाह के हुक्म पर क़ुरबान करने से जी चुराते हो और दूसरी तरफ़ अपने नफ़्स (मन) की क़ुव्वतों को और अपने ज़रिओं को अल्लाह की मरज़ी के ख़िलाफ़ इस्तेमाल करते हो, तो यह इस बात की दलील है कि तुम अपने इक़रार में झूठे हो। सच्चे ईमानवाले सिर्फ़ वे लोग हैं जो वाक़ई अपनी जान और माल अल्लाह के हाथ बेच चुके हैं और उसी को इन चीज़ों का मालिक समझते हैं। जहाँ उसका हुक्म होता है वहाँ उन्हें बेदरेग़ क़ुरबान करते हैं, और जहाँ उसका हुक्म नहीं होता वहाँ नफ़्स की ताक़तों का कोई छोटा-सा हिस्सा और माली ज़रिओं का कोई ज़रा-सा हिस्सा भी ख़र्च करने के लिए तैयार नहीं होते।
107. इस बात पर बहुत एतिराज़ किए गए हैं कि जिस वादे का यहाँ ज़िक्र है वह तौरात और इंजील में मौजूद नहीं है। मगर जहाँ तक इंजील का ताल्लुक़ है, ये एतिराज़ बेबुनियाद हैं। जो इंजीलें इस वक़्त दुनिया में मौजूद हैं उनमें हज़रत मसीह (अलैहिस्सलाम) की बहुत-सी बातें हमें ऐसी मिलती हैं जो इस आयत की हम-मानी हैं, जैसे— “मुबारक हैं वे जो सच्चाई पर चलने की वजह से सताए गए हैं, क्योंकि आसमान की बादशाही उन्हीं की है। (मत्ती 5:10) “जो कोई अपनी जान बचाता है उसे खोएगा जो कोई मेरी वजह से अपनी जान खोता है उसे बचाएगा।” (मत्ती 10:39) "जिस किसी ने घरों या भाइयों या बहनों या बाप या माँ या बच्चों या खेतों को मेरे नाम की ख़ातिर छोड़ दिया है उसको सौ गुना मिलेगा और हमेशा की ज़िन्दगी का वारिस होगा।” (मत्ती 19:29) अलबत्ता तौरात जिस सूरत में इस वक़्त मौजूद है उसमें बेशक यह मज़मून नहीं पाया जाता, और यही मज़मून क्या! वह तो मौत के बाद की ज़िन्दगी और हिसाब के दिन और आख़िरत में इनाम व सज़ा के तसव्वुर ही से ख़ाली है। हालाँकि यह अक़ीदा (धारणा) हमेशा से दीने-हक़ का लाज़िमी हिस्सा रहा है। लेकिन मौजूदा तौरात में इस मज़मून के न पाए जाने से यह नतीजा निकालना ठीक नहीं है कि वाक़ई में तौरात इससे ख़ाली थी। हक़ीक़त यह है कि यहूद अपने गिरावट के ज़माने में कुछ ऐसे माद्दा-परस्त और दुनिया की ख़ुशहाली के भूखे हो गए थे कि उनके नज़दीक नेमत और इनाम के कोई मानी इसके सिवा न रहे थे कि वह इसी दुनिया में हासिल हो। इसी लिए अल्लाह की किताब में बन्दगी और इताअत के बदले जिन-जिन इनामों के वादे उनसे किए गए थे उन सबको वे दुनिया ही में उतार लाए और जन्नत की हर तारीफ़ को उन्होंने फ़िलस्तीन की सरज़मीन पर चस्पा कर दिया जिसके वे उम्मीदवार थे। मिसाल के तौर पर तौरात में बहुत-सी जगहों पर हमको यह बात मिलती है— “सुन ऐ इसराईल! ख़ुदावन्द हमारा ख़ुदा एक ही ख़ुदावन्द है। तू अपने सारे दिल और अपनी सारी जान और अपनी सारी ताक़त से ख़ुदावन्द, अपने ख़ुदा से मुहब्बत कर।” (व्यवस्थाविवरण 6:4, 5) और यह कि— "क्या वह तुम्हारा बाप नहीं जिसने तुमको ख़रीदा है? उसी ने तुमको बनाया और क़ियाम बख़्शा। (व्यवस्थाविवरण 32:6) लेकिन अल्लाह के इस ताल्लुक़ का जो बदला बयान हुआ है वह यह है कि तुम उस मुल्क के मालिक हो जाओगे जिसमें दूध और शहद बहता है, यानी फ़िलस्तीन। इसकी अस्ल वजह यह है कि तौरात जिस शक्ल में इस वक़्त पाई जाती है अव्वल तो वह पूरी नहीं है और फिर उसके अन्दर सिर्फ़ ख़ालिस कलामे-इलाही ही नहीं है, बल्कि इसमें बहुत-सा तफ़सीरी कलाम ख़ुदा के कलाम के साथ-साथ शामिल कर दिया गया है। इसके अन्दर यहूदियों की क़ौमी रिवायतें, उनके नस्ली पूर्वाग्रहों, उनके अन्धविश्वास, उनकी आरज़ुओं और तमन्नाओं, उनकी ग़लतफहमियों और उनके फ़िक़ही इज्तिहादों का एक अच्छा-ख़ासा हिस्सा एक ही सिलसिला-ए-इबारत में कलामे-इलाही के साथ कुछ इस तरह रल-मिल गया है कि ज़्यादातर जगहों पर अस्ल कलाम को उन ज़ायद (अतिरिक्त) बातों से छाँटकर अलग करना बिलकुल नामुमकिन हो जाता है। (देखें— सूरा-3 आले-इमरान, टिप्पणी-2)
ٱلتَّٰٓئِبُونَ ٱلۡعَٰبِدُونَ ٱلۡحَٰمِدُونَ ٱلسَّٰٓئِحُونَ ٱلرَّٰكِعُونَ ٱلسَّٰجِدُونَ ٱلۡأٓمِرُونَ بِٱلۡمَعۡرُوفِ وَٱلنَّاهُونَ عَنِ ٱلۡمُنكَرِ وَٱلۡحَٰفِظُونَ لِحُدُودِ ٱللَّهِۗ وَبَشِّرِ ٱلۡمُؤۡمِنِينَ ۝ 105
(112) अल्लाह की तरफ़ बार-बार पलटनेवाले108 उसकी बन्दगी बजा लानेवाले, उसकी तारीफ़ के गुण गानेवाले, उसके लिए ज़मीन में गर्दिश करने (घूमने-फिरने) वाले109, उसके आगे झुकने और सजदे करनेवाले, नेकी का हुक्म देनेवाले, बदी से रोकनेवाले और अल्लाह की हदों की हिफ़ाज़त करनेवाले110, (इस शान के होते हैं वे ईमानवाले जो अल्लाह से ख़रीदने-बेचने का यह मामला तय करते हैं) और ऐ नबी! इन ईमानवालों को ख़ुशख़बरी दे दो।
108. मूल अरबी में लफ़्ज़ 'अत-ताइबून' इस्तेमाल हुआ है जिसका लफ़्ज़ी तर्जमा 'तौबा करनेवाले है। लेकिन जिस अंदाज़ में यह लफ़्ज़ इस्तेमाल किया गया है उससे साफ़ ज़ाहिर है कि तौबा करना ईमानवालों की मुस्तक़िल सिफ़ात में से है, इसलिए इसका सही मतलब यह है कि वे एक ही बार तौबा नहीं करते, बल्कि हमेशा तौबा करते रहते हैं। और तौबा के अस्ल मानी रुजू करने या पलटने के हैं, इसलिए इस लफ़्ज़ की हक़ीक़ी रूह ज़ाहिर करने के लिए हमने इसका तशरीही तर्जमा इस तरह किया है कि “वे अल्लाह की तरफ़ बार-बार पलटते हैं।” ईमानवाला हालाँकि अपने पूरे शुऊर और इरादे के साथ अल्लाह से अपनी जान और माल के ख़रीदने-बेचने का मामला तय करता है, लेकिन चूँकि ज़ाहिर हाल के लिहाज़ से महसूस यही होता है कि जान उसकी अपनी है और माल उसका अपना है, और यह बात कि इस जान और माल का अस्ल मालिक अल्लाह है एक महसूस बात नहीं, बल्कि सिर्फ़ एक माक़ूल और मुनासिब बात है इसलिए ईमानवाले की ज़िन्दगी में बार-बार ऐसे मौक़े आते रहते हैं, जबकि वह वक़्ती तौर पर अल्लाह के साथ अपने ख़रीदने-बेचने के मामले को भूल जाता है और उससे ग़ाफ़िल होकर कोई ख़ुद-मुख़्ताराना रवैया इख़्तियार कर बैठता है। मगर एक सच्चे ईमानवाले की ख़ूबी यह है कि जब भी उसकी यह वक़्ती भूल दूर होती है और वह अपनी ग़फ़लत से चौंकता है और उसको यह महसूस हो जाता है कि ग़ैर-शुऊरी तौर पर वह अपने अह्द की ख़िलाफ़वर्ज़ी कर गुज़रा है, तो उसे शर्मिन्दगी होती है। शर्मिन्दगी के साथ वह अपने ख़ुदा की तरफ़ पलटता है, माफ़ी माँगता है और अपने अह्द को फिर से ताज़ा कर लेता है। यही बार-बार की तौबा और यही रह-रहकर अल्लाह की तरफ़ पलटना और हर ग़लती के बाद वफ़ादारी की राह पर वापस आना ही इस बात की ज़मानत है कि आदमी का ईमान दाइमी और मज़बूत है। वरना इनसान जिन इनसानी कमज़ोरियों के साथ पैदा किया गया है, उनकी मौजूदगी में तो यह बात इसके बस में नहीं है कि ख़ुदा के हाथ एक बार जान और माल बेच देने के बाद हमेशा कामिल शुऊरी हालत में वह इस ख़रीद-बिक्री के तक़ाज़ों को पूरा करता रहे और किसी वक़्त भी ग़फ़लत और भूल उसपर तारी न होने पाए। इसी लिए अल्लाह ईमानवाले की तारीफ़ में यह नहीं फ़रमाता कि वह बन्दगी की राह पर आकर कभी उससे फिसलता ही नहीं, बल्कि उसकी तारीफ़ के क़ाबिल ख़ूबी यह क़रार देता है कि वह फिसल-फिसलकर बार-बार उसी राह की तरफ़ आता है, और यही वह बड़ी-से-बड़ी ख़ूबी है जिसपर इनसान क़ुदरत रखता है। फिर इस मौक़े पर ईमानवालों की ख़ूबियों में सबसे पहले तौबा का ज़िक्र करने की एक और मस्लहत भी है। ऊपर से बात का जो सिलसिला चला आ रहा है उसमें ख़िताब उन लोगों से है जिनसे ईमान के ख़िलाफ़ काम हो रहे थे। इसलिए उनको ईमान की हक़ीक़त और उसका बुनियादी तक़ाज़ा बताने के बाद अब यह ताकीद की जा रही है कि ईमान लानेवालों में लाज़िमी तौर पर जो ख़ूबियाँ होनी चाहिएँ उनमें से सबसे पहली ख़ूबी यह है कि जब भी उनका क़दम बन्दगी की राह से फिसल जाए वे फ़ौरन उसकी तरफ़ पलट आएँ, न यह कि अपने फिसलने पर जमे रहें और ज़्यादा दूर निकलते चले जाएँ।
