Hindi Islam
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इस्लाम में बलात् धर्म परिवर्तन नहीं

इस्लाम को लेकर आम लोगों में बहुत ग़लतफ़हमियां फैली हुई है। इसका बुनियादी कारण यह है कि इस्लाम के अनुयायियों ने उन लेगों के बीच इस्लाम का परिचय नहीं कराया, जो इस्लाम से अपरिचित थे, जबकि आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन्हें यह ज़िम्मेदारी सौंपी थी कि उन लोगों तक इस्लाम के पैग़ाम को पहुंचाएं, जिन तक यह नहीं पहुंचा है। इस के अलावा कुछ लोगों ने अपना हित साधने के लिए इस्लाम के विरुद्ध जो द्वेषपूर्ण तथा निराधार प्रचार कर के इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश भी की है और इस्लाम के बिरुद्ध कई तरह की भ्रांतियों को हवा दी है। यह पुस्तिका ऐसी ही भ्रांतियों को दूर करने की कोशिश है। विशेष रूप से इस में जिहाद और जिज़्या की वास्तविकता पर बात की गई है। यह पुस्तिका पहली बार 1945 ई० में प्रकाशित हुई थी। आज भी इसकी प्रसांगिकता कम नहीं हुई है।

बच्चे और इस्लाम

इस लेख को तैयार करने का मक़सद यह है कि बच्चों से सम्बोधित इस्लामी शिक्षाएँ सामने आ सकें। इसमें कोई शक नहीं कि हाल के वर्षों में बच्चों के अधिकारों को लेकर पश्चिम में बहुत काम किया गया है, लेकिन बच्चों के अधिकारों की बात सब से पहले इस्लाम ने की है। पश्चिम हर अच्छे काम को अपने से जोड़ता है। बच्चों के अधिकारों के बारे में की जा रही कोशिश को भी वह अपना कारनामा बताता है। हालांकि बहुत पहले से बच्चों के सिलसिले में इस्लाम की बड़ी सटीक और सर्वपक्षीय शिक्षाएँ मौजूद हैं। इस विषय पर मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी के विस्तृत लेख पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। इस लेख में कुछ हद तक उन्हीं का निचोड़ पेश किया गया है।

इस्लाम एक परिचय

इस्लाम किसी जाति या क्षेत्र विशेष का धर्म नहीं, बल्कि समस्त मानवजाति और पूरे संसार के लिए एक स्वाभाविक जीवन व्यवस्था है। यह जीवन व्यवस्था ख़ुद अल्लाह ने बनाई है, इसलिए इसे मानने में ही सबका भला है। आम तौर से मुसलमानों को भी एक जाति समझ लिया गया है और इस्लाम को केवल उन्हीं का धर्म, जिस तरह संसार में बहुत-सी जातियॉ और बहुत से धर्म हैं। लेकिन यह सही नहीं है भ्रम है। सच यह है कि मुसलमान इस अर्थ में एक जाति नहीं हैं, जिस अर्थ में वंश, वर्ण और देश के सम्बन्ध से जातियाँ बना करती हैं और इस अर्थ में इस्लाम भी किसी विशेष जाति का धर्म नहीं है।

मानवता उपकारक हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम)

अरब के लोग बेटियों की हत्या कर देते थे। भारत में भी यही प्रथा थी। क़ुरआन ने लोगों को इस दुष्कर्म से मना किया। महा ईशदूत ने बेटियों से स्नेह की शिक्षा ही नहीं दी, बल्कि स्नेह के साथ सम्मान का आदर्श भी उपस्थित किया। बेटियों को पाल-पोसकर विवाह करने का फल जन्नत में अपने निकट स्थान, बताया। स्त्रियों को बहुत सम्मानित किया। माता की सेवा का फल भी जन्नत और बेटी से स्नेह और लालन-पालन का फल भी जन्नत बताया गया। बहन को भी बेटी के बराबर ठहराया गया। पत्नी को दाम्पत्य जीवन, घराने व समाज में आदरणीय, पवित्र, सुखमय व सुरक्षित स्थान प्रदान किया गया।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) सबके लिए

सार्वभौमिकता के परिप्रेक्ष्य में, हजरत मुहम्मद (सल्ल.) के, भारतवासियों का भी पैगम्बर होने की धारणा तकाजा करती हैं कि आप (सल्ल.) के समकालीन भारत पर एक संक्षिप्त दृष्टि अवश्य डाली जाए, और चूंकि आप की पैग़म्बरी का ध्येय एवं आप (सल्ल.) के ईशदूतत्व का लक्ष्य मानव-व्यक्तित्व, मानव-समाज के आध्यात्मिक व सांसारिक हर क्षेत्र में सुधार, परिवर्तन, निखार व क्रान्ति लाना था, इसलिए यह दृष्टि भारतीय समाज के राजनैतिक, सामाजिक व धार्मिक सभी पहलुओं पर डाली जाए।

