इतिहास की यह पुस्तक पाकिस्तान के सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं इतिहासकार सरवत सौलत साहब ने उस दृष्टिकोण को सामने रखकर लिखी है, जो उद्देश्यपूर्ण और सैद्धान्तिक है। इसमें किसी भी प्रकार के पक्षपात से ऊपर उठकर, मानव मात्र की प्रगति एवं विकास के उद्देश्य को सामने रखकर घटनाओं एवं परिस्थितियों का विश्लेषण किया जाता है और नतीजे निकाले जाते हैं। उस किताब का आसान हिन्दी अनुवाद पेश है। यह अनुवाद सहज एव सरल रखा गया है। और इसमें जिन ऐतिहासिक व्यक्तियों और स्थानों के नाम आए हैं उन्हें विशुद्ध रूप में ही स्वीकार किया गया है। इसके लिए बिरादरम ख़ालिद निज़ामी साहब ने जो सतर्कता दिखाई है और उन्होंने जो परिश्रम किया है वह अत्यन्त सराहनीय है। आशा है कि हम सब इस पुस्तक से लाभान्वित होंगे। अल्लाह हमें इसकी तौफ़ीक़ दे, आमीन!
हदीस सौरभ के इस भाग में मौलिक धारणाओं और इबादतों से सम्बन्धी हदीसें प्रस्तुत की गई हैं। नैतिकता, समाज, शासन एवं राजनीति, अर्थनीति एवं अर्थव्यवस्था, सत्य का आह्वान और सत्य-प्रचार आदि से सम्बन्धित हदीसें पुस्तक के अन्य भागों में प्रस्तुत की जाएँगी।
इनसान के शरीर में ज़ुबान का महत्व बहुत ज़्यादा है।किसी आदमी की अच्छी या बुरी पहचान बनाने में ज़बान की भूमिका सब से बढ़कर है। परिवार और समाज में बिगाड़ फैलने का एक बड़ा कारण ज़बान ही है। अल्लाह के रसूल (सल्ल.) की एक हदीस के मुताबिक़ बहुत से लोग केवल अपनी ज़बान की कारकर्दगी के कारण जहन्नम में डाले जाएंगे। इस लिए इस्लाम में ज़बान की हिफ़ाज़त करने और उसे क़ाबू में रखने पर बहुत ज़ोर दिया गया है। इस किताब में क़ुरआन और हदीस के हवाले से ज़बान की हिफ़ाज़त, की ज़रूरत और उसके फ़ायदे पर बात की गई है।
इस्लाम ने बताया है कि अगर इनसान अल्लाह के बताए हुए रास्ते पर चलेगा यानी वे काम करेगा जिनको करने का अल्लाह की किताब क़ुरआन मजीद और अल्लाह के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने हुक्म दिया है और उन कामों और बातों से बचेगा जिनसे रोका गया है तो फिर वह मरने के बाद अल्लाह की बनाई हुई जन्नत में दाख़िल होगा। क़ुरआन मजीद में ऊपर लिखी हुई सिफ़ात को बयान करने के लिए बहुत-से अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल किया गया है। उन्हीं में से एक लफ़्ज़ 'तज़किया' है। तज़किया क़ुरआन मजीद की एक 'इस्तिलाह' (शब्दावली) है जो अपने अन्दर बहुत सारे मानी रखती है। तज़किए का ताल्लुक़ इनसान की पूरी ज़िन्दगी से है। इसमें रूह को पाक रखने के मानी भी पाए जाते हैं और उसे परवान चढ़ाने और बुलन्द करने के मानी भी। इस दौर के मशहूर आलिमे-दीन मौलाना सैयद जलालुद्दीन उमरी साहब ने इस छोटी-सी किताब में तज़किये की शक्लें क़ुरआन मजीद की रौशनी में बयान की हैं। इनको पढ़कर इनसान के लिए यह आसान हो जाता है कि वह दुनिया और आख़िरत की कामयाबी के लिए तज़किये की सिफ़ात अपने अन्दर पैदा करे।
लेखक एक हिंदू चिंतक तथा विचारक हैं, पंजाब के निवासी हैं। उनको ज्ञान तथा कला में विशेष रुचि है। अपने जीवन का एक भाग मध्यपूर्व के इस्लामी संस्कृति के गढ़ में बिताने के कारण उन्हें उसे निकट से देखने-समझने का अवसर मिला है, इसीलिए इस्लाम की विशेष जानकारी रखने वालों में उनकी गणना होती है। उनकी एक और पुस्तक 'इस्लाम और औरत' भी है, जो अति लोकप्रिय है।पुस्तक लेख 'दयामूर्ति का रवैया अपने शत्रुओं के साथ' के शीर्षक से पहले लेख-माला के रूप में 'फ़ारान' उर्दू मासिक, कराची में प्रकाशित हुआ था। उन्हीं लेखों के इस संग्रह को बाद में पुस्तक रूप दिया गया, जिसका अनुवाद यहां प्रस्तुत है।