109. 'अस्ल अरबी में लफ़्ज़ 'अस-साइहून' इस्तेमाल हुआ है जिसका मतलब क़ुरआन के कुछ आलिमों ने रोज़ा रखनेवाले बताया है। लेकिन 'सियाहत' के मानी रोज़ा मजाज़ी (लाक्षणिक) मानी हैं। अस्ल लुग़त (शब्दकोश) में इसके ये मानी नहीं हैं। और जिस हदीस में यह बयान किया गया है कि नबी (सल्ल०) ने ख़ुद इस लफ़्ज़ के ये मानी बताए हैं, इस हदीस को नबी (सल्ल०) से जोड़ना ठीक नहीं है। इसलिए हम इसको अस्ल लुग़वी मानी (शाब्दिक अर्थ) ही में लेना ज़्यादा सही समझते हैं। फिर जिस तरह क़ुरआन में बहुत-से मौक़ों पर ख़ाली इनफ़ाक़ का लफ़्ज़ इस्तेमाल हुआ है, जिसके मानी ख़र्च करने के हैं और मुराद उससे अल्लाह की राह में ख़र्च करना है, उसी तरह यहाँ भी सियाहत से मुराद सिर्फ़ घूमना-फिरना नहीं है, बल्कि ऐसे मक़सदों के लिए ज़मीन में घूमना-फिरना है जो पाक और बुलन्द हों और जिनमें अल्लाह की ख़ुशी चाही गई हो। जैसे दीन को क़ायम करने के लिए जिहाद, जो इलाक़े कुफ़्र की चपेट में आ गए हैं वहाँ से हिजरत, दीन की दावत, लोगों की इस्लाह व सुधार, सही और नेक इल्म की तलब, कायनात में फैली अल्लाह की निशानियों को देखना और उनपर ग़ौर करना और हलाल रिज़्क़ की तलाश। इस सिफ़त को यहाँ ईमानवालों की सिफ़ात में ख़ास तौर पर इसलिए बयान किया गया है कि जो लोग ईमान का दावा करने के बावजूद जिहाद की पुकार पर घरों से नहीं निकलते थे, उनको यह बताया जाए कि सच्चा ईमानवाला ईमान का दावा करके अपनी जगह चैन से बैठा नहीं रह जाता, बल्कि वह ख़ुदा के दीन को क़ुबूल करने के बाद उसका बोलबाला करने के लिए उठ खड़ा होता है और उसके तक़ाज़े पूरे करने के लिए दुनिया में दौड़-धूप और कोशिश करता फिरता है।
110. यानी अल्लाह ने अक़ीदों, इबादतों, अख़लाक़़, रहन-सहन, तमद्दुन, (सभ्यता) मईशत, (आर्थिक मामलों) सियासत, अदालत और सुलह व जंग के मामलों में जो हदें मुक़र्रर कर दी हैं वे उनका पूरी पाबन्दी के साथ लिहाज़ रखते हैं, अपने इनफ़िरादी और इजतिमाई अमल को उन्हीं हदों के अन्दर महदूद रखते हैं, और कभी उनसे आगे बढ़कर न तो मनमानी कार्यवाइयाँ करने लगते हैं और न ख़ुदाई क़ानूनों के बजाय ख़ुद के बनाए हुए क़ानूनों या इनसानी बनावट के दूसरे क़ानूनों को अपनी ज़िन्दगी का नियम और ज़ाबिता बनाते हैं। इसके अलावा ख़ुदा की हदों की हिफ़ाज़त में यह मतलब भी शामिल है कि इन हदों को क़ायम किया जाए और इन्हें टूटने न दिया जाए। इसलिए सच्चे ईमानवालों की तारीफ़ सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि वे ख़ुद अल्लाह की हदों की पाबन्दी करते हैं, बल्कि इससे बढ़कर उनकी यह सिफ़त भी है कि वे दुनिया में अल्लाह की मुक़र्रर की हुई हदों को क़ायम करने की कोशिश करते हैं, उनकी निगहबानी करते हैं और अपना पूरा ज़ोर इसी कोशिश में लगा देते हैं कि ये हदें टूटने न पाएँ।
مَا كَانَ لِلنَّبِيِّ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُوٓاْ أَن يَسۡتَغۡفِرُواْ لِلۡمُشۡرِكِينَ وَلَوۡ كَانُوٓاْ أُوْلِي قُرۡبَىٰ مِنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمۡ أَنَّهُمۡ أَصۡحَٰبُ ٱلۡجَحِيمِ ۝ 106
(113) नबी को और उन लोगों को जो ईमान लाए हैं, उनके लिए मुनासिब नहीं कि मुशरिकों के लिए माफ़ी की दुआ करें, चाहे वे उनके रिश्तेदार ही क्यों न हों, जबकि उनपर यह बात खुल चुकी है कि वे जहन्नम के हक़दार हैं।111
111. किसी शख़्स के लिए माफ़ी की दरख़ास्त लाज़िमी तौर पर यह मानी रखती है कि पहले तो हम उसके साथ हमदर्दी और मुहब्बत रखते हैं। दूसरे यह कि हम उसके क़ुसूर को माफ़ी के क़ाबिल समझते हैं। ये दोनों बातें उस शख़्स के मामले में तो ठीक हैं, जो वफ़ादारों की लिस्ट में शामिल हो और सिर्फ़ गुनाहगार हो। लेकिन जो शख़्स खुला हुआ बाग़ी हो उसके साथ हमदर्दी और मुहब्बत रखना और उसके जुर्म को माफ़ी के क़ाबिल समझना न सिर्फ़ यह कि उसूली तौर पर ग़लत है, बल्कि इससे ख़ुद हमारी अपनी वफ़ादारी शक के घेरे में आ जाती है। और अगर हम सिर्फ़ इस बुनियाद पर कि वह हमारा रिश्तेदार है, यह चाहें कि उसे माफ़ कर दिया जाए, तो इसके मानी ये हैं कि हमारे नज़दीक रिश्तेदारी का ताल्लुक़ ख़ुदा की वफ़ादारी के तक़ाज़ों के मुक़ाबले में ज़्यादा क़ीमती है, और यह कि ख़ुदा और उसके दीन के साथ हमारी मुहब्बत बेलाग नहीं है, और यह कि जो लाग हमने ख़ुदा के बाग़ियों के साथ लगा रखी है हम चाहते हैं कि ख़ुदा ख़ुद भी इसी लाग को क़ुबूल कर ले और हमारे रिश्तेदार को तो ज़रूर बख़्श दे, चाहे इसी जुर्म को करनेवाले दूसरे मुजरिमों को जहन्नम में झोंक दे। ये तमाम बातें ग़लत हैं, इख़लास और वफ़ादारी के ख़िलाफ़ हैं और उस ईमान के मनाफ़ी हैं, जिसका तक़ाज़ा यह है कि ख़ुदा और उसके दीन के साथ हमारी मुहब्बत बिलकुल बेलाग हो, ख़ुदा का दोस्त हमारा दोस्त हो और उसका दुश्मन हमारा दुश्मन। इसी बिना पर अल्लाह ने यह नहीं फ़रमाया कि “मुशरिकों के लिए मग़फ़िरत की दुआ न करो।” बल्कि यूँ फ़रमाया है कि “तुम्हारे लिए यह मुनासिब नहीं है कि तुम इनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करो।” यानी हमारे मना करने से अगर तुम बाज़ रहे तो कुछ बात नहीं, तुममें तो ख़ुद वफ़ादारी का एहसास इतना तेज़ होना चाहिए कि जो हमारा बाग़ी है उसके साथ हमदर्दी रखना और उसके जुर्म को माफ़ी के क़ाबिल समझना तुमको अपने लिए नामुनासिब महसूस हो। यहाँ इतना और समझ लेना चाहिए कि ख़ुदा के बाग़ियों के साथ जिस हमदर्दी से रोका गया है वह सिर्फ़ वह हमदर्दी है जो दीन के मामले में दख़लअन्दाज़ होती हो। रही इनसानी हमदर्दी और दुनियावी ताल्लुक़ात में रिश्ते-नातों का ख़याल रखना, आपसी हमदर्दी और मदद और मुहब्बत और प्यार का बरताव तो इसके लिए कोई रोक-टोक नहीं है, बल्कि यह तो पसन्दीदा है। रिश्तेदार चाहे ग़ैर-मुस्लिम हों या ईमानवाले, उनके दुनियावी हुक़ूक़ ज़रूर अदा किए जाएँगे। मुसीबत के मारे इनसान की बहरहाल मदद की जाएगी। ज़रूरतमन्द आदमी को हर सूरत में सहारा दिया जाएगा। बीमार और ज़ख़्मी के साथ हमदर्दी में कोई कसर उठा न रखी जाएगी। यतीम के सर पर यक़ीनन मुहब्बत का हाथ रखा जाएगा। ऐसे मामलों में हरगिज़ यह फ़र्क़ नहीं किया जाएगा कि कौन मुस्लिम है और कौन ग़ैर-मुस्लिम।
وَمَا كَانَ ٱسۡتِغۡفَارُ إِبۡرَٰهِيمَ لِأَبِيهِ إِلَّا عَن مَّوۡعِدَةٖ وَعَدَهَآ إِيَّاهُ فَلَمَّا تَبَيَّنَ لَهُۥٓ أَنَّهُۥ عَدُوّٞ لِّلَّهِ تَبَرَّأَ مِنۡهُۚ إِنَّ إِبۡرَٰهِيمَ لَأَوَّٰهٌ حَلِيمٞ ۝ 107
(114) इबराहीम ने अपने बाप के लिए जो माफ़ी की दुआ की थी वह तो इस वादे की वजह से थी जो उसने अपने बाप से किया था112, मगर जब उसपर यह बात खुल गई कि उसका बाप अल्लाह का दुश्मन है तो वह उससे बेज़ार हो गया। हक़ यह है कि इबराहीम बड़ा नर्म दिलवाला और अल्लाह से डरनेवाला और बरदाश्त करनेवाला आदमी था।113
112. इशारा है उस बात की तरफ़ जो अपने मुशरिक बाप से ताल्लुक़ात ख़त्म करते हुए हज़रत इबराहीम ने कही थी कि— "आपको सलाम है, मैं आपके लिए अपने रब से दुआ करूँगा कि आपको माफ़ कर दे, वह मेरे ऊपर बहुत ही मेहरबान है।” (क़ुरआन; सूरा-19 मरयम, आयत-47) “मैं आपके लिए माफ़ी ज़रूर चाहूँगा, और मेरे इख़्तियार में कुछ नहीं है कि आपको अल्लाह की पकड़ से बचवालूँ। (क़ुरआन; सूरा-60 मुम्तहिना, आयत-4) चुनाँचे इसी वादे की बुनियाद पर हज़रत इबराहीम ने अपने बाप के लिए यह दुआ माँगी थी कि— "और मेरे बाप को माफ़ कर दे, बेशक वह गुमराह लोगों में से था, और उस दिन मुझे रुस्वा न कर जबकि सब इनसान उठाए जाएँगे, जबकि न माल किसी के कुछ काम आएगा न औलाद, नजात सिर्फ़ वह पाएगा जो अपने ख़ुदा के सामने बग़ावत से पाक दिल लेकर हाज़िर हुआ हो।” (क़ुरआन; सूरा-26 शुअरा, आयत-86 से 89) यह दुआ अव्वल तो ख़ुद बहुत ही एहतियात के साथ की गई थी। मगर इसके बाद जब हज़रत इबराहीम की नज़र उस तरफ़ गई कि मैं जिस शख़्स के लिए दुआ कर रहा हूँ वह तो ख़ुदा का खुल्लम-खुल्ला बाग़ी था और उसके दीन से सख़्त दुश्मनी रखता था, तो वे उससे भी रुक गए और एक सच्चे वफ़ादार ईमानवाले की तरह उन्होंने बाग़ी की हमदर्दी से साफ़-साफ़ अपने को अलग कर लिया, हालाँकि वह बाग़ी उनका बाप था जिसने कभी मुहब्बत से उनको पाला-पोसा था।
