मैं इस काम को अपने लिए बहुत बड़ा सौभाग्य समझता हूँ कि आज मुझे उन सम्मान एवं आदर कि अधिकारी बहनों से बात करने का अवसर मिल रहा है जिनकी ज़िंदगी का बड़ा भाग पवित्र क़ुरआन के शिक्षण-प्रशिक्षण में व्यतीत हुवा है, जिनकी दिन रात कि दिलचस्पियाँ पवित्र क़ुरआन के प्रचार-प्रसार से जुड़ी हुई हैं और जिन्होंने अपने जीवन के अधिकतर और मूल्यवान क्षण अल्लाह कि किताब के उत्थान और उसके शिक्षण-प्रतिक्षण तथा उसकी शिक्षाओं और संदेश को समझने और समझाने में व्यतीत किये हैं। पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) कि हदीस की दृष्टि से आप सब इस दुनिया में भी इस समाज का उत्तम अंग हैं और अल्लाह ने चाहा तो क़ियामत के दिन भी आपकी गणना मुस्लिम समुदाय को सर्वोत्तम निधि के रूप में होगी। इसलिए की पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) का कथन है : “तुम में से सर्वोत्तम वह है जिसने पवित्र क़ुरआन सीखा और सिखाया है।” आपने पवित्र क़ुरआन सीखा भी है और पवित्र क़ुरआन सिखाने का दायित्व भी अल्लाह की कृपा और अनुकंपा से तथा उसके असीम योगदान से संवरण कर रही है। इसलिए पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के कथनानुसार आप इस समाज का सर्वोत्तम अंग है।
इस चर्चा से दो चीज़ें पेश करना मेरा मक़सद है। एक तो इस ग़लतफ़हमी या कम-हिम्मती का खंडन कि इल्मे-हदीस पर जो काम होना था वह अतीत के वर्षों में हो चुका। और आज न इल्मे-हदीस पर किसी नए काम की ज़रूरत है और न कोई नया काम हो रहा है। मुहद्दिसीन के ये कारनामे सुनकर एक ख़याल यह ज़ेहन में आ सकता है कि जितना काम होना था वह हो चुका। जो शोध होना था वह हो चुका। अब और न किसी काम की ज़रूरत है और न किसी शोध की। यह ग़लतफ़हमी दूर हो सकती है अगर संक्षिप्त रूप से यह देख लिया जाए कि आजकल हदीस पर कितना काम हो रहा है और इसमें और किन-किन कामों के करने की संभावनाएँ हैं और क्या-क्या काम आगे हो सकते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में इल्मे-हदीस पर चर्चा की ज़रूरत दो कारणों से है। एक बड़ा कारण तो यह है कि भारतीय उपमहाद्वीप में एक ख़ास दौर में इल्मे-हदीस पर बहुत काम हुआ। यह काम इतने विस्तृत पैमाने पर और इतनी व्यापकता के साथ हुआ कि अरब दुनिया में बहुत-से लोगों ने इसको स्वीकार किया और इसके प्रभाव बड़े पैमाने पर अरब दुनिया में भी महसूस किए गए। मिस्र के एक प्रख्यात इस्लामी विद्वान और बुद्धिजीवी अल्लामा सय्यद रशीद रज़ा ने यह लिखा कि अगर हमारे भाई, भारतीय उपमहाद्वीप के मुसलमान न होते तो शायद इल्मे-हदीस दुनिया से उठ जाता। यह अट्ठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी की स्थिति का उल्लेख है। भारतीय उपमहाद्वीप के उलमा किराम ने उस दौर में इल्मे-हदीस का पर्चम बुलंद किया जब मुस्लिम जगत् अपनी विभिन्न समस्याओं में उलझा हुआ था।