क़ुरआन मजीद इस ज़मीन पर अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत है क्योंकि क़ुरआन ने इन्सान की बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति की है। वह आवश्यकता है जीवन-यापन के ऐसे मार्ग की जानकारी जिस पर चल कर आदमी इन्सान बन सके, एक संतुलित और न्यायपूर्ण समाज की स्थापना हो सके और आख़िरत में कामियाबी मिले। क़ुरआन की इस अहमियत का तक़ाज़ा यह है कि मानव जाति का एक-एक व्यक्ति इस महान ग्रन्थ से परिचित कराया जाए। यह पुस्तक इसी ज़रूरत को पूरा करने के लिए लिखी गई है। इसके लिखने का मक़सद यह है कि लोग क़ुरआन के अध्ययन के महत्व को महसूस कर लें और उसका हक़ अदा करने की कोशिश करें। यह पुस्तक मुसलमानों से ज़्यादा ग़ैर-मुस्लिम भाइयों की ज़रूरत को सामने रखकर तैयार की गई है, इसलिए इसमें कुछ ऐसी बातें भी आ गई हैं जो मुसलमानों के लिए ज़रूरी नहीं हैं मगर क्योंकि एक ग़ैर-मुस्लिम के लिए उनका जानना बहुत ज़रूरी है इस लिए उन पर चर्चा की गई।
इस्लाम को तफ़सील से समझने और सही मायनों में उसकी पैरवी का हक़ अदा करने के लिए अल्लाह के आख़िरी रसूल हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के काम और उनकी बातें (कथन) जिन्हें 'हदीस' कहा जाता है, से वाक़िफ़ होना बहुत ज़रूरी है। इसके बिना ख़ुद क़ुरआन मजीद को भी सही ढंग से नहीं समझा जा सकता। क़ुरआन की तरह हदीस की मूल भाषा भी चूंकि अरबी है, और अरबी जानने वाले बहुत थोड़े लोग हैं, अत: बाक़ी सभी लोगों को इस बड़ी नेमत का बोध कराने के लिए इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं कि दूसरी ज़बानों में इसका तर्जुमा कराया जाए। यह किताब इसी प्रकार की एक मुबारक कोशिश का नतीजा है। इसमें सैकड़ों उनवानात (शीर्षकों) के तहत ऐसी चुनिंदा हदीसों को मुनासिब ढंग से जमा कर दिया गया है जो इंसान और इंसानी समाज के लगभग सभी पहलुओं को अपने अंदर समेट लेती हैं।
इक्कीसवीं शताब्दी विभिन्न धर्म व संस्कृतियों के आपसी परिचय और मिलन का युग है। विभिन्न धर्म-दर्शनों के दृष्टिकोणों, संस्कारों व विचारों को देखने, जानने और समझने की प्रवृत्ति बढ़ी है, जो उज्जवल भविष्य का प्रतीक है। वर्तमान पीढ़ी यह जानना चाहती है कि अनेक धर्म और उनके धर्म ग्रन्थों का विभिन्न समस्याओं के प्रति दृष्टिकोण क्या है और वे क्या निवारण पेश करते हैं? उनका मार्ग-दर्शन किसी विशेष समुदाय, देश एवं सीमित काल के लिए है या सम्पूर्ण मानवजाति, समस्त जगत तथा युग-युगांतर के लिए है। प्रस्तुत पुस्तक 'क़ुरआन की शिक्षाएँ- मानवजाति के लिए अनमोल उपहार' आधुनिक पीढ़ी की इन्हीं जिज्ञासाओं को शान्त करने और उस श्रोत का परिचय कराने की दिशा में एक प्रयास है, जिसे ईश्वर की अन्तिम वाणी अर्थात 'पवित्र क़ुरआन' के नाम से जाना जाता है, जो मानव जाति की विभिन्न मौलिक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती है।
इस किताब में इस्लामी जगत् के एक बड़े आलिम मौलाना सैयद अबुल आला मौदूदी के उन ख़ुतबों (भाषणों) को जमा करके प्रकाशित किया गया है, जो उन्होंने सन् 1938 ई० में दारुल इस्लाम पठानकोट (पंजाब) की जामा मस्जिद में आम मुसलमानों के सामने दिए थे। इन ख़ुतबों में इतने सादा और प्रभावकारी अन्दाज़ में इस्लाम की शिक्षाओं को उनकी रूह के साथ पेश किया गया है कि इन्हें सुनकर या पढ़कर बेशुमार लोगों की ज़िन्दगियाँ संवर गईं और वे बुराइयों को छोड़ने और भलाइयों को अपनाने पर आमादा हो गए।
मानव-लोक में आज सत्य और सच्चाई की कोई आवाज़ सुनाई देती है तो वह मनुष्य के अपने व्यक्तिगत सोच-विचार और तपश्चर्या का फल नहीं, बल्कि वह उन महान विभूतियों का उपकार है और उन्हीं की प्रतिध्वनि है, जिन्हें संसार नबी, पैग़म्बर या रसूल के नाम से याद करता आया है।उन महापुरुषों ने जब इस बात की घोषणा की कि उन्हें सत्य का ज्ञान प्रदान किया गया है तो इस घोषणा से उनके जिस उच्च कोटि के विश्वास का पता चलता है वह हमें दूसरों के यहाँ नहीं मिलता।