113. अस्ल अरबी में 'अव्वाहुन' और 'हलीमुन' के लफ़्ज़ इस्तेमाल हुए हैं। अव्वाहुन के मानी हैं बहुत आहें भरनेवाला, आँसू बहानेवाला, डरनेवाला, हसरत करनेवाला। और हलीम उस शख़्स को कहते हैं जो अपने मिज़ाज पर क़ाबू रखता हो, न ग़ुस्से और दुश्मनी और मुख़ालफ़त में आपे से बाहर हो, न मुहब्बत और दोस्ती और ताल्लुक़ जोड़ने में एतिदाल की हद से आगे बढ़ जाए। ये दोनों लफ़्ज़ इस जगह पर दोहरे मानी दे रहे हैं। हज़रत इबराहीम ने अपने बाप के लिए मग़फ़िरत की दुआ की; क्योंकि वे बहुत ही नर्मदिल आदमी थे, इस ख़याल से काँप उठे थे कि मेरा यह बाप जहन्नम का ईंधन बन जाएगा। और हलीम थे, उस ज़ुल्म और सितम के बावजूद जो उनके बाप ने इस्लाम से उनको रोकने के लिए उन पर ढाया था, उनकी ज़बान उसके हक़ में दुआ ही के लिए खुली। फिर उन्होंने यह देखकर कि उनका बाप ख़ुदा का दुश्मन है उससे अलग हो गए; क्योंकि वे ख़ुदा से डरनेवाले इनसान थे और किसी की मुहब्बत में हद से बढ़ जानेवाले न थे।
وَمَا كَانَ ٱللَّهُ لِيُضِلَّ قَوۡمَۢا بَعۡدَ إِذۡ هَدَىٰهُمۡ حَتَّىٰ يُبَيِّنَ لَهُم مَّا يَتَّقُونَۚ إِنَّ ٱللَّهَ بِكُلِّ شَيۡءٍ عَلِيمٌ ۝ 108
(115) अल्लाह का यह तरीक़ा नहीं है कि लोगों को हिदायत देने के बाद फिर गुमराही में डाल दे जब तक कि उन्हें साफ़-साफ़ बता न दे कि उन्हें किन चीज़ों से बचना चाहिए।114 हक़ीक़त में अल्लाह हर चीज़ का इल्म रखता है।
114. यानी अल्लाह पहले यह बता देता है कि लोगों को किन ख़यालों, किन कामों और किन तरीक़ों से बचना चाहिए। फिर जब वे बाज़ नहीं आते और ग़लत सोचने और ग़लत करने ही पर अड़े रहते हैं तो अल्लाह भी उनकी हिदायत और रहनुमाई से हाथ खींच लेता है और उसी ग़लत राह पर उन्हें धकेल देता है, जिसपर वे ख़ुद जाना चाहते हैं। ख़ुदा का यह फ़रमान एक ऐसा बुनियादी उसूल बयान करता है जिससे क़ुरआन की वे तमाम जगहें अच्छी तरह समझी जा सकती हैं जहाँ हिदायत देने और गुमराह करने के काम को अल्लाह ने अपने से जोड़ा है। ख़ुदा का हिदायत देना यह है कि वह सोचने और अमल का सही तरीक़ा अपने नबियों और अपनी किताबों के ज़रिए से लोगों के सामने वाज़ेह तौर पर पेश कर देता है, फिर जो लोग इस तरीक़े पर ख़ुद चलने के लिए आमादा हों उन्हें उसका मौक़ा बख़्शता है। और ख़ुदा का गुमराही में डालना यह है कि जो सोचने और काम करने का सही तरीक़ा उसने बता दिया है अगर उसके ख़िलाफ़ चलने ही पर कोई अड़ा रहे और सीधा न चलना चाहे तो ख़ुदा उसको ज़बरदस्ती सही रास्ते को देखनेवाला और सही रास्ते पर चलनेवाला नहीं बनाता, बल्कि जिधर वह ख़ुद जाना चाहता है उसी तरफ़ उसको जाने का मौक़ा दे देता है। बात का जो ख़ास सिलसिला चला आ रहा है उसमें यह बात जिस ताल्लुक़ से बयान हुई है वह पिछली तक़रीर और बाद की तक़रीर पर ग़ौर करने से आसानी के साथ समझ में आ सकती है। यह एक तरह का ख़बरदार करना है जो बहुत ही मुनासिब तरीक़े से पिछले बयान का ख़ातिमा भी ठहराया जा सकता है और आगे जो बयान आ रहा है उसकी शुरुआत भी।
إِنَّ ٱللَّهَ لَهُۥ مُلۡكُ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلۡأَرۡضِۖ يُحۡيِۦ وَيُمِيتُۚ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ ٱللَّهِ مِن وَلِيّٖ وَلَا نَصِيرٖ ۝ 109
(116) और यह भी सच है कि अल्लाह ही के क़ब्ज़े में आसमानों और ज़मीन की सल्तनत है, उसी के इख़्तियार में ज़िन्दगी और मौत है, और तुम्हारा कोई हिमायती व मददगार ऐसा नहीं है जो तुम्हें उससे बचा सके।
لَّقَد تَّابَ ٱللَّهُ عَلَى ٱلنَّبِيِّ وَٱلۡمُهَٰجِرِينَ وَٱلۡأَنصَارِ ٱلَّذِينَ ٱتَّبَعُوهُ فِي سَاعَةِ ٱلۡعُسۡرَةِ مِنۢ بَعۡدِ مَا كَادَ يَزِيغُ قُلُوبُ فَرِيقٖ مِّنۡهُمۡ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡۚ إِنَّهُۥ بِهِمۡ رَءُوفٞ رَّحِيمٞ ۝ 110
(117) अल्लाह ने माफ़ कर दिया नबी को और उन मुहाजिरीन और अनसार को जिन्होंने बड़ी तंगी के वक़्त में नबी का साथ दिया।115 हालाँकि इनमें से कुछ लोगों के दिल टेढ़ की तरफ़ झुक चले थे116, (मगर जब वे इस टेढ़ के पीछे न चले, बल्कि नबी का साथ ही दिया तो) अल्लाह ने उन्हें माफ़ कर दिया।117 बेशक उसका मामला इन लोगों के साथ मुहब्बत और मेहरबानी का है
115. यानी तबूक की मुहिम के सिलसिले में जो छोटी-छोटी ग़लतियाँ नबी (सल्ल०) और आप के सहाबा से हुईं उन सबको अल्लाह ने उनकी बड़ी-बड़ी ख़िदमतों का लिहाज़ करते हुए माफ़ कर दिया। नबी (सल्ल०) से जो चूक हुई थी उसका ज़िक्र आयत-43 में गुज़र चुका है, यानी यह कि जिन लोगों ने ताक़त रखने के बावजूद जंग से पीछे रह जाने की इजाज़त माँगी थी, उनको आप (सल्ल०) ने इजाज़त दे दी थी।
116. यानी कुछ सच्चे सहाबा भी इस सख़्त वक़्त में जंग पर जाने से किसी-न-किसी हद तक जी चुराने लगे थे, मगर चूँकि उनके दिलों में ईमान था और वे सच्चे दिल से दीने-हक़ के साथ मुहब्बत रखते थे, इसलिए आख़िरकार उन्होंने अपनी इस कमज़ोरी पर काबू पा लिया।
117. यानी अब अल्लाह इस बात पर उनकी पकड़ न करेगा कि उनके दिलों में टेढ़ की तरफ़ यह झुकाव क्यों पैदा हुआ था, इसलिए कि अल्लाह उस कमज़ोरी पर पकड़ नहीं करता जिसे इनसान ने ख़ुद सुधार लिया हो।
وَعَلَى ٱلثَّلَٰثَةِ ٱلَّذِينَ خُلِّفُواْ حَتَّىٰٓ إِذَا ضَاقَتۡ عَلَيۡهِمُ ٱلۡأَرۡضُ بِمَا رَحُبَتۡ وَضَاقَتۡ عَلَيۡهِمۡ أَنفُسُهُمۡ وَظَنُّوٓاْ أَن لَّا مَلۡجَأَ مِنَ ٱللَّهِ إِلَّآ إِلَيۡهِ ثُمَّ تَابَ عَلَيۡهِمۡ لِيَتُوبُوٓاْۚ إِنَّ ٱللَّهَ هُوَ ٱلتَّوَّابُ ٱلرَّحِيمُ ۝ 111
(118) और उन तीनों को भी उसने माफ़ किया जिनके मामले को टाल दिया गया था।118 जब ज़मीन अपने सारे फैलाव के बावजूद उनपर तंग हो गई और उनकी जानें भी उनपर बोझ होने लगीं और उन्होंने जान लिया कि अल्लाह से बचने के लिए कोई पनाहगाह ख़ुद अल्लाह ही की रहमत के दामन के सिवा नहीं है, तो अल्लाह अपनी मेहरबानी से उनकी तरफ़ पलटा, ताकि वे उसकी तरफ़ पलट आएँ यक़ीनन वह बड़ा माफ़ करनेवाला और रहम करनेवाला है।119
118. नबी (सल्ल०) जब तबूक से मदीना वापस आए तो वे लोग मजबूरी बयान करने के लिए हाज़िर हुए जो पीछे रह गए थे। उनमें 80 से कुछ ज़्यादा मुनाफ़िक़ थे और तीन सच्चे ईमानवाले भी थे। मुनाफ़िक़ झूठे बहाने पेश करते गए और नबी (सल्ल०) उनकी मजबूरी क़ुबूल करते चले गए। फिर इन तीनों की बारी आई और इन्होंने साफ़-साफ़ अपनी ग़लतियों को मान लिया। नबी (सल्ल०) ने इन तीनों के मामले में फ़ैसले को आगे के लिए टाल दिया और आम मुसलमानों को हुक्म दे दिया कि जब तक अल्लाह का हुक्म न आए इनसे किसी तरह का समाजी ताल्लुक़ न रखा जाए। इसी मामले का फ़ैसला करने के लिए यह आयत नाज़िल हुई। जल (यहाँ यह बात सामने रहे कि इन तीन सहाबियों का मामला उन सात सहाबियों से अलग है, जिनका ज़िक्र हाशिया-99 में गुज़र चुका है। उन्होंने पूछताछ से पहले ख़ुद अपने आपको सज़ा दे ली थी।)