शांति और सम्मान

जिस धर्म या संस्कृति की आधारशिला सत्य न हो उसकी कोई भी क़ीमत नहीं। जीवन को मात्र दुख और पीड़ा की संज्ञा देना जीवन और जगत् दोनों ही का तिरस्कार है। क्या आपने देखा नहीं कि संसार में काँटे ही नहीं होते, फूल भी खिलते हैं। जीवन में बुढ़ापा ही नहीं यौवन भी होता है। जीवन निराशा द्वारा नहीं, बल्कि आशाओं और मधुर कामनाओं द्वारा निर्मित हुआ है। हृदय की पवित्र एवं कोमल भावनाएँ निरर्थक नहीं हो सकतीं। क्या बाग़ के किसी सुन्दर महकते फूल को निरर्थक कह सकते हैं?

उंच-नीच छूत-छात

अल्लाह ने क़ुरआम दुनिया के सारे लोगों को समझाते हुए यह शिक्षा दी है : "लोगो! हमने तुम को एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और फिर तुम्हें परिवारों और वंशों में विभाजित कर दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। तुम में अधिक बड़ा वह है जो अल्लाह के आदेशों सर्वाधिक पालन करने वाला है और निसन्देह अल्लाह जानने वाला और ख़बर रखने वाला है।" (सूरह हुजुरात) प्रस्तुत लेख में सैयद अबुल आला मौदूदी ने इसी आयत को आधार बनाकर समाज को मानव असमानता के रोग से बचाने की कोशिश की है।

नशाबन्दी और इस्लाम

नशा से होने वाले नुक़सानों को देखते हुए समाज का गंभीर वर्ग इससे छुटकारा पाना तो चाहता है, लेकिन उसे कोई तरकीब समझ में नहीं आ रही है। समाज में विभिन्न तरीक़ों को एक एक कर आज़माया गया लेकिन, वे सब नाकाम रहे। इस लेख में मौलाना अबुल लैस इस्लाही नदवी ने नशाबन्दी के इस्लामी तरीक़े का उल्लेख किया है।

नारी और इस्लाम

इस्लाम में औरत को क्या स्थान दिया गया है और उसकी क्या हैसियत इस्लाम में है, इसकी एक झलक इस संक्षिप्त-सी पुस्तिका में प्रस्तुत की गई है जिससे आपको अन्दाज़ा हो सकेगा कि इस्लाम ने औरत को समाज में उसका सही स्थान प्रदान किया है। इस विषय पर विस्तृत जानकारी प्राप्त करने के लिए पुस्तिका के अन्त में एक पुस्तक-सूची भी दी गई है, जिनके अध्ययन से इस विशय पर इस्लाम का विस्तृत दृश्टिकोण आपके सामने आ सकेगा।

मानव जीवन और परलोक

मौत एक ऐसी सच्चाई है, जिसको झुठलाया नहीं जा सकता। इंसान अपने क़रीबी, अपने रिश्तेदारों और दोस्तों को मौत के गाल में समाते हुए देखता रहता है, लेकिन उन्हें मौत से बचा नहीं सकता। उसे यह ख़याल भी आता है कि एक दिन उसे भी मरना है और हमेशा के लिए इन संसार से चले जाना है। इंसान के समाने कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जिनका सही उत्तर मिलना अत्यंत आवश्यक है। जैसे-जीवन क्या है, यह कहां से मिला, इसका मक़सद क्या है। मौत क्या है, मौत के बाद क्या होगा, क्या मौत के बाद भी जीवन है, अगर जीवन है, तो कैसा है, उस जीवन में सफल होने के लिए इस सांसारिक जीवन में क्या करना होगा। अगर जीवन नहीं है, तो क्या मौत के बाद जीवन समाप्त हो जाता है। प्रस्तुत पुस्तक में इस विषय पर इस्लामी पक्ष रखा गया है।