आज की चर्चा में हदीस की कुछ प्रसिद्ध किताबों और उनकी व्याख्याओं का परिचय कराना अभीष्ट है। यह परिचय दो हिस्सों पर सम्मिलित होगा। हदीस की वे बुनियादी किताबें और उनकी वे व्याख्याएँ जो भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर लिखी गईं। उनपर आज की बैठक में चर्चा होगी। वे हदीस और व्याख्या की किताबें थीं जिनकी रचना का काम भारतीय उपमहाद्वीप में हुआ उनमें से कुछ एक के बारे में कल बात होगी।
आज की वार्ता का शीर्षक है उलूमे-हदीस यानी हदीस के बारे में विस्तृत ज्ञान। आज तक जितनी बहस हुई है इस सब का संबंध एक तरह से उलूमे-हदीस ही से है। ये सब विषय उलूमे-हदीस ही के विषय थे, लेकिन उलूमे-हदीस पर अलग से चर्चा करने की ज़रूरत इस बात पर-ज़ोर देने के लिए पेश आई कि जिन विषयों को उलूमे-हदीस कहते हैं वे एक बहुत बड़ी, एक अनोखी और नई इल्मी रिवायत (ज्ञान संबंधी परम्परा) के विभिन्न हिस्से हैं। यह परम्परा मुसलमानों के अलावा किसी और क़ौम में नहीं पाई जाती। ज्ञान एवं कला के इस मिश्रण को अनगिनत विद्वानों ने अपनी ज़िंदगियाँ क़ुर्बान कर के संकलित किया। और उन तमाम विषयों से संबंधित सामग्री एकत्र की जिसका संबंध परोक्ष या अपरोक्ष रूप से अल्लाह के रसूल (सल्लाहु अलैहि वसल्लम) के हालात, कथनों और व्यक्तित्व से था। उन्होंने इस सामग्री की पड़ताल की और इसको संकलित ढंग से और नित-नई शैलियों में पेश किया।
आज की चर्चा का शीर्षक है ‘रेहलत फ़ी तलबिल-हदीस’ यानी “इल्मे-हदीस की प्राप्ति और तदवीन (संकलन) के उद्देश्य से सफ़र।” यों तो ज्ञान प्राप्ति के लिए दूर-दराज़ इलाक़ों का सफ़र करना मुसलमानों की परम्परा का हमेशा ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा, लेकिन इल्मे-हदीस की प्राप्ति की ख़ातिर सफ़र का अपना एक अलग स्थान है। मुहद्दिसीन (हदीस के संकलनकर्ताओं) ने इल्मे-हदीस की प्राप्ति, हदीसों की पड़ताल, रावियों की जिरह और तादील (जाँच) और रिजाल (रावियों) के बारे में मालूमात जमा करने की ख़ातिर जो लम्बे और कठिन सफ़र किए उन सबकी दास्तान न सिर्फ़ दिलचस्प और हैरत-अंगेज़ है, बल्कि इल्मे-हदीस के इतिहास का एक बड़ा नुमायाँ और अनोखा अध्याय है।
तदवीने-हदीस (हदीसों के संकलन) के विषय पर चर्चा का उद्देश्य उस प्रक्रिया का एक सारांश बयान करना है जिसके परिणामस्वरूप हदीसों को इकट्ठा किया गया और किताब के रूप में संकलित करके हम तक पहुँचाया गया। संभव है कि आप में से जिसके ज़ेहन में यह ख़याल पैदा हो कि तदवीने-हदीस का विषय तो चर्चा के आरंभ में होना चाहिए था और सबसे पहले यह बताना चाहिए था कि हदीसें कैसे मुदव्वन (संकलित) हुईं और उनकी तदवीन (संकलन) का इतिहास क्या था।
इससे पहले इल्मे-इस्नाद और उससे संबंधित कुछ ज़रूरी मामलों पर चर्चा हुई थी और उसमें कहा गया था कि ख़ुद पवित्र क़ुरआन और अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की सुन्नत के अनुसार यह बात ज़रूरी है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से जो चीज़ जोड़ी जाए, वह हर तरह से निश्चित और यक़ीनी हो। उसमें किसी शक-सन्देह की गुंजाइश न हो और हर मुसलमान जो क़ियामत आने तक धरती पर आए उसको पूरे इत्मीनान और सन्तुष्ट दिल के साथ यह बात मालूम हो जाए कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने इसके लिए क्या बात कही है। क्या चीज़ जायज़ क़रार दी है, क्या नाजायज़ ठहराई है। किन चीज़ों पर ईमान लाना उसके लिए अनिवार्य क़रार दिया गया है और किन चीज़ों के बारे में उसको आज़ादी दी गई है।