119. ये तीनों सहाबी कअब-बिन-मालिक, हिलाल-बिन-उमैया और मुरारह-बिन-रुबैअ थे। जैसा कि ऊपर हम बयान कर चुके हैं तीनों सच्चे मोमिन थे। इससे पहले अपने इख़लास का बहुत बार सुबूत दे चुके थे। क़ुरबानियाँ कर चुके थे। आख़िर के दो सहाबी तो बद्र की लड़ाई में शरीक होनेवालों में से थे, जिनका सच्चा ईमान हर शक और शुब्हे से परे था। और पहले सहाबी हालाँकि बद्र की लड़ाई में शरीक नहीं थे, लेकिन बद्र के सिवा हर लड़ाई में नबी (सल्ल०) के साथ रहे। इन ख़िदमात के बावजूद जो सुस्ती इस नाज़ुक मौक़े पर, जबकि तमाम जंग के क़ाबिल ईमानवालों को जंग के लिए निकल आने का हुक्म दिया गया था, इन लोगों ने दिखाई उसपर सख़्त पकड़ की गई। नबी (सल्ल०) ने तबूक से वापस आकर मुसलमानों को हुक्म दे दिया कि कोई इनसे सलाम-कलाम न करे। 40 दिन के बाद उनकी बीवियों को भी उनसे अलग रहने की ताकीद कर दी गई। सच तो यह है कि मदीना की बस्ती में उनकी वही हालत हो गई थी, जिसकी तस्वीर इस आयत में खींची गई है। आख़िरकार जब इनके बॉइकाट को पचास (50) दिन हो गए तब माफ़ी का यह हुक्म नाज़िल हुआ। इन तीनों सहाबियों में से हज़रत कअब-बिन-मालिक ने अपना क़िस्सा बहुत तफ़सील के साथ बयान किया है जो बहुत ही सबक़आमोज़ (शिक्षाप्रद) है। अपने बुढ़ापे के ज़माने में जबकि वे नाबीना (नेत्रहीन) हो चुके थे, उन्होंने अपने बेटे अब्दुल्लाह से जो उनका हाथ पकड़कर उन्हें चलाया करते थे, यह क़िस्सा ख़ुद बयान किया— "तबूक की मुहिम की तैयारी ज़माने में नबी (सल्ल०) जब कभी मुसलमानों से जंग में शिरकत की अपील करते थे, मैं अपने दिल में इरादा कर लेता था कि चलने की तैयारी करूँगा, मगर फिर वापस आकर सुस्ती कर जाता था और कहता था कि अभी क्या है, जब चलने का वक़्त आएगा तो तैयार होते क्या देर लगती है। इसी तरह बात टलती रही, यहाँ तक कि लश्कर की रवानगी का वक़्त आ गया और मैं तैयार न था। मैंने दिल में कहा कि लश्कर को चलने दो, मैं एक-दो दिन बाद रास्ते ही में उससे जा मिलूँगा। मगर फिर वही सुस्ती रुकावट बनी, यहाँ तक कि वक़्त निकल गया। उस ज़माने में जबकि मैं मदीना में रहा मेरा दिल यह देख-देखकर बेहद कुढ़ता था कि मैं पीछे जिन लोगों के साथ रह गया हूँ वे या तो मुनाफ़िक़ हैं या वे बूढ़े और मजबूर लोग जिनको अल्लाह ने कमज़ोर और बेबस रखा है। जब नबी (सल्ल०) तबूक से वापस आ गए तो मामूल के मुताबिक़ आप (सल्ल०) ने पहले मस्जिद आकर दो रकअत नमाज़ पढ़ी, फिर लोगों से मुलाक़ात के लिए बैठे। इस मजलिस में मुनाफ़िक़ों ने आ-आकर झूठे बहाने लम्बी-चौड़ी क़समों के साथ पेश करने शुरू किए। ये 80 से ज़्यादा आदमी थे। नबी (सल्ल०) ने उनमें से एक-एक की बनावटी बातें सुनीं। उनके ज़ाहिरी बहानों को क़ुबूल कर लिया और उनके बातिन (अन्दरून) को ख़ुदा पर छोड़कर फ़रमाया, ख़ुदा तुम्हें माफ़ करे। फिर मेरी बारी आई। मैंने आगे बढ़कर सलाम किया। आप मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए और फ़रमाया, “तशरीफ़ लाइए! आपको किस चीज़ ने रोका था?” मैंने कहा कि “ख़ुदा की क़सम, अगर मैं दुनियावालों में से किसी के सामने हाज़िर हुआ होता तो ज़रूर कोई न कोई बात बनाकर उसको राज़ी करने की कोशिश करता, बातें बनानी मुझे भी आती हैं, मगर मैं आपके बारे में यक़ीन रखता हूँ कि अगर इस वक़्त कोई झूठा बहाना पेश करके मैंने आपको राज़ी कर भी लिया तो अल्लाह ज़रूर आपको मुझसे फिर नाराज़ कर देगा। अलबत्ता अगर सच कहूँ तो चाहे आप नाराज़ ही क्यों न हों, मुझे उम्मीद है कि अल्लाह मेरे लिए माफ़ी की कोई सूरत पैदा फ़रमा देगा। सच्ची बात यह है कि मेरे पास कोई बहाना नहीं है जिसे पेश कर सकूँ, मैं जाने पर पूरी क़ुदरत रखता था।” इसपर नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया, “यह शख़्स है जिसने सच्ची बात कही। अच्छा, उठ जाओ और इन्तिज़ार करो यहाँ तक कि अल्लाह तुम्हारे मामले में कोई फ़ैसला करे।” मैं उठा और अपने क़बीले के लोगों में जा बैठा। यहाँ सब-के-सब मेरे पीछे पड़ गए और मुझे बहुत मलामत की कि तूने कोई बहाना क्यों न कर दिया। ये बातें सुनकर मेरा मन भी कुछ आमादा होने लगा कि फिर हाज़िर होकर कोई बात बना दूँ। मगर जब मुझे मालूम हुआ कि दो और नेक आदमियों (मुरारा-बिन-रुबैअ और हिलाल-बिन-उमैया) ने भी वही सच्ची बात कही है जो मैंने कही थी, तो मुझे तसल्ली हो गई और मैं अपनी सच्चाई पर जमा रहा। उसके बाद नबी (सल्ल०) ने आम हुक्म दे दिया कि हम तीनों आदमियों से कोई बात न करे। वे दोनों तो घर बैठ गए, मगर में निकलता था, जमाअत के साथ नमाज़ पढ़ता था, बाज़ारों में चलता-फिरता था और कोई मुझसे बात न करता था। ऐसा मालूम होता था कि यह ज़मीन बिलकुल बदल गई है, मैं यहाँ अजनबी हूँ और इस बस्ती में कोई भी मेरा जानकार नहीं मस्जिद में नमाज़ के लिए जाता तो आम दिनों की तरह नबी (सल्ल०) को सलाम करता था, मगर बस इन्तिज़ार ही करता रह जाता था कि जवाब के लिए आप (सल्ल०) के होंठ हिलें। नमाज़ में नज़रें चुराकर नबी (सल्ल०) को देखता था कि आप (सल्ल०) की निगाहें मुझपर कैसी पड़ती हैं। मगर वहाँ हाल यह था कि जब तक मैं नमाज़ पढ़ता आप (सल्ल०) मेरी तरफ़ देखते रहते, और जहाँ मैंने सलाम फेरा कि आप (सल्ल०) ने मेरी तरफ़ से नज़र हटाई। एक दिन मैं घबराकर अपने चचेरे भाई और बचपन के दोस्त अबू-क़तादा के पास गया और उनके बाग़ की दीवार पर चढ़कर उन्हें सलाम किया। मगर उस अल्लाह के बन्दे ने सलाम का जवाब तक न दिया। मैंने कहा, “अबू-क़तादा! मैं तुमको ख़ुदा की क़सम देकर पूछता हूँ, क्या मैं उसके रसूल से मुहब्बत नहीं रखता?” वे ख़ामोश रहे। मैंने फिर पूछा। वे फिर ख़ामोश रहे। तीसरी बार जब मैंने क़सम देकर यही सवाल किया तो उन्होंने बस इतना कहा कि “अल्लाह और उसका रसूल ही बेहतर जानता है।” इसपर मेरी आँखों से आँसू निकल आए और मैं दीवार से उतर आया। उन्हीं दिनों एक बार मैं बाज़ार से गुज़र रहा था कि शाम के नबतियों में से एक शख़्स मुझे मिला और उसने ग़स्सान के बादशाह का ख़त रेशम में लिपटा हुआ मुझे दिया। मैंने खोल कर पढ़ा तो उसमें लिखा था कि “हमने सुना है तुम्हारे साहिब ने तुमपर सितम तोड़ रखा है, तुम कोई गिरे-पड़े आदमी नहीं हो, न इस लायक़ हो कि तुम्हें खो दिया जाए, हमारे पास आ जाओ, हम तुम्हारी क़द्र करेंगे। मैंने कहा, यह एक और बला नाज़िल हुई, और उसी वक़्त उस ख़त को चूल्हे में झोंक दिया। चालीस दिन इस हालत पर गुज़र चुके थे कि नबी (सल्ल०) का आदमी हुक्म लेकर आया कि अपनी बीवी से भी अलग हो जाओ। मैंने पूछा, क्या तलाक़ दे दूँ? जवाब मिला, नहीं, बस अलग रहो। चुनाँचे मैंने अपनी बीवी से कह दिया कि तुम अपने मायके चली जाओ और इन्तिज़ार करो, यहाँ तक कि अल्लाह इस मामले का फ़ैसला कर दे। पचासवें दिन सुबह की नमाज़ के बाद मैं अपने मकान की छत पर बैठा हुआ था और अपनी जान से बेज़ार हो रहा था कि अचानक किसी शख़्स ने पुकारकर कहा, “मुबारक हो कअब-बिन-मालिक!” मैं यह सुनते ही सजदे में गिर गया और मैंने जान लिया कि मेरी माफ़ी का हुक्म हो गया है। फिर तो फ़ौज-दर-फ़ौज लोग भागे चले आ रहे थे और हर एक-दूसरे से पहले पहुँचकर मुझको मुबारकबाद दे रहा था कि तेरी तौबा क़ुबूल हो गई। मैं उठा और सीधा मस्जिदे-नबवी की तरफ़ चला। देखा कि नबी (सल्ल०) का चेहरा ख़ुशी से दमक रहा है। मैंने सलाम किया तो फ़रमाया, “तुझे मुबारक हो, यह दिन तेरी ज़िन्दगी में सबसे बेहतर है।” मैंने पूछा, यह माफ़ी नबी (सल्ल०) की तरफ़ से है या अल्लाह की तरफ़ से? फ़रमाया, अल्लाह की तरफ़ से, और ये आयतें सुनाईं। मैंने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल, मेरी तौबा में यह भी शामिल है कि मैं अपना सारा माल अल्लाह के रास्ते में सदक़ा कर दूँ। फ़रमाया कि “कुछ रहने दो कि यह तुम्हारे लिए बेहतर है।” मैंने इस हिदायत के मुताबिक़ अपना ख़ैबर का हिस्सा रख लिया। बाक़ी सब सदक़ा कर दिया। फिर मैंने अल्लाह से अह्द किया कि जिस सच्ची बात के कहने के बदले में अल्लाह ने मुझे माफ़ी दी है उसपर तमाम उमर क़ायम रहूँगा, चुनाँचे आज तक मैंने कोई बात जान-बूझकर सच्चाई के ख़िलाफ़ नहीं कही और अल्लाह से उम्मीद रखता हूँ कि आगे भी मुझे इससे बचाएगा।" यह क़िस्सा अपने अन्दर बहुत-से सबक़ रखता है जो हर ईमानवाले के दिल में नक़्श होने चाहिएँ— सबसे पहली बात तो इससे यह मालूम हुई कि कुफ़्र और इस्लाम की कशमकश का मामला कितना अहम और कितना नाज़ुक है कि इस कशमकश में कुफ़्र का साथ देना तो बहुत दूर की बात, जो शख़्स इस्लाम का साथ देने में, बदनीयती से भी नहीं नेक नीयती से, तमाम उम्र भी नहीं किसी एक मौक़े ही पर, कोताही बरत जाता है उसकी भी ज़िन्दगी भर की इबादत गुज़ारियाँ और दीनदारियाँ ख़तरे में पड़ जाती हैं, यहाँ तक कि ऐसे बड़े-बड़े इज़्ज़तदार लोग भी गिरफ़्त से नहीं बचते जो बद्र व उहुद और अहज़ाब व हुनैन की सख़्त लड़ाइयों में जाँबाज़ी के जौहर दिखा चुके थे और जिनके इख़लास और ईमान में ज़र्रा बराबर भी शक नहीं था। दूसरी बात जो इससे कुछ कम अहम नहीं, यह है कि फ़र्ज़ के अदा करने में सुस्ती दिखाना कोई मामूली