बच्चों की तर्बियत और माँ-बाप की ज़िम्मेदारियाँ

पुस्तिका: बच्चों की तर्बियत और माँ-बाप की ज़िम्मेदारियाँ

धर्म का वास्तविक स्वरुप

संसार में जितने भी धर्म ईश्वरीय धर्म होने का दावा करते है, वे सभी एक ही धर्म के अलग-अलग संस्करण हैं। ये ईश्वर के पैग़म्बरों द्वारा अलग अलग ज़मानों में अलग-अलग देशों में लाए गए। कालांतर में उनकी शिक्षाओं में फेर बदल कर के उनका रूप बिगाड़ दिया गया। यही कारण है कि ऐसे सभी धर्मों में एकेश्वरवाद, ईशदुतत्व और मरने के बाद के जीवन और स्वर्ग नरक की मान्यता मिलती है। प्रस्तुत लेख में हम देखेंगे कि भारतीय धर्मग्रंथों ऐसी शक्षाएं कहां-कहां मौजूद हैं

पवित्र क़ुरान एक नज़र में

मनुष्य अपने-आप में पूर्ण नहीं है। वह वास्तव में सृष्टि के समस्त रहस्यों को हल करने में सक्षम नहीं है। वह स्वयं अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन की सभी समस्याओं की पूरी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकता जिससे वह अपने विचारों, कर्मों और दूसरों के साथ व्यवहारों में शांति, सामंजस्य एवं संतुलन स्थापित कर सकें। मनुष्य ने ज्ञान के क्षेत्र में जितनी भी प्रगति की है, वह सत्य और परम मूल्यों को पाने में पर्याप्त नहीं है। जबकि इसको पाए बिना शांति एवं सामंजस्य को प्राप्त नहीं कर सकता। यही कारण है कि मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं को कुल मिलाकर हल करने में असफल है। ऐसे विश्वसनीय ज्ञान का स्रोत केवल ईश्वर ही है। वह सर्वज्ञ शक्ति जिसने मनुष्य एवं समस्त विश्व की रचना की। अतः वह इस रचना की जटिलताओं का ज्ञान रखता है। कृपाशील परमेश्वर ने मनुष्य को उसके अल्प सीमित ज्ञान एवं बुद्धि से जीवन का मार्ग निर्धारित करने और अंधकार में इधर-उधर भटकते रहने के लिए नहीं छोड़ा है। उसने मनुष्य को उसकी आवश्यकता अनुसार वास्तविकताओं का ज्ञान दे दिया एवं जीवन का मार्गदर्शन कर दिया है।

एकेश्वरवाद (तौहीद) मानव-प्रकृति के पूर्णतः अनुकूल है

एकेश्वरवाद (तौहीद) दिल की दुनिया बदल देने वाली एक क्रांतिकारी, कल्याणकारी, सार्वभौमिक, सर्वाधिक महत्वपूर्ण और मानव-स्वभाव के बिल्कुल अनुकूल अवधारणा है जो आदमी को सिर्फ़ और सिर्फ़ एक अल्लाह या ईश्वर की बन्दगी और दासता की शिक्षा देती है। एक अल्लाह के आगे सजदा करने या झुकने वाला आदमी बाक़ी सारे बनावटी और नक़ली ख़ुदाओं के सजदे और दासता से छुटकारा पा जाता है। और अल्लाह की नज़र में सारे इंसान एक समान हो जाते हैं। अल्लाह की नज़र में किसी के बड़ा या छोटा होने का मानदंड उसका कर्म है।जिसका कर्म जितना अच्छा होगा, वह उतना ही बड़ा और ऊंचा होगा और जिसका कर्म जितना बुरा होगा वह उतना ही छोटा या अधम और नीच होगा। आदमी का कर्म ही उसे लोक-परलोक में सफल या असफल बनाएगा और स्वर्ग या नरक में ले जाएगा। प्रस्तुत लेख में एकेश्वरवाद पर बड़े ही तार्किक ढंग से बात की गई है।

इस्लाम का ही अनुपालन क्यों ?

इस्लाम मात्र एक धर्म नहीं है यह एक संपूर्ण जीवन व्यवस्था है, जो जीवन के प्रत्येक विभाग में मार्गदर्शन करती है। यह व्यवस्था स्वयं ईश्वर की बनाई हुई है, जो सर्वजगत का रचयिता स्वामी और पालनहार है, इसलिए इस व्यवस्था में किसी प्रकार की भी त्रुटी का आशंका भी नहीं की जा सकती। यही बात क़ुरआन ने बार-बार दोहराई है और विभिन्न दृष्टि से समझाने की कोशिश की है। प्रस्तुत पुस्तिका क़ुरआन की उन्हीं शिक्षाओं पर आघारित है। इसमें बड़े तार्किक और वैज्ञानिक ढंग से इस तथ्य को उजागर किया गया है कि इस्लाम ही का अनुपालन करना क्यों ज़रूरी है।