इल्मे-इस्नाद और इल्मे-रिजाल आज की चर्चा का शीर्षक है। इल्मे-इस्नाद और इल्मे-रिजाल, इन दोनों का आपस में बड़ा गहरा संबंध है। ‘इस्नाद’ से मुराद है किसी हदीस की सनद (प्रमाण) बयान करना। जबकि सनद से मुराद है रावियों (उल्लेखकर्ताओं) का वह सिलसिला जो हदीस के आरंभिक रावी से लेकर अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) तक पहुँचता है। रावी कौन लोग हों, उनका इल्मी (ज्ञान संबंधी) दर्जा क्या हो, उनकी दीनी (धार्मिक) और वैचारिक प्रतिभा क्या हो, उसकी जो शर्तें हैं उनपर इससे पहले विस्तार से चर्चा हो चुकी है। लेकिन अभी यह चर्चा बाक़ी है कि रावियों के हालात जमा करने का काम कब से शुरू हुआ, किस प्रकार ये हालात जमा किए गए, और किसी रावी के स्वीकार्य या अस्वीकार्य या ज़ाबित (हदीस ग्रहण करने योग्य) या उसमें असमर्थ होने का फ़ैसला किस आधार पर किया जाता है। यह वह इल्म (ज्ञान) है जिसको इल्मे-अस्माउर्रिजाल या इल्मे-रिजाल के नाम से याद किया जाता है।
माइल ख़ैराबादी हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) इस्लाम के सबसे पहले ख़लीफ़ा हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) की छोटी बेटी थीं। इस्लामी इतिहास में जिस तरह हज़रत अबू-बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) सबसे ज़्यादा मशहूर हैं उसी तरह हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) मुसलमान औरतों में सबसे ज़्यादा नुमायाँ हैं, और हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) का यह परिचय भी कितना शानदार है कि वे अल्लाह के आख़िरी नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) की प्यारी बीवी थीं और यह कि अल्लाह तआला ने नबी (सल्ललाहु अलैहि वसल्लम) की बीवियों को उम्महातुल मोमिनीन (मुसलमानों की माएँ) कहा है। इस इरशाद के मुताबिक़ हज़रत आइशा (रज़ियल्लाहु अन्हा) उम्मुल मोमिनीन (मुसलमानों की माँ) हैं।
इल्मे-हदीस बुनियादी तौर पर दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक हिस्सा वह है जिसको ‘इल्मे-रिवायत’ कहते हैं और दूसरा हिस्सा वह है जिसको ‘इल्मे-दिरायत’ कहते हैं। इल्मे-रिवायत में उस ज़रिये या माध्यम से बहस होती है जिसके द्वारा कोई हदीस अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से लेकर हम तक पहुँची हो।
इरफ़ान ख़लीली नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़िन्दगी के गुलदस्ते का हर फूल बेमिसाल, हर एक की ख़ुशबू मेरे दिल के दामन को अपनी ओर खींच रही थी। मैं अजीब कशमकश में पड़ा हुआ था। न छोड़ते बनता था, न पकड़ते। मेरे अल्लाह ने मेरी मदद की। ज़ेहन में एक ख़याल उभरा— "क्यों न नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की ज़िन्दगी के उन वाक़िआत को जमा कर दूँ जो हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी से सीधा ताल्लुक़ रखते हों।" इस किताब के पढ़नेवालों से गुज़ारिश है कि इसे ग़ौर से पढ़ें और इस की बातों को अपनी ज़िन्दगियों में समोने की कोशिश करें।