चीज़ नहीं है, बल्कि कई बार सिर्फ़ सुस्ती ही सुस्ती में आदमी कोई ऐसी ग़लती कर जाता है जिसकी गिनती बड़े गुनाहों में होती है, और उस वक़्त यह बात उसे पकड़ से नहीं बचा सकती कि उसने उस ग़लती को बदनीयती से नहीं किया था। फिर यह क़िस्सा उस समाज की रूह को बड़ी ख़ूबी के साथ हमारे सामने बेनक़ाब करता है जो नबी (सल्ल०) की अगुवाई में बना था। एक तरफ़ मुनाफ़िक़ हैं जिनकी ग़द्दारियाँ सबपर खुली हुई हैं, मगर उनकी ज़ाहिरी बहानेबाज़ियाँ सुन ली जाती हैं और उनको माफ़ कर दिया जाता है; क्योंकि उनसे ख़ुलूस की उम्मीद ही कब थी कि अब उसके न होने की शिकायत की जाती। दूसरी तरफ़ एक आज़माया हुआ मोमिन है जिसकी जाँनिसारी पर शुब्हे तक की गुंजाइश नहीं, और वह झूठी बातें भी नहीं बनाता, साथ-साथ ग़लतियों को मान लेता है मगर उसपर ग़ज़ब की बारिश बरसा दी जाती है, न इस वजह से कि उसके मोमिन होने में कोई शुब्हा हो गया है, बल्कि इस वजह से कि मोमिन होकर उसने वह काम क्यों किया जो मुनाफ़िक़ों के करने का था। मतलब यह था कि ज़मीन के नमक तो तुम हो, तुमसे भी अगर नमकीनी हासिल न हुई तो फिर और नमक कहाँ से आएगा। फिर मज़े की बात यह है कि इस सारे मामले में लीडर जिस शान से सज़ा देता है और लीडर की पैरवी करनेवाला जिस शान से इस सज़ा को भुगतता है, और पूरी जमाअत जिस शान से इस सज़ा को लागू करती है, उसका हर पहलू बेमिसाल है और यह फ़ैसला करना मुश्किल हो जाता है कि किसकी ज़्यादा तारीफ़ की जाए। लीडर बहुत ही सख़्त सज़ा दे रहा है मगर ग़ुस्से और नफ़रत के साथ नहीं, गहरी मुहब्बत के साथ दे रहा है। बाप की तरह ग़ुस्सैल निगाहों का एक गोशा हर वक्त यह ख़बर दिए जाता है कि तुझसे दुश्मनी नहीं है, बल्कि तेरी ग़लती पर तेरी ही वजह से दिल दुखा है। तू ठीक हो जाए तो यह सीना तुझे चिमटा लेने के लिए बेचैन है। पैरौ सज़ा की सख़्ती पर तड़प रहा है मगर सिर्फ़ यही नहीं कि उसका क़दम इताअत के रास्ते से एक पल के लिए भी नहीं डगमगाता, और सिर्फ़ यही नहीं कि उसपर गुरूरे-नफ़्स और हमीयते-जाहिलिया (अज्ञानपूर्ण पक्षपात) का कोई दौरा नहीं पड़ता और खुल्लम-खुल्ला तकब्बुर पर उतर आना तो दूर की बात, वह दिल में अपने महबूब लीडर के ख़िलाफ़ कोई शिकायत तक नहीं आने देता, बल्कि इसके बरख़िलाफ़ वह लीडर की मुहब्बत में और ज़्यादा डूब गया है। सज़ा के इन पूरे पचास दिनों में उसकी नज़रें सबसे ज़्यादा बेताबी के साथ जिस चीज़ की तलाश में रहीं वह यह थी कि सरदार की आँखों में थोड़ी-सी भी तवज्जोह बाक़ी है या नहीं जो उसकी उम्मीदों का आख़िरी सहारा है। मानो वह एक सूखे का मारा किसान था जिसकी उम्मीद का सारा सरमाया बस एक ज़रा-सी वह बदली थी जो आसमान के किनारे पर नज़र आती थी। फिर जमाअत को देखिए तो उसके डिसिप्लिन और उसकी नेक अख़लाक़ी स्प्रिट पर इनसान हैरान रह जाता है। डिसिप्लिन का यह हाल कि उधर लीडर की ज़बान से बायकॉट का हुक्म निकला, इधर पूरी जमाअत ने मुजरिम से निगाहें फेर लीं। सबके सामने तो बहुत दूर की बात, तनहाई तक में भी कोई क़रीब-से-क़रीब रिश्तेदार और कोई गहरे-से-गहरा दोस्त भी उससे बात नहीं करता। बीवी तक उससे अलग हो जाती है। ख़ुदा का वास्ता दे-देकर पूछता है कि मेरे ख़ुलूस में तो तुमको शक नहीं है, मगर वे लोग भी जो मुद्दत से इसको सच्चा और मुख़लिस जानते थे, साफ़ कह देते हैं कि हम से नहीं, अल्लाह और उसके रसूल से अपने ख़ुलूस की सनद हासिल करो। दूसरी तरफ़ अख़लाक़ी स्प्रिट इतनी बुलन्द और पाकीज़ा कि एक शख़्स की चढ़ी हुई कमान उतरते ही मुर्दार खानेवालों का कोई गरोह उसका गोश्त नोचने और उसे फाड़ खाने के लिए नहीं लपकता, बल्कि सज़ा के इस पूरे ज़माने में जमाअत का एक-एक आदमी अपने इस सज़ा में गिरफ़्तार भाई की मुसीबत पर रंजीदा और उसको फिर से उठाकर गले लगा लेने के लिए बेताब रहता है और माफ़ी का एलान होते ही लोग दौड़ पड़ते हैं कि जल्दी-से-जल्दी पहुँचकर उससे मिलें और उसे ख़ुशख़बरी पहुँचाएँ। यह नमूना है उस नेक समाज का जिसे क़ुरआन दुनिया में क़ायम करना चाहता है। इस पसमंज़र (पृष्ठभूमि) में जब हम इस आयत को देखते हैं तो हमपर यह बात वाज़ेह हो जाती है कि इन सहाबियों को अल्लाह के दरबार से जो माफ़ी मिली है और इस माफ़ी के अन्दाज़े-बयान में जो रहमत व शफ़क़त टपकी पड़ रही है, इसकी वजह उनका वह इख़्लास है जिसका सुबूत उन्होंने पचास दिन की सख़्त सज़ा के दौरान में दिया था। अगर क़ुसूर करके वे अकड़ते और अपने लीडर की नाराज़ी का जवाब ग़ुस्से और दुश्मनी से देते और सज़ा मिलने पर इस तरह बिफरते जिस तरह किसी ख़ुदपरस्त इनसान का ग़ुरूरे-नफ़्स ज़ख़्म खाकर बिफरा करता है, और बायकॉट के दौरान में उनका तर्ज़े-अमल यह होता कि हमें जमाअत से कट जाना गवारा है, मगर अपनी ख़ुदी के बुत पर चोट खाना गवारा नहीं है, और अगर यह सज़ा का पूरा ज़माना वे इस दौड़-धूप में गुज़ारते कि जमाअत के अन्दर बददिली न फैलाएँ और बददिल लोगों को ढूँढ़-ढूँढ़कर अपने साथ मिलाएँ ताकि एक जत्था तैयार हो, तो माफ़ी कैसी, उन्हें तो बिल-यक़ीन (निश्चित रूप से) जमाअत से काटकर फेंका जाता और इस सज़ा के बाद उनकी अपनी मुँह माँगी सज़ा उनको दी जाती कि जाओ अब अपनी ख़ुदी के बुत ही को पूजते रहो, हक़ का कलिमा बुलन्द करने की जिद्दो-जुह्द में हिस्सा लेने की नेकी अब तुम्हारे नसीब में कभी न आएगी। लेकिन इन तीनों साहबों ने इस कड़ी आज़माइश के मौक़े पर यह रास्ता इख़्तियार नहीं किया, अगरचे यह भी उनके लिए खुला हुआ था। इसके बरअक्स उन्होंने वह रवैया अपनाया जो आप अभी देख आए हैं। इस रवैये को इख़्तियार करके उन्होंने साबित कर दिया कि ख़ुदा-परस्ती ने उनके सीने में कोई बुत बाक़ी नहीं छोड़ा है जिसे वे पूजें, और अपनी पूरी शख़्सियत को उन्होंने ख़ुदा की राह की जिद्दो-जुह्द में झोंक दिया है और वे अपनी वापसी की कश्तियाँ इस तरह जलाकर इस्लामी जमाअत में आए हैं कि अब यहाँ से पलटकर कहीं और नहीं जा सकते। यहाँ की ठोकरें खाएँगे, मगर यहीँ मरेंगे और खपेंगे। किसी दूसरी जगह बड़ी-से-बड़ी इज़्ज़त भी मिलती हो तो यहाँ की ज़िल्लत छोड़कर उसे लेने न जाएँगे। इसके बाद अगर उन्हें उठाकर सीने से न लगा लिया जाता तो और क्या किया जा सकता था। यही वजह है कि अल्लाह तआला ने उनकी माफ़ी का ज़िक्र ऐसे शफ़क़त भरे अन्दाज़ में किया था कि “हम उनकी तरफ़ पलटे ताकि वे हमारी तरफ़ पलट आएँ।” इन कुछ लफ़्ज़ों में इस हालत की तस्वीर खींच दी गई है कि आक़ा ने पहले तो इन बन्दों से नज़र फेर ली थी, मगर जब वे भागे नहीं, बल्कि उदास होकर उसी दर पर बैठ गए तो उनकी वफ़ादारी की शान देखकर आक़ा से ख़ुद रहा न गया। मुहब्बत के जोश से बेक़रार होकर वह आप निकल आया ताकि उन्हें दरवाज़े से उठा लाए।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ ٱتَّقُواْ ٱللَّهَ وَكُونُواْ مَعَ ٱلصَّٰدِقِينَ ۝ 112
(119) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! अल्लाह से डरो और सच्चे लोगों का साथ दो।
مَا كَانَ لِأَهۡلِ ٱلۡمَدِينَةِ وَمَنۡ حَوۡلَهُم مِّنَ ٱلۡأَعۡرَابِ أَن يَتَخَلَّفُواْ عَن رَّسُولِ ٱللَّهِ وَلَا يَرۡغَبُواْ بِأَنفُسِهِمۡ عَن نَّفۡسِهِۦۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمۡ لَا يُصِيبُهُمۡ ظَمَأٞ وَلَا نَصَبٞ وَلَا مَخۡمَصَةٞ فِي سَبِيلِ ٱللَّهِ وَلَا يَطَـُٔونَ مَوۡطِئٗا يَغِيظُ ٱلۡكُفَّارَ وَلَا يَنَالُونَ مِنۡ عَدُوّٖ نَّيۡلًا إِلَّا كُتِبَ لَهُم بِهِۦ عَمَلٞ صَٰلِحٌۚ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يُضِيعُ أَجۡرَ ٱلۡمُحۡسِنِينَ ۝ 113
(120) मदीना के रहनेवालों और आस-पास के बद्दुओं के लिए यह हरगिज़ मुनासिब न था कि अल्लाह के रसूल को छोड़कर घर बैठे रहते और उसकी तरफ़ से बेपरवाह होकर अपने-अपने नफ़्स (जान) की फ़िक्र में लग जाते। इसलिए कि ऐसा कभी न होगा कि अल्लाह की राह में भूख-प्यास और जिस्मानी मशक़्क़त की कोई तकलीफ़ वे झेलें और हक़ के इनकारियों को जो राह नापसन्द है उसपर कोई क़दम वे उठाएँ, और किसी दुश्मन से (हक़ की दुश्मनी का) कोई बदला वे लें और उसके बदले उनके हक़ में एक नेक अमल न लिखा जाए। यक़ीनन अल्लाह के यहाँ बेहतरीन काम करनेवालों का मेहनताना मारा नहीं जाता है।