क्रान्ति-दूत हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) नईम सिद्दीक़ी की महान पुस्तक ‘मुहसिने इन्सानियत’ का संक्षिप्त संसकरण है। पहले इसे लेखक द्वारा रेडियो पर प्रसारित किया गया। रेडियो प्रसारण का यह सिलसिला तीस एपिसोड पर आधारित था। बाद में स्वयं लेखक ने कुछ संपादन के साथ पुस्तक का रूप दे दिया। इसमें मुख्य रूप से हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) द्वारा लाई गई विश्व व्यापी और अमर क्रांति पर चर्चा की गई है।
'मुस्लिम पर्सनल लॉ' एक ऐसा क़ानून है जो इस्लामी जीवन-व्यवस्था पर आधारित है। एक लम्बे समय से भारत में इसे विवादित मुद्दा बनाया जाता रहा है और माँग की जाती रही है कि इसे बदलकर देश में 'समान सिवल कोड' लागू कर दिया जाए। मुसलमान इस क़ानून को बदलने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि यह इस्लामी जीवन-व्यवस्था पर आधारित है। देश के बहुसंख्यक समुदाय के नेता सरकारी ज़िम्मेदारों की मदद से इसमें परिवर्तन की माँग करते रहते हैं। कभी-कभी कोई नेशनलिस्ट मुसलमान भी उसी सुर-में-सुर मिला बैठता है, और इस तरह यह मुद्दा दिन-प्रतिदिन महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है।इस पुस्तक में इसी समस्या पर वार्ता की गई है।
प्रस्तुत पुस्तिका जमाअत इस्लामी हिन्द के साम्राज्यवाद विरोधी अभियान के दौरान लिखी गई थी। इसमें बताया गया है कि आज का कॉरपोरेट मीडिया किस तरह अपने दायित्व से विमुख होकर साम्राज्यवादी पूँजीवाद की कठपुतली बन गया है। इससे देश और देशवासियों को कितना नुक़सान उठाना पड़ रहा है। इसनें मीडिया का इस्लामी दृष्टिकोण, भी पेश किया गया है और सुधार के उपाय भी बताए गए हैं।
हम अल्लाह की इबादत किस तरह करें? कैसे रहें-सहें? लेन-देन कैसे करें? एक आदमी के दूसरे आदमी पर क्या हक़ हैं? क्या हराम (अवैध) है? क्या हलाल (वैध) है? किस चीज़ को हम किस हद तक बरत सकते हैं और किस तरह बरत सकते हैं? ये और इसी तरह की तमाम बातें हमें शरीअ़त से मालूम होती हैं। इस्लामी शरीअ़त की बुनियाद क़ुरआन और सुन्नत है। क़ुरआन अल्लाह का कलाम है और सुन्नत वह तरीक़ा है जो नबी (सल्ललाहु अलैहि व सल्लम) से हमको मिला है। नबी (सल्ललाहु अलैहि व सल्लम) का सारा जीवन क़ुरआन पेश करने, समझाने और उसपर अमल करने में बीता। नबी (सल्ललाहु अलैहि व सल्लम) का यही बताना, समझाना और अमल करना सुन्नत कहलाता है। हमारे बहुत-से बुज़ुर्गों और आलिमों ने क़ुरआन और सुन्नत से वे तमाम बातें चुन लीं जिनकी मदद से हम दीन की बातों पर अमल कर सकें।
एकेश्वरवाद और परलोकवाद के अतिरिक्त इस्लाम की एक मौलिक धारणा है रिसालत अथवा पैग़म्बरवाद या ईशदूतत्त्व। ईश्वर ने जगत् में मानव की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की पूर्ण व्यवस्था की है। वर्षा इसी लिए होती है और धरती में अनाज इसी लिए पैदा होता है कि मानव को खाद्य-पदार्थ प्राप्त हो सके। ठीक इसी तरह ईश्वर सदैव से इसकी व्यवस्था करता रहा है कि मानव की वे अपेक्षाएँ भी पूरी हों जो उसकी नैतिक और आध्यात्मिक अपेक्षाएँ हैं। दूसरे शब्दों में ईश्वर ने सदैव स्पष्ट रूप से मानव का मार्गदर्शन किया और उसे बताया कि जगत् में उसका स्थान क्या है? यहाँ (धरती पर) वास्तव में उसे किस कार्य के लिए भेजा गया है? उसके वर्तमान जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? जीवन-यापन के लिए उसे किन-किन नियमों और सिद्धान्तों का पालन करना चाहिए? इस सिलसिले में मानव के मार्गदर्शन के लिए नबियों या पैग़म्बरों (ईशदूतों) को दुनिया में भेजा जाता रहा है।