मेरे दिल में भी बहुत दिनों से ख़ाहिश थी कि नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की एक ऐसी सीरत (जीवनी) लिखूँ— 1. जो मुख़्तसर हो लेकिन उसमें कोई ज़रूरी बात न छूटे। 2. जिसमें जंचे-तुले हालात और आख़िरी हद तक सच्चे वाक़िआत दर्ज हों। 3. जिसकी ज़बान इतनी आसान और सुलझी हुई हो कि उसको छोटी उम्र के लड़के-लड़कियाँ और कम पढ़े-लिखे लोग भी आसानी से समझ सकें। 4. जो स्कूलों और मदरसों के कोर्स में शामिल की जा सके। 5. जिसकी रौशनी में माँ-बाप और उस्ताद (शिक्षक) अपने बच्चों और शागिर्दों को नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की पाक ज़िन्दगी के वाक़िआत को आसानी से याद करा सकें। 6. जिसमें नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के बेहतरीन अख़लाक़ के अलग-अलग पहलुओं को दिल में उतर जानेवाले तरीक़े से ज़िक्र किया गया हो।
यह किताब अस्ल में मौलाना सैयद अबुल-आला मौदूदी (1903-1979 ई.) के दो लेखों (इत्तिबाअ् व इताअते-रसूल' और 'रिसालत और उसके अह्काम) का हिन्दी तर्जमा है। ये लेख मौलाना के लेखों के उर्दू संग्रह तफ़हीमात, हिस्सा-1 में प्रकाशित हुए हैं। ये लेख उन्होंने सन् 1934 और 1935 ई. में उर्दू पत्रिका 'तर्जुमानुल-क़ुरआन' में कुछ लोगों के सवाल के जवाब में लिखे थे। सवाल पैग़म्बर की फ़रमाँबरदारी करने के बारे में था। मौलाना मौदूदी (रहमतुल्लाहि अलैह) ने बड़े ही प्रभावकारी ढंग से दलीलों के साथ उनका जवाब दिया। आज भी इस तरह के सवाल बहुत से लोगों के दिमाग़ों में आते हैं या दूसरे लोगों के ज़रिए पैदा किए जाते हैं और लोग उन सवालों की ज़ाहिरी शक्ल को देखकर मुतास्सिर हो जाते हैं कि अगर कोई आदमी ख़ुदा को एक मानता है और कुछ अच्छे काम भी करता है तो क्या उसके लिए पैग़म्बर पर ईमान लाना और उसकी फ़रमाँबरदारी ज़रूरी है? और अगर ज़रूरी है तो क्यों? इसलिए ज़रूरत महसूस की गई कि ऐसे क़ीमती लेखों का हिन्दी में तर्जमा प्रकाशित किया जाए।
अल्लाह तीन प्रकार से इन्सानों को संबोधित करता है:- 1.अन्तः प्रेरणा द्वारा जो अल्लाह धार्मिक व्यक्तियों के मन या मस्तिष्क में सुझाव या विचार के रूप में डाल देता है। 2.किसी पर्दे के पीछे से दृश्य या दर्शन के रूप में जब योग्यतम व्यक्ति नींद या आलमेजज़्ब (आत्मविस्मृति) में हो, और- 3. ईश्वरीय संदेशवाहक हज़रत जिब्रील द्वारा प्रत्यक्ष ईश्वरीय संदेश के साथ, जिन्हें ईश्वर के चुने दूत तक पहुँचाने के लिए अवतरित किया जाता है। (क़ुरआन 42 : 51) यह आख़िरी रूप उच्च कोटि का है और इसी रूप में क़ुरआन हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर अवतरित हुआ। यह सीमित है केवल ईश-दूतों तक, जिनमें हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अन्तिम हैं और ईश दूतत्व की अन्तिम कड़ी हैं।