وَلَا يُنفِقُونَ نَفَقَةٗ صَغِيرَةٗ وَلَا كَبِيرَةٗ وَلَا يَقۡطَعُونَ وَادِيًا إِلَّا كُتِبَ لَهُمۡ لِيَجۡزِيَهُمُ ٱللَّهُ أَحۡسَنَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ ۝ 114
(121) इसी तरह यह भी कभी न होगा कि (अल्लाह के रास्ते में) थोड़ा या बहुत कोई ख़र्च वे उठाएँ और (जिहाद की कोशिश में) कोई घाटी वे पार करें और उनके हक़ में उसे लिख न लिया जाए, ताकि अल्लाह उनके इस अच्छे कारनामे का बदला उन्हें दे।
۞وَمَا كَانَ ٱلۡمُؤۡمِنُونَ لِيَنفِرُواْ كَآفَّةٗۚ فَلَوۡلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرۡقَةٖ مِّنۡهُمۡ طَآئِفَةٞ لِّيَتَفَقَّهُواْ فِي ٱلدِّينِ وَلِيُنذِرُواْ قَوۡمَهُمۡ إِذَا رَجَعُوٓاْ إِلَيۡهِمۡ لَعَلَّهُمۡ يَحۡذَرُونَ ۝ 115
(122) और यह कुछ ज़रूरी न था कि ईमानवाले सारे-के-सारे ही निकल खड़े होते, मगर ऐसा क्यों न हुआ कि उनकी आबादी के हर हिस्से में से कुछ लोग निकलकर आते और दीन की समझ पैदा करते और वापस जाकर अपने इलाक़े के बाशिन्दों को ख़बरदार करते, ताकि वे (ग़ैर-इस्लामी रवैये से) परहेज़ करते।120
120. इस आयत का मंशा समझने के लिए इसी सूरा की आयत-97 सामने रखनी चाहिए जिसमें फ़रमाया गया है कि— "बदवी अरब कुफ़्र व निफ़ाक़ में ज़्यादा सख़्त हैं और उनके मामले में इस बात के इमकान ज़्यादा हैं कि उस दीन की हदों से अनजान रहें जो अल्लाह ने अपने रसूल पर नाज़िल किया है।" वहाँ सिर्फ़ इतनी बात बयान करने को काफ़ी समझा गया था कि दारुल-इस्लाम की देहाती आबादी का बड़ा हिस्सा निफ़ाक़ के रोग में इस वजह से गिरफ़्तार है कि ये सारे-के-सारे लोग जहालत में पड़े हुए हैं, इल्म के मर्कज़ से जुड़े न होने और इल्म रखनेवालों का साथ मयस्सर न आने की वजह से अल्लाह के दीन की हदें उनको मालूम नहीं हैं। अब यह फ़रमाया जा रहा है कि देहाती आबादियों को इस हालत में पड़ा न रहने दिया जाए, बल्कि उनकी जहालत को दूर करने और उनके अन्दर इस्लामी शुऊर पैदा करने का अब बाक़ायदा इन्तिज़ाम होना चाहिए। इस मक़सद के लिए यह कुछ ज़रूरी नहीं है कि तमाम देहाती अरब अपने-अपने घरों से निकल-निकलकर मदीने आ जाएँ और यहाँ इल्म हासिल करें। इसके बजाय होना यह चाहिए कि हर देहाती इलाक़े और हर बस्ती और क़बीले से कुछ आदमी निकलकर इल्म के मर्कज़ों, जैसे मदीना और मक्का और ऐसे ही दूसरी जगहों में आएँ और यहाँ दीन की समझ पैदा करें, फिर अपनी-अपनी बस्तियों में वापस जाएँ और आम लोगों के अन्दर बेदारी फैलाने की कोशिश करें। यह एक बहुत ही अहम हिदायत थी जो इस्लामी तहरीक (आन्दोलन) को मज़बूत करने के लिए ठीक मौक़े पर दी गई। शुरू में जबकि इस्लाम अरब में बिलकुल नया-नया था और बहुत ही सख़्त मुख़ालफ़त के माहौल में धीरे-धीरे फैल रहा था, इस हिदायत की कोई ज़रूरत न थी, क्योंकि उस वक़्त तो इस्लाम क़ुबूल करता ही वह शख़्स था जो पूरी तरह उसे समझ लेता था और हर पहलू से उसको जाँच-परख कर इत्मीनान कर लेता था। मगर जब यह तहरीक कामयाबी के मरहलों में दाख़िल हुई और ज़मीन में उसका इक़तिदार क़ायम हो गया तो आबादियाँ-की-आबादियाँ, फ़ौज-की-फ़ौज इसमें शामिल होने लगीं, जिनके अन्दर कम लोग ऐसे थे जो इस्लाम को उसके तमाम तक़ाज़ों के साथ समझ-बूझकर इसपर ईमान लाते थे। वरना ज़्यादातर लोग सिर्फ़ वक़्त के सैलाब में बे-समझे-बूझे बहे चले आ रहे थे। नव मुस्लिम आबादी का यह तेज़ रफ़्तार फैलाव बज़ाहिर तो इस्लाम के लिए ताक़त पहुँचाने का काम कर रहा था, क्योंकि इस्लाम की पैरवी करनेवालों की तादाद बढ़ रही थी, लेकिन हक़ीक़त में इस्लामी निज़ाम के लिए ऐसी आबादी किसी काम की न थी, बल्कि उलटी नुक़सानदेह थी जो इस्लाम के शुऊर से ख़ाली हो और इस निज़ाम की अख़लाक़ी माँगों को पूरी करने के लिए तैयार न हो। चुनाँचे यह नुक़सान तबूक की मुहिम की तैयारी के मौक़े पर खुलकर सामने आ गया था। इसलिए ठीक वक़्त पर अल्लाह ने हिदायत दी कि इस्लामी तहरीक का यह फैलाव जिस तेज़ी के साथ हो रहा है उसी के मुताबिक़ उसकी मज़बूती की तदबीर भी होनी चाहिए, और वह यह है कि आबादी के हर हिस्से में से कुछ लोगों को लेकर तालीम व तरबियत (शिक्षण-प्रशिक्षण) दी जाए, फिर वे अपने-अपने इलाक़ों में वापस जाकर आम लोगों की तालीम व तरबियत का फ़र्ज़ अदा करें, यहाँ तक कि मुसलमानों की पूरी आबादी में इस्लाम का शुऊर और अल्लाह की हदों का इल्म फैल जाए। यहाँ इतनी बात और समझ लेनी चाहिए कि आम तालीम (सार्वजनिक शिक्षा) के जिस इन्तिज़ाम का हुक्म इस आयत में दिया गया है उसका अस्ल मक़सद आम लोगों को सिर्फ़ पढ़ा-लिखा बनाना और उनमें किताब को पढ़ लेने की क़िस्म का इल्म फैलाना नहीं था, बल्कि वाज़ेह तौर पर उसका असली मक़सद यह तय किया गया था कि लोगों में दीन की समझ पैदा हो और उनको इस हद तक होशियार और ख़बरदार कर दिया जाए कि वे ग़ैर-इस्लामी ज़िन्दगी के रवैये से बचने लगें। यह मुसलमानों की तालीम का वह मक़सद है जो हमेशा-हमेशा के लिए अल्लाह ने ख़ुद मुक़र्रर कर दिया है और हर तालीमी निज़ाम को उसी लिहाज़ से जाँचा जाएगा कि वह इस मक़सद को कहाँ तक पूरा करता है। इसका यह मतलब नहीं है कि इस्लाम लोगों में किताब को पढ़ लेने और दुनियावी इल्म को आम करना नहीं चाहता, बल्कि इसका मतलब यह है कि इस्लाम लोगों में ऐसी तालीम को आम करना चाहता है जो ऊपर बताए गए मक़सद तक पहुँचाती हो। वरना एक-एक शख़्स अगर अपने वक़्त का आइंस्टाइन और फ़्रायड हो जाए लेकिन दीन की समझ से दूर हो और ज़िन्दगी के ग़ैर-इस्लामी रवैये में भटका हुआ हो तो इस्लाम ऐसी तालीम पर लानत भेजता है। इस आयत में अरबी लफ़्ज़ 'लि-य-त-फ़क़्क़हू फ़िद्-दीन' (दीन में समझ पैदा करते हैं) जो इस्तेमाल हुआ है उससे बाद के लोगों में एक अजीब ग़लतफ़हमी पैदा हो गई जिसके ज़हरीले असरात एक ज़माने से मुसलमानों की मज़हबी तालीम, बल्कि उनकी मज़हबी ज़िन्दगी पर भी बुरी तरह पड़ रहे हैं। अल्लाह ने तो 'तफ़क़्क़ुह फ़िद्-दीन' को तालीम का अस्ल मक़सद बताया था जिसके मानी हैं दीन को समझना, उसके निज़ाम में सूझ-बूझ हासिल करना, उसके मिज़ाज और उसकी रूह को जानना और इस क़ाबिल हो जाना कि सोचने और अमल करने के हर पहलू और ज़िन्दगी के हर शोबे में इनसान यह जान सके कि सोच का कौन-सा तरीक़ा और अमल का कौन-सा तरीक़ा दीन की रूह के मुताबिक़ है। लेकिन आगे चलकर जो क़ानूनी इल्म इस्तिलाहन फ़िक़्ह के नाम से जाना जाने लगा और जो धीरे-धीरे इस्लामी ज़िन्दगी की सिर्फ़ ज़ाहिरी शक्ल (रूह के मुक़ाबले में) का तफ़सीली इल्म बनकर रह गया, लोगों ने लफ़्ज़ फ़िक़्ह के दोनों जगह पाए जाने की वजह से समझ लिया कि बस यही वह चीज़ है जिसका हासिल करना अल्लाह के हुक्म के मुताबिक़ तालीम का अस्ल मक़सद है। हालाँकि वह पूरा मक़सद नहीं, बल्कि मक़सद का एक हिस्सा था। इस बड़ी ग़लतफ़हमी से जो नुक़सान दीन और दीन के माननेवालों को पहुँचे, उनका जाइज़ा लेने के लिए तो एक मोटी किताब चाहिए, मगर यहाँ हम इसपर ख़बरदार करने के लिए मुख़्तसर तौर पर इतना इशारा किए देते हैं कि मुसलमानों की मज़हबी तालीम को जिस चीज़ ने दीन की रूह से ख़ाली करके सिर्फ़ दीन के जिस्म और दीन की शक्ल की तशरीह पर महदूद कर दिया और आख़िरकार जिस चीज़ की वजह से मुसलमानों की ज़िन्दगी में एक निरी बेजान ज़ाहिरदारी, दीनदारी की आख़िरी मंज़िल बनकर रह गई, वह बड़ी हद तक यही ग़लतफ़हमी है।
يَٰٓأَيُّهَا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ قَٰتِلُواْ ٱلَّذِينَ يَلُونَكُم مِّنَ ٱلۡكُفَّارِ وَلۡيَجِدُواْ فِيكُمۡ غِلۡظَةٗۚ وَٱعۡلَمُوٓاْ أَنَّ ٱللَّهَ مَعَ ٱلۡمُتَّقِينَ ۝ 116
(123) ऐ लोगो जो ईमान लाए हो! जंग करो हक़ के उन इनकारियों से जो तुमसे क़रीब हैं121 और चाहिए कि वे तुम्हारे अन्दर सख़्ती पाएँ122, और जान लो कि अल्लाह मुत्तक़ियों (परहेज़गारों) के साथ है।123
121. आयत के ज़ाहिर अलफ़ाज़ से जो मतलब निकलता है वह यह है कि दारुल-इस्लाम के जिस हिस्से से इस्लाम के दुश्मनों का जो इलाक़ा मिला हुआ हो, उसके ख़िलाफ़ जंग करने की सबसे पहली ज़िम्मेदारी उसी हिस्से के मुसलमानों पर आती है, लेकिन अगर आगे के सिलसिला-ए-कलाम के साथ मिलाकर इस आयत को पढ़ा जाए तो मालूम होता है कि यहाँ 'काफ़िरों’ से मुराद वे मुनाफ़िक़ लोग हैं जिनका इनकारे-हक़ पूरी तरह नुमायाँ हो चुका था और जिनके इस्लामी सोसाइटी में घुले-मिले रहने से सख़्त नुक़सान पहुँच रहे थे। आयत-73 में, जहाँ तक़रीर के इस सिलसिले की शुरुआत हुई थी, पहली बात यही कही गई थी कि अब इन आस्तीन के साँपों की जड़ काटने के लिए बाक़ायदा जिहाद शुरू कर दिया जाए। वही बात अब तक़रीर के ख़त्म होने पर ताकीद के लिए फिर दोहराई गई है, ताकि मुसलमान इसकी अहमियत को महसूस करें और इन मुनाफ़िक़ों के मामले में उन नस्ली, ख़ानदानी और समाजी ताल्लुक़ात की परवाह न करें, जो उनके और इनके बीच ताल्लुक़ की वजह बने हुए थे। वहाँ उनके ख़िलाफ़ 'जिहाद' करने का हुक्म दिया गया था। यहाँ उससे ज़्यादा सख़्त लफ़्ज़ ‘क़िताल' इस्तेमाल किया गया है, जिससे मुराद यह है कि इनकी पूरी तरह जड़ें उखाड़ फेंकी जाएँ, इनकी जड़ों को उखाड़ फेंकने में कोई कसर उठा न रखी जाए। वहाँ 'कुफ़्फ़ार' और मुनाफ़िक़ दो अलग लफ़्ज़ बोले गए थे। यहाँ एक ही लफ़्ज़ कुफ़्फ़ार को काफ़ी समझा गया है, ताकि इन लोगों का इनकारे-हक़, जो खुले तौर पर साबित हो चुका था, इनके ऊपरी तौर पर मान लेने और ईमान ले आने के परदे में छिपकर किसी रिआयत का हक़दार न समझ लिया जाए।
122. यानी अब वह नर्म सुलूक ख़त्म हो जाना चाहिए, जो अब तक इनके साथ होता रहा है। यही बात आयत-73 में कही गई थी कि 'इनके साथ सख़्ती से पेश आओ।’
123. यहाँ दो बातों पर यकसाँ तौर पर ख़बरदार किया गया है। एक यह कि इन हक़ के इनकारियों के मामले में अगर तुमने अपनी शख़्सी और ख़ानदानी और मआशी ताल्लुक़ात का लिहाज़ किया तो यह हरकत तक़वा (परहेज़गारी) के ख़िलाफ़ होगी; क्योंकि मुत्तक़ी (परहेज़गार) होना और ख़ुदा के दुश्मनों से लाग लगाए रखना दोनों बातें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हैं। इसलिए ख़ुदा की मदद अपने साथ शामिल रखना चाहते हो तो इस लाग-लपेट से पाक रहो। दूसरे यह कि यह सख़्ती और जंग का जो हुक्म दिया जा रहा है इसका यह मतलब नहीं है कि इनके साथ सख़्ती करने में अख़लाक़ और इनसानियत की भी सारी हदें तोड़ डाली जाएँ। तुम्हारी हर कारवाई में अल्लाह की हदों और उसकी हिदायतों की पाबन्दी लाज़मी तौर पर होनी चाहिए। इसको अगर तुमने छोड़ दिया तो इसके मानी ये होंगे कि अल्लाह तुम्हारा साथ छोड़ दे।
وَإِذَا مَآ أُنزِلَتۡ سُورَةٞ فَمِنۡهُم مَّن يَقُولُ أَيُّكُمۡ زَادَتۡهُ هَٰذِهِۦٓ إِيمَٰنٗاۚ فَأَمَّا ٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ فَزَادَتۡهُمۡ إِيمَٰنٗا وَهُمۡ يَسۡتَبۡشِرُونَ ۝ 117
(124) जब कोई नई सूरा उतरती है तो उनमें से कुछ लोग (मज़ाक़ के तौर पर मुसलमानों से) पूछते हैं कि “कहो तुममें से किसके ईमान में इससे बढ़ोतरी हुई?” (इसका जवाब यह है कि) जो लोग ईमान लाए हैं उनके ईमान में तो हक़ीक़त में (हर उतरनेवाली सूरा ने) बढ़ोतरी ही की है और वे इससे ख़ुश हैं,
وَأَمَّا ٱلَّذِينَ فِي قُلُوبِهِم مَّرَضٞ فَزَادَتۡهُمۡ رِجۡسًا إِلَىٰ رِجۡسِهِمۡ وَمَاتُواْ وَهُمۡ كَٰفِرُونَ ۝ 118
(125) अलबत्ता जिन लोगों के दिलों को (निफ़ाक़ का) रोग लगा हुआ था उनकी पिछली गंदगी पर (हर नई सूरा ने) एक और गन्दगी बढ़ा दी124 और वे मरते दम तक कुफ ही में पड़े रहे।
124. ईमान और कुफ़्र और निफ़ाक़ में कमी-बेशी का क्या मतलब है, इसको जानने के लिए देखें— सूरा-8 अनफ़ाल, हाशिया-2।
أَوَلَا يَرَوۡنَ أَنَّهُمۡ يُفۡتَنُونَ فِي كُلِّ عَامٖ مَّرَّةً أَوۡ مَرَّتَيۡنِ ثُمَّ لَا يَتُوبُونَ وَلَا هُمۡ يَذَّكَّرُونَ ۝ 119
(126) क्या ये लोग देखते नहीं कि हर साल एक-दो बार ये आज़माइश में डाले जाते125? मगर इसपर भी न तौबा करते हैं, न कोई सबक़ लेते हैं।
125. यानी कोई साल ऐसा नहीं गुज़र रहा है जबकि एक-दो बार ऐसे हालात न पेश आ जाते हों जिनमें इनका ईमान का दावा आज़माइश की कसौटी पर कसा न जाता हो और उसकी खोट का भेद खुल न जाता हो। कभी क़ुरआन में कोई ऐसा हुक्म आ जाता है जिससे इनकी मन की ख़ाहिश पर कोई नई पाबन्दी लग जाती है, कभी दीन की कोई ऐसी माँग सामने आ जाती है जिससे इनके फ़ायदों को चोट पहुँचती है, कभी कोई अन्दरूनी झगड़ा ऐसा पैदा हो जाता है जिसमें यह इम्तिहान छिपा होता है कि इनको अपने दुनियावी ताल्लुक़ात और अपनी शख़्सी और ख़ानदानी और क़बायली दिलचस्पियों के मुक़ाबले अल्लाह और उसका रसूल और उसका दीन कितना प्यारा है। कभी कोई जंग ऐसी पेश आ जाती है जिसमें यह आज़माइश होती है कि ये जिस दीन पर ईमान लाने का दावा कर रहे हैं उसकी ख़ातिर जान, माल, वक़्त और मेहनत की कितनी क़ुरबानी करने के लिए तैयार हैं। ऐसे तमाम मौक़ों पर सिर्फ़ यही नहीं कि मुनाफ़क़त की वह गन्दगी जो इनके झूठे इक़रार के नीचे छिपी हुई है खुलकर सबके सामने आ जाती है, बल्कि हर बार जब ये ईमान के तक़ाज़ों से मुँह मोड़कर भागते हैं तो इनके अन्दर की गन्दगी पहले से कुछ ज़्यादा बढ़ जाती है।
وَلَا تُعۡجِبۡكَ أَمۡوَٰلُهُمۡ وَأَوۡلَٰدُهُمۡۚ إِنَّمَا يُرِيدُ ٱللَّهُ أَن يُعَذِّبَهُم بِهَا فِي ٱلدُّنۡيَا وَتَزۡهَقَ أَنفُسُهُمۡ وَهُمۡ كَٰفِرُونَ ۝ 120
(85) उनकी मालदारी और औलाद की ज़्यादती तुमको धोखे में न डाले। अल्लाह ने तो इरादा कर लिया है कि इस माल और औलाद के ज़रिए से उनको इसी दुनिया में सज़ा दे और उनकी जानें इस हाल में निकलें कि वे काफ़िर हों।
وَإِذَآ أُنزِلَتۡ سُورَةٌ أَنۡ ءَامِنُواْ بِٱللَّهِ وَجَٰهِدُواْ مَعَ رَسُولِهِ ٱسۡتَـٔۡذَنَكَ أُوْلُواْ ٱلطَّوۡلِ مِنۡهُمۡ وَقَالُواْ ذَرۡنَا نَكُن مَّعَ ٱلۡقَٰعِدِينَ ۝ 121
(86) जब कभी कोई सूरा इस मज़मून की उतरी कि अल्लाह को मानो और उसके रसूल साथ मिलकर जिहाद करो तो तुमने देखा कि जो लोग इनमें से क़ुदरत रखनेवाले थे वही तुमसे दरख़ास्त करने लगे कि इन्हें जिहाद में शरीक होने से माफ़ रखा जाए और उन्होंने कहा कि हमें छोड़ दीजिए कि हम बैठनेवालों के साथ रहें।
رَضُواْ بِأَن يَكُونُواْ مَعَ ٱلۡخَوَالِفِ وَطُبِعَ عَلَىٰ قُلُوبِهِمۡ فَهُمۡ لَا يَفۡقَهُونَ ۝ 122
(87) इन लोगों ने घर बैठनेवालियों में शामिल होना पसन्द किया और उनके दिलों पर ठप्पा लगा दिया गया, इसलिए उनकी समझ में अब कुछ नहीं आता।89
89. यानी हालाँकि यह बड़े शर्म के क़ाबिल बात है कि अच्छे-ख़ासे हट्टे-कट्टे, तन्दुरुस्त, हैसियतवाले लोग, ईमान का दावा रखने के बावुजूद काम का वक़्त आने पर मैदान में निकलने के बजाय घरों में घुस बैठे और औरतों में जा शामिल हों, लेकिन चूँकि इन लोगों ने ख़ुद जान-बूझकर अपने लिए यही रवैया पसन्द किया था, इसलिए फ़ितरत के क़ानून के मुताबिक़ इनसे वह पाकीज़ा एहसासात छीन लिए गए जिनकी बदौलत आदमी ऐसे गिरे हुए तौर-तरीक़े इख़्तियार करने में शर्म महसूस किया करता है।
لَٰكِنِ ٱلرَّسُولُ وَٱلَّذِينَ ءَامَنُواْ مَعَهُۥ جَٰهَدُواْ بِأَمۡوَٰلِهِمۡ وَأَنفُسِهِمۡۚ وَأُوْلَٰٓئِكَ لَهُمُ ٱلۡخَيۡرَٰتُۖ وَأُوْلَٰٓئِكَ هُمُ ٱلۡمُفۡلِحُونَ ۝ 123
(88) इसके बरख़िलाफ़ रसूल ने और उन लोगों ने जो रसूल के साथ ईमान लाए थे अपनी जान व माल से जिहाद किया, और अब सारी भलाइयाँ उन्हीं के लिए हैं और वही कामयाबी पानेवाले हैं।
أَعَدَّ ٱللَّهُ لَهُمۡ جَنَّٰتٖ تَجۡرِي مِن تَحۡتِهَا ٱلۡأَنۡهَٰرُ خَٰلِدِينَ فِيهَاۚ ذَٰلِكَ ٱلۡفَوۡزُ ٱلۡعَظِيمُ ۝ 124
(89) अल्लाह ने उनके लिए ऐसे बाग़ तैयार कर रखे हैं जिनके नीचे नहरें बह रही हैं, इनमें वे हमेशा रहेंगे। यह है अज़ीमुश्शान कामयाबी!
وَجَآءَ ٱلۡمُعَذِّرُونَ مِنَ ٱلۡأَعۡرَابِ لِيُؤۡذَنَ لَهُمۡ وَقَعَدَ ٱلَّذِينَ كَذَبُواْ ٱللَّهَ وَرَسُولَهُۥۚ سَيُصِيبُ ٱلَّذِينَ كَفَرُواْ مِنۡهُمۡ عَذَابٌ أَلِيمٞ ۝ 125
(90) बद्दू अरबों90 में से भी बहुत-से लोग आए जिन्होंने बहाने किए, ताकि उन्हें भी पीछे रह जाने की इजाज़त दी जाए। इस तरह बैठ रहे वे लोग जिन्होंने अल्लाह और उसके रसूल से ईमान का झूठा अह्द किया था। इन बद्दुओं में से जिन लोगों ने कुफ़्र (नाफ़रमानी) का तरीक़ा अपनाया है91 बहुत जल्द वे दर्दनाक सज़ा से दोचार होंगे।
90. बदवी (देहाती) अरबों से मुराद मदीना के आसपास रहनेवाले देहाती और रेगिस्तानी अरब लोग हैं जिन्हें आम तौर पर बद्दू कहा जाता है।
91. मुनाफ़िक़ाना (कपटपूर्ण) ईमान का इज़हार, जिसकी तह में हक़ीक़त में हक़ का इक़रार करना, अपने आपको उसके हवाले करना, उसको सच्चे दिल से मानना और उसकी पैरवी न हो, और जिसके ज़ाहिरी इक़रार के बावजूद इनसान ख़ुदा और उसके दीन के मुक़ाबले में अपने फ़ायदों और अपनी दुनियावी दिलचस्पियों को ज़्यादा प्यारा रखता हो, अस्ल हक़ीक़त के एतिबार से कुफ़्र और इनकार ही है। ख़ुदा के यहाँ ऐसे लोगों के साथ वही मामला होगा जो इनकार करनेवालों और बाग़ियों के साथ होगा, चाहे दुनिया में इस तरह के लोग काफ़िर न ठहराए जा सकते हों और उनके साथ मुसलमानों ही का-सा मामला होता रहे। इस दुनिया की ज़िन्दगी में जिस क़ानून पर मुस्लिम सोसाइटी का निज़ाम क़ायम किया गया है और जिस ज़ाबिते की बिना पर इस्लामी हुकूमत और उसके क़ाज़ी (न्यायाधीश) अहकाम और आदेश लागू करते हैं, इसके लिहाज़ से तो मुनाफ़क़त पर कुफ़्र या कुफ़्र का शुब्हा होने का हुक्म सिर्फ़ उन्हीं सूरतों में लगाया जा सकता है, जबकि इनकार और बग़ावत या ग़द्दारी और बेवफ़ाई का इज़हार साफ़ तौर पर हो जाए। इसलिए मुनाफ़क़त की बहुत-सी सूरतें और हालतें ऐसी रह जाती हैं जो इस्लामी अदालत में कुफ़्र के हुक्म से बच जाती हैं। लेकिन शरई अदालत में किसी मुनाफ़िक़ का कुफ़्र के हुक्म से बच निकलना यह मानी नहीं रखता कि अल्लाह की अदालत में भी वह इस हुक्म और इसकी सज़ा से बच निकलेगा।
وَإِذَا مَآ أُنزِلَتۡ سُورَةٞ نَّظَرَ بَعۡضُهُمۡ إِلَىٰ بَعۡضٍ هَلۡ يَرَىٰكُم مِّنۡ أَحَدٖ ثُمَّ ٱنصَرَفُواْۚ صَرَفَ ٱللَّهُ قُلُوبَهُم بِأَنَّهُمۡ قَوۡمٞ لَّا يَفۡقَهُونَ ۝ 126
127) जब कोई सूरा उतरती है तो ये लोग आँखों-ही-आँखों में एक-दूसरे से बातें करते हैं कि कहीं कोई तुमको देख तो नहीं रहा है, फिर चुपके से निकल भागते हैं।126 अल्लाह ने उनके दिल फेर दिए हैं, क्योंकि ये नासमझ लोग हैं।127
126. क़ायदा यह था कि जब कोई सूरा नाज़िल होती थी तो नबी (सल्ल०) मुसलमानों को इकट्ठा होने का एलान कराते और फिर उनके सामने उस सूरा को तक़रीर के तौर पर सुनाते थे। इस महफ़िल में ईमानवालों का हाल तो यह होता था कि पूरा ध्यान लगाकर उस तक़रीर को सुनते और उसमें डूब जाते थे, लेकिन मुनाफ़िक़ों का रंग-ढंग कुछ और था। वे तो इसलिए जाते थे कि हाज़िरी का हुक्म था और अगर वे वहाँ हाज़िर न होते तो इसके मानी अपने निफ़ाक़ के राज़ को ख़ुद खोल देने के थे। मगर इस ख़ुतबे से इनको कोई दिलचस्पी न होती थी। बहुत ही बददिली के साथ उकताए हुए बैठे रहते थे और अपने-आप को हाज़िर लोगों में गिनवा लेने के बाद इन्हें बस यह फ़िक्र लगी रहती थी कि किसी तरह जल्दी-से-जल्दी यहाँ से भाग निकलें। इनकी इसी हालत की तस्वीर यहाँ खींची गई है।
127. यानी ये बेवक़ूफ़ ख़ुद अपने फ़ायदों को नहीं समझते। अपनी फ़लाह और कामयाबी से ग़ाफ़िल और अपनी बेहतरी से बेफ़िक्र हैं। इनको एहसास नहीं है कि कितनी बड़ी नेमत है जो इस क़ुरआन और इस पैग़म्बर के ज़रिए से इनको दी जा रही है। अपनी छोटी-सी दुनिया और इसकी बहुत ही घटिया क़िस्म की दिलचस्पियों में ये कुएँ के मेंढक ऐसे डूबे हैं कि उस अज़ीमुश्शान इल्म और उस ज़बरदस्त रहनुमाई की क़द्र और क़ीमत इनकी समझ में नहीं आती, जिसकी वजह से ये अरब के रेगिस्तान के इस तंग और अन्धयारे कोने से उठकर तमाम इनसानी दुनिया के इमाम और पेशवा बन सकते हैं और इस ख़त्म हो जानेवाली दुनिया ही में नहीं, बल्कि बाद की न ख़त्म होनेवाली और हमेशा रहनेवाली ज़िन्दगी में भी हमेशा-हमेशा के लिए कामयाब हो सकते हैं। इस नादानी और बेवक़ूफ़ी का फ़ितरी नतीजा यह है कि अल्लाह ने इन्हें फ़ायदा हासिल करने के मुबारक मौक़े से महरूम कर दिया। जब कामयाबी और ताक़त व बड़ाई का यह ख़ज़ाना मुफ्त में लुट रहा होता है और ख़ुशनसीब लोग उसे दोनों हाथों से लूट रहे होते हैं उस वक़्त इन बदनसीबों के दिल किसी और तरफ़ लगे होते हैं और इन्हें ख़बर तक नहीं होती कि किस दौलत से महरूम रह गए।
لَقَدۡ جَآءَكُمۡ رَسُولٞ مِّنۡ أَنفُسِكُمۡ عَزِيزٌ عَلَيۡهِ مَا عَنِتُّمۡ حَرِيصٌ عَلَيۡكُم بِٱلۡمُؤۡمِنِينَ رَءُوفٞ رَّحِيمٞ ۝ 127
(128) देखो! तुम लोगों के पास एक रसूल आया है जो ख़ुद तुम ही में से है, तुम्हारा नुक़सान में पड़ना उसके लिए तक़लीफ़देह है, तुम्हारी कामयाबी का वह हरीस (लालसा रखनेवाला) है, ईमान लानेवालों के लिए वह मेहरबान और रहमदिल है।
فَإِن تَوَلَّوۡاْ فَقُلۡ حَسۡبِيَ ٱللَّهُ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَۖ عَلَيۡهِ تَوَكَّلۡتُۖ وَهُوَ رَبُّ ٱلۡعَرۡشِ ٱلۡعَظِيمِ ۝ 128
(129) अब अगर ये लोग तुमसे मुँह फेरते हैं तो ऐ नबी, इनसे कह दो कि “मेरे लिए अल्लाह काफ़ी है, कोई माबूद नहीं मगर वह, उसी पर मैंने भरोसा किया और वह मालिक है अर्श-अज़ीम (महान् सिंहासन